Category: लेख, विचार

  • चिपको आंदोलन को पूरी दुनिया मे”पर्यावरणीय आंदोलन”के रूप में जाना जाता है”

    45 साल पहले 25 मार्च के दिन गढ़वाल हिमालय के एक सीमान्त गाँव की महिलाओं ने मैदानी ठेकेदारों के हमले से अपने जंगलों को बचाने के लिए पेढों को घेर खड़ी हो गयीं थीं. आने वाले वर्षों में यह आन्दोलन देश और विदेश में चिपको आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ. गौरा देवी नामक एक ग्रामीण महिला के नेतृत्व में जन्मे इस आन्दोलन ने हमें कई ऐसी बातें सिखायीं जो शायद हम आज भूल गए हैं. आइये कुछ बातें आज याद कर लेते हैं:

    जिस आन्दोलन को दुनिया भर में एक ‘पर्यावरणीय’ आन्दोलन का रूप दिया गया वह दरअसल आजीविका को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष था जो आज भी हमारे देश में जारी है. वनों का संरक्षण, आजीविका और पहाड़ी जीवन की सुरक्षा के साथ अटूट रूप से जुडा है और जो समुदाय वनों के साथ रहते हैं, जब तक वनों पर जीवन व्यापन के लिए निर्भर हैं तब तक संरक्षण के लिए भी तत्पर रहेंगे.

    पहाड़ी समाज में महिलाओं का जंगल से और भी गहरा रिश्ता रहा है. आज भी तीखी धारों में घास काटने पहुंची होती हैं औरतें और जंगलों से घर को लौटती, लकड़ी के बोझे ढोती हुई नज़र आती हैं.

    चिपको, वन आधारित समुदायों का न पहला संघर्ष था और न आखरी, वनों का व्यापार जो अंग्रेजों के काल में शुरू हुआ था, आज भी जारी है. अंग्रेजों ने वन आधारित समाज को वनों से बेदखल करने का जो सिलसिला शुरू किया था वो आज और तेज़ी से चल रहा है. उनके कानून और उनका बनाया तंत्र आज भी खडा है.

    वन अधिकार कानून 2006 एक पहला ऐसा कानून है जो वन भूमि पर आधारित लोगों की पहचान को मान्यता देता है – उनको वनों के संरक्षण और वनों से आजीविका कमाने का अधिकार देता है और इस प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित करता है. ये अलग बात है की इस कानून को धरातल पर लाने से शासन कतरा रहा है. पहाड़ों में तो सरकारें इस कानून की ज़रुरत को ही नहीं मानने को तैयार.

    अब पहाड़ी समुदायों के सामने चुनौती है – क्या हम चिपको आन्दोलन जैसे संघर्षों को व्यर्थ जाने देंगे या इन्हें अंजाम तक पहुंचा पायेंगे?

  • मीडिया और लोकतंत्र,नजरिया:डॉक्टर मोहम्मद मंजूर आलम

    नजरिया:डॉक्टर मोहम्मद मंजूर आलम

    मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लोकतंत्र का अस्तित्व लोगों के मामलों का हल मजलूम गरीब और कमजोर लोगों की मदद में मीडिया का रोल सबसे महत्वपूर्ण होता है मीडिया का मतलब होता है लोगों तक सच्चाई पहुंचाना सही जानकारी प्राप्त करना और तथ्य पर आधारित खबरों को प्रकाशित करना इतिहास के पन्ने बताते हैं कि पत्रकारों ने हमेशा इस पेशा में ईमानदारी से काम लेने की कोशिश की है मीडिया को गैर पक्षपाती रखा है हमें अच्छी तरह याद है कि इमरजेंसी के जमाने में भी मीडिया ने अपने भूमिका से समझौता नहीं क्या पत्रकारों को दबाव और खौफ का अंदेशा था लेकिन इन्होंने ईमानदारी का सबूत पेश किया सरकार के सामने झुकने किसी तरह का दबाव कबूल करने और खौफ व दहशत में पीड़ीत होने के बजाय मीडिया ने गैर पक्षपाती से काम लिया लोगों तक सच्चाई पहुंचाया किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया लेकिन आज मामला बिल्कुल बदल गया है आज प्रेस को पूर्ण आजादी है खबरों की वितरण के दसियों सूत्र है पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया था दैनिक और सप्ताहिक समाचार पत्र के जरिए खबरें प्रकाशित होती थी हर जगह पहुंचना भी असंभव था लेकिन अब सैटेलाइट का जमाना है देश में लाखों की संख्या में समाचार पत्र प्रकाशित होने के अलावा 1000 से ज्यादा टीवी चैनल है वेब पोर्टल की भरमार है सोशल मीडिया के बाद अब हर कोई इस पेशा से जुड़ गया है टीवी की मुहताजगी भी खत्म हो गई है मीडिया हाउस पर कोई पाबंदी भी नहीं है लेकिन इन सब के बावजूद देश के टीवी चैनलों और अन्य समाचार पत्र के जरिए जिस तरह खबरों को पेश किया जा रहा है जिस अंदाज से मीडिया अधिकारी काम कर रहे हैं इसने इस पेशा पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया है मीडिया का महत्व दुविधा मे डाल दिया है

    लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तय लोगों में शक व दुविधा पैदा हो गया है ऐसा लग रहा है कि मीडिया अब किसी के हाथ का खिलौना बन गया है कुछ लोग सत्ता प्राप्ति के लिए स्थिति का उपयोग करके और अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए इसका प्रयोग कर रहे हैं और मीडिया आसानी से इस अभियान का शिकार है या यूं कहिए के मीडिया ने अब अपना मकसद ही झूठ के विज्ञापन गलत प्रोपेगेंडा करना सच के बजाय झूठी खबरों को प्रकाशित करना बना लिया है वजह तौर पर यह फर्क महसूस किया जा सकता है कि 1975 में अधिसूचित आपातकाल थे पत्रकारों को एक तरह से डर था लेकिन उसके बावजूद इन्होंने अपने पेशे से समझौता नहीं किया लेकिन आज जिस तरह मीडिया हाउस कर रहे हैं समझ से बाहर है या तो सरकार ने गैर अधिसूचित इमरजेंसी लागू करके पत्रकारों को अपने जाल में फंसा रखा है सच बोलने और तथ्य लोगों तक पहुंचाने में इन्हे गंभीर खतरा है अलग अलग अंदाज में इन्हें डराया धमकाया जा चुका है या फिर दूसरा विकल्प यह है कि दौलत और शोहरत के लालच में मीडिया ने अपना विवेक बेचकर अपने उसूलों से समझौता कर लिया है

    किसी भी देश को संवारने या इसको बनाने में मीडिया का रोल बहुत महत्वपूर्ण होता है इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि हमारी जिंदगी पर मीडिया के जरिए बहुत से सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव होते हैं स्मार्ट मोबाइल फोन की अधिकतर संख्या के बाद अब मीडिया लगभग हर व्यक्ति की जिंदगी का हिस्सा बन गया है बच्चा बूढ़ा औरत मर्द शिक्षित अशिक्षित लगभग हर एक व्यक्ति की जिंदगी का मीडिया घटक ला यंफिक बन गया है समाचार पत्र और टीवी चैनल जब तक थे उस समय तक मीडिया तक हर एक आम आदमी की उपयोगी नहीं थी लेकिन सोशल मीडिया और एंड्रॉयड फोन के बाद अब हर एक व्यक्ति मीडिया से जुड़ गया है और हर एक की जिंदगी पर मीडिया का प्रभाव हो रहा है इसलिए मीडिया की शक्ति अब बहुत बढ़ गई है इसकी महत्व दोगुना हो गई है मीडिया के जरिए हम किसी भी देश की आर्थिक स्थिति को बदल सकते हैं और इसके सही प्रयोग से हम समाज में अच्छाई ला सकते हैं दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि मीडिया की शक्ति का गलत प्रयोग करके हम किसी भी देश के हालात और आर्थिक सिस्टम को दरहम बरहम कर सकते हैं इसके सिस्टम को तहस-नहस कर सकते हैं देश के लोगों ने एक जालिम और नाकारा सरकार को थोप करके देश के बढ़ते कदम को ना सिर्फ रोक सकते हैं बल्कि इसे दस वर्ष पीछे धकेल सकते हैं

