Category: लेख, विचार

  • गुड़गांव घटना की विस्तृत फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट: यूनाइटेड अगेंस्ट हेट

    मोहम्मद साजिद और उनका परिवार जो भूप सिंह कॉलोनी,ग्राम भोंडसी, गुरुग्राम, हरियाणा के निवासी हैं की ज़िंदगी ने 21 मार्च की शाम को अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। होली के दिन की एक आलसी दोपहर थी और धीरे धीरे शाम ढल रही थी जब साजिद, उनके बेटे और उनके कुछ रिश्तेदार जो छुट्टी का दिन होने की वजह से उनके घर पर थे, अपने घर के सामने एक परित्यक्त क्षेत्र में क्रिकेट खेल रहे थे । दो युवा लड़के, जो पड़ोस के नया गावं नामक गावं के निवासी थे एक बाइक पर आये और उनके साथ खेलने की मांग की। परिवार के बीच दोस्ताना क्रिकेट मैच पहले से ही चल रहा था और वो लोग इसे खेल रहे थे और इस सिलसिले को तोड़ना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने उन्हें मना कर दिया । इस कारणवश थोड़ी तकरार हुई और साजिद के अनुसार उन पर और उनके परिवार पर एक सांप्रदायिक टिप्पणी की गयी ” तुम मुल्ले लोग पाकिस्तान जा कर क्रिकेट क्यों नहीं खेलते”. फिर वो लड़के चले गए और कुछ देर बाद दो बाइक के साथ वापस आये जिस पर छह लोग थे और सबके हाथ में लाठी,लोहे की छड़ और यहां तक भाले भी थे। उन लोगों के पीछे एक और भीड़ थी जिनके हाथों में लाठी डंडे और भले तक थे
    भीड़ उनके घर में घुस गई और आक्रामकता के साथ हर एक को पीटना शुरू कर दिया । परिवार के कुछ सदस्य जो ऊपर छत पर फंसे हुए थे हमले की एक छोटी सी झलक कैमरे में कैद कर के एक वीडियो बना ली जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। तब तक कुछ हमलावरों को एहसास हो गया के उनकी वीडियो बनाई जा रही है जिसके बाद उन्होंने लोहे के रॉड और भालों से छत के दरवाज़े को तोड़ने की कोशिश असफ़ल रहे। उनके द्वारा की जा रही हिंसा की वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली गयी है ये जानने के बाद वो भाग गए लेकिन हमला कितना तेज़ और आक्रमक था इसे उस वीडियो को देख कर समझा जा सकता है।

    भीड़ ने पूरे घर को घेर लिया था और घर में लगे कांच के शीशे को तोड़ने के लिए लगातार चट्टानों और पत्थरों से हमला करती जा रही थी वे सांप्रदायिक गालियां देते रहे और बच्चों सहित परिवार के सभी सदस्यों को पीटा जो नीचे और पहली मंजिल थे। यहाँ तक की उन्होंने भयभीत बच्चों जो अलमारी के पीछे छुप् अलमारी से बाहर खींच कर उन्हें पीटा। फिर अलमारी खोल कर गहने और कैश तक लूट लिए जो उन्हें मिल गया । मोहम्मद साजिद, मोहम्मद इरशाद, मोहम्मद शादाब, श्रीमती शाकेरीन आबिद, शाहरुख, समीना,दिलशाद, नरगिस, अफ़ीफ़ा और आमिर को सबसे ज्यादा बेरहमी से पीटा गया था और वास्तव में हमलावरों को लगा के वो मर चुके हैं ।

    साजिद के डरे हुए परिवार ने 100 नंबर डायल करके पुलिस को कॉल करने की कोशिश की लेकिन वो उपलब्ध नहीं हुए. अंत में वो घायल लोगों को एक निजी कार से इलाज के लिए दिल्ली के एम्स ले कर आये और परिवार का एक व्यक्ति पुलिस रिपोर्ट करने के लिए स्थानीय थाने पहुंचा।
    यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की एक टीम ने पहली बार दिल्ली स्थित लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल में 25 मार्च 2019. को भर्ती किए गए घायल पीड़ितों से मुलाक़ात की और दो दिन बाद उनके घर का दौरा किया।

    वो घर अस्पताल की तरह दिख रहा था। टूटे हुए कांच के शीशे हर जगह बिखरे हुए थे और दीवारों पर छड़ और भालों के निशान भी थे । खिड़कियों और दरवाज़े तोड़ कर गुंडों ने जबरन घर में घुसने का प्रयास किया था।घर के प्रत्येक कमरे और बिस्तर पर एक या दो घायल व्यक्ति पड़े थे। परिवार का प्रत्येक डरा हुआ और तनाव में था ” बच्चे तब से हर दिन रोते हैं । ‘ वो रंगवाले लोग फिर से आ जायेंगे अब्बु. भाग चलते है यहाँ से “. जिन हमलावरों ने सुबह होली खेली थी और शाम को लाठी और भाले के साथ उन सब को मारने के लिए आये थे बच्चों के दिमाग में हमेशा के लिए हैं है । उन्होंने हर दरवाजे को तोड़ दिया था बस एक छत का दरवाजा वो नहीं तोड़ पाए थे जहाँ कुछ कुछ महिलायें और लड़कियां छुपे हुए थे और परिवार की एक लड़की दनिश्ता ने वहीँ से इस पूरी घटना का वीडियो बनाया था। उस दरवाज़े को जबरन तोड़ने और भालों से दरवाज़े पे प्रहार के निशाँ स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन वो लोग दरवाज़े को नहीं तोड़ पाए ” साजिद की युवा बहू नरगिस बताती हैं के अल्लाह, हमारे साथ खड़ा था, दरवाजा पकड़ रहा था वरना हम बस कुछ लड़कियां एक तरफ और हथियारबंद गुंडे दूसरी तरफ थे।
    साजिद बताते हैं के उनके परिवार को गुंडों से बचाने कोई स्थानीय पड़ोसी नहीं आया क्यूंकी एक तो होली के कारण उनमें से ज्यादातर यहाँ नहीं थे और जो मौजूद थे वो दूर से ही हमें पीटता हुआ देख रहे थे और शायद डरे हुए थे इसलिए कोई भी नहीं आया। भूपसिंह कॉलोनी में कोई बहुत पुराने पड़ोसी नहीं हैं क्यूंकी यह एक कम आबादी वाली नई विकसित कॉलोनी है, जहां ज्यादातर प्रवासी श्रमिक जो गुड़गांव के विशाल औद्योगिक बेल्ट में काम करते हैं, किराए पर रहते हैं इसलिए कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है एक दुसरे के साथ क्यूंकी अधिकतर लोग बाहर से आये हैं। वहीँ दूसरी ओर हमलावर नए गाँव से आए थे , जो एक अपेक्षाकृत बड़ी बस्ती है और अधिकतर गूजर समुदाय के लोग हैं जो स्थानीय जाति हैं, और उनके द्वारा हिंसा की घटनाएं आम हैं। इसी डर के कारण से पड़ोसी,जो भी उस दिन के चश्मदीद थे और स्थानीय गुंडों को पहचानते भी थे उन्होंने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया

