Category: लेख, विचार

  • नज़रिया – मुस्लिम प्रतिनिधित्व को कुचलने के लिए बेक़रार कन्हैया कुमार

    मौसम के रूख के साथ राजनीति का रूख भी बदलना शुरू हुआ है। जैसे-जैसे सर्दी से बसंत की तरफ बढ़ रहे है तापमान भी बढ़ता जा रहा है। सर्दी तो छंट चुकी है और गर्मी के मौसम मे क़दम रख चुके है। मौसम के साथ-साथ चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद राजनीति का तापमान भी बढ़ना शुरू हुआ है। टिकट एवं सीट बँटवारे को लेकर बैठक पर बैठक हो रहे है। गठबंधन को लेकर भी उधेड़-बुन शुरू है। सभी जाति-विशेष के नेता एवं मतदाता अपनी प्रतिनिधित्व को लेकर बेचैन है। छोटी-छोटी पार्टियां दांवा ठोककर मजबूती के साथ अपना प्रतिनिधित्व माँग रही है। लेकिन बिहार मे लगभग 20 प्रतिशत की आबादी वाले मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की लगातार कोशिश हो रही है।

    सबसे मज़ेदार बात बेगूसराय को लेकर है। बेगूसराय लेनिनग्राद के नाम से मशहूर है। बेगूसराय क्षेत्र कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ समझा जाता है। लेकिन यह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है। अभी भी उसी भ्रम को आधार मानकर कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय पर अपनी दावेदारी पेश करती है। आज भी महागठबंधन मे कम्यूनिस्ट पार्टी हिस्सेदार बनना चाहती है और बेगूसराय की सीट पर दावा ठोक रही है। जबकि बेगूसराय सीट मुसलमान समुदाय के हिस्से की सीट समझी जाती रही है। पूर्व मे भी जदयु से डॉ मोनजीर हसन सांसद निर्वाचित हुए है। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव मे राजद की टिकट पर पूर्व विधानपरिषद डॉ तनवीर हसन मोदी लहर मे भी मजबूत लड़ाई लड़े थे। अभी महागठबंधन होने की स्थिति मे कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट पर जेएनयू के पूर्व छात्रनेता कन्हैया कुमार की नज़र बेगुसराय सीट पर है।

    अभी तक यह भ्रम फैलाया जाता रहा है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ रहा है और इसलिए ही बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जानते है। मैं जब कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ तब सामूहिक रूप से सभी कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ। लेकिन स्वतन्त्रता से लेकर आजतक केवल 1967 के लोकसभा चुनाव मे ही बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के योगेन्द्र शर्मा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। जबकि 1962 के लोकसभा चुनाव मे मुस्लिम समुदाय से आने वाले अख़्तर हाशमी, 1971 के लोकसभा चुनाव मे योगेन्द्र शर्मा और 2009 के लोकसभा चुनाव मे शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट से दूसरे स्थान पर रहे थे। 1977 के चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के इन्द्र्दीप सिंह 72096 मत, 1998 मे रमेन्द्र कुमार 144540, 1999 के चुनाव मे सीपीआई(एमएएल) के शिवसागर सिंह 9317 और 2014 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र प्रसाद सिंह जदयु गठबंधन से 192639 मत प्राप्त करके तीसरे स्थान पर रहे थे। जब्कि 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 2004 के लोकसभा चुनावों मे कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय से अपना उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी थी। फिर सवाल है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?

    बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत चेरिया बरियारपुर, साहिबपुर कमाल, बेगूसराय, मठियानी, तेघरा, बखरी और बछवाड़ा विधानसभा का क्षेत्र आता है। चेरिया बरियारपुर से केवल एकबार 1980 के विधानसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सुखदेव महतो विधायक चुने गये थे। साहिबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र से अभी तक एक बार भी कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल नहीं रही है। बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से आज़ादी के बाद से अबतक केवल तीन बार ही कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल रही है और आखिरी बार कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र सिंह 1995 का विधानसभा चुनाव जीते थे। मठियानी विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी तीन बार चुनाव जीतने मे सफल रही है लेकिन सन 2000 मे हुए विधानसभा चुनाव के बाद आजतक कम्यूनिस्ट पार्टी यहाँ से चुनाव नहीं जीत सकी है। तेघरा विधानसभा क्षेत्र मे कम्यूनिस्ट पार्टी लगातार 2010 से ही विधानसभा का चुनाव हार रही है।

    कम्यूनिस्ट पार्टी का पूर्ण रूप से दबदबा केवल दो विधानसभा क्षेत्रों क्रमशः बखरी और बछवाड़ा पर रहा है। लेकिन बखरी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी आखिरी बार 2005 मे चुनाव जीतने मे सफल रही थी। जब्कि बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चार बार विधायक चुने गये है और आखिरी बार 2010 का विधानसभा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है की वर्तमान विधानसभा मे बिहार मे कम्यूनिस्ट पार्टी के मात्र तीन विधायक है और तीनों मे से एक भी बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से जीतकर नहीं आते है। यानि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव मे बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों मे से एक भी क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने मे सफल नहीं रहे थे। प्रश्न फिर वही है की जिस लोकसभा क्षेत्र मे एक भी विधायक नहीं है वह कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?
    2014 के लोकसभा चुनाव मे बेगूसराय से राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ तनवीर हसन को कुल 369892 मत प्राप्त हुए थे। जब्कि जदयु समर्थित कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 192639 मत प्राप्त हुआ था। वही 2009 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के शत्रुघ्न प्रसाद सिंह को 164843 मत प्राप्त हुआ था। यदि कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा 2009 और 2014 मे प्राप्त किए गये कूल मतों को एकसाथ जोड़ भी देते है फिर भी डॉ तनवीर हसन साहब द्वारा 2014 के मोदी लहर मे प्राप्त किए गये मतों से भी कम है।

    उपरोक्त आँकड़े यह बताने के लिए काफी है की बेगूसराय कभी भी कम्यूनिस्ट पार्टी का मजबूत क़िला नहीं रहा है। बल्कि पूर्वी चम्पारण(मोतीहारी), नालंदा, नवादा, मधुबनी, जहानाबाद इत्यादि ऐसे लोकसभा क्षेत्र है जहाँ से दो या दो बार से अधिक कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद निर्वाचित हुए है। जब्कि बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से मात्र एकबार ही कम्यूनिस्ट पार्टी को सफलता प्राप्त हो सकी है। लेकिन प्रश्न यह है की आख़िर कम्यूनिस्ट पार्टी क्यों बेगूसराय की सीट ही लेना चाहती है? जब कम्यूनिस्ट पार्टी सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर इतना चिंतित रहती है तब फिर क्यों बेगूसराय मे मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है?

    एक तर्क है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है इसलिए बेगूसराय की सीट कम्यूनिस्ट के खाते से कन्हैया को मिलनी चाहिये। यह बात सही है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है और कम्यूनिस्ट विचारधारा के ऊर्जावान पथिक है। वह जब राष्ट्रीय स्तर के नेता है तब भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते थे। मोतीहारी, नवादा, नालंदा, मधुबनी, जहानाबाद तो कम्यूनिस्ट का गढ़ रहा है और पहले से भी पार्टी के सांसद निर्वाचित होते रहे है फिर बेगूसराय पर ही नज़र क्यों है? अरविंद केजरीवाल दिल्ली से चलकर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध बनारस चुनाव लड़ने आये थे। दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश से चलकर मोदी के विरुद्ध बनारस लड़ने का एलान कर चुके है। हार्दिक पटेल ने भी कुछ ऐसा ही मंशा जाहीर किया है। फिर राष्ट्रीय स्तर के नेता कन्हैया कुमार मुसलमान समुदाय के हिस्से मे जाने वाली सीट से ही चुनावी मैदान मे उतरने के लिए क्यों उतावले है? क्या सिर्फ इसलिए की मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करके खुद की जीत सुनिश्चित कर सके? यानि की मुसलमानों के गर्दन पर चाकू चलाकर कन्हैया को सुरक्षित किया जा रहा है।

    लेखक़- तारिक अनवर चंपारणी, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्था (TISS), मुम्बई से मास्टर डिग्री है और वर्तमान मे बिहार के किसानों के साथ काम कर रहे है

  • चीन को लेकर अभी-अभी देखा गया एक सपना, सपने में सुना मोदी का भाषण

    रवीश कुमार

    भाइयों बहनों, हम चीन को पिचकारी मार-मार कर रंग देंगे। चीन ने आतंकी का साथ दिया है। उसकी सज़ा भुगतनी होगी। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा। अब चीन को पिचकारी से मार देंगे। होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे। एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी। इसके बार हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे। छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी।