    मीडिया की शक्ति और महत्व देश को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है विचार सार्वजनिक करने और लोगों के बीच नजरिया कायम करने की भूमिका भी मीडिया अदा कर रही है ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी है देश की सही मार्गदर्शन करना खबरों को सही अंदाज में पेश करना लोगों तक सच्चाई पहुंचाना लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज देश में इसके विपरीत हो रहा है झूठ की बुनियाद पर खबरें प्रकाशित की जा रही है सच्चाई छुपाई जा रहे हैं फर्जी खबरों के जरिए लोगों के दिमाग को गंदा किया जा रहा है टीआरपी के प्राप्ति के लिए और पैसों की लालच में मीडिया हाउस पक्षपात पूर्ण रिपोर्टिंग कर रहे हैं हिंदुस्तान में पत्रकार के इतिहास का यह पहला मौका है जब देश का हर गंभीर नागरिक मीडिया के रवैये पर चिंताजनक है इस देश के खतरे की अलामत के तौर पर देखा जा रहा है और ऐसा लग रहा है कि मीडिया देश को संभालने के बजाय इसे बिगाड़ने पर तुला है

    आज की मीडिया सच्चाई बताने के बजाय जज्बात से खेलने लगी है एक झूठ को इतनी बार बेबाकी और खूबसूरती के साथ पेश किया जाता है कि लोगों के दिमाग में वही सच बन कर सच बस जाता है टीवी चैनल के एंकर को देखकर लगता है कि वह जंग की स्थिति में है अपने शब्द अंदाज और बॉडी लैंग्वेज से किसी दूसरे पर हमला कर रहे हैं वह सरकार से सवाल करने के बजाय अपोजिशन पार्टियों के प्रवक्ता से सवाल करते हैं सरकार की प्रदर्शन का समीक्षा लेने के बजाय अपोजिशन पार्टी के कार्य का आत्म निरीक्षण करते हैं हर सत्ताधारी पार्टियों से सवाल करने के बजाय पिछले सरकारों से हिसाब मांगते हैं पत्रकारों के रवैया और अंदाज को देख कर लगता है कि टीवी चैनल में पत्रकारिता का मूल्य खो दिया है मीडिया का प्रक्रिया पी आर में बदल गया है पत्रकारिता नहीं हो रही है बल्कि इस नाम पर पब्लिक रिलेशन बनाने का काम किया जा रहा है मीडिया लोगों तक सच्चाई पहुंचाने और सच्चाई बताने के बजाय पीआर एजेंसी में बदल गई है
    देश गंभीर संकट से गुजर रहा है आर्थिक स्थिति दयनीय हैं जीडीपी की दर में कमी आती जा रही है रुपया की कीमत घट रही है हिंसा और आतंकवाद देश में बढ़ रहे हैं बल्कि यही अब इसकी पहचान बन गई है अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित देश बन गया है विकसित देश की लिस्ट में 140 वें नंबर पर पहुंच गया है किसानों ,दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को हर मोर्चे पर परेशानियों का सामना है लेकिन मीडिया में इन विषय पर कोई चर्चा नहीं है चरमपंथी और उत्तेजक लीडरों की तरह मीडिया में भी उत्तेजित खबरें प्रकाशित की जा रही है लोगों के भावना को भड़काने के अलावा किसी भी गंभीर विषय पर मीडिया में कोई बहस नहीं हो रही है वर्तमान मीडिया का यह रवैया अफसोसनाक शर्मनाक और मीडिया के लिए शर्मनाक गिरावट है ऐसी पत्रकारिता लोकतंत्र के लिए खतरा, देश के लिए खतरनाक और लोगों के लिए नुकसानदायक है
    देश की सुरक्षा लोगों की खुशहाली के लिए जरूरी है कि मीडिया अपना सही रोल अदा करें वह खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का हक अदा करें अपनी महत्व को समझ कर यह काम को अंजाम दें और यह हमेशा मद्देनजर रहे की किसी भी देश की तरक्की और गिरावट मे मीडिया का‌ रोल बहुत महत्त्वपूर्ण होता है इसलिए हिंदुस्तान में अगर विकास की दर में गिरावट आ रही है चरमपंथी और और संविधान विरोधी पार्टियां अगर सत्ता में आती है तो यह देश निश्चित तौर पर बर्बाद होगा इसके लिए हमारी मीडिया सबसे पहले जिम्मेदार होगी बहरहाल देश गंभीर स्थिति से गुजर रहा है आर्थिक स्तर पर देश दिवालिया का शिकार है जीडीपी की दर में गिरावट आ चुका है रेप और महिलाओं के क्राइम की दर में पिछले 5 सालों के दौरान मे सबसे वृद्धि हुई है -इंसान नफरत और उत्तेजना कि दर में पिछले 70 सालों के दौरान सबसे ज्यादा बढ़ गई है महंगाई में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि हुई है नौकरी मिलने के बजाए 1 करोड़ नौकरी कम हो गई है गरीबी ,अज्ञान और पिछड़ेपन में भी अधिक वृद्धि हो चुका है किसानों की आत्महत्या की घटनाएं सबसे ज्यादा सामने आई है गाय के नाम पर मोब लिंचिंग करके सबसे ज्यादा अधिक मुसलमानों दलितों और आदिवासियों का कत्ल किया गया है क्रप्शन और रिश्वतखोरी का मामला बढ़ गया है क्राइम और जुर्म की वजह से दुनिया भर में हिंदुस्तान का गिनती नापसंदीदा देश के तौर पर होने लगा है ऐसी गंभीर हालत में लोगों को मीडिया की बातों पर भरोसा करने और उसे देखने के बजाय खुद सोचना समझना और गौर करना होगा कि इन्हें क्या करना है 11 अप्रैल से शुरू होने वाले चुनाव में किन लोगों को सत्ता तक पहुंचाना है किसे अपना वोट देना है यह चरण बहुत महत्वपूर्ण और बेश कीमती है
    लोकतंत्र में चुनाव का दिन बहुत कीमती होते हैं इस मौके पर लिया गया सही फैसला 5 सालों तक इंसान को संतुष्ट और शांत रखता है जरा सी चूक और गलती की आधार पर 5 सालों तक पछताना पड़ता है इसलिए वोट डालने से पहले अच्छी तरह सोच समझ ले गौर कर लें पिछले 5 सालों का समीक्षा कर ले फिर किसी के हक में बटन दबाकर वोट डालें ताकि 2014 से अब तक जिस तरह आपको पछताना पड़ा है परेशानियों का सामना करना पड़ा है आगे 5 सालों में आपको परेशानी का सामना ना करना पड़े

    लेखक:ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी है

  • सीमांचल:महानंदा बेसिन परियोजना और कृषि उत्पादकता !!

    N N Madani: सीमांचल क्षेत्र के किसी भी जिले में कोई भी सिंचाई भूमि नहीं है। शायद क्षेत्र का एक एकड़ जमीन भी सिंचिाई-योग्य नहीं है। महानंदा बेसिन परियोजना 42 साल पहले प्रस्तावित किया गया था और इस परियोजना के उद्देश्यों में से एक है – इस क्षेत्र में नदियों के बाढ़ के प्रकोप से पूरे क्षेत्र को बचाने के अलावा सिंचाई-प्रणाली को स्थापित करना था। आप खुद ही देख सकते हैं आज तक प्रशासन की तरफ से कितने प्रयास किए गये हैं।

    सरकारें बहुत आईं और बदलती गईं, लेकिन उनमें से कोई भी सरकार इस परियोजना पर काम करने के लिए इच्छुक नहीं दिखे। वास्तव में, कटिहार सांसद को चुनाव के दौरान किए गए वादे के मुताबिक इस परियोजना को शुरू करना चाहिए था, लेकिन वह बुरी तरह विफल रहे और कभी लगा ही नहीं कि वो इस मुद्दे पर गंभीर भी हैं। अगर कोई नेता यह वादा करता है कि वह सीमांचल-क्षेत्र को कृषि उत्पादकता के मामले में पंजाब/हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तरह बना देंगे तो इसका मतलब है कि उन्के पास कृषि-क्षेत्र का ज्ञान बिल्कुल भी नहीं है या फिर वह कृषि-क्षेत्र की बुनियादी बारीकियों को समझने में नाकामयाब रहे है। पहले देश के Average उत्पादकता वाला राज्य बनाने का तो प्रयास कर लें।

    जनता के सामने ऐसे वादे करने से पहले, नेताओं को महानंदा बेसिन परियोजना को साकार करना चाहिए था और फिर कृषि-क्षेत्र मे आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने के क्रम में कदम उठाना चाहिए था। अब तो हमारे पास, एक कृषि महाविद्यालय (किशनगंज) भी है जिसे स्थानीय किसानों के साथ मिलकर काम करना चाहिए तथा उन्हें नवीनतम टिशू कल्चर तकनीक, बेहतर अंकुर उत्पादन आदि का ज्ञान किसानों में विकसित करना चाहिए। किसानों को यह भी बताना चाहिए कि कृषि वैज्ञानिक बुनियादी आवश्यकताओं के अनुसार इसे प्रयोगशाला से खेतों मे किस प्रकार इन तकनीकों का उपयोग करते हैं।