    पुलिस की भूमिका:
    पुलिस ने साजिद और उनके परिवार को पीटने वाले भीड़ के किसी भी सदस्य का नाम प्राथमिकी में शामिल नहीं किया हालांकि वे इंटरनेट पर उपलब्ध वीडियो से बहुत आसानी से पहचान सकते हैं यानी एफआईआर नामज़द नहीं हुई है।
    पुलिस के दावे के अनुसार कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया है लेकिन इतने दिनों के बाद भी हिरासत में लिए गए आरोपी की कोई पहचान परेड नहीं हुई है ।
    पुलिस स्टेशन में हर कोई अपने होंठ सिले हुए था और मामले के बारे में कुछ भी बात करने के लिए तैयार नहीं था। उनका कहना था के कमिश्नर श्री अकील ने निर्देश दिए हैं कि पुलिस विभाग को बाहर से किसी भी व्यक्ति से इस पर बात नहीं करनी चाहिए ।

    एक काउंटर केस और एफआईआर देने से इनकार:

    परिवार पर एक काउंटर केस दर्ज किया गया है और सात दिनों के बाद, आरोपीयों ने एक लड़के को सामने लाया है जो उनके अनुसार पीड़ित परिवार द्वारा चोटिल हुआ है और उसके सर पर टाँके लगे हैं। अजीब बात है कि इस लड़के का उल्लेख उस आरोपी द्वारा कहीं नहीं किया गया था जब मीडिया ने व्यापक रूप से हमले की घटना को कवर किया था। काउंटर एफ़आईआर स्पष्ट रूप से पीड़ित लोगों को कानूनी रूप से और मामले को सेटल करने के लिए पीड़ितों को डराने धकाने और संतुलन बनाने का एक प्रयास है । इस काउंटर एफआईआर की कॉपी परिवार द्वारा मांगे जाने के बावजूद भी परिवार को नहीं दी गई है जो की उनका अधिकार है UAH के सदस्यों ने कुछ मीडिया वालों की मदद से कॉपी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन पत्रकारों को भी उस एफआईआर की कॉपी नहीं मिल पाई है।

    1 अप्रैल को परिवार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बताया के किस तरह उन्हें धमकी दी जा रही है और यहां तक कि सामूहिक आत्महत्या करने की बात तक पीड़ित परिवार के लोग कर रहे हैं।

    ठीक उसी समय गूजर पंचायत भी किया गया है जहां इस मामले में परिवार को धमकाने और कानूनी करवाई से हट कर बाहर ही इस मामले को हल करने की रणनीति बनाई गयी
    हम जब दूसरी बार परिवार से मिले तो हमने स्थानीय विधायक तेजपाल तंवर को भी परिवार से मिलते देख। विधायक ने कहा: “दोनों लोगों को साथ बैठा कर मिलवा देंगे”. विधायक के साथ आये लोगों का लहजा दोषियों को दंडित करने के बारे में बात करने के बजाय समझौता करने के लिए अधिक था । गुरुग्राम में इस घटना को एक बार फिर से एक बार फिर से बताया गया है कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत और कट्टरता भयानक हिंसा की ऐसी घटनाओं को भड़का रही है और सम्प्रदायिक गुंडे पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं जिन्हें कानून का कोई डर नहीं है और पूरा तंत्र इन गुंडों के सामने आत्मसमर्पण कर चूका है। अगर मोहम्मद साजिद का परिवार मौन में भयभीत है या अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर है, और अगर इन गुंडों को उनके खिलाफ स्पष्ट साक्ष्य के बावजूद सजा नहीं दी जाती तो ये हमारे लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा आघात होगा और भारतीय लोकतंत्र और कानून पर इस देश की जनता के विश्वास को कमज़ोर करेगा

    फैक्ट फ़ाइंडिंग टीम के सदस्य:

    ये रिपोर्ट #UnitedAgainstHate के सदस्यों द्वारा फ़ैक्ट फाइंडिंग के बाद जारी की गयी है। टीम ने 27 मार्च 2019 को गुरुग्राम के भोंडसी गावं का दौरा किया था और पीड़ित परिवार के सदस्यों से मुलाक़ात की थी।

  • मुसलमान सबको चाहिए लेकिन “विक्टिम” की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों।

    आप सबको JNU का वो नारेबाज़ी वाला मामला तो याद ही होगा जिसमें JNU के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, छात्र नेता उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन तीनों को इस मामले में जेल भी जाना पड़ा था। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सात कश्मीरी छात्रों को भी मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन सब के अलावा 36 अन्य को कॉलम नंबर 12 में आरोपी बनाया गया था जो कि कथित तौर पर घटनास्थल पर मौजूद थे।

    इस विवाद से किसी को फ़ायदा हुआ हो या न हुआ हो लेकिन JNU के उसी विवाद से कन्हैया कुमार एक नेता बन कर उभरे और आज बेगूसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। बेगूसराय सीट पर CPI के उम्मीदवार कन्हैया कुमार, भाजपा के गिरिराज सिंह और महागठबंधन के प्रत्याशी डॉ तनवीर हसन चुनाव लड़ रहे हैं। कल यानी 9 अप्रैल को कन्हैया कुमार बेगूसराय से नामांकन करेंगे और CPI उनके नामांकन को अभूतपूर्व बनाना चाहती है। इसी सिलसिले में CPI अंचल परिषद की विस्तारित बैठक सोमवार को जिला कार्यालय कार्यानंद भवन में श्यामसुंदर झा की अध्यक्षता में की गई। मौके पर अंचल मंत्री अनिल कुमार अंजान ने कहा कि “9 अप्रैल को वाम मोर्चा के उम्मीदवार डा. कन्हैया कुमार के नामांकन को अभूतपूर्व बनाया जाएगा। एक-एक बूथ से संगठित जत्था आएगा, जिसमें सभी जाति और सांप्रदाय के लोग शामिल होंगे।”