    भाइयो बहनों, मैंने सारे एंकरों को ट्वीट किया है कि वे भी स्टुडियो में पिचकारी लेकर एंकरिंग करें। अब हर भारतीय के लिए कांग्रेसी चीन के समर्थक बन गए हैं। कांग्रेस के नेताओं ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। एंकरों से अपील है कि वे कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक और राजीव त्यागी को रंग रंग कर रंग दें। हम बदला लेंगे। हर हर मोदी, घर घर होली।

    प्रधानमंत्री का यह भाषण सुनकर मैं तैयार हो कर व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के लिए निकल पड़ा। इनबाक्स के बस्ते में पड़ी किताबों को पलटने लगा। वामपंथी प्रोफेसर ने उस चैप्टर को गायब कर दिया था जिसमें चीन की पिचकारी के विरोध का इतिहास लिखा था। सुबह से एक भी मेसेज नहीं आया कि आज चीन की पिचकारी का बहिष्कार होगा। जो भारतीय चीन की पिचकारी बेचेगा वो मसूद अज़हर का दामाद होगा। अपना व्हाट्स एप स्टेटस तैयार करने के बाद मैंने उसे अबकी बार पिचकारी सरकार वाले ग्रुप में भेज दिया। वहां से वायरल हो गया।

    चीन हमेशा आतंक का साथी रहा है। हमें चीन का साथ नहीं देना है। जो लोग चीन से सामान लाकर भारत का पैसा बीजिंग भेजते हैं, हम उन्हें दार्लीजिंग भेज देंगे। वहां उन्हें भारतीय मोमो बनाने की विधि की ट्रेनिंग दी जाएगी। हमने चीन को झूला झुलाया मगर चीन ने हमें झुला दिया है। हमारा काम हो गया है। सरदार पटेल की मूर्ति हमने बनवा ली है। चीन के इंजीनियर जा चुके हैं। भारतीय कारीगर बिना पगार के भी सरदार पटेल की रक्षा कर सकते हैं।

    मगर हम चीन की यह धमकी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। तभी टीवी पर प्रधानमंत्री का एक और भाषण आ गया। वे जनता से पूछ रहे थे। चीन को घर में घुस कर मारना चाहिए कि नहीं। एक एंकर ने एलान कर दिया है। चीन से युद्ध के सर्वे होने लगे हैं। सीमा पर प्रधानमंत्री के समर्थक पिचकारी भर कर जाते हुए दिख रहे हैं।

    आख़िर कब तक हम चीन को लेकर चुप होते रहेंगे। नेहरू चुप हो गए लेकिन नरेंद्र चुप नहीं रहेंगे। जो नेहरू नहीं कर पाए, वही तो नरेंद्र करते हैं। वे झूला झुलाते हैं तो चीन को झुलसा भी देंगे। मार पिचकारी, मार पिचकारी रंग देंगे। चीन का चेहरा बदल देंगे। मसूद अज़हर का जो साथी है, वो चीन हमारा दुश्मन है।

    तभी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में एक मेसेज आता है। चीन को लेकर विरोध पिचकारी और फुलझड़ी तक ही सीमित रखना है। न्यूज़ एंकरों को चीन के साथ शांति की बात करनी है। यह नहीं कहना है कि चीन ने मसूद अज़हर का साथ देकर पुलवामा के शहीदों का अपमान किया है। चीन को लेकर चुप्पी जैसे ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाने हैं। चीन डर गया भारत से या भारत डर गया चीन से इस तरह के नारे चैनलों पर नहीं लिखे होंगे। एक बंदा था जो न्यूज़ रूम में जा- जाकर सबको डांट रहा था। एडिटर मुर्गा बने बैठे थे। एडिटरों के मालिक अमित शाह से ब्रीफकेस में निर्देश ले रहे थे। विज्ञापन का नया नाम निर्देश है।

    फिर अचानक कोई ज़ोर से चिल्लाता है। प्रधानमंत्री मोदी का लाइव चैनलों पर आने लगता है। वो कहते हैं भाइयों और बहनों, शहीदों का अपमान कांग्रेस ने किया है। उसे हराना है। चीन अपने आप हार जाएगा। हमारी विदेश नीति इटावा से लेकर बेगुसराय तक हिट है। हम जीत रहे हैं। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा है। आप उसी में यह समझ लो कि हमने उसके दोस्त चीन को भी मारा है। हम वन प्लस वन नहीं करते, हम वन टू का फोर करते हैं। वन टू का फोर।

    मैं सपने से बाहर आ रहा था। नींद हल्की होने लगी। खिड़की पर बैठा बारिश की बूंदे गिन रहा था। मतदान केंद्रों पर वोट पड़ रहे थे। लोग अपने झूठ से हार रहे थे। गांव गांव में लोग कह रहे थे कि विदेश नीति में मोदी जीत गए हैं। चीन की पिचकारी से चीन को हरा दिया है।

    एंकर ने एलान किया। 70 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। आज पहली बार झूठ जीत गया है। मैं जाग गया था। व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के इनबाक्स में मेसेज चेक करने लगा था। अभी तक चीन की पिचकारी के बहिष्कार की कोई अपील नहीं आई है। क्या आपके पास ऐसे मेसेज आने लगे हैं?

    यह लेख फेसबुक पेज @RavishKaPage से लिया गया है।

  • चीखते घोटाले खामोश मीडिया-भारत राष्ट्रीय संप्रभुता का निर्लज्ज समझोता

    रक्षा सौदों एवं इससे जुड़े मुद्दों पर अक्सर रक्षा विशेषज्ञों ,अन्तराष्ट्रीय-राष्ट्रीय मीडिया की पैनी नज़र रहती है परंतु कुछ मसले जानपूछकर उजागर नहीं किये जाते, ये बड़े मीडिया हाउस और कॉर्पोरेट हाउस के गठबंधन के परिणाम से होता है ऐसा ही भारत में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस के साथ हुआ है जोकि अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस इंफ़्रा की सब्सिडरी है रिलायंस डिफेंस को अब रिलायंस नेवल के नाम से जाना जाता है 2014 से पहले इस कंपनी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी मोदी जी के सत्ता संभालते ही मोदी जी की योजना मेक इन इंडिया,और स्टार्ट अप इंडिया का जादुई फायदा रिलायंस नेवल को हुआ, इस कंपनी के इजराइल,अमेरिका,फ्रांस,रूस,एमिरेट्स,जर्मनी से अचानक लाखों करोड़ के समझौते होने लगे,और ये सब हुआ प्रधानमंत्री मोदी जी की मध्यस्थता से,इस संदर्भ में कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं।

    रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर,रिलायंस डिफेंस या अब बदले हुए नाम रिलायंस नेवल को डिफेंस के क्षेत्र में शून्य अनुभव था ऐसे में 2015 से 2016 के बीच गुजरात बेस्ड पिपावाव शिपयार्ड का अधिग्रहण रिलायंस डिफेंस करता है और पिपावाव शिपयार्ड रिलायंस डिफेंस बन जाता है इसके बाद एक जादू की छड़ी घूमती है और न कुछ कंपनी विश्व की बड़ी महाशक्तियों की चहेती कंपनी बन जाती है। जिसमें मोदी जी निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका निभाते है।
    सन 2015 से 2016 के बीच 35 डिफेंस से संबंधित लाइसेंस रिलायंस डिफेंस को मिलते हैं जिसमें 12 लाइसेंस 3 दिसंबर 2015 को एवं 16 लाइसेंस एक साथ 5 मई 2016 को दे दिए जाते हैं जिसमें मिसाइल बनाने के लाइसेंस भी सम्मिलित है साथ ही नागपुर में 10 सप्ताह से भी कम समय में 289 एकड़ जमीन हेलीकॉप्टर बनाने के लिए दे दी जाती है आश्चर्य चकित करने वाला तथ्य देखिए रिलायंस 16 जून 2015 में महाराष्ट्र सरकार के समक्ष जमीन के लिए आवेदन करती है और 26 अगस्त 2015 को देवेंद्र फड़नवीस एक कार्यक्रम में जमीन से सम्बंधित कागजात दे देते हैं ये भारत के इतिहास में पहली बार था जब इतने कम वक्त में इतनी बड़ी जमीन का आवंटन निजी कंपनी को कर दिया गया।