    जुलाई 2010 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 14.5 9 करोड़ रुपये की लागत से महानंदा के तटबंधों को बांधने के लिए महानंदा नदी बेसिन परियोजना की शुरुआत की थी। लेकिन इस परियोजना को लांच किए हुए 8 वर्ष बीत चुके हैं पर धरातल पर कोई ऐसी परियोजना का नाम-व-निशान नहीं दिख रहा है। बाढ़ हर साल आती है जान-व-माल का नुकसान हर साल ही होता है। छोटे-छोटे नालों पर कलभर्ट और पुलिया ही अगर विकास है तो सीमांचल का क्षेत्र पूरे देश में सबसे विकसित कहलाएगा।

    क्या हम उम्मीद करें सीमांचल की जनता से कि आने वाली चुनाव में इन मुद्दों को प्राथमिकता से उठाएंगे और विभिन्न पार्टियों की मेनिफेस्टो में शामिल करने के लिए मजबूर करेंगे। साथ ही इसे लागु करवाने का प्रयास करेंगे।

  • मुस्लिम प्रतिनिधित्व अपनी अंतिम साँसे ले रहा है

    पूर्व आईएएस टॉपर शाह फैसल ने अपने पद से त्यागपत्र देने के बाद एक नयी पार्टी का गठन किया है। शाह फैसल के इस फैसले का स्वागत होना चाहिये। उन्होने एक ऐसे समय मे यह फैसला लिया है जब काश्मीर गर्म तवे की तरह तप रहा है। यह बेहद हिम्मत की बात है जब काश्मीर मे पहले से उमर अब्दुल्लाह की नेशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी की मजबूत उपस्थिती है उसके बावजूद भी क़दम बढ़ाया है। मैंने फ़ारूक अब्दुल्लाह की जगह उमर अब्दुल्लाह और मुफ़्ती सईद की जगह महबूबा मुफ़्ती का नाम इसलिए लिया है ताकि शाह फैसल जैसे नौजवान को सामने रखकर बात किया जाये। इन दोनों पार्टियों के रहते हुए शाह फैसल के द्वारा पार्टी का गठन करना कई मायनें मे सोचनीय है।
    जाहीर है यह फैसला एक दिन मे तो लिया नहीं गया होगा। इस फैसला तक पहुँचने से पहले वह कई तरह के विचारों से गुजरे होंगे। काश्मीर की समस्याओं को पहचाना गया होगा। उन समस्याओं का क्रिटिकल एनालिसिस हुआ होगा। डेमोग्राफिक एवं भौगोलिक परिस्थिति को समझने का प्रयास किये होंगे। फिर उसी आधार पर लोगों से संपर्क किया गया होगा। उनके सामने उपरोक्त सभी बातों पर चर्चा हुई होगी। फिर कुछ लोगों को तैयार करके एजेंडा तय पाया होगा। एजेंडा की पूर्ति के रास्ते मे आने वाली दिक़्क़तों पर मंथन के बाद उन दिक़्क़तों से निपटने के तरीकों पर चर्चा हुई होगी। फिर जाकर पार्टी बनाने के फैसला तक पहुँचे होंगे। अब जब पार्टी बन गया है तब जाकर अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करने के लिए एजेंडा के साथ जमीन पर काम करना शुरू करेंगे।
    आज भारत की मुस्लिम राजनीति अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। मैं जब मुस्लिम राजनीति की बात कर रहा हूँ इसका बिलकुल यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिये की मैं मुसलमानों की अलग राजनीतिक गिरोहबंदी या राजनीतिक दल की बात कर रहा हूँ। मेरी असल चिंता सेकुलर दलों में लगातार कम हो रही प्रतिनिधित्व को लेकर है। सीएसडीएस की रिपोर्ट के अनुसार लोकतान्त्रिक संस्थानों मे किसी भी अन्य समुदायों से अधिक भागीदारी(Participation) मुसलमानों की है मगर उसके अनुपात मे प्रतिनिधित्व(Representation) नहीं है। हम मुस्लिम राजनीति के कमज़ोर होने के जो कारक(Factor) है उसको ढूँढने में आज भी असफल है। हम बड़ी चालाकी से भाजपा और आरएसएस पर आरोप मढ़कर निकल जाते है और बाकी के जो कुछ लोग बचते है वह मुस्लिम धर्म-गुरुओं को गाली देकर काम चला लेते है।
    यदि बिहार के संदर्भ मे देखा जाये तब एक समय था जब किशनगंज, अररिया, पुर्णिया, कटिहार, दरभंगा, मधुबनी, शिवहर, पश्चिमी चम्पारण(बेतिया), सीवान, भागलपुर, बेगूसराय, खगड़िया इत्यादि ऐसे लोकसभा क्षेत्र थे जहाँ से मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का मौक़ा मिलता था। कुछ जीतकर भी आते थे और कुछ अपनी मजबूत उपस्थिती भी दर्ज करते थे। लेकिन, अचानक से उम्मीदवारों की संख्या कम होने लगी। इसके पीछे कई कारण है। पहला, जो प्रभाव वाले पुराने नेता थे वह इस दुनिया से चल बसे। दूसरा पुराने प्रभाव वाले कुछ नेता जो बचे हुए है उनका अपने ही समुदाय मे प्रभाव कम हो चुका है। तीसरा परिवारवाद या वंशवाद से निकलकर आने वाले नेता जमीनी सच्चाई को नहीं समझ पा रहे है जिस कारण समाज मे अधिक प्रभावी नहीं हो पा रहे है। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण कारण और असल समस्या की जड़ है वह नये नेतृत्व का उभार नहीं हो पाना है।
    मुसलमानों मे एक लंबे समय से नयी नेतृत्व का उभार नहीं हो पाया है। आज भी वही लोग नेतृत्व कर रहे है जो परिवारवाद से होकर राजनीति मे पहुँचे है या फिर किसी राजनीतिक दल के रहमो-करम पर राजनीति कर रहे है। विकल्प नहीं मिलने के कारण मुसलमान प्रतिनिधित्व के नाम पर कुछ नेताओं को मजबूरी मे भी ढ़ो रहे है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है की विकल्प खड़ा भी कैसे किया जाये? प्रतिनिधित्व का स्थान इतना खाली है की मुसलमान निगाह टिकाएँ बैठे है। साथ ही कुछ नये लोग जो प्रतिनिधित्व करने को तैयार है उसको आम मुसलमान स्वीकार करने को भी तैयार नहीं है। यहाँ पर यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है की आख़िर यह सामंजस्य क्यों नहीं बन पा रहा है?
    सामंजस्य नहीं बन पाने के पीछे कई कारण है। पहला महत्वपूर्ण कारण है कल तक विश्वविधालय से उभरने वाले छात्रनेता, शिक्षक या एनजीओ से उभरे लोग सामाजिक मुद्दों पर चर्चा समाज के लोगों के बीच आकर करते थे। मगर आज विश्वविधालय की राजनीति मे सक्रिय नेता या एनजीओ से उभरे लोग सेमिनार रूम और शहरी एक्टिविज़्म तक सिमट कर रह गये है। अख़बार की सुर्खियों मे रहने के लिए समाज से लगभग रिश्ता कटा हुआ होता है। मगर विश्वविधालयों के सेमिनार रूम मे बैठकर समाज की समस्याओं पर चर्चा करने के कारण आमजनमानस से जुड़ाव नहीं हो पाता है।
    यह जो अर्बन-सेंट्रिक राजनीति या एक्टिविज़्म है वह गाँव-ग्राम के लोगों पर असर नहीं डाल पाता है। सेमिनार रूम मे सामाजिक समस्याओं पर चर्चा जरूर होती है। अर्बन-सेंट्रिक नेताओं या एक्टिविस्टों की सबसे बड़ी समस्या है की जब वह समाज के बीच आते है तब वह समाज के मूल समस्याओं पर चर्चा नहीं करके मुसलमानों के धार्मिक रीति-रिवाजों और धार्मिक नेताओं पर चोट करना शुरू करते है। हमारा समाज अभी इतना उदार नहीं हुआ है की धार्मिक रीति-रिवाजों और धार्मिक नेताओं पर किए गये हमलों को बर्दाश्त कर सके।
    दूसरा बड़ा कारण यह है की जो लोग प्रतिनिधित्व करने को तैयार है वह इतने अर्बन-सेंट्रिक और तथाकथित बौद्धिकता का परिचय देने लगते है की आम जनता ऐसे नेताओं को प्रतिनिधित्व देने से घबराती है। ऐसी स्थिति मे यही होता है की राजनीति मे क़दम रख चुके