    हालाँकि ज़मीनी हक़ीक़त इस से परे है। ये सही है की कन्हैया के नामांकन को अभूतपूर्व बनाने ले लिए उन्होंने देश भर में लोगों को न्योता दिया है लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है की कन्हैया कुमार के उस निमंत्रण सूची से छात्र नेता उमर खालिद का नाम ग़ायब है। कल तक छात्र नेता का नाम कन्हैया कुमार की निमंत्रण सूची में था लेकिन रात उस सूची से उमर ख़ालिद का नाम निकाल दिया गया है। CPI को डर है की कन्हैया कुमार के नामांकन में उमर ख़ालिद के आने से कन्हैया कुमार का भूमिहार वोट कट जाएगा। इसलिए भूमिहार वोट कटने के डर से उमर ख़ालिद को इस अवसर पर नहीं बुलाया गया है।

    आज कन्हैया कुमार ने भी साबित कर दिया की मुसलमान सबको चाहिए लेकिन विक्टिम की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों। इस का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं की इस अवसर पर JNU के गुमशुदा छात्र नजीब की माँ फ़ातिमा नफ़ीस को तो वहाँ बुलाया गया है लेकिन कन्हैया के कभी बहुत ही क़रीबी साथी उमर ख़ालिद को नहीं बुलाया है। अब आप ख़ुद अंदाज़ा लगा लीजिए कि जिस कन्हैया को आज एक उर्दू नाम वाले उमर ख़ालिद के अपने नामांकन समारोह में सम्मिलित होने से दिक्कत महसूस हो रही है, कल उनका मसलमानों के साथ रवैया कैसा होगा।

    लाल सलाम। ?

    मोहम्मद ख़ालिद हुसैन

  • इस्लाम विरोधी विचारधारा और जेएनयू के वामदल

    जेएनयू का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है

    14 अक्टूबर 2016 को बायोटेक्नोलॉजी के प्रथम वर्ष के छात्र नजीब अहमद को माही मांडवी हॉस्टल में एक तथाकथित झड़प के बाद पीटा गया और अगले दिन नजीब रहस्यमय ढंग से गायब हो गया. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कोई छात्र लापता हो गया हो और कोई सुराग तक ना मिला हो. स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन, वाईएफडीए और शेहला राशिद आदि कई वामपंथी नेताओं ने बयान दिए कि भीड़ ने नजीब को मुसलमान होने के कारण पीटा और परिसर में इस्लाम विरोधी माहौल व्याप्त है. इस दलील से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़े होते हैं क्योंकि जेएनयू मुख्यधारा की वामपंथी छात्र राजनीति, मसलन सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल)और इनके अतिरिक्त कुछ नासमझ किंतु अधिक रेडिकल वाम संगठनों का गढ़ रहा है.

    नजीब के गायब होने का जिम्मेदारी कौन?

    वामदलों के प्रभुत्व वाले और स्वघोषित निरपेक्षता के लिए विख्यात एक विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर में इस्लाम विरोधी भीड़ अगर इस प्रकार के बर्बर हमले को अंजाम दे सकती है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसे में नजीब के गायब होने की जिम्मेदारी किसकी है? वाम दलों के नेताओं के पास इन प्रश्नों का रटा-रटाया उत्तर यह है की परिसर में एबीवीपी की ताकत बढ़ गई है और इसी कारण मुसलमान असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. लेकिन गौर से देखने पर यह जवाब संतोषजनक नहीं लगता क्योंकि परिसर में स्वयं को निरपेक्ष कहने वाली वाम विचारधारा का समर्थकों की संख्या और अकादमिक सम्मान दोनों में ही प्रभुत्व एवं एकाधिकार है.

    और गहराई से पड़ताल करने पर हम यह पाते हैं कि वामदलों की बयानबाजी भी स्वभावत:मुस्लिम विरोधी ही है जिसमें अक्सर मुसलमानों के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण और इस्लाम का बचकाना चित्रण पाया जा सकता है.

    इस्लाम के भीतर भी बहस है

    यहां पर हम इस्लाम में महिलाओं की स्थिति या स्वतंत्रता, ट्रिपल तलाक या मुसलमानों में जाति प्रथा से संबंधित परिचर्चा की बात नहीं कर रहे हैं. इन विषयों पर इस्लाम के धर्मशास्त्र के अंदर ही व्यापक बहस पहले से चल रही है और इस्लाम के असंख्य विद्वान भी इन मुद्दों पर आपस में मोर्चा खोले हुए हैं. यहां हम उन बयानों और विचारों की बात कर रहे हैं जो उन मुद्दों से संबंधित हैं जोकि इस्लाम की आस्था से बहुत मौलिक रुप से संबंधित है और जिनके बारे में अपरिपक्व व्यवहार और बयानबाजी से पहले से ही त्रस्त मुस्लिम युवा और अधिक अलगाव महसूस करने लगते हैं.

    उदाहरण के लिए, नजीब एक धार्मिक रुझान वाला युवक था और बरेलवी सूफी मत की एक धारा से प्रभावित था जैसा कि महान सूफी गौस-ए-आज़म के बारे में उसकी कई फेसबुक पोस्टों से पता चलता है.

    आइए इस प्रकार की बयानबाजी के कुछ नमूने देखते हैं:

    वामपंथी छात्र संगठन आइसा के सदस्य और भूतपूर्व पदाधिकारी हर्ष वर्धन इस फेसबुक पोस्ट में दावा करते हैं कि कुछ मुसलमानों के आतंकवादी बनने का कारण कम से कम आंशिक तौर पर इस्लाम धर्म ही है और उनकी पवित्र पुस्तक कुरान में स्पष्टत: ऐसी खामियां है जिनकी वजह से वे हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित होते हैं.

    इन महानुभाव ने आतंकवादी गतिविधियों और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों के बीच के संबंध को उजागर करने वाले किसी विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ को पढ़ा या समझा तक नहीं है, आतंकवाद की एक अस्पष्ट अवधारणा की आलोचना करना तो शायद इनके लिए बहुत दूर की बात है.

    फिर भी कुरान के बारे में कम से कम एक बुनियादी ऐतिहासिक समझ की उम्मीद तो इनसे की ही जा सकती थी. कई सदियों और कई महाद्वीपों की मुस्लिम जनता में कुरान की स्वीकार्यता इसके प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था.

    लेकिन उनका यह बयान एक सामान्यीकरण है जो कि यह दावा करता है कि कुरान पढ़ने से आप आतंकवादी बन सकते हैं. यह एक पूरी कौम या समुदाय को एक रंग में रंगने वाली घटिया सोच और एक इस्लाम-विरोधी बयान है.

    अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लाम का विरोध कितना सही है?