    रिलायंस डिफेंस जो अब रिलायंस नेवल है के साथ विभिन्न देशों की बड़ी हथियार निर्माता कंपनी और मोदी जी की विदेश यात्रा की टाइमिंग देखिए,सत्ता और औद्योगिक घरानों का घृणित गठभन्धन नजऱ आएगा।
    24 दिसंबर ,2015 को रूस की कंपनी अलमज़ अन्ते ने रिलायंस डिफेन्स के साथ लगभग 42 हज़ार करोड़ का समझोता किया, इससे पहले दिसंबर के प्रथम सप्ताह में भारत सरकार ने रूस के साथ चार एस-400 एयर डिफेन्स सिस्टम खरीदने का 32000 हज़ार करोड़ का सौदा किया, गौर करें मोदी जी 23 और 24 दिसंबर 15 को रूस की आधिकारिक यात्रा पर थे।
    30 मार्च 2016 को इजराइल की कंपनी राफेल के साथ रिलायंस डिफेन्स (अनिल अम्बानी) की 65000 करोड़ की डील फाइनल हुई, और इससे पहले मार्च 3, 2016 को भारत सरकार ने दो अवाक्स ( वार्निंग सिस्टम) खरीद का सौदा इज़राइल सरकार के साथ किया और इसके तुरंत बाद इजराइल की कौन्सेल जनरल येल हशवित ने कहा की मोदी जी शीघ्र ही इज़राइल की यात्रा करेंगे।
    रिलायंस डिफेंस ने 21 जून 2017 को फ्रांस की कंपनी थेल्स के साथ राडार,और एयरबोर्न सिस्टम बनाने के लिए जॉइंट वेंचर बनाने का समझौता किया,इससे पहले सिंतबर 2016 में भारत फ्रांस के साथ 36 राफेल जेट विमान का समझौता 59000 करोड़ रुपये में कर चुका था यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि थेल्स , दसॉल्ट फाल्कन जो कि भारत को राफेल उपलब्ध करवाएगा,उसे तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाता है।
    दक्षिण कोरिया की LIG NEX 1 के साथ रिलायंस नेवल ने 17 अप्रैल 2017 को सामरिक संबद्धता का समझौता किया ,जिसके तहत रिलायंस नेवल को मिलिट्री हार्डवेयर बनाने में साउथ कोरिया की फर्म सहायता करेगी, इससे पहले 2015 में सिओल में मोदी जी दक्षिण कोरिया के साथ रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हो चुके थे।

    रिलायंस नेवल ने फ्रांस की देहर ऐरोस्पेस के साथ 22 जून 2017 को समझौता किया,इससे पहले भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी जून 2017 के पहले सप्ताह में फ्रांस की यात्रा पर थे ये उनकी तीसरी फ्रांस यात्रा थीं।
    6 जून 2015 को अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस पावर को बांग्लादेश में 3 हज़ार मेगावाट का गैस बेस्ड पॉवर प्लांट एवं एल एन जी टर्मिनल लगाने का समझोता हुआ, उस वक्त 6 से 7 जून प्रधानमन्त्री जी बांग्लादेश की यात्रा पर थे।
    अब आप एक तथ्य पर गौर करें की एक ऐसी कंपनी जो की एक वर्ष में ही बनी है( रिलायंस डिफेन्स) उसे रूस,इजराइल ,फ्रांस से लगभग 1 लाख करोड़ के डील किस बिनाह पर मिले, साथ ही ये संयोग कैसे हुआ की पहले भारत सरकार ने खरीद के हज़ारों करोड़ के आर्डर उन्हें दिए,फिर अनिल अम्बानी की कंपनी के साथ डील हुई, ये भी कैसे हुआ की 35 बड़े लाइसेंस एक ही झटके में दे दिए गए।
    यहां यह प्रश्न करना भी लाजमी है कि जब भारत में बी ई एल,बी ई एम एल,बी एच ई एल जैसी रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनी विधमान हैं तो बार भारत की तरफ से अनिल अंबानी की कंपनी को विभिन्न अंतराष्ट्रीय करारों के लिए आगे करने का क्या अर्थ है ?
    अब ज़रा अनिल अंबानी की विश्वसनीयता पर गौर करते हैं रिलायंस कम्युनिकेशन और रिलायंस पावर सहित अनिल अंबानी ग्रुप पर 1 लाख करोड़ से ऊपर का कर्ज है जिसमें से 45000 करोड़ का जो कर्ज रिलायंस कम्युनिकेशन को दिया गया था वह कर्ज लगभग डूब चुका है कम्युनिकेशन का शेयर जो 1000 रु हुआ करता था 16 रु पर है वहीं कभी 450 रु बिकने वाला रिलायंस पावर 40 रु पर है इसके अलावा अनिल अंबानी पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस के सवालों से लेकर 2 जी में संलिप्तता के आरोप भी लगते रहे है। ऐसी स्थिति में विदेश यात्राओं के दौरान लगातार अनिल अंबानी को साथ ले जाना,और जिन देशों से भारत रक्षा के क्षेत्र में समझौता कर रहा हैं उन देशों की अंतराष्ट्रीय रक्षा समझौते में सम्बद्ध कंपनी के साथ अनिल अंबानी की कंपनियों के समझौते स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि यद्यपि मोदी जी ने अपने चुनाव पूर्व के वादे रक्षा सौदों से बिचोलिये की अवधारणा को समाप्त कर दूंगा की दिशा में कदम उठाते हुए,स्वयं को बिचोलिये की भूमिका में स्थापित कर लिया है। इसका सबसे बड़ा फायदा विदेशी मुल्कों को हुआ, की उन्हें बिचोलिये के द्वारा सौदों में होने वाली देरी से निजात मिल गयी।

    आज के इस ‘उत्तर सत्य’ युग में जहां सत्य के ऊपर आभासी या काल्पनिक आवरण चढ़ा दिया जाता है वहां विभिन्न मसलों पर तथ्यात्मक परख ,तार्किक विवेचन के माध्यम से ‘उत्तर सत्य’ युग के वाहक कॉर्पोरेट सत्ता गठभन्धन को बेनकाब किया जा सकता है।
    संदर्भ : इस लेख के लिए आधार सामग्री रिलायंस इंफ़्रा,रिलायंस डिफेंस,रिलायंस नेवल,पिपावाव शिपयार्ड द्वारा बी एस सी,एन एस सी में फ़ाइल किये गए डिस्क्लोज़र, डी आई पी पी द्वारा जारी डिस्कोलज़र ,प्रधानमंत्री के दौरों का मीडिया कवरेज, विभिन्न विदेशी कंपनी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति द्वारा गृहण की गई है। लेखक लिखे गए तथ्यों की प्रामाणिकता के लिए जिम्मेवार है।)
    (प्रो. अरविंद वर्मा
    एसोसिएट प्रोफेसर,राजनीति विज्ञान विभाग
    भरतपुर,राजस्थान)

  • दुनिया ने महिलाओं को आजादी के नाम पर पर्दे से निकाल कर बहुत बड़ा जुल्म किया है: मौलाना उसामा कासमी

    दुनिया ने महिलाओं को आजादी के नाम पर पर्दे से निकाल कर बहुत बड़ा जुल्म किया है, उनके ऊपर दोहरी जिम्मेदारी डाल दी है। नतीजा यह हुआ कि पाश्चात्य सभ्यता वाले यूरोपीय देशों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनको अपने बाप का पता नहीं है । इन विचारों को जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद मतीनुल हक उसामा कासमी काजी ए शहर कानपुर ने आज 8 मार्च को महिला दिवस के अवसर पर जामा मस्जिद अशरफाबाद में आयोजित जलसे में व्यक्त करते हुए कहा कि इस्लामी शरीयत ने मियां बीवी के आपसी ताल्लुकात को बहुत अहमियत दी है रिश्ते नाते को तोड़ने का काम करने वालों को जहन्नम में डाला जाएगा, यह बहुत बड़ा जुर्म है । हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मर्द और औरतों दोनों के हुकूक बताए हैं। मर्दों को वरीयता इसलिए दी है कि क्योंकि घर की निगरानी और खर्च की जिम्मेदारी उनके ऊपर है, घर के अंदर के तमाम कामों की जिम्मेदारी औरतों की है । मौलाना ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान को बताया कि तुम में सबसे बेहतर वह है जो अपनी बीवी के लिए अच्छा हो । मौलाना ने कहा कि अगर किसी की दो बीवी हैं तो उनमें फर्क ना करें , बराबरी और इंसाफ का मामला कर सकें तभी दूसरी शादी करें । मौलाना ने बताया कि महिलाएं चाहेंगी तो घर का निजाम बहुत अच्छा चलेगा । हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से हजरत आयशा का रिश्ता अल्लाह ने आसमान में तय किया था, हजरत आयशा रजि० अल्लाह की जिंदगी रहती दुनिया तक की महिलाओं के लिए नमूना है । आज कुछ लोग औरतों को धोखा देते हुए कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जमाने में औरतें मस्जिद में जाती थीं, हजरत उमर रजि अल्लाह ने मना कर दिया। सवाल करते हैं कि नबी की मानोगे या हजरत उमर की ? दरअसल यह सवाल ही गलत है क्योंकि हजरत उमर रजिअल्लाहु अन्हा कभी नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खिलाफ हो ही नहीं सकते हैं ।