    लोग अलग-अलग दलों से साठगांठ करके राजनीति शुरू करते है। नेटवर्किंग, लॉबी या धन इत्यादि देकर राजनीतिक दल या फिर दल के मुखिया द्वारा मनोनीत होने के बाद सदन पहुँचते है। लॉबी, नेटवर्किंग और पैसे इत्यादि देकर जो सदन पहुँचते है वह अपने दल और दल के मुखिया के प्रति ज़्यादा समर्पित होते है। जिस कारण आम जनता के प्रति उनका जुड़ाव कम हो रहा है।
    जनता और नेता दोनों के बीच की इस दूरी को बहुत गहराई से समझने की जरूरत है। उदाहरण के रूप मे कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल जैसे नेताओं का जब उभार हुआ तब मुस्लिम एक्टिविस्टों ने इनके कार्यक्रमों को भारी संख्या मे आयोजित किया और मुसलमानों का भारी जनसमर्थन प्राप्त हुआ। मुसलमानों को भी चाहिये की अपने समाज से ऐसे ही कुछ लोगों को ढूंढकर और जनसमर्थन देकर प्रोमोट करे ताकि प्रतिनिधित्व का अभाव नहीं रहे। यदि मुसलमान ऐसा नहीं करते है तब जाहीर सी बात है की जो नेटवर्किंग, लॉबी या पैसे की बल पर मनोनीत होकर आयेंगे वह अपने दल और दल के मुखिया के प्रति ज़्यादा समर्पित रहेंगे। यदि कल कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी या हार्दिक पटेल पर उनकी पार्टी किसी भी प्रकार का दबाव बनाना चाहेगी उससे पहले एकबार इन नेताओं को मिलने वाले जनसमर्थन के बारे मे जरूर विचार करेगी। मनोनीत होकर आने वाले लोग हमेशा दल और दल के मुखिया के एहसान के नीचे दबा रहेगा इसलिए ऐसे नेताओं से समाज हित के बारे मे सोचना आम जनता की बेवकूफी होगी।
    काश्मीर की राजनीति को शेष भारत की राजनीतिक वातावरण मे फिट करना उचित नहीं है। मगर राजनीतिक इछाशक्ति को साबित करने के लिए शाह फैसल का उदाहरण पेश किया जाना भी जरूरी है। डॉ शाह फैसल ने अपने पूरी जीवन मे रिस्क ही लिया है। मैडिसिन की पढ़ाई करने के बाद मैडिसिन मे कैरियर नहीं बनाकर सिविल सर्विस की तरफ बढ़ गये। सिविल सर्विस मे दस वर्ष नौकरी करने के बाद त्यागपत्र देकर राजनीति की तरफ क़दम बढ़ाया। वह भी एक ऐसे राजनीतिक माहौल मे जहाँ बर्फ होने के बावजूद भी माहौल हमेशा आग की तरह होता है। विश्वविधालय की राजनीति या एनजीओ से निकलकर राजनीति शुरू करने वाले लोगों को डॉ शाह फैसल की तरह समाज की जड़ों को समझकर रिस्क लेना पड़ेगा। तभी किसी प्रकार के नेतृत्व के उभार या प्रतिनिधित्व को बढ़ाये जाने की कल्पना की जा सकती है।

    तारिक अनवर चम्पारणी
    (लेखक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान(TISS), मुंबई से दलित एंड ट्राइबल स्टडीज मे मास्टर इन सोश्ल वर्क है)

  • कन्हैया बेगूसराय से ही चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं?

    Anamika Singh

    जबकि वो अबतक वामपंथी चेहरे के रूप पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुके हैं.दिल्ली, गुजरात से लेकर वे केरल तक भाषण देने पहुँच गए. तो ये पूरे देश मे कहीं से भी चुनाव लड़ सकते हैं.

    आइये थोड़ा सा मामला समझते.

    कहा जाता है बेगूसराय वामपन्थियों का अड्डा है, लेकिन वामदल वहाँ मात्र एक बार चुनाव जीती है.
    जबकि नवादा, नालन्दा जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में दो या दो अधिक बार वामदल चुनाव जीतकर आयी है.

    2014 में राजद(लालू यादव) से मुसलमान नेता लड़े थे लेकिन हार गए.उससे पहले में जदयू(नीतीश कुमार) से मुसलमान नेता लड़े और जीत गए.
    इस बार महागठबंधन से मुसलमान उम्मीदवार खड़ा करने की तैयारी है. तो मुसलमानो का सीट खाने पर क्यों तुले है कन्हैया.

    बिहार में कन्हैया की सच्चाई सभी भूमिहारो को पता है, वहां के सवर्ण लंठ नहीं है बाकी राज्यों के सवर्णो की तरह जो कन्हैया को देशद्रोही कह दे.
    बिहार के सवर्ण चाहते हैं कि मोदी जीते पर कन्हैया भी बेगूसराय से चुनाव लड़े और जीते.
    ये बात आपको खुलेआम बिहार के सवर्ण कहते हुए मिल जाएंगे.
    दरअसल ये लोग सदा सदा के लिए मुसलमानो की राजनीति बेगूसराय से खत्म कर देना चाहते हैं.
    बेगूसराय 20% मुसलमानो की आबादी से भरी है.

    यहां पर वामदल मात्र एक बार लोकसभा चुनाव 1967 में जीतती है,जबकि 1980,1984, 1989,1991,1996 और 2004 में तो वामपंथी दलों ने अपना उम्मीदवार भी नहीं उतारा.

    हालांकि इसबार भी बेगूसराय में वामदल अकेले चुनाव जीत ले तो बिल्कुल सम्भव नहीं.इसलिए मीडिया जबरदस्ती बेगूसराय को वामपंथ का अड्डा और लेनिनग्राद कह कर प्रचारित किया जा रहा है.और बार बार वामदल तथा राजद से गठबंधन की फ़र्ज़ी खबरे चलाई जाती हैं.

    अगर कन्हैया को वाकई वामपंथी विचारधारा पर चुनाव लड़ना है तो नवादा चुनाव क्षेत्र से लड़े जोकि भूमिहारो और यादव दबंगो का गढ़ रहा है.(यहां का यादवो में लालू यादव का कोई क्रेज नहीं है)
    जय भीम और लाल सलाम का नारा भी बुलन्द होगा.
    यहाँ 30% जनसंख्या दलितो की है. उन्हें कुछ बेहतर लाभ हो कन्हैया के वामपंथी विचारधारा से.

    जाति की बात आते ही कन्हैया छटपटाने लगते हैं.
    बीबीसी द्वारा ‘बोले बिहार’ में दिए गए उनके इंटरव्यू में तो यही दर्शाता है.
    इस प्रोग्राम को मोडरेट कर रही है रूपा झा जब उनसे जाति को लेकर सवाल करती हैं तो वे लेनिन की कथा सुनाने लगते हैं.
    वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर भी जब उनसे जाति से मिलने वाली प्रिविलेज की बात करते हैं तो कन्हैया की छटपटाहट साफ नजर आती है.

    सवर्ण आरक्षण पर भी बिना कोई टिप्पणी नहीं है.
    13 पॉइंट रोस्टर पर चुप्पी.

    “रवीश कुमार ने एक बात कही थी. जो जाति के मसले पर बात नहीं करना चाहता है वो सबसे बड़ा जतिवादी है”

    पता नही इनका जय भीम और लाल सलाम कैसा है।

    सम्वेदनाओं को हथियार बनाकर इन्होंने चुनाव लड़ने की सोची है तो जनता के लिए ये भी मोदी साबित होंगे.
    रोहित वेमुला या नजीब की माँ इनके लिए वाकई बड़ा मुद्दा हैं तो इन्हें बेगूसराय से कम से कम चुनाव नहीं लड़ना चाहिए.

  • काले स्कार्फ़ में शोक मनातीं न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक औरत हैं

    क्या हम कभी 37 साल की एक बिन-ब्याही मां को अपनी PM चुन सकते?

    15 मार्च. दुनिया का दूसरा सबसे शांतिपूर्ण देश न्यूजीलैंड. यहां एक जगह है क्राइस्टचर्च नाम की. जुम्मे का दिन था. लोग मस्जिदों में नमाज़ अदा करने गए हुए थे. तभी अंधाधुंध गोलियां चलने लगती हैं. हर तरफ अफ़रा-तफ़री मच जाती है. हमले में 50 लोग मार दिए जाते हैं. 50 और घायल हो जाते हैं.