    फिर भी आइसा के कई कार्यकर्ता इस पोस्ट का तर्कसंगत वाद-विवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक उदाहरण के रूप में समर्थन और बचाव करते रहे. अपनी एक पोस्ट में शहला रशीद द्वेषपूर्ण भाषण या भड़काऊ बयानबाजी क्या होती है यह समझाने का जिम्मा उठा लेती हैं. वे एक उदाहरण देती हैं जिसमें मुहम्मद के लिए एक अपमानसूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है और दावा करती हैं कि यह कथन द्वेषपूर्ण भाषण का उदाहरण नहीं है.

    इस पूरी समस्या की एक वजह यह भी है कि इन चिंतकों का तर्क से दूर का भी कोई नाता नहीं है. अगर कोई इस्लाम के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखता है तो उसे यह पता होगा की इस्लामी आस्था में मुहम्मद को एक सर्वोपरि मानवीय आदर्श माना जाता है. अतः इस पोस्ट में जहां मुहम्मद के बारे में एक अापराधिक श्रेणी की बात की जा रही है, इसका अर्थ यह भी निकलता है कि मुहम्मद के अनुयायी अर्थात सभी मुस्लिम उसी आपराधिक श्रेणी में रखे जाने चाहिए.

    अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ ने इस पर प्रतिक्रिया दी और कैबिनेट मेंबर गजाला अहमद ने शहला के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण की एफआईआर दर्ज करायी. जेएनयू छात्रसंघ और वाम बुद्धिजीवी शहला के बचाव में कूद पड़े और अचानक अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय को एक दकियानूसी विश्वविद्यालय का खिताब देने लगे. यहां तक कि गजाला को पितृसत्तात्मक अलीगढ़ मुस्लिमविश्विद्यालय छात्र संघ के हाथों में एक कठपुतली भी कहा जाने लगा.

    नारीवाद के नाम पर इस्लाम पर हमला कितना सही?

    एक और बचकानी पोस्ट जो इन दायरों में इस्लाम विरोधी सोच के लक्षणों को दर्शाती है, उसमें इस्लामी नारीवाद पर प्रहार किया गया.
    आधुनिक इतिहास के छात्र और आइसा के एक कार्यकर्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि धार्मिक और गैर-धार्मिक मुद्दों पर पिछली पूरी सदी में मुस्लिम महिलाओं के प्रतिरोध के बारे में मुसलमानों और गैर मुसलमानों द्वारा लिखी हुई अकादमिक पुस्तकों की कोई कमी नहीं है.

    इस्लामी-नारीवाद शब्द-युग्म का प्रयोग एक खास संदर्भ में किया जाता है जिसमें की मुस्लिम विदुषियों ने महिलाओं के नजरिए से इस्लामी ज्ञान की एक विभिन्न और पूरक प्रकृति को सामने लाया है, जिसमें कि कभी-कभी परिवार की विक्टोरियन अवधारणा को भी पीछे छोड़ देना पड़ता है.

    दूसरी आपत्तिजनक बात इस पोस्ट में यह की मोहम्मद को सिजोफ्रेनिया की बीमारी का शिकार बताया गया है. यह मुस्लिम पहचान और आस्था पर सीधा हमला है.

    कोई इतिहासकार बिना प्रामाणिक और मूल स्रोतों के कैसे एक बीमारी का पता लगा सकता है, ये हमारी समझ के बाहर है.आश्चर्य की बात यह है कि कुछ वामपंथी विद्वानों ने इस पोस्ट का समर्थन तार्किक सोच के नाम पर किया.

    फतवे का सच और जेएनयू के वामपंथी

    आखिरी उदाहरण सबसे ज्यादा चिंताजनक है. यह श्रेणी है फेक न्यूजज अर्थात झूठी खबरों की. तथाकथित फतवों के बारे में आने वाली लगभग सभी खबरें इसी श्रेणी में आती हैं.

    यहां यह साफ करते चलें कि फतवा दरअसल एक पंजीकृत मुफ्ती द्वारा किसी के पूछने पर इस्लामी आस्था के नैतिक मूल्यों के बारे में दी गई एक कानूनी राय होती है जो कि किसी भी रुप में बाध्य नहीं है.

    यह बताना इसलिए भी जरूरी था कि आजकल के अखबारों के किसी आम पाठक को यह भी गलतफहमी हो सकती है कि कोई भी दाढ़ी वाला मुसलमान अगर किसी हिंसात्मक गतिविधि के लिए उकसाने वाला कोई बयान देता है तो उसे फतवा कहा जाता है.

    आम जनमानस में फतवे कि यही धारणा बना दी गई है. जेएनयू शिक्षक संघ की अध्यक्ष आयशा किदवई ने अपनी टाइमलाइन पर यह शेयर किया.

    यह झूठी खबर दरअसल 2 साल पुरानी है लेकिन उन्होंने पिछले रविवार को इसे शेयर किया. हफिंगटन पोस्ट, द गार्जियन जैसे समाचार प्रतिष्ठान 2 सालों से बता रहे हैं कि यह खबर झूठी है.

    मुफ्ती-ए-अाज़म ने भी खुद ये साफ किया है कि उन्होंने ऐसा कोई फतवा नहीं दिया. यहां सवाल यह नहीं कि हम मुफ्ती-ए-अाज़म की इस्लाम के बारे में अवधारणा से सहमत हैं या नहीं क्योंकि यह तो अलग-अलग प्रकार की आस्थाओं वाले मुसलमानों के बीच एक व्यापक बहस का मुद्दा है.

    यहां ध्यान देने की बात यह है कि इन बुद्धिजीवियों ने चुन-चुन कर ऐसे समाचारों का प्रचार किया जो मुसलमानों को नीचा दिखाते हैं

    यहां हमारा उद्देश्य इन व्यक्तियों की निंदा करना नहीं है ना ही हम बात को कुछएक खराब व्यक्तियों के होने या ना होने की दिशा में ले जाना चाहते हैं.

    हमारा मानना यह है कि इन पोस्टों से वाम दलों के भीतर मौजूद मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह का पता चलता है. यही वजह है कि पिछड़े इलाकों से आने वाले कई मुस्लिम छात्रों को यह गलतफहमी हो जाती है कि उनकी मुस्लिम पहचान,आस्था और व्यक्तिगत आचरण और विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित वामदलों के सुनने में बहुत ऊंचे लगने वाले आदर्शों में 36 का आंकड़ा है.

    इस द्वेषपूर्ण बयानबाजी और साथियों के दबाव के द्वारा यहां का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है. इस प्रकार वे विद्यार्थियों पर विचार और व्यवहार की एक खास पद्धति थोपना चाहते हैं.साथ ही साथ यह उनके इस्लाम विरोधी जनाधार का तुष्टीकरण भी करता है.