    जब हजरत उमर ने महिलाओं को मस्जिद में जाने से मना किया तो उस वक्त भी कुछ नेक ख्वातीन हजरत आयशा के पास पहुंची थीं तो हज़रत आयशा ने भी यही कहा था कि हजरत उमर ने बिल्कुल सही फैसला लिया है। खुद नबी का फरमान है कि औरतों का घर में नमाज पढ़ना अफजल है हालांकि मस्जिद में भी नमाज हो जाएगी। अब यह हमारी महिलाओं को तय करना है कि उन्हें सवाब चाहिए या शौक चाहिए। जब हालात बदल गए और आसमानी हिदायतें आनी बंद हो गईं तो उस वक्त हजरत उमर ने यह फैसला लिया। मौलाना उसामा ने कहा कि हुजूर ने अपनी तमाम बीवियों के साथ इंसाफ का मामला किया, अपनी बीवी का इतना ख्याल रखते थे कि आप जब तहज्जुद की नमाज के लिए उठते तो इतनी आहिस्ता जाते कि सोने वाले की नींद में खलल ना पड़ जाए। नबी के जमाने में भी कुछ सहाबा ने कहा था कि हम दुनियादारी सब छोड़कर सिर्फ इबादत में लग जाएंगे तो हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नाराजगी का इजहार करके कहा था कि इबादत के साथ मामलात और मआशरत(समाजी कार्य) भी हैं ।

    नबी ने रात को तीन हिस्सों में तक्सीम किया था एक हिस्से में इबादत करते एक हिस्से में बीवी बच्चों का हक अदा करते हैं और एक में अपने जिस्म को राहत पहुंचाने के लिए सोते थे। इसलिए हमें इस्लामी निज़ाम को समझने की जरूरत है । मौलाना ने कहा कि औरतें घर के अंदर है तो मल्लिका और महारानी बनकर रहती हैं , घर में उनका ही हुक्म चलता है , घरों में जब नानी दादी अम्मा फूफी और खाला वगैरा रहती हैं तो कितना अच्छा और मुहब्बत का माहौल रहता है। लेकिन आजादी के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता को अच्छा बताने वाले उसके नुकसान आपको भूल जाते हैं कि वहां की नाजायज़ औलादें जिन्हें अपने बाप का नाम नहीं मालूम वह कभी अपनी बूढ़ी मां की इज्जत नहीं कर सकती बल्कि उन्हें ओल्ड होम में भेज देती है , उनके पास अपने मां बाप से मिलने का वक्त नहीं रहता , मरने के बाद भी बिल अदा करके अपनी अंतिम संस्कार करवा देते हैं। ऐसे समाज को कभी अच्छा नहीं कहा जा सकता , इसलिए अल्लाह ने हमें जो दीनी और ईमानी दौलत, खानदानी एकता, फैमिली सिस्टम, एक दूसरे का हक़ अदा करने का जो निज़ाम अता किया है , उस पर शुक्र अदा करके उसकी कद्र करनी चाहिए।(मौलाना मोहम्मद मतीनुल हक कासमी, अध्यक्ष जमियत उलेमा उत्तर प्रदेश)

  • चैनलों ने तो पत्रकारिता की कंट्रोल लाईन ही उड़ा दी! लेखक:डॉ.यामीन अंसारी

    भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अपने चरम पर है। दोनों देशों के बीच भले ही बाक़ायदा जंग न हुई हो, लेकिन युद्ध के बादल अब भी मंडरा रहे हैं। यानी ख़तरा अभी टला नहीं है। इस बीच युद्ध से भी बड़ा ख़तरा हमारे सामने है। यह ख़तरा है मीडिया, और विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। अफसोस कि यह ख़तरा सीमा के इधर भी है और उधर भी है। यही कारण है कि सीमा के दोनों ओर सरकारों और फौज से ज़्यादा हमारे टीवी स्टूडियोज़ युद्ध का मैदान बन गए हैं। यहाँ की चीख़ पुकार, एक दूसरे पर लानत मलामत, गाली गलौच, बड़े बड़े और झूठे दावे, भ्रामक रिपोर्टिंग और विश्लेषण करते इन टीवी चैनलों ने अजीब सी जुनूनी स्थिति पैदा कर दी है। वैसे अपने ही पेशे के बारे में और वह भी आलोचनात्मक दृष्टिकोण से लिखना एक मुश्किल काम है, लेकिन पत्रकारिता का पहला नियम कहता है कि अपनी भावनाओं और विचारों से परे होकर अपने काम को अंजाम दिया जाए। वैसे मैने इस पेशे में आने के बाद सभी प्रकार की अनुकूल और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हर संभव प्रयास किया है कि किसी भी कीमत पर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जाए।

    क्योंकि हक़ीक़त में तो पत्रकारिता आदर्शवाद और सिद्धांतों पर क़ुर्बान हो जाने का ही नाम है। भले ही आज इस पेशे में शामिल एक वर्ग ने न केवल सिद्धांतों को ताक़ पर रख दिया है, बल्कि अपने ज़मीर के साथ अपने क़लम का भी सौदा कर लिया है। यह हमारे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज टीवी पत्रकारिता, पत्रकारिता कम चापलूसी और अदाकारी अधिक दिखती है। यहाँ समाचार बिकने लगे हैं, बल्कि चीख़-चीख़कर बेचे जा रहे हैं। अन्यथा पत्रकारिता का नियम तो कहता है कि किसी डर और लालच के बिना सरकारों से सवाल किया जाए, उनके कार्यों का हिसाब लिया जाए, जनता के मुद्दों को उठाया जाए, सरकारों की कमियों और लापरवाहियों को सामने लाया जाए, चाहे हुक्मरां कितना ही ताक़तवर व्यक्ति क्यों न हो। इतिहास गवाह है कि इसी देश में मौलवी मुहम्मद बाक़र जैसे पत्रकार भी पैदा हुए हैं। मौलवी मुहम्मद बाक़र की गिनती ऐसे मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों में होती है जो पत्रकार तो थे ही, देशभक्ति को अपने ईमान का हिस्सा समझते थे। उन्होंने अपनी बेबाक पत्रकारिता से अंग्रेज़ हुकूमत की नींव हिला कर रख दी थी। हर प्रकार के ज़ुल्म और अत्याचारों के बावजूद उनका क़लम ख़ामोश नहीं हुआ, उस अत्याचारी सरकार के सामने उन्होंने हथियार नहीं डाले। आख़िरकार हुकूमत के सामने न झुकने और पत्रकारिता के सिद्धांतों से समझौता न करने के कारण 16 सितम्बर 1857 को मौलवी बाक़र को तोप के मुंह पर बांधकर शहीद कर दिया गया। जब हमारी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे जांबाज़ और बेबाक पत्रकार मौजूद रहे हों तो हमें उन्हें अपना आदर्श मानने में क्या बुराई है? आज अगर पत्रकारों को सवाल करने से रोका जा रहा है, उनके क़लम और ज़बान पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया जा रही है, उन्हें ख़रीदने और धमकी देने की कोशिश की जा रही है और यह सब संभव भी हो रहा है तो समझ लें कि क़लम और ज़बान अपना अस्तित्व खो चुके हैं।

    पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादियों के हमले के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जो भूमिका निभाई है, वह किसी फिल्म के खलनायक के रूप में हमारे सामने आती है। दंगा-फसाद, युद्ध और अनुकूल परिस्तिथियों में तो मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाने की और कोशिश करेगा कि लोग और अधिक उग्र न हों और धैर्य से काम लें। परंतु आज इसके बिल्कुल विपरीत हो रहा है। पुलवामा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, मीडिया ने आग में घी डालने का काम किया। चैनलों पर चीख़ते चिल्लाते, बदला लेने, जनता को उत्तेजित करने और सरकार से पाकिस्तान के खिलाफ त्वरित कार्रवाई का दबाव बनाते टीवी एंकर लगता है जैसे खून के प्यासे हो गए हैं। उन्हें इंसानी जान की न परवाह है और न ही कोई उसका मूल्य है। वह समझते हैं कि टीवी स्टूडियो में बैठकर ही सारे मुद्दे हल हो जाएंगे। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि आज की पत्रकारिता ने अपने सिद्धांतों से पूरी तरह से समझौता कर लिया है। उन्हें लगता है कि दंगा, फसाद और युद्ध की स्थिति से बेहतर उनके लिए कुछ नहीं है। जैसा कि ऊपर कहा गया कि अब समाचार और पत्रकारिता बेची जा रही है तो ऐसे में यह स्थिति उनके लिए एक सामान है, जिसे वह अधिक मिर्च मसाला लगाकर बेच रहे हैं। वर्तमान में मीडिया ने अपने प्रदर्शन से जो बदमानी हासिल की है, वह उनकी कमाई ही कही जा सकती है। हालांकि अब पाठक और दर्शक भी बखूबी उनके अभिनय और चापलूसी को समझने लगे हैं। यही कारण है कि कुछ टीवी एंकर तो अपनी उग्रता के कारण समाज में खलनायक बन गए हैं। उन्हें अब असामाजिक तत्वों में गिना जाने लगा। यहां तक कि वैश्विक स्तर पर भी हमारे मीडिया ने अपनी जो तस्वीर बनाई है वह सबके सामने है। कई मौकों पर भारतीय मीडिया का उपहास उड़ाया गया है। और यह सब पिछले कुछ समय के दौरान ही हुआ है, मतलब कहा जा सकता है कि इस समय पत्रकारिता अपने सबसे ख़राब दौर से गुजर रही है। वर्ना आज भी पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलने वाले और देश में उत्तेजना और घृणा के खिलाफ खुल कर बोलने वाले टीवी पत्रकार रवीश कुमार को दर्शकों से अपील नहीं करनी पड़ती कि आप लोग केवल दो ढाई महीने टीवी देखना बंद कर दें।
    कुछ समाचार चैनल तो जैसे सुनियोजित तरीके से न केवल सरकार और संघ परिवार के प्रोपगंडे का हिस्सा बन गए हैं, बल्कि देश और समाज में नफरत को हवा देने में लगे हैं। इनमें पत्रकारिता के सिद्धांतों को धता बता कर केवल ज़हर उगलने और उत्तेजना फैलाने वाला ‘रिपब्लिक’ चैनल सबसे आगे है। अभी तक अंग्रेजी में ही अपने भड़काऊ पन और चीख-पुकार के लिए प्रसिद्ध रहा यह चैनल अब हिंदी में भी विशेष उद्देश्य के तहत काम कर रहा है। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि रिपब्लिक भारत चैनल ने लांचिंग के दिन ही एक झूठी और गुमराकुन ख़बर चलाई। इस चैनल ने पहले ही दिन अयोध्या से संबंधित 28 वर्ष के बाद फर्जी और ग़लत ख़बर चलाई। जिसका उद्देश्य हिंदुओं की भावनाओं को भड़काना और यूपी में समाजवादी पार्टी के खिलाफ माहौल बनाना था। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके कुछ दिन बाद ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक झूठे मामले को बड़े हंगामे में बदलने में चैनल का बड़ा रोल रहा। हिंदू संगठनों की राह अपनाते हुए पाकिस्तान का सहारा लेकर भारतीय मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलना इस चैनल ने अपना सिद्धांत बना लिया है। हाल ही में जमाते इस्लामी हिंद और उसके अध्यक्ष को रिपब्लिक चैनल ने अपने झूठे और भ्रामक प्रचार का शिकार बनाया। पत्रकारिता के सिद्धांतों को रौंदते हुए चैनल ने जमाते इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी के बारे में झूठी, भ्रामक और आपत्तिजनक ख़बर चला दी। रोज़नामा इंक़लाब ने इसके खिलाफ अभियान चलाया और आख़िरकार चैनल और उसके संपादक अरनब गोस्वामी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। इसी प्रकार कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में भी भ्रामक और असत्य कवरेज के कारण उसे एक अदालत के नोटिस का सामना करना पड़ा। केवल यही नहीं, इसके अलावा भी कई अन्य चैनल संघ परिवार की मुस्लिम विरोधी और सरकार समर्थक नीतियों पर चल रहे हैं। जंगी जुनून में डूबे हुए ऐसे ही एक अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन न्यूज़ 18’ ने मक्का, मदीना और मस्जिदे अक्सा की तस्वीरें दिखाकर उसे जैश के आतंकवादी कारखाने बता दिया। इंक़लाब ने इस मामले को भी उठाया, आखिरकार इस स्टोरी पर न्यूज़ 18 नेटवर्क को Explanation जारी करना पड़ा। चैनल ने अपने Explanation में कहा कि एक मार्च को फर्स्टपोस्ट, सीएनएन और नेटवर्क 18 व अन्य ने एक खोजी रिपोर्ट चलाई थी, जिसमें प्रोपगंडा वीडियो का उपयोग किया गया था, जिसे जैश ने अपने मदरसे के विस्तार को दिखाने के लिए तैयार किया था। अब यह कौन सा पत्रकारिता नियम है कि एक आतंकवादी संगठन की प्रोपगंडा सामग्री चैनल पर चलाई जाए? ख़ुदा जाने ये चैनल भारत को किस ओर ले जाना चाहते हैं। अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो इसके परिणाम बहुत विस्फोटक हो सकते हैं।

  • सड़कों पर जुलूस निकाल’पाकिस्तान मुर्दाबाद’करने के बजाय उन टीवी चैनलों की शवयात्रा निकाली जाये जो लोकतंत्र और शांति के लिये खतरा बन गए हैं।

    हेमंत कुमार झा:पाकिस्तान से निबटने के लिये तो सेना है, रक्षा और विदेश विभाग का थिंक टैंक है, लेकिन मीडिया के उस वर्ग से कौन निबटेगा जो मूलतः जनविरोधी और शान्तिद्रोही बन चुका है? इसने पत्रकारिता की मौलिक अवधारणा की हत्या तो कब की कर दी थी और अब स्वयं देश के लिये एक बड़ा खतरा बन गया है।

    विश्वसनीयता…जो मीडिया की आत्मा है, वह इसका साथ छोड़ चुकी है और उसकी प्राणहीन देह अब दुर्गंध के सिवा कुछ नहीं फैला रही।

    नौबत यह है कि भारत-पाक के बीच उभरे तनावों और सैनिक कार्रवाइयों की सही जानकारी के लिये समझदार लोगों के पास अंतरराष्ट्रीय मीडिया के पास जाने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। कुछेक भारतीय चैनल हैं जो संतुलित और वस्तुनिष्ठ खबरें देने की कोशिशें कर रहे हैं लेकिन विश्वसनीयता का संकट, जिसके कोहरे में भारतीय मीडिया घिर चुका है, इन संतुलित खबरों की सच्चाई के प्रति भी आस्था नहीं जगा पा रहा।

    अधिकांश चैनल और उनके आत्ममुग्ध एंकर देशभक्ति को सत्ताधारी दल की दलाली में बदल चुके हैं। एंकरों की भाषा, उनका ‘बॉडी लैंग्वेज’ उनके परोक्ष राजनीतिक उद्देश्यों की खुलेआम चुगली करता है और…इसमें क्या आश्चर्य कि उन्हें इसकी कोई शर्म भी नहीं।

    जिस तरह किसी नाटक-नौटंकी में उटपटांग हरकतें करते और अशालीन भाषा में बातें करते घटिया दर्जे के विदूषकों से किसी भी तरह के शर्म की अपेक्षा करना बेकार है, उसी तरह ये चैनल और उनके एंकर हैं।

    मीडिया में राष्ट्रवाद की इतनी फूहड़ और भ्रामक प्रस्तुति ने राष्ट्र, सेना, सरकार, सत्ताधारी दल और सत्तासीन राजनेता के बीच के फर्क को पाट कर उन्हें एक ही धरातल पर ला दिया है।