    कुछ घंटों में देश की प्रधानमंत्री काली कमीज़ पहने, सर पर काला दुपट्टा लपेटे घटनास्थल पर पहुंचती हैं. मृत लोगों के परिवार वालों के पास जाती है. एक छोटे बच्चे के साथ खड़ी महिला, जिसने किसी अपने को खो दिया है, को गले लगाती है. महिला रोती है. प्रधानमंत्री महिला को और कसकर भींच लेती है. कई सेकंड महिला को कलेजे से लगाकर रखती है.

    उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेस में कहती है:

    “उन्होंने (मुसलमान समुदाय) इस मुल्क को अपना मुल्क चुना है. इसलिए ये उनका मुल्क है.”

    हमला ब्रेंटन टैरंट नाम के एक आदमी ने किया था. ऑस्ट्रेलिया का रहने वाला था. प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने इसे आतंकवादी हमला करार कर दिया. ये कहना बड़ी बात थी. क्योंकि दुनियाभर के मीडिया के साथ कई लोग भी इसे ‘हेट क्राइम’ कह रहे हैं. पर ये ‘हेट क्राइम’ नहीं था. ये एक आतंकी हमला था. जो कि बहुत तफ़सील से प्लान किया गया था. और जिसमें 50 लोगों ने अपनी जान गंवाई.

    प्रधानमंत्री ने कहा, “ब्रेंटन टैरंट के विचारों के लिए न इस देश में. और न ही दुनिया में कोई जगह है.” साथ ही जेसिंडा ने ये भी ऐलान किया है कि मारे गए लोगों के परिवार वालों को उनके जनाज़े का ख़र्चा नहीं उठाना होगा. ये काम न्यूजीलैंड की सरकार करेगी.

    कौन हैं जेसिंडा आर्डर्न

    जिस प्रधानमंत्री की हम बात कर रहे हैं. वो 38 साल की, किसी भी धर्म को न मानने वाली, एक बिन-ब्याही मां है. जिसे हम इंडिया में देश की पॉलिटिक्स तो दूर, अपने घर में घुसने लायक भी न समझें.

    1. जेसिंडा न्यूजीलैंड की 40वीं प्राइम मिनिस्टर हैं. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने बतौर रिसर्चर की थी. वो 2001 के समय अपॉइंट हुई PM हेलेन क्लार्क के ऑफिस में काम करती थीं. लेबर पार्टी की लीडर बनाए जाने के बाद 2017 में उन्होंने अपनी सरकार बनाई.

    2. 21 जून 2018 में जेसिंडा ने एक बेटी को जन्म दिया. वो दुनिया में दूसरी ऐसी लीडर हैं जो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का रोल निभाने के दौरान मां बनीं. प्रेगनेंट होते ही लोगों ने पूछा कि क्या वो मैटरनिटी लीव लेंगी. लेंगी तो देश का क्या होगा. जेसिंडा ने एक रेडियो प्रोग्राम में कहा, “मैं लीव लूं या न लूं, ये मेरी चॉइस होगी. हर औरत का अधिकार होता है ये चुनना कि वो कितना और कब तक काम करना चाहती है.”

    जेसिंडा ने बच्ची को जन्म दिया. फिर डेढ़ महीने की मैटरनिटी लीव पर गईं. ऐसा करने वाली वो दुनिया की पहली प्रधानमंत्री थीं.

    3. जेसिंडा की मां एक स्कूल में कैटरिंग का काम करती थीं. और उनके पिता पुलिस अफसर थे. स्कूल खत्म करने के बाद जेसिंडा ने पॉलिटिक्स और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की. ग्रेजुएशन के बाद जेसिंडा की आंटी उन्हें पॉलिटिक्स में ले आईं. वो ख़ुद काफ़ी समय से लेबर पार्टी की मेम्बर थीं. 2008 में जेसिंडा बतौर सांसद चुनी गईं. फिर वहां से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफ़र.

    4. जेसिंडा के परिवार वाले काफ़ी धार्मिक थे. उनको बतौर मॉरमॉन पाला गया. ये क्रिश्चियनिटी की ही एक शाखा है. पर जेसिंडा को अपने धर्म में सिखाई जा रही कुछ चीज़ों से दिक्कत थी. वो गे समुदाय के हक़ के लिए बोलती थीं. उनका धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता था, इसलिए उन्होंने अपना धर्म छोड़ने का फ़ैसला लिया.

    6. 2012 में जेसिंडा क्लार्क गेफ़ोर्ड से मिलीं. वो एक टीवी एंकर हैं. दोनों की मुलाकात उनके एक कॉमन दोस्त ने करवाई थी. पहली मुलाकात के बाद दोनों काफ़ी समय तक नहीं मिले. एक दिन किसी काम के सिलसिले में क्लार्क ने जेसिंडा को कॉल किया. फिर क्या था. दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे. उन्होंने शादी नहीं की. वो साथ में रहते हैं और अपना परिवार चलाते हैं.

    7. दोनों ने एक बिल्ली पाली जो वर्ड फ़ेमस हो गई. क्योंकि उसका ख़ुद का ट्विटर पर एक अकाउंट था. 2017 में उसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई.

    जेसिंडा 2017 में प्रधानमंत्री बनी थीं. उनकी छवि एक सॉफ्ट व्यक्ति के तौर पर रही थी. जो धाकड़ और दबंग से ज्यादा, कोमल और धैर्यवान लगती थीं. उनके आलोचकों ने कहा, यही रवैया रहा तो सरकार नहीं चलेगी. जवाब में जेसिंडा ने कहा, “दूसरों के दर्द को समझना और एक शांत हृदय रखना ही असल बहादुरी है. मुझे गर्व है कि मेरी पॉलिटिक्स में करुणा का भाव है.”

    जेसिंडा लगातार युद्ध और न्यूक्लियर हथियारों के विरोध में बोलती देखी जाती हैं. क्राइस्टचर्च आतंकी हमले के बाद भी उन्होंने मुसलमान समुदाय से ये वादा किया कि वो वहां के ‘गन-लॉ’ बदल देंगी. यानी लोगों को जो आसानी से बंदूक रख पाने की सुविधा मिली है, उसमें बदलाव करेंगी

    जेसिंडा वही कर रही हैं जो किसी भी प्रधानमंत्री को करना चाहिए. हमारे राजनेताओं को इनसे सबक लेना चाहिए. जो घड़ी-घड़ी युद्ध के लिए न सिर्फ तैयार रहते हैं. बल्कि उसके आधार पर वोट भी ले आते हैं.

    लेखक: सरवत फातिमा

  • उत्तरप्रदेश, मायावती और महिला: महिला सशक्तिकरण में फिसड्डी

    Anamika Singh

    उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी से लेकर मायावती जैसी सशक्त महिला मुख्यमंत्री दिए यूपी की जनता ने.

    लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव यूपी से मात्र 14 महिला सांसद चुनी गई हैं.
    फिलहाल यूपी में 80 लोकसभा सीट है,

    मायावती को तरह तरह के उपाधियों से नवाजा गया.
    फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की 59 वीं सबसे शक्तिशाली महिला लीडर बताया.
    न्यूज़वीक ने उन्हें दुनिया की 15 शक्तिशाली महिला लीडर में से एक तथा ‘बराक ओबामा ऑफ इंडिया’ भी कहा.
    हालांकि अपने शासनकाल में महिला सुरक्षा देने में भी मायावती सफल हुई.
    पर महिला सशक्तिकरण में फिसड्डी साबित हुई हैं.

    आंकड़ो पर आते हैं.?

    2007 में मायावती(बसपा) आखिरी बार मुख्यमंत्री बनती हैं और इसबार मात्र 3 महिला विधायक चुनी जाती हैं.

    2012 में अखिलेश(सपा) की सरकार बनती है मात्र 35 महिला विधायक चुनी जाती हैं
    सपा 34 महिला प्रतिनिधि खड़ा करती है जिसमें 22 जीतकर विधायक बनती हैं
    बसपा 33 कंडीडेट खड़ा करती है.

    2017 में सपा+कांग्रेस 33 महिला उम्मीदवार उतारते हैं
    वही बसपा मात्र 20 महिला उम्मीदवारो को टिकट प्रदान करती है.
    जबकि भाजपा 43 महिला को उम्मीदवारी देती है और 32 जीतकर आते हैं.

    भाजपा की तरफ से आनेवाली महिला उम्मीदवार किसी काम की नहीं हैं वो बस महिला के नाम पर मुखौटा है.

    अब आते हैं बसपा यानी मायावती जिसकी लीडर हैं फ़िलहाल.
    बसपा को कांशीराम ने बनाया. उन्होंने मायावती को कमान दी.
    मायावती 4 बार यूपी की मुख्यमंत्री चुनी जाती हैं.
    बसपा अम्बेडक्राइट पार्टी है अर्थात डॉ आंबेडकर के विचारों पर चलती है.
    अम्बेडकर का मानना था अगर समाज में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दृढ़ हो तो समाज सभ्य हो जाएगा.