    लेखक: Sharjeel Imam and Saqib Salim
    (दोनों ही लेखक जेएनयू से इतिहास के शोधकर्ता हैं) साभार: फर्स्टपोस्ट

  • जानिए- बीएसएनएल को मोदी सरकार ने किस तरह बर्बाद किया

    यह बात सभी को पता है कि किस तरह से 4जी स्पेक्ट्रम बीएसएनएल को न देकर बाकी सब कंपनियों दिया गया….. मोदी सरकार की मंशा जियो को प्रमोट करने की थी और उसी को आगे बढाने के लिए बीएसएनएल को धीमा ज़हर दिया गया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस को सिर्फ डेटा सर्विस के लिए लाइसेंस दिया गया था, लेकिन बाद में 40 हजार करोड़ रुपये की फीस की बजाय 1,600 करोड़ रुपये में ही वॉयस सर्विस का लाइसेंस दे दिया गया।

    लेकिन जियो के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव था। इसलिए मोदी सरकार ने बीएसएनएल के इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे धीरे जिओ को देना शुरू किया। 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने एक टॉवर पॉलिसी की घोषणा की ओर दबाव डालकर रिलायंस जिओ इंफोकॉम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्‍टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जिओ बीएसएनएल के देशभर में मौजूद 62,000 टॉवर्स का उपयोग कर सकती थी। इनमें से 50,000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी ।

    यह जिओ के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योंकि वह चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लेती, इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नही खड़ा कर सकती थी। लेकिन उसके सामने एक मुश्किल यह ओर थी कि बीएसएनएल भी उसके कड़े प्रतिद्वंद्वियों में से एक था, जिन्हें इन टॉवर से सिग्नल्स मिलते थे।

    इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला, उसने जिओ को इन टावर का निरंतर फायदा मिलते रहे इसके लिए इन टावर्स को एक अलग कम्पनी बना कर उसमे डाल दिया।

    मोबाइल टॉवर किसी भी टेलीकॉम ऑपरेटर के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं, इस कदम का परिणाम यह हुआ कि अब बीएसएनएल को भी इन टावरों का इस्तेमाल करने के लिए किराया चुकाना पड़ रहा था। 2017 में मोदीं सरकार ने यह फ़ैसला लिया था, जिससे बीएसएनएल ख़ुद अपने ही टॉवरों की किराएदार बन गया।

    नतीजतन जो कम्पनी 2014-15 में 672.57 करोड़ रुपए के फायदे में आ गई थी, इस निर्णय के बाद हजारों करोड़ रुपए का घाटा दर्शाने लगी।

    कुछ समझे आप मोदी सरकार ने बीएसएसएल को 4जी स्पेक्ट्रम अलॉट भी नही किया और उसे बीएसएनएल के टावर भी दिलवा दिए और बीएसएनएल को ख़ुद अपनी ही संपत्ति का किराएदार भी बना दिया।

    लेकिन मोदी सरकार यही नही रुकी उसने उन राज्यों में जहाँ उसकी सरकार थी, वहां ऐसी पॉलिसी बनाई जिससे जिओ को फायदा पुहंचे ओर बीएसएनएल को कोई मौका नहीं मिले।

    छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने एक योजना शुरू की जिसे संचार क्रांति योजना कहा गया। 2011 में छत्तीसगढ़ में मोबाईल की पहुंच 29 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं कम जनसंख्या घनत्व के कारण दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां राज्य में नेटवर्क का विस्तार नहीं कर पा रही थी।

    संचार क्रांति योजना के तहत इन क्षेत्रों में टेलीकॉम प्रदाता कंपनी द्वारा नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदाय किए जाने हेतु अधोसंरचना (इन्फ़्रास्ट्रक्चर) तैयार की जानी थी और 1500 से अधिक नए मोबाईल टॉवर लगाये जाने थे 600 करोड़ रुपये मोबाइल टावरों की स्थापना पर खर्च किये जाने थे, यानी सारा काम सरकारी खर्च पर किया जाना था। यह ठेका बीएसएनएल के बजाए जियो को दिया गया।

    इस तरह से मोदी राज में BSNL को पूरी तरह से बर्बाद करने की दास्तान लिखी गई।

    (गिरीश मालवीय स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

  • 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्वकार कौन था?

    Ashraf Hussain

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 1857 कि जंग का नेतृत्व मंगल पांडे कर रहे थे लेकिन इतिहास कुछ और ही बता रहा है, बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

    1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला।

    इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया। विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रितानी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले ९० वर्षों तक चला।

    1857 यानी पहली जंगे आजादी के महान स्वतंत्र सेनानी अल्लामा फजले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दिया था ! इस फतवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अज़ीम जंगे आजादी लड़ी !

    अँगरेज़ इतिहासकार लिखते हैं की इसके बाद हजारों उलेमाए किराम को फांसी ,सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था और बहुतसों को काला पानी की सजा दी गयी थी! अल्लामा फजले हक खैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई !

    यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।
    सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है।

    प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा ‘गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स’ के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).

    इतिहास कि कई किताबों में ये भी जिक्र आया है कि 1857 के जंग ए आज़ादी के दौरान डोक्टर विलियम ब्रीडन अंग्रेजों को मशवरा देते हुए कहता है की अगर तुम हिंदुस्तान पर हमेशा अपना कब्जा जमाये रखना चाहते हो तो तिन काम करो,
    – कुरान को खत्म कर दो,
    – ओल्माओ को खत्म कर दो,
    – और मदारिसों को मिटा दो,
    लिहाजा अंग्रेजों ने 1861 तक लाखों कुरान जला दिए, 1864 तक 14 हजार से जादा ओल्माओ को मौत के घाट उतार दिया और हजारो मदरसों को नेस्तो नाबुत कर दिया था।

  • कांग्रेस का”हम निभाएंगे”देश के किसानों के लिए कितना लाभप्रद होगा ये आने वाला वक्त ही बताएगा.

    अनामिका सिंह

    कांग्रेस का”हम निभाएंगे”देश के किसानों के लिए कितना लाभप्रद होगा ये आने वाला वक्त ही बताएगा.

    फिलहाल घोषणापत्र कहता है वो कृषि बजट अलग से पेश करेगी.
    ये बहुत ही पहले हो जाना चाहिए जिस देश के प्रोडक्शन का सबसे बड़ा एरिया एग्रीकल्चर हो उसका एक अलग बजट होना ही चाहिए.

    कृषि को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें जो घोषणापत्र में हैं।

    ● एक स्थायी और राष्ट्रीय आयोग की स्थापना “कृषि विकास और योजना आयोग” इसमे किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्री सम्मिलित होंगे.
    इस आयोग के सुझाव को सरकार मानने के लिए बाध्य होगी.