    पत्रकारिता के अध्येताओं के लिये भविष्य में यह एक रोचक अध्याय होगा कि किस तरह कुछेक हाथों में भारतीय चैनलों का मालिकाना हक सिमटता गया और पत्रकारों की जगह बोलती कठपुतलियों के माध्यम से अपने राजनीतिक और आर्थिक हित साधने की कवायदें चलती रहीं।

    इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उभार ने नई उम्मीदें जगाई थीं और लगा था कि दृश्य-श्रव्य का यह माध्यम सच को कुछ अधिक करीब से, कुछ अधिक बेहतर तरीके से लोगों तक पहुंचा सकेगा। लेकिन, इसने पहली हत्या सच की ही की।

    हालांकि, सच पर पहला आक्रमण प्रिंट मीडिया के दौर में ही हो चुका था। एक वक्त था जब छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता थी। धीरे-धीरे यह खंडित होती गई क्योंकि लोकतंत्र का हरण करने वाली शक्तियों को मीडिया के प्रभावों का अंदाजा था। उन्होंने अखबारों को शिकंजे में लेना शुरू किया।

    किन्तु, प्रिंट मीडिया को पूरी तरह शिकंजे में लेना कभी संभव नहीं हो सका। कुछेक स्वतंत्र चेता संपादकों और निर्भीक रिपोर्टरों ने सच्चाई से मुठभेड़ कर जन सापेक्षता के नए प्रतिमान स्थापित किये।
    अखबारों की साख पर धब्बे तो लगते रहे, संपादक के पदों पर बौद्धिक रूप से बौने या मालिक के राजनीतिक हितों के प्रति हितैषी लोगों को बिठाया जाने लगा, लेकिन तब भी, न्यूनतम विश्वसनीयता बनी रही।

    1990 के दशक में संपादकों के पदों का ही अवमूल्यन कर दिया गया। इसने प्रिंट मीडिया की साख को निर्णायक धक्का पहुंचाया। अब अधिकतर मालिकान ही संपादकों का दायित्व निभाने लगे। जाहिर है, सच से अखबारों का नाता टूटने लगा।

    1990 के दशक में ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास और विस्तार के साथ निजी समाचार चैनलों का भी आगमन हुआ। उसके बाद तो तमाम प्रतिमानों के ध्वस्त होने का दौर शुरू हो गया।
    पहले खबरों और मनोरंजन का फर्क मिटा, फिर सनसनी फैलाने के लिये खबरों के साथ खिलवाड़ करने की प्रवृत्ति पनपी…और तब…खबरों की जगह दलाली और प्रस्तोताओं की जगह दलालों ने लेनी शुरू की। नए-नए मीडिया घराने अस्तित्व में आए जिन्हें पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था। जाहिर है, उन्होंने ऐसे लोगों की भर्त्ती की जो उनके राजनीतिक, प्रकारान्तर से व्यावसायिक उद्देश्यों के वाहक बने।

    आज का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इतना जनविरोधी बन चुका है कि उन्हें देखना, उनके साथ थोड़ा भी वक्त बिताना अपना दिमाग प्रदूषित करना है। वे प्रदूषण फैलाने के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे। वे कुछ और कर भी नहीं सकते, क्योंकि उनकी नियुक्ति ही इसीलिये की गई है।

    आतंकवादियों से निबटने के लिये देश में सक्षम तंत्र है और वे उनसे निबट भी रहे हैं। लेकिन…इन चैनलों से, इनके दलाल एंकरों से, जिन्होंने आम जन के जरूरी मुद्दों को पत्रकारिता के दायरे से पूरी तरह बाहर कर दिया है, निबटने के लिये रास्तों की तलाश करनी होगी।
    (हेमंत कुमार झा)

  • वायु सेना,सरकार के पराक्रम के बीच पत्रकारिता का पतन झाँक रहा है।

    आज का दिन उस शब्द का है, जो भारतीय वायु सेना के पाकिस्तान में घुसकर बम गिराने के बाद अस्तित्व में आया है। भारत के विदेश सचिव ने इसे अ-सैन्य कार्रवाई कहा है। अंग्रेज़ी में non-military कहा गया है। इस शब्द में कूटनीतिक कलाकारी है। बमों से लैस लड़ाकू विमान पाकिस्तान की सीमा में घुस जाए, बम गिराकर बगैर अपने किसी नुकसान के सकुशल लौट आए और कहा जाए कि यह अ-सैन्य कार्रवाई थी तो मुस्कुराना चाहिए। मिलिट्री भी नॉन-मिलिट्री काम तो करती ही है। इसके मतलब को समझने के लिए डिक्शनरी को तकलीफ देने की ज़रूरत नहीं है। पोलिटिक्स को समझने की ज़रूरत है। मगर एक चूक हो गई। कमाल भारतीय वायुसेना का रहा लेकिन ख़बर ब्रेक पाकिस्तान की सेना ने की। भारत के पत्रकार देर तक सोते हैं। वैसे भी सुबह चैनलों में ज्योतिष एंकर होते हैं। इस पर भी मुस्कुरा सकते हैं।

    पहली ख़बर पाकिस्तान के सैनिक प्रवक्ता मेजर जनरल गफूर ने 5 बजकर 12 मिनट पर ट्वीट कर बता दिया कि भारतीय सेना अंदर तक आ गई है बस हमने उसे भगा दिया। डिटेल आने वाला है। फिर 7 बजकर 06 मिनट पर ट्वीट आता है कि मुज़फ्फराबाद सेक्टर में भारतीय जहाज़ घुस आए। पाकिस्तानी वायुसेना ने समय पर जवाबी कार्रवाई की तो भागने की हड़बड़ाहट में बालाकोट के करीब बम गिरा गए। कोई मरा नहीं, कोई क्षति नहीं। इनका तीसरा ट्वीट 9 बजकर 59 मिनट पर आया कि ‘भारतीय कश्मीर ने आज़ाद कश्मीर के 3-4 मील के भीतर मुज़फ़्फ़राबाद सेक्टर में घुसपैठ की है। जवाब देने पर लौटने के लिए मजबूर जहाज़ों ने खुले में बम गिरा दिया। किसी भी ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचा है, तकनीकी डिटेल और अन्य ज़रूरी सूचनाएं आने वाली हैं।’

    इसके बाद मेजर जनरल साहब की तरफ से न कोई ट्वीट आया और न डिटेल। अब इसके बाद 11.30 मिनट पर भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस कांफ्रेंस होती है। विदेश सचिव विजय गोखले बताते हैं कि आतंकी संगठन जैश के ठिकाने को निशाना बनाया गया है। भारत के पास पुख़्ता जानकारी थी कि जैश भारत में और फिदायीन हमले की तैयारी कर रहा था। उसे पहले ही बे-असर करने के लिए अ-सैन्य कार्रवाई की गई। किसी नागरिक की जान नहीं गई। इस प्रेस कांफ्रेंस में किसी सवाल का जवाब नहीं दिया गया न पूछा गया। भारतीय वायु सेना का नाम नहीं लिया गया। न ही लोकेशन के बारे में साफ-साफ कहा गया। यह भी नहीं कहा गया कि पाकिस्तान के भीतर जहाज़ गए या पाक अधिकृत कश्मीर में गए।

    भारत ने आधिकारिक बयान को सीमित रखा मगर पाकिस्तान ने ही पुष्टि कर दी थी कि भारत के जहाज़ कहां तक गए थे। बाद में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि आपरेशन कहां हुआ था। उमर अब्दुल्ला ने पहले बालाकोट को लेकर सवाल उठाए और कहा कि अगर यह कश्मीर पख़्तूनख़्वा मे हुआ है तो बहुत बड़ी स्ट्राइक है। अगर नहीं तो सांकेतिक है।बाद में उन्होंने फिर ट्वीट किया और कहा कि कार्रवाई कश्मीर पख़्तूनख़्वा में हुई जो कि बहुत बड़ी बात है।

    युद्ध या दो देशों के बीच तनाव के समय मीडिया की अपनी चुनौतियां होती हैं। ऑफ रिकार्ड और ऑन रिकार्ड सूचनाओं की पुष्टि या उन पर सवाल करने का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। जो भी सोर्स होता है वो आमतौर पर एक ही होता है। कई चैनलों पर चलने लगा कि आतंकी मसूद अज़हर का साला मारा गया है। भाई ससुराल गए हैं तो जो मारा जाएगा वो साला ही होगा! पर यह बयान किसका था, पता नहीं। कई बार रक्षा मंत्रालय या विदेश मंत्रालय के सूत्र होते हैं मगर सूत्रों का वर्गीकरण साफ नहीं है। ऑफ रिकार्ड सूचनाओं में भी विश्वसनीयता होती है मगर जब मीडिया के कवरेज़ में बहुत अंतर आने लगे तो मुश्किल हो जाती है। जैसे मरने वालों की संख्या भी अलग अलग बताई गई। पाकिस्तान कहता रहा कि कोई नहीं मरा है। भारतीय वायु सेना अपना शानदार काम कर चुप ही रही। कोई ट्वीट नहीं किया।