    लेकिन उन्हीं के विचारों को मानने वाली पार्टी ने सबसे कम महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं.
    उत्तरप्रदेश में फिलहाल 403 विधानसभा की सीटे हैं.
    और महिला वोटर यहां 45% के आस पास है.

    अगर मायावती ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट प्रदान करती तो आज बसपा यूपी की ही नहीं बल्कि भारत की सबसे बड़ी पार्टी होती.
    तथा समाज काफी हद तक बदल गया होता.
    मायावती के पास मौका था 403 विधानसभा उम्मीदवारों में 300 उम्मीदवार महिला उतार सकती थी.
    80 लोकसभा उम्मीदवार में से 50 लोकसभा उम्मीदवार महिलाओं के खेमे में डाल देती.

    300 में से 50 उम्मीदवार सवर्ण पृष्ठभूमि से आनेवाली महिला.
    50 मुस्लिम समाज से तथा 100 पिछड़ा और 100 दलित समाज से.

    कुछ इसी तरह से लोकसभा उम्मीदवारी में महिलाओं की भागीदारी तय कर देतीं.

    2014 के लोकसभा चुनाव में महिला भागीदारी यूपी की देखते हैं?
    बसपा- 7(जीत-0)
    कांग्रेस-12(जीत-1)
    सपा-11(जीत-1)
    भाजपा-11(जीत-10)
    अपना दल की अनुप्रिया पटेल भाजपा गठन्धन की तरफ से कैबिनेट मंत्री थीं.

    अगर ऐसा करती तो टकले सन्तरे के लंठो की फौज एंटी रोमियो स्क्वाड बनके प्रेमी जोड़ों को न पीटते.
    पुलिस आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओ पर लाठियां न बरसाती.
    शिक्षामित्रों पर लाठियां न बरसती.
    और भी न जाने कितने इंसिडेंट हुए महिला उत्पीड़न को लेकर.

    इसबार तो मायावती ने हद कर दी है, कोई उम्मीद नहीं बची है इनसे जैसा इनका बिहेवियर रहा है.हो सकता मायावती और अखिलेश को इसके बाद अपने अम्बेडक्राइट और समाजवादी होने का अक्ल आये.

    यह पोस्ट अनामिका सिंह के फेसबुक वॉल से ली गई है

  • “कन्हैया कुमार खायें-पीयेँ-अघायेँ हुए सवर्णों के नेता है”

    पटना का मौर्यालोक मार्केट राजनीतिक प्राणियों का चारागाह है। प्रति दिन शाम में लेखक, पत्रकार, छात्रनेता, राजनेता, शिक्षक, समाजसेवी, डॉक्टर, व्यापारी, बयूरोक्रेट इत्यादि का लगने वाला जमावड़ा बिहार की राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त है। उस जमावड़े में शामिल कुछ लोग केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने की बात करते हैं साथ में कन्हैया कुमार की जीत की भी कामना करते हैं। आप जब उनलोगों की जाति जानने का प्रयास करेंगे तब आप बखूबी समझ जायेंगे की वह किस जाति समूह के लोग हैं।
    एक दिन पटना के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑफिस में बेगूसराय मंडल भाजपा के महामंत्री से भेंट हुई। वह भी जाति से भूमिहार थे। बातचीत में ऐसा लगा कि उनकी भी इच्छा थी कि कन्हैया बेगूसराय से चुनाव लड़े। आप निजि जीवन में भाजपा से सहानुभूति रखने वाले कुछ भूमिहार जाति के लोगों से बात करें। बात करने के दौरान एक बात सभी मे कॉमन होगा वह यह कि सबकुछ के बावजूद कन्हैया भाषण अच्छा करता है।

    मैंने यह उदाहरण इसलिए दिया है ताकि यह समझा जा सके कि कन्हैया कुमार के भूमिहार जाति से होने और बेगूसराय से चुनाव लड़ने के बीच का सम्बन्ध समझ सके। वह भले ही आवेदन देकर भूमिहार जाति में जन्म नहीं लिए हो मग़र बेगूसराय में उनकी जाति उनकी पहचान बनती जा रही है।
    बीबीसी के एक कार्यक्रम में कन्हैया जाति के प्रश्न पर जवाब देते हुए कहते है कि क्या वह अपने माता-पिता बदल ले। मेरा मानना यह है कि जातीय श्रेष्ठता के प्रश्न पर इतना घुमाकर जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं है। बल्कि यह स्थापित सत्य है कि सवर्ण जाति में जन्म लेने पर लॉबी, नेटवर्किंग, मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठता इत्यादि स्वयं से विकसित होता जाता है।
    इसी 15 मार्च को बिहार की राजधानी पटना में बीबीसी हिंदी के द्वारा “बोले बिहार” नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस कार्यक्रम के एक हिस्सा में कन्हैया कुमार को बतौर वक्ता बुलाया गया। कार्यक्रम को वरिष्ठ पत्रकार रूपा झा मॉडरेट कर रही थी। इस पूरे कार्यक्रम में कन्हैया कुमार ने जिस तरह से जाति के प्रश्न का उत्तर दिया वह बिल्कुल ठहलाने जैसा था।

    वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने जब जातीय पहचान के संदर्भ में प्रश्न किया तब कन्हैया कुमार रूस के लेनिन का उदाहरण देकर और रूस के विघटन की बात करके प्रश्न को टाल गये। जब्कि सच्चाई यही है कि रूस के भौगोलिक एवं सामाजिक संरचना में जमीन-आसमान का फ़र्क़ है। भूगोल एवं समाज का राजनीति में बड़ा हस्तक्षेप होता है।
    रूस के विघटन में रूस की भौगोलिक संरचना सबसे बड़ी वजह थी। भारत के संदर्भ में उसी रूस की थ्योरी को फिट करके नहीं देखा जा सकता है। बल्कि रूस की सामाजिक संरचना में जाति जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था मग़र वहाँ की जो सामाजिक संरचना थी उसको कम्युनिस्ट सही से एड्रेस नहीं कर सकी जिसका परिणाम हुआ कि रूस से कम्युनिस्ट की सरकार चली गयी। इसलिए भारत के राजनीतिक बदलाव को रूस के सन्दर्भों में जस्टिफाई करना एक प्रबुद्ध स्कॉलर का काम नहीं है।

    वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार हमेशा कहते है कि जो जाति के मुद्दें पर बहस नहीं करना चाहता है वही असल जातिवादी है। इस पूरे एपिसोड में कन्हैया कुमार ने जाति वाले सवाल को टाल दिया। रूपा झा के सवाल को भी कन्हैया ने टालने का प्रयास किया। वह मानने को तैयार ही नहीं थे कि एक विशेष जाति वर्ग के होने के कारण बेगूसराय में उनको लाभ मिल रहा है। बल्कि जाति के सवाल को रात में सड़कों पर निकलने वाली महिलाओं की छेड़खानी से तुलना करके जवाब दिया।

    महिला तो स्वयं में एक शोषित वर्ग है और उसी वर्ग को उदाहरण मान लेना तर्कपूर्ण नहीं है। देश भर के दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थानों में सैकड़ों रिसर्च से साबित हो चुका है कि महिला स्वयं में शोषित वर्ग है और यदि महिला दलित समुदाय से है तब दोहरा शोषण झेलती है। फिर कन्हैया जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति जाति जैसे संवेदनशील मुद्दें को इतने हल्के में लेकर कैसे चल सकते है? ग़ज़ब तो तब लगा जब हॉल में बैठें लोग कन्हैया के जवाब के बाद ताली पीट रहे थे।
    जहाँ तक सवाल भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी के कमज़ोर होने का है तब कन्हैया ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकारा की कम्युनिस्ट पार्टी समाज के बदलते स्वरूप को समझकर आंदोलन का रूप नहीं बदल सकी है। मैं कन्हैया की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ। भारत कल भी जातिवादी समाज था और आज भी जातिवादी समाज है। भारत की राजनीतिक सच्चाई को तबतक नहीं समझा जा सकता है जबतक जातियों की आंतरिक राजनीति को नहीं समझ लिया जाये।
    भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा वर्ग (Class) विभेद को मुद्दा बनाकर राजनीति किया है। जबकि होना यह चाहिए था कि कार्ल मार्क्स की उस थ्योरी को भारत में जाति में फिट करके देखना चाहिये था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाबा साहब अम्बेडकर मार्क्स और हेगेल की थ्योरी को जाति की संरचना पर फिट करके देखना चाहते थे। क्योंकि उच्च जाति में जन्म लेना एक एडवांटेज रहा है।