    ● कृषि बीमा योजनाओ को पूरी तरह से बदला जाएगा.
    कम्पनियो को NO PROFIT NO LOSS (न लाभ न हानि) का सिद्धांत अपनाना होगा.

    ● भूमि के मालिको और किरायेदारी का डेटा digitized करेगी.
    यहां पर महिलाओं को विशेष अधिकार प्रदान किये जायेंगे।

    ● देश के प्रत्येक ब्लॉक् में आधुनिक गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने का लक्ष्य।

    ● कृषि से सम्बंधित रिसर्च संस्थानों की आवंटित राशि को अगले पांच सालों में दुगुनी करने का लक्ष्य.

    ● भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम -2013 तथा वनाधिकार अधिनियम-2006 को मूल उद्देश्यों में फिर से बहाल किया जाएगा. अर्थात देश के मूलनिवासी(आदिवासी) की समस्याओं का समाधान.

    ● मनरेगा का इस्तेमाल अब ग्रामीण स्तर पर खेल के मैदान, स्वास्थ्य केंद्र, पुस्तकालय, कक्षाएं निर्माण करने में भी उपयोग में लाएगी.

    #कांग्रेस_घोषणापत्र2019

    इस क्षेत्र में भाजपा ने 5 सालो में किसानों की आत्महत्याएं दुगुनी कर दी.
    आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां चलवाई.
    फसल बीमा के नाम पर कम्पनियो को खूब फायदा पहुँचवाया.
    मोदी सरकार किसानों के लिए फासिस्ट साबित हुई.
    अपने पांच सालों में न ही सिर्फ मोदी सरकार ने किसानों की जिंदगी को तबाह किया है बल्कि कृषि क्षेत्र को भी तबाह कर दिया.
    अपनी रैलियों की महत्वाकांक्षाओ में हजारों एकड़ फसल कटवा दिये.
    अपने गिने चुने लुटेरों के हवाले जंगलो और पहाड़ों कर दिया तथा आदिवासियों पर कहर बरपाए.

    (अनामिका सिंह)

  • जामिया मिल्लिया इस्लामिया में फिर से इस्लामी तहज़ीब-ओ-सकाफत को ज़िंदा करने की जरूरत है

    (माजिद मजाज)
    डॉक्टर जाकिर हुसैन ने 1938 में जामिया के स्थापना के उद्देश्यों के बारे में कहा था कि “जामिया मिल्लिया इस्लामिया का मुख्य उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के भविष्य के जीवन के लिए इस तरह के एक रोडमैप को विकसित करना है जो इस्लाम के चारों ओर घूमता हो और भारतीय संस्कृति के ऐसे रंगों से मिला जुला हो जो वैश्विक मानव सभ्यता के साथ मेल खाता हो”।

    जामिया का अपना एक शानदार इतिहास रहा है, ये महज़ एक यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ संघर्षों की एक मुकम्मल दस्तावेज़ का नाम है, इसकी बुनियाद की ईंटों में स्वतंत्रता सेनानियों का ख़ून और पसीना शामिल है, ख़िलाफ़त मूवमेंट की हर वो आवाज़ शामिल है जो सर ज़मीन-ए-हिंद से उठती थी।

    भारत को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने के लिए जिन मुसलमानों ने अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया उन्हीं मुसलमानों की एक धरोहर का नाम है “जामिया मिल्लिया इस्लामिया”। अगर इसमें से इस्लाम को अलग कर दो तो फिर कुछ भी नहीं बचेगा।

    यहाँ बात जामिया की हो रही है तो आप पहले ये समझ लें कि जामिया एक धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान है। बहुत फ़र्क़ है बाक़ी संस्थाओं और जामिया में।
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकार दिए जाते हैं ताकि वे अपनी भाषा रीत-रिवाज और अपनी तहज़ीब का तहफ़्फुज़ कर सकें। क्योंकि बहुसंख्यक समाज में हमेशा अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति को लेकर ख़तरा बना रहता है, इसीलिए दुनिया के तमाम देश अपने यहाँ के अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष अधिकार देते हैं। इसीलिए अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान खोलने और इसकी ऑटोनोमी रखने का पूर्णरूप से अधिकार है जो हमारे संविधान की मौलिक अधिकारों की सूची में दर्ज है। अब अगर आप इसकी तुलना बाक़ी की दीगर संस्थाओं से करेंगे तो ये नाइंसाफ़ी ही नहीं बल्कि हमारे संविधान के साथ भी खिलवाड़ होगा।

    इसलिए मेरा मानना है कि इस्लामी तहज़ीब और मानव सभ्यता के उद्धार के लिए इस्लाम का जो एतिहासिक रोल रहा है उसपर चर्चा करने के लिए इस मुल्क में जामिया से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती, क्योंकि इस संस्था का मक़सद भी यही था कि मुस्लिम युवा एक भारतीय नागरिक के रूप में अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के दायरे में रहकर बहुसंख्यक समाज के साथ इस्लामी विचार और इसके व्यवहार को साझा कर सकें। इसका मूल उद्देश्य यही था कि मुसलमानों को अपनी धार्मिक पहचान को साथ लेकर एक सामंजस्यपूर्ण राष्ट्रीयता का निर्माण करना था।

    ज़रूरत है जामिया में फिर से उसी इस्लामी तहज़ीब-ओ-सक़ाफत को ज़िंदा करने की जिसकी वजह से इसकी बुनियाद पड़ी थी वर्ना इसके स्थापना करने वालों के साथ ग़द्दारी होगी। महात्मा गांधी के साथ नाइंसाफ़ी होगी जो इस्लाम को इससे हमेशा जुड़ा हुआ देखना चाहते थे।

    (माजिद मजाज के फेसबुक वॉल से)

  • तेरी मुर्गी मुर्गी और मेरी मुर्गी नूरजहां:जिग्‍नेश का सीवान विवाद

    तनवीर आलम
    देश में आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। हर तरफ चुनावी हंगामे और उन हंगामों में रोज़ एक नई बहस और उस पर विवाद सुनने को मिल रहा है।हाल की घटना वडगाम के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी से जुड़ी है। जिग्नेश मेवानी लेफ्ट विचारधारा से प्रभावित हैं और दिल्ली से लेकर देश भर में AISA से लेकर दलित-मुस्लिम संगठनों में उनकी अच्छी पैठ मानी जाती है। जिग्नेश 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में वडगाम से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार थे।