    इस हमले को कैसे अंजाम दिया गया इसकी अंतिम जानकारी नहीं आई है। अभी आती जा रही है। मिराज 2000 लड़ाकू विमानों के कमाल की बात हो रही है। कोई ख़रोंच तक नहीं आई तो सोचा जा सकता है कि किस उम्दा स्तर की रणनीति बनी होगी। बग़ैर किसी चूक के ऐसे आपरेशन को अंजाम देना बड़ी बात है। जनता वायु सेना के पराक्रम से गौरवान्वित हो उठी। बधाइयों का तांता लग गया।

    मीडिया में एक दूसरा ही मोर्चा खुल गया। अपुष्ट जानकारियों की भरमार हो गई। बहसें और नारे राजनीतिक हो चले। सरकार और वायुसेना के पराक्र्म के मौके पर चैनलों की पत्रकारिता( अखबारों और वेबसाइट की भी) के पतन की बात भी आज ही करूंगा। आज सरकार की शब्दावली ज़्यादा संयमित और रचनात्मक थी। मगर चैनलों की भाषा और उनके स्क्रीन वीडियो गेम में बदल चुके हैं। टीवी न्यूज़ के इस पतन को आप गौरव के इन्हीं क्षणों में समझें।

    मैंने ये बात पहले भी की है और आज ही करूंगा। अलग अलग चैनल हैं मगर सबकी पब्लिक अब एक है। बाकी पब्लिक चैनलों से बाहर कर दी गई है। एंकरों के तेवर से लग रहा है कि वही जहाज़ लेकर गए थे। तभी कहा कि हमारे देश में युद्ध के समय पत्रकारिता के आदर्श मानक नहीं हैं। न हमारे सामने और न उनके सामने। सूचनाओं को हम किस हद तक सामने रखें, बड़ी चुनौती होती है।

    हम सबके भीतर स्वाभाविक देशप्रेम होता है। चैनलों के स्क्रीन से लगता है कि उस देशप्रेस का राजनीतिकरण हो रहा है। अपने देशप्रेम पर ज्यादा भरोसा रखें। जो चैनल आपके भीतर देशप्रेम गढ़ रहे हैं वो अगर कल भूत प्रेत दिखाने लगें तब आप क्या करेंगे। यह फर्क उसी ऐतिहासिक क्षणों में उजागर होना चाहिए ताकि दर्ज हो कि मीडिया इस इतिहास को कैसे प्रहसन में बदल रहा है। इसे नाटकीयता का रूप देकर वो क्या कर रहा है आपको देखना ही पड़ेगा। आपको सेना, सरकार की कमायाबी,मीडिया की हरकतों और सूचनाओं की पवित्रताओं में फर्क करना ही होगा।

    उधर प्रधानमंत्री की गतिविधियों में मीडिया से कहीं ज्यादा रचनात्मकता रही। लगता है आज उन्होंने भी न्यूज़ चैनल नहीं देखे। शायद देखने की ज़रूरत नहीं। वे गांधी शांति पुरस्कार से लेकर गीता पाठ तक के कार्यक्रम में शामिल रहे। गीता का वज़न 800 किलो का बताया गया और बम का 1000 किलोग्राम का। दोनों अ-सैन्य पहलू हैं। जिस गीता का उद्घाटन कर आए वो इटली से छप कर आई है। तभी कहता हूं कि आर चैनलों ने रचनात्मकता के कई अवसर गंवा दिए। आज गांधी को शांति मिली या गीता द्वंद हल हुआ, मगर सूत्रों का काम खूब हुआ। वे न होते तो चैनल पांच मिनट से ज्यादा का कार्यक्रम न बना पाते।

    पाकिस्तान घिर गया है। वो मनोवैज्ञानिक, रणनीतिक और कूटनीतिक हार के कगार पर है। बौखलाएगा। क्या करेगा देखा जाएगा। मगर वह भारतीय पक्ष के दावों को स्वीकार नहीं कर रहा है। उसकी कार्रवाई की आशंका को देखते हुए भारत की सीमाएं चौकस कर दी गई हैं। युद्ध होगा, कोई नहीं जानता। आज का दिन ऐतिहासिक है।(रवीश कुमार)

  • लड़ाई और युद्ध में सिर्फ मानवता ही नहीं बल्कि प्रकृति को भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है

    बिपिन कुमार शर्मा/मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:”युद्धा को युद्ध विराम और अयुद्धा को युद्ध लेकर चिंतित करती मन की विषमता परेशान करती है । जिसने लडाई नही देखी उसको लडाई की बहुत जल्दी रहती है । क्योंकि उसका ना तो बच्चा उस लडाई होगा और ना ही कोई ऐसा व्यक्ति जिससे उसके निजी सम्बंध होगे । उसको सिर्फ लडाई का लाईव देखना है । उनको लडाई के साथ होने वाले नुकसान का कोई अंदाजा ही नही होता है । साथियो महाभारत का युद्ध हमने टीवी पर देखा । लेकिन मैंने लडा है । युद्ध तो शान्ति स्थापित करने का सबसे आखिर विकल्प है । जिसके सहारे कुछ समय तक शान्ति रह सके ।
    युद्ध मे इंसान इंसान को मारता है और वे इंसान भी मरते है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना भी नही होता है । बहुत बड़े पैमाने इंसानियत की जान चली जाती है । जरा सोचिए अगर धरती पर इंसान ही नही रहेगा तो शान्ति ही रहेगी । युद्ध से इंसान नही रहेगा जमीन और आसमान तो रहेगे । फिर कौन इस जमीन का मलिक होगा ।
    हमे अगर युद्ध लडना है तो शिक्षा के क्षेत्र चिकित्सा पद्धति के साथ युद्ध लडना चाहिए । ताकी इंसानियत कभी दुनिया से रुखसत ना हो सके ।”

    मैं युद्ध, प्रतिशोध या हत्या का जश्न नहीं मना सकता और न ही इसे राष्ट्र के स्वाभिमान या विजय से जोड़कर देख सकता हूं।
    क्या इस संसार में कोई ऐसा अभागा देश भी होगा, जहां सैनिकों की सुरक्षा के प्रति शासक की घोर लापरवाही और विफलता को ढकने के लिए युद्ध का प्रपंच रचा जाता हो, ताकि आमजन में उस ‘राजा’ का ‘पौरुष’ लांछित न हो?
    ठीक इस पल में भी, जबकि देश युद्ध के रोमांच से सिहर रहा है और कथित राष्ट्रभक्त सेना के शौर्य पर आंखों में आंसू भर-भरकर जयघोष कर रहे हैं, मैं पूरी ताकत से कहना चाहता हूं कि वह शासक पूरी तरह असफल और अपराधी है, अगर उसके देश की बहुसंख्यक जनता दुखी, जर्जर, बेकार, असहाय, हताश और अवसादग्रस्त है!
    वह देश किस मुंह से अपनी विजयगाथा गाएगा, जिसकी बहुसंख्यक जनता दिनोंदिन आत्महत्या के कगार पर पहुंचती जा रही है और देश के पूंजीपति उनकी दुर्दशा पर अट्टहास कर रहे हों? जिस देश का सर्वोच्च न्यायपीठ न्याय करने की जगह अत्याचार का मार्ग प्रशस्त करता हो?
    वह देश किस शत्रु के पराजित होने का स्वप्न देखकर जागा है और अभी तलक अपनी अंगड़ाई रोके खड़ा है, जिसने अभी तक ठीक तरह से अपने शत्रुओं को पहचाना भी नहीं है??
    दो पल ठहरकर तो सोचो, हमारा राजा कुछ ही दिन पहले शान्तिदूत बनकर घर लौटा है! उसके चेहरे से मुस्कान की सिलवटें अभी पूरी तरह मिटीं भी नहीं और रणभेरी बजने लगी! कहीं हमारे राजा के मुंह खून तो नहीं लग गया है? गिद्ध को तो लाश चाहिए, वह चाहे जिसकी हो!
    इस विजय का दंभ भी हमेशा की भांति क्षणभंगुर साबित होने वाला हैे! काल के अथाह प्रवाह में विजय और पराजय कोई मूल्य नहीं रखते! किंतु मनुष्य का दुख, सुख और उसके सुकर्म हमेशा महत्व रखते हैं! क्या यह युद्ध इस देश का दुख-दलिद्दर दूर कर देगा? क्या इस युद्ध के बाद नौजवानों को शिक्षा और आजीविका मिल सकेगी? क्या इस युद्ध के बाद आम आदमी का जीवन थोड़ा-सा भी आसान हो जाएगा? अगर नहीं तो ऐसे लाखों युद्ध निरर्थक हैं। ऐसे युद्ध मनुष्य को उसकी मनुष्यता से पतित करने के सिवा और कुछ न कर सकेंगे।

    या यह युद्ध भी केवल शासक की नाकामियों को छुपाने और देश में युद्धोन्माद के धुंधलके के बीच उसे दुबारा गद्दी पर बिठाने के लिए लड़ा जा रहा है, जिसमें कुछ और सैनिकों का मर जाना चन्द जुमलों के सिवा कुछ और महत्व नहीं रखता है??
    विचार कठिन वक्त में संजीवनी से कम आवश्यक नहीं होते!