    कम्युनिस्ट आंदोलन में सबसे अधिक सहभागिता दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की रही है। लेकिन प्रतिनिधित्व हमेशा सवर्ण एवं ब्राह्मणों के हाथ में रहा। उदाहरण के रूप में बेगूसराय, चम्पारण, जहानाबाद, गया, आरा इत्यादि जिलों में भूमिहार जाति का दबदबा रहा है। बिहार में भूमिहार ही सबसे अधिक जमीन के मालिक है। दलितों का सबसे अधिक शोषण यही जाति वर्ग के लोग भी किये है। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यही है कि कम्युनिस्ट आंदोलनों के अग्रणी नेता भी शोषक समुदाय के लोग है।
    समाजवादी आंदोलन के बाद लालू, मुलायम, नीतीश, पासवान जैसे नेताओं का जब उभार हुआ तब दलितों, पिछड़ों एवं मुसलमानों में प्रतिनिधित्व को लेकर एक चेतना का विकास हुआ। यही से दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कम्युनिस्ट आंदोलन से निकलकर समाजवादी राजनीति की तरफ़ शिफ़्ट हुए और नेतृत्व परिवर्तन का यही दौर था जिसे कम्युनिस्ट लोग जंगलराज से पुकारते है।
    कम्युनिस्ट पार्टी में प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कन्हैया ने रामावतार शास्त्री को बड़ी चालाकी से एक यादव नेता के प्रतीक के रूप में पेश कर दिया। आज भी दूरस्थ भारत की एक बड़ी आबादी कन्हैया कुमार और रवीश कुमार को दलित समझती है। भला उस आबादी को 1967 में चुने गये सांसद राम अवतार शास्त्री की जाति कैसे मालूम होगी? हाँ, मगर 1967 के समय के लोगों को मालूम था कि राम अवतार शास्त्री यादव समुदाय से आते थे।

    इनसब मुद्दों पर बहस करने से पूर्व कन्हैया कुमार को थोड़ा राजनीतिक प्रतिनिधित्व (Political Representation) और राजनीतिक सहभागिता (Political Participation) के बीच के अंतर को समझना चाहिये। यह तो स्थापित सत्य है कि कम्युनिस्ट आंदोलन में शोषितों के नाम पर सबसे अधिक सहभागिता (Participation) पिछड़ी जाति, दलित, अल्पसंख्यकों की रही है।

    मगर क्या सहभागिता (Participation) के अनुपात में दलित, पिछड़े एवं अल्पसंखयकों को प्रतिनिधित्व (Representation) मिला? कन्हैया ने दबे लफ़्ज़ों में यह मैसेज देने का प्रयास किया कि कम्युनिस्ट पार्टी यादव जाति के लोगों को सांसद बनाती रही है। इसलिए महागठबंधन के अगुआ तेजस्वी यादव को चाहिये कि बेगूसराय से भूमिहार कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाने के बारे में विचार करें।
    एक युवा ने कन्हैया कुमार से पूर्व छात्रनेता चंद्रशेखर उर्फ चंदू और बाबहुली नेता शहाबुद्दीन साहब के संदर्भ में प्रश्न किया। कन्हैया ने एक अप्रत्याशित उत्तर दिया जिसकी उम्मीद कोई नहीं कर सकता था। कन्हैया बार-बार यह बताने का प्रयास करते रहे कि चन्द्रशेखर सीपीआई के नहीं थे बल्कि सीपीआई (एमएल) के नेता थे। अब जब चारों तरफ से वाम एकता की बात हो रही है उस समय चंदू के प्रश्न पर चंदू को सीपीआई (एमएल) से जोड़कर स्वयं को चंदू से अलग कर लेना कितना न्यायसंगत है? जब सीपीआई और सीपीआई (एमएल) आपस में मिलने को तैयार नहीं है फिर कन्हैया किस तरह के महागठबंधन में शामिल होने की कल्पना कर रहे है?

    क्या वह सिर्फ़ इसलिए चंदू के सवाल को टाल गये की महागठबंधन के प्रत्याशी बनने के रूप में उन्हें शहाबुद्दीन साहब के परिवार का अनैतिक समर्थन करना पड़ेगा? चन्द्रशेखर उर्फ चंदू 1990 में एमफिल के लिए जेएनयू गये। वह जेएनयू जाने से पूर्व पटना यूनिवर्सिटी के छात्र थे। वह पटना यूनिवर्सिटी में सीपीआई की छात्र विंग AISF के सक्रिय सदस्य थे। वह जब जेएनयू गये तब सीपीआई(एमएल) की छात्र विंग आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) के ढाँचा को अपनी परिश्रम से खड़ा किये थे। कन्हैया कुमार भी सीपीआई की विंग AISF के नेता है। इसलिए कन्हैया द्वारा चंदू को सीपीआई से सिरे से खारिज़ कर देना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
    भक्त का विरोध करते-करते लोग कब अंधसमर्थक की फ़ौज खड़ी कर लेते है पता भी नहीं चलता है। जब जेएनयू घटना के बाद कन्हैया कुमार जेल से छूटकर कैंपस पहुँचे तब एक जोरदार भाषण दिया। कन्हैया का कहना था कि संयोग से जेल में उनको खाना लाल और नीलें रँग के कटोरे में परोसा गया। मालूम नहीं उनकी यह बात कितनी सत्य पर आधारित है, वही जाने।

    दरअसल, वह यह बताना चाहते थे कि भगत सिंह और बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों को साथ लेकर आगे बढ़ा जायेगा। मग़र भगतसिंह और अम्बेडकर के विचारों को एकसाथ लेकर कैसे चला जा सकता है? जब्कि भगतसिंह और अम्बेडकर के विचारों में नार्थ पोल और साउथ पोल का फ़र्क़ है। उदाहरण के रूप में (1) भगतसिंह साइमन कमीशन का विरोध कर रहे थे। जब्कि अम्बेडकर पूरा एक ड्राफ़्ट लेकर साइमन कमीशन से दलितों की हिस्सेदारी माँगने चले गये।
    (2) अम्बेडकर हमेशा डेमोक्रेटिक तऱीके से क़लम को हथियार बनाकर लड़ाई लड़ने की बात करते थे। जब्कि भगतसिंह सेंट्रल हॉल पर बम फेंक रहे थे। (3) शूद्रों पर हो रहे अत्याचार के लिए अम्बेडकर ने सवर्णों एवं ब्राह्मणों को दोषी ठहराते थे इसलिए उनका मत था कि ब्रिटिश भारत में सामाजिक न्याय ब्राह्मण भारत से अधिक मिलने की संभावना है। लेकिन भगतसिंह इसबात को नकारते थे।

    ऐसे अनेकों वैचारिक विरोधभास है जिससे साबित होता है कि कन्हैया कुमार के सामाजिक रूप से विशेष सुविधा प्राप्त सवर्णों के नेता है। यदि ऐसा नहीं होता तब वह सामाजिक न्याय को मज़बूती प्रदान करने के लिए बेगूसराय से मुहिम छेड़ते और कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर ही किसी दलित या पिछड़े या अल्पसंख्यक समाज के किसी नेता को मज़बूती से समर्थन देकर चुनाव लड़ाते। इससे सहभागिता के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी बढ़ता और सामाजिक न्याय की विचारधारा भी मज़बूत होती। साथ में कम्युनिस्ट पार्टी की विश्वसनीयता भी वापस लौटती।

    तारिक़ अनवर चम्पारणी
    (लेखक, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुम्बई से दलित एंड ट्राइबल स्टडीज में मास्टर इन सोशल वर्क, MSW, हैं और वर्तमान में बिहार में किसानों के साथ काम कर रहे हैं)

  • लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए सेक्यूलर पार्टियों का गठबंधन अपरिहार्य है