    जिग्नेश जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और बेगुसराय से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के लोकसभा प्रत्‍याशी कन्हैया कुमार के मित्र भी हैं। जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार और उमर खालिद कई बार एक साथ मंच भी साझा करते रहे हैं। मार्च के आखिरी सप्ताह में कन्हैया का चुनाव प्रचार करने जिग्नेश बेगुसराय पहुंचे और वहां प्रचार किया। 31 मार्च को सीवान में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर का शहीदी दिवस मनाया जाना था जिसमें भाग लेने के लिए जिग्नेश अपने साथी के साथ सिवाना के लिए निकले। सोशल मीडिया के माध्यम से दिल्ली में बैठे जिग्नेश के मुस्लिम साथियों को इसकी सूचना मिली कि जिग्नेश सीवान जा रहे हैं और वो वहां सीपीआई (एमएल) के प्रत्याशी का चुनाव प्रचार करेंगे। सीवान से ही महागठबंधन के सबसे बड़े घटक दल राजद की प्रत्याशी हिना शहाब चुनाव लड़ रही हैं। यहां ये बताते चलना होगा कि 31 मार्च 1997 को चंद्रशेखर की हत्या हिना शहाब के पति और गैंगस्टर शहाबुद्दीन ने करा दी थी जब वो सीवान में नुक्कड़ सभा को संबोधित कर रहे थे। दिल्ली और देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे दलित-मुस्लिम एकता और राजनीति से जुड़े उनके साथी जो हिना शहाब को महागठबंधन के प्रत्याशी के रूप में समर्थन कर रहे थे, उन्‍हें जिग्नेश का सीवान में जाकर महागठबंधन से बाहर के प्रत्याशी का चुनाव प्रचार करना मुस्लिम-दलित एकता विरोधी लगा। विवाद यहीं से शुरू हो गया। जिग्नेश ने बाद में सफाई दी कि मैं चंद्रशेखर के शहादत दिवस पर आयोजित प्रोग्राम में भाग लेने आया हूँ, किसी का चुनाव प्रचार करने नहीं।

    अब सवाल ये उठता है कि जिग्नेश मेवानी ने प्रचार वाली बात छुपाने का या उस पर अपनी सफाई देने का प्रयास ही क्यों किया। भारत का संविधान किसी भी व्‍यक्ति को इस बात की आज़ादी देता है कि वो अपनी राजनीतिक पार्टी या अपने समान राजनीतिक विचारधारा वाली किसी भी पार्टी का कहीं भी, किसी के विरुद्ध भी प्रचार करे। ये नैतिकता से परे बात होगी कि कोई राजनीतिक व्‍यक्ति जिस राजनीतिक विचार के साथ या नज़दीक होगा चुनाव के बीच उस क्षेत्र में जाकर अपने प्रत्‍याशी का प्रचार नहीं करेगा। चाहे उसकी कीमत कुछ भी चुकानी पड़े। यहां तक कि किसी पद का त्याग भी कर देना पड़े। चाहे उसके कारण चुनाव में हार का ही मुंह देखना पड़े।

    मित्रवत संबंध अलग बात है, राजनीतिक विचार अलग। कोई व्‍यक्ति अपने मित्रों के साथ उठ-बैठ, खा-पी, भोजपात, शादी-श्राद्ध सबका रिश्ता रख सकता है लेकिन राजनीतिक विचार में अलग होने पर अपने मित्रों या संबंधियों के राजनीतिक विचार का पालन करने पर बाध्य नहीं हो सकता। ये आदर्श है ही नहीं। एक व्‍यक्ति को उसके बोलने की आज़ादी, कहीं भी जाने की आज़ादी, कोई भी राजनीतिक या धार्मिक विचार या धर्म मानने की आज़ादी हमारे देश के संविधान की आत्मा है। उसपर अंकुश लगाने का हर प्रयास गैर संवैधानिक और नैतिकता से गिरना होगा। संबंध का आधार बन्धमुक्त विचार होना चाहिए और अगर ऐसा नहीं है तो उस संबंध में स्वार्थ है, अपरिपक्वता है।
    बीते कुछ दिनों में जिग्नेश मेवानी के सीवान जाने पर सोशल मीडिया पर जो बवाल कटा है उससे हर उस व्‍यक्ति को परेशानी होनी चाहिए जो ‘आज़ादी’ की वकालत करता हो। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिली है वो असहनोय है। मुस्लिम समाज के युवाओं की समझ पर प्रश्न चिन्ह है। जिग्नेश या किसी भी नेता पर मुस्लिम समाज के कुछ लोग किस हैसियत से अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता की बात कर सकते हैं? ऐसे लोग कैसे तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के मुस्लिम नेताओं को गूंगा-बहरा कह सकते हैं? ये लोग जैसे जिग्नेश को सीवान में प्रचार करने से रोकना चाहते हैं, बिहार में रोकना चाहते हैं, किसी भी पार्टी के मुस्लिम प्रत्याशियों के विरुद्ध प्रचार नहीं करने का दबाव बनाना चाहते हैं, क्या ये तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के आलाकमान मुस्लिम समाज के लोगों की हत्या पर, उनकी लिंचिंग पर, उनके घरों को जलाने पर, दंगे पर, उनकी बहु-बेटियों की आबरू रेज़ी पर ऐसे खामोश नहीं करना चाहते होंगे? बल्कि जिग्नेश के इस प्रकरण ने एक नई बहस के दरवाजे को खोल दिया है कि लालू-मुलायम-माया-ममता और कांग्रेस जैसी पार्टियों के मुसलमान नेता ‘जिग्नेश जैसे विक्टिम’ होंगे।

    इन मुस्लिम युवाओं के विरोध में खुद एक सवाल है। हिंदुत्ववादी कट्टर संगठनों, हिन्दू गैंगस्टरों और अपराधियों के चुनाव में खड़े होने और जीतने पर इनके अंदर एक बेचैनी बनती है, खौफ का माहौल बनता है लेकिन इसके विपरीत इसी विचारधारा और चरित्र के मुस्लिम प्रत्याशियों के लिए इनके मन में सहानुभूति जगती है, उत्साहित होते हैं और समर्थन पर खुलेआम उतर जाते हैं। ये सहानुभूति और समर्थन क्या है? क्या साम्प्रदायिकता है ये? और यही अगर साम्प्रदायिकता है तो मुस्लिम समाज को समझना होगा कि इस देश में प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिकता का पोषक कौन है?
    इस पूरे प्रकरण के दौरान जिग्नेश के राजनीतिक विचार पर भी सवाल उठ रहा है। एक तरफ जिग्नेश कांग्रेस पार्टी के समर्थन से निर्दलीय विधायक का चुनाव जीतते हैं। दूसरी ओर वो महागठबंधन के घटक दल के प्रत्याशियों के विरुद्ध वामपंथी दलों के प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार करने जाते हैं। बिहार में कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा है। फिर उन्होंने जिस प्रकार से प्रचार नहीं करने की सफाई दी ये उनकी अपरिपक्व राजनीतिक समझ को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।
    जिग्नेश को पूरा अधिकार है कि वो किसका प्रचार करे और किसके विरुद्ध करे। उससे किसी भी सम्बंध पर किसी प्रकार का असर नहीं पड़ना चाहिए। जिग्नेश को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि वो अगर दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकता की बात करते हैं तो उनके किसी क़दम से इस एकता पर चोट न हो। फिर उन्होंने सवाल उठा रहे मुस्लिम युवाओं के लिए जिस प्रकार से गैर संवैधानिक भाषा का प्रयोग किया वो एक विधायक और समाजसेवी के लिए शोभनीय नहीं है।