    Bipin Kumar Sharma

  • राहुल गाँधी का मंदिर – मंदिर जाना मज़बूरी या सेक्युलर हिंदुत्व एजेंडा?

    जब से बीजेपी सत्ता में आई है तब से उसने विपक्षी पार्टियों ख़ासकर कांग्रेस पार्टी को हिन्दू विरोधी बताने में लगी हुई है और बहुत हद तक उनको इसमें क़ामयाबी भी प्राप्त हुई

    काँग्रेस को इस छवि से निकालने के लिए राहुल गाँधी ख़ुद को सच्चा हिन्दू साबित करने के लिये मन्दिर मन्दिर जा रहें हैं कई जानकारों को मानना है कि इसमें राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को फायदा भी मिला है.

    अब तो वो हर चुनाव में गौशाला खोलने के वादे घोषणा पत्र में रखतें हैं ताज़ा मामला उज्जैन का ही लीजिये गाय ले जाने के क्रम में तीन लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा का केस रासुका लगा दिया है.अब कांग्रेस भी गौशाला खोलने गौशाला पर ऋण देने जैसे कई वादे कर रही है और उसपर कार्य प्रगति पर है.

    लेकिन इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मुसलमान उन्हें क्या मानते हैं। फ़र्क़ इससे पड़ता है कि हिन्दू उन्हें क्या मानते हैं।

    1989 में जब राजीव गाँधी ने मंदिर का शिलान्यास करवाया था इससे कांग्रेस के हिन्दू वोट बैंक में कोई लाभ नही हुआ बल्कि संघ के एजेंडे को बल मिला.

    1990-91 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अयोध्या विवाद को सुलझाने के बेहद क़रीब पहुँच गए थे लेक़िन जैसे ही राजीव गाँधी को भनक मिली उन्होंने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया और 64 सीट के साथ बने प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कि सरकार गिर गयी औऱ देश आम चुनाव में गया जिसने चुनाव प्रचार में ही राजीव गांधी कि हत्या कर दी गयी थी.

    उसके बाद नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और 6 दिसम्बर 1992 को जो हुआ वो इतिहास है.बीजेपी और कांग्रेस में ज्यादा फ़र्क नही है एक खुली हुई क़िताब कि तरह है दूसरी बन्द क़िताब की तरह वैसे बीजेपी के कई बड़े नेता सार्वजनिक मंचो से क़ुबूल कर चुके हैं उन्हें मुसलमान वोट नही देता है और बीजेपी को मुस्लिम वोट चाहिये भी नहीं.

    कांग्रेस के लिये मुस्लिम वोट बैंक रहा है लेक़िन सिर्फ़ वोट बैंक तक ही सीमित रहा.क्योंकि आज़ादी के वक़्त मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में भागेदारी 30℅ थी आज 1% से 2 % इस हालात के लिए इसका श्रेय कांग्रेस को जाता है क्योंकि ज्यादातर सत्ता में वो ही रही है.

    इसमें सचाई है कि मुस्लिम वोट बैंक हमेशा कांग्रेस के साथ रहा लेक़िन 2014 में मुस्लिम वोट बीजेपी को भी मिले जो उम्मीद से ज्यादा थे शायद बीजेपी वाले भी उम्मीद नही कर रहे थे.

    अब देखना ये दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश में अग़र कांग्रेस महागठबंधन में शामिल नही हुई तो मुस्लिम वोट बैंक शायद कांग्रेस से छिटक कर सपा बसपा कि तरफ़ जाए लेक़िन जहाँ कांग्रेस के उम्मीदवार बीजेपी को हराने वाले होंगे वो उधर जाएंगे.

    एक कांग्रेस थी, जिसकी जड़ें देश भर में थीं, लेकिन उसके पास न कोई विचार है, न संकल्प है संघ को चुनावों से नहीं, बल्कि तभी पराजित किया जा सकता है, जब उसके विरुद्ध कोई नया विचार खड़ा हो। वह विचार कहाँ है? किसके पास है?

    Zeeshan Naiyer
    Student & Blogger
    Maulana Azad National Urdu University Hyderabad

  • तेरे वादे पे जिऐं तो मर जाऐं : अदनान मलिक

    29 जनवरी को केंद्रीय सरकार ने उच्चतम न्यालय एक याचिका दाखिल कर इस बात की अनुमति मांगी कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह को छोड़कर वह जमीन जो विवादास्पद नहीं राम जन्मभूमि न्यास को सोंपे जाने का इख्तियार दिया जाए। केन्द्रीय सरकार ने राम मंदिर के निर्माण में हो रही है देरी देखते हुए यह याचिका दायर किया। दायर याचिका में यह दावा किया गया कि मात्र आधा ऐकङ जमीन ही विवादास्पद है, इसलिए शेष जमीन सभी पक्षों को दे दिया जाए। मतलब कि दायर याचिका के अनुसार कुल 67 ऐकङ जमीन में से 42 ऐकङ जमीन राम जन्मभूमि की है। लेकिन मोदी सरकार पर यह प्रशन अवश्य उत्पन्न होगा कि अगर फैसले के आने में कुछ ओर इन्तजार कर लिया जाए तो कोन सा आसमान गिर जाएगा? फिर जब बीजेपी इस मामले की फरीक ही नहीं तो फिर वह इतना परेशान क्यों है? खासकर जबकि 2019 का लोकसभा चुनाव सामने है। किया उसे यह यकीन हो गया है कि वह मात्र अयोध्या के दरवाजे से ही सरकार बचा सकती है? क्यों कि उसने भारतवासीयों से जो वादे किए थे सब मात्र एक तकरीर भाषण एवं जुबान की सफाई साबित हुए। उल्लेखनीय हो कि 2014 में बीजेपी “सबका साथ सबका विकास, काले धन वापस लाएंगे” जैसे फर्जी नारों के सहारे सरकार बनाने में सफल हुई थी। लेकिन हुए किया जनता देख रही है कि पिछले चार वर्षों में कितना विकास ओर किनका विकास हुआ? हाँ इतना जरूर हुआ कि महंगाई आकाश को छू गई। GSTओर नोट बंदी ने तो देश की अर्थव्यवस्था को अत्यंत रुप से प्रभावित कर दिया।
    बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ स्वच्छ भारत जैसे अभियान भी विफल हो गए। दो करोड़ नोकरी तो दूर 50 लाख नोकरी का अवसर नहीं मिला। इस का तुलना इस बात से कर सकते हैं कि वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में चपरासी की 1368 पदों पर 23 लाख लोगों ने फार्म भरा था। जिस के लिए वर्ग 5 तक शिक्षित होना अनिवार्य था।

    इसमें एक लाख 50 हजार ग्रेजुएट 25 हजार पोस्ट ग्रेजुएट 250 पीएचडी के छात्र शामिल थे। इससे बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक रणनीति तय्यार कर रही है, और राम जन्मभूमि को अपना राजनीतिक विज्ञापन बनाने का प्रयास कर रही है। लेकिन भारत की जनता को इस से सतर्क हो कर वोट करना चाहिए, ओर ऐसी सरकार का चयन करना चाहिए जो देश ओर भारत के लोकतंत्र की हित में कार्य करे, ओर भारत की पुरानी संस्कृति को बहाल करने ओर एकता क।
    अदनान मलिक