    डॉ मोहम्मद मंजूर आलम
    इलेक्शन 2019 की तारीखों का ऐलान हो चुका है सभी पार्टियों की तैयारियां जारी है 23 मई को परिणाम भी सामने आ जाएगा देश में किसकी सरकार बनेगी या बीजेपी का सत्ता बरकरार रहेगा या वर्तमान अपोजिशन पार्टीयों को सरकार बनाने का मौका मिलेगा अपोजिशन पार्टियों के दरमियान इस बात पर मुकम्मल इत्तेफाक है कि पिछले 5 सालों में भारतीय संविधान और दस्तूर की धज्जियां उड़ाई गई है संविधान को कुचलने की मुकम्मल तौर पर कोशिश हुई है संविधान और सत्ता का दुरूपयोग किया गया है और अगर यह सरकार दोबारा सत्ता में आती है तो यकीनी तौर पर देश के संविधान ‌मे परिवर्तन कर दिया जाएगा चुनाव मुहिम में दस्तूर और संविधान का सुरक्षा लगभग सभी अपोजिशन पार्टियों का नारा है इसी जुमलों के साथ सियासी पार्टियां जनता से साथ मांग रही है और देश की हिफाजत के लिए असमाजिक तत्वों के ताकतों को शिकस्त देने की अपील हो रही है लेकिन दूसरी तरफ मामला यह है कि सेकुलर पार्टियां नजरियाती इत्तेफाक से आगे नहीं बढ़ रही है अमली सतह पर इनमें इत्तेफाक नजर नहीं आ रहा है कुछ राज्य में अपोजिशन पार्टियों ने गठबंधन कर लिया है लेकिन कई राज्यों में अमली सतह पर इंतशार नजर आ रहा है कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर लिया है बिहार में भी गठबंधन होने की पूरी कोशिश है लेकिन यूपी, पश्चिमी बंगाल समेत कई राज्य ऐसे हैं जहां सेकुलर पार्टियों के दरमियान
    गठबंधन नहीं हो पाया है

    सेकुलर पार्टियों के इंतेशार को अच्छा नहीं माना जा सकता है जनता भी इसकी वजह से सस्पेंशन के शिकार हैं कि वह किसे वोट दें किसकी जीत को यकीनी बनाए 5 साल के हालात को देखते हुए जनता ने बहुत आसानी के साथ या फैसला कर लिया है कि हमें किसे वोट नहीं देना है लेकिन सेकुलर पार्टियों के इंतेशार की वजह से किसे वोट देना है इसका फैसला नहीं हो पा रहा है जीत और हार का फैसला जनता के जरिए होगा जिसके हाथ में जनता का एकजुट वोट जाएगा उसी का चुनाव परिणाम आएगा लेकिन जनता और वोटर्स के दरमियान एकता पैदा करने के लिए सियासतदानों अपोजिशन पार्टियों का गठबन्धन जरूरी है अगर ऐसा नहीं होता है सेकुलर पार्टियों के अलग-अलग उमीदवार चुनाव लड़ते हैं तो वजह तौर पर सेकुलर पार्टियों को नुकसान उठाने पड़ेंगे , आर एस एस के कार्यकर्ता घर घर पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जुमलों को कामयाबी बता रहे हैं जाति तौर पर इन्हें व सेकुलर पार्टियों का विरोधी बना रहे हैं इनके दिमाग में ऐसे ऐसे शब्द पैदा कर रहे हैं जिसकी वजह से वह सेकुलर पार्टियों से दूर जा रहे हैं
    सेकुलर पार्टियां ऐसे कदम का सही जवाब देने में नाकाम है ना ही उनके कार्यकर्ता घर घर पहुंच कर सही जानकारी दे पा रहे हैं तथा मीडिया भी एकतरफा तौर पर एक एजेंडे के मुताबिक काम कर रही है मोदी सरकार की नाकामियों को कामयाबी बता कर जनता के दिमागों को आकर्षित कर रहे है

    अपोजिशन और सेकुलर पार्टियों का रवैया भी बदला बदला सा नजर आ रहा है उनकी तरफ से जो बयानात और एलान आ रहे हैं उनमें व्यवहार और मर्यादा का कोई लिहाज नहीं रखा जा रहा है सियासी उसूलों का पासदारी नजर नहीं आ रहा है जिसे संविधान में सराहा नहीं जा सकता है और ऐसा लगता है कि गठबंधन इमकानात बंद करने की भी कोशिश हो रही है एक मामला यह भी है कि एक दो पार्टियों को छोड़कर कई सियासी पार्टियां ऐसी है जो अपने बड़े लीडर को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाह रहे हैं उनके एजेंडे नजरियात और खदम से ऐसा लग रहा है कि उनकी पार्टी के अध्यक्ष भी प्रधानमंत्री के लिए सबसे सक्षम है इसे मुनासिब नहीं कहा जा सकता है और इस तरह चुनाव 2019 में सेकुलर पार्टियों को नुकसान हो सकता है एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि जब सियासी पार्टियां आपस में एक नहीं होगी तो क्या जनता में खुद ब खुद एकता आ जाएगी क्या यह मुमकिन है यह समय अब भाषण का नहीं बल्कि देश की तरक्की और संविधान की हिफाजत के लिए फैसला करने का है जिस तरह कर्नाटक और बिहार में गठबंधन हुआ है इसी तरह अन्य राज्यों में भी होना चाहिए

    2019 का इलेक्शन बहुत महत्वपूर्ण है यह सत्ता की तब्दीली और सरकार बनाने का मामला नहीं है बल्कि भारतीय संविधान के अस्तित्व और संवैधानिक इदारों की सुरक्षा और संविधान की बदहाली का मामला है पिछले 5 सालों में जिस तरह से नियम को कुचलने की और संविधान को कमजोर करने की कोशिश हुई है आगे ऐसी सरकार के बनने के बाद यह निश्चित हो जाएगा देश पिछड़ जाएगा संविधान खतरे में होगी इसलिए सियासी सेकुलर पार्टियों का‌ आपसी गठबंधन जरूरी है ता की जनता का कंफ्यूजन दूर हो सके और देश मे एक सेकुलर सरकार का निर्माण हो पाए, संविधान की बहाली निश्चित हो जाए

    (लेखक ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी है)

  • ‌नजरिया_ ये जो भक्त है ये उन्हीं का वक़्त है

    (जिशान नैय्यर)
    भारतीय राजनीति में नेताओं के भक्त या कट्टर समर्थक हर दौर में रहें हैं.चाहे नेहरू हो इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी हालांके मैंने उनका दौर तो नही देखा है. लेक़िन पढ़ने और सुनने के बाद कह सकता हूँ

    मैंने जिस नेताओं के प्रति भक्ति देखी है उनमें वाय एस राजशेखर रेड्डी,जयललिता,और करुनानिधि शामिल है और एक हद तक इन तीनों के निधन के बाद इनके समर्थकों ने आत्महत्या तक कर ली.

    एक बात यहाँ साफ़ है के दक्षिण भारत में नेताओं के प्रति अंधभक्ति हद से ज्यादा है, उत्तर भारत के मुकाबले में.

    लेक़िन आज अग़र नेताओं के प्रति भक्ति देखें तो लगता है उनके नेता से सवाल करना आलोचना करना देशद्रोह के सूची में आता है.

    हालांके जब से पिछले साढ़े 4 साल से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तो समर्थक को भक्त का ख़िताब मिल गया जो बिल्कुल नया शब्द है इससे पहले समथर्क कहा जाता था.और अब उनके विरोधी उनको भक्त कह कर संबोधित करतें हैं इस भक्ति में आम और ख़ास से लेकर बॉलीवुड खेल मीडिया हर क्षेत्र के लोग शामिल हैं.

    लेक़िन पिछले एक दो साल में भक्ति की शक्ति में बहुत बड़ी गिरावट आई है.

    यही हाल पिछले एक साल से राहुल गाँधी से भी है. जब से तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी है तबसे उनके प्रति भी भक्ति उबाल मार रहा है हालांके ये भक्त भी मोदी भक्त से कहीं भी कम नही है.औऱ तो और जब से प्रियंका गाँधी आधिकारिक तौर पर कांग्रेस की महासचिव बनी है.

    तबसे औऱ ज्यादा भक्ति के शक्ति में इज़ाफ़ा हुआ है.जैसे प्रियंका के पास कोई जादू की छड़ी हो और कांग्रेस को यूपी में 2 सीट से 20 सीट पर पहुँचा देगी वैसे यही भक्ति राहुल गांधी के लिए 2013 में थी जब वो उपाध्यक्ष बने थे.

    कन्हैया कुमार वैसे तो उनको नेता बनाने का श्रेय मोदी जी को जाता है और वो खुद और उनकी पार्टी भी कन्हैया को नेता मान चुकी है औऱ ज़िला कमिटी ने उन्हें लोकसभा का बेगूसराय से उम्मीदवार भी बना दिया है.

    वैसे उनके प्रति भी अंधभक्ति अपने चरम सीमा पर है क्योंकि मैं भी उसी क्षेत्र से आता हूँ औऱ मैंने भी इसको देखा है उनके भक्त में ज्यादातर युवा नेता शामिल है.

    किसी भी नेता के पतन के पीछे उनके भक्त ही होतें हैं समर्थक होना और भक्त होना दो अलग अलग चीच है लेक़िन अब के दौर समर्थक कम भक्त ज्यादा देखने को मिल रहें हैं
    औऱ यही भक्त उनको ले डूबेगा.

    ZEESHAN NAIYER
    MAULANA AZAD NATIONAL URDU UNIVERSITY HYDERABAD