    मुस्लिम समाज को तय करना होगा कि वो अपने अंदर पनप रहे जाने या अनजाने साम्प्रदायिकता को कुचल कर विचार और आदर्श की राजनीति पर चलना है या ‘तेरी मुर्गी मुर्गी और मेरी मुर्गी नूरजहां’ को चरितार्थ करते हुए देश में तेज़ी से बढ़ रही साम्प्रदायिकता का पोषक बने रहना है।

    लेखक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र के अध्‍यक्ष हैं

  • सेक्युलर राजनीति के अंदर की साम्प्रदायिकता

    तनवीर आलम
    1990 के दशक से बने साम्प्रदायिक भय पर खड़ी राजनीति ने देश में कई मुखर चेहरे दिए। उस भय पर अल्पसंख्यकों के हितों की बात करते करते कई चेहरों ने अपनी सियासी ज़मीन को उर्वरक तो बनाया ही, साथ ही मुस्लिम नेताओं को बड़ी खूबसूरती से खामोश भी रखा। ये चेहरे सामाजिक न्याय की बात करते करते घोर जातिवादी मानसिकता का शिकार भी हो गए। इस परिवेश में परिवार के अंदर जो राजनीति बढ़ी उसके फलस्वरूप उनकी आज की पीढ़ी हमारे सामने है। नई पीढ़ी के इन नेताओं ने मान लिया है कि अल्पसंख्यक वोट अब उनकी जागीर हैं। इन परिवारों या दलों ने जिन मुस्लिम चेहरों को जगह दी वो भी हमारे सामने हैं। उनके सामने अल्पसंख्यक हित से ज़्यादा महत्वपूर्ण अपनी राजनीति है। अगर ऐसा नहीं होता तो विगत सालों में अनेक दंगे हुए, ट्रिपल तलाक़ का मामला हुआ, मुसलमानों की लिंचिंग हुई, खुलेआम ज़ैनुल अंसारी को जला कर मार दिया गया, पुलिस कस्टडी में हत्या हुई और ये तथाकथित मुस्लिम चेहरे खामोश रहे। इसलिए यह मान लेने में हर्ज नहीं है कि मुस्लिम हितों की बात इन मुस्लिम नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण नहीं। ऐसे में इन चेहरों को टिकट मिलने, कट जाने या उनको वोट देने पर मुस्लिम समाज के अंदर विरोध या समर्थन पर चर्चा की बजाए भाजपा हराओ की नीति अधिक चर्चा का विषय है।
    बिहार में यूपीए के सबसे बड़े घटक दल राजद ने जिस प्रकार अपने को एक जाती से निकालकर गैर यादव जातियों कुशवाहा, मांझी और निषाद को जोड़ने का काम किया ये उसका सराहनीय कदम है। लेकिन इन जातियों के नेताओं ने अपनी ही पार्टी के अंदर जिस प्रकार से दूसरे समाज की उपेक्षा की है ये उनकी घोर जातिवादी मानसिकता को दर्शाता है। 40 प्रतिशत अतिपिछड़ों की भागीदारी की बात करने वाले तेजस्वी यादव ने पिछड़ों को निराश किया। राजद ने 8 टिकट यादवों को दे दिया। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने एक दलित, एक सवर्ण और तीन कुशवाहा को टिकट दिया। उनकी पार्टी में शुरू से मुसलमानों की एक अच्छी संख्या थी। पिछड़ी राजनीति की वकालत करने वाले उपेंद्र कुशवाहा को मुसलमानों का वोट तो चाहिए लेकिन मुसलमानों को हिस्सेदारी देने पर उनके अंदर की घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक चेहरा यहां साफ दिखता है। ठीक यही हाल नीतीश कुमार का साथ छोड़ने वाले शरद यादव का भी है। पार्टी छोड़ते समय क़दम से क़दम मिलाकर चलने वाले अली अनवर अंसारी को टिकट के समय शरद यादव भूल गए और किसी दूसरे को टिकट दे देते हैं। सन ऑफ मलाह मुकेश सहनी और मांझी का भी यही हाल है। उपेंद्र कुशवाहा के साथ साथ इन दोनों ने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। जब इन पार्टियों का चरित्र आज ऐसा साम्प्रदायिक है तो चुनाव बाद ये फिर से एनडीए के साथ नहीं चले जाएंगे, इसकी ज़मानत तेजस्वी यादव देंगे क्या?

    दूसरा सवाल इन पार्टियों के तथाकथित मुस्लिम चेहरों का है। जब इनका अपना टिकट कटता है तो ये मुसलमानों के स्वघोषित रहनुमा बन जाते हैं। पूरे पांच साल इन्हें मुसलमान याद नहीं आता। टिकट कटने पर ये अपनी ही पार्टी के दूसरे मुस्लिम चेहरों के विरुद्ध ताल ठोंकने लगते हैं। अली अशरफ फातमी का टिकट कट गया और मुकेश सहनी का उम्मीदवार मधुबनी से चुनाव लड़ रहा है। विरोध ही दर्ज करना है तो अली अशरफ फातमी को चाहिए कि मुकेश सहनी के प्रत्याशी को हराएं। दरभंगा के राजद प्रत्याशी अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को हराने की कोशिश नहीं करें। फातमी को मधुबनी में तैयारी करने के लिए कहा गया था और उन्होंने तैयारी की भी थी। एक और बात, चुनाव में भाजपा और मोदी को हराना है तो तनवीर हसन और उनके समर्थक भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह के विरुद्ध अपना प्रचार करेंगे या कन्हैया के विरुद्ध!
    मुस्लिम युवाओं की तरफ से भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर इन पार्टियों के विरोध में जगह जगह सवाल उठाए जा रहे हैं। अधिकारों के प्रति उठने वाली हर आवाज़ का समर्थन होना चाहिए, लेकिन किसके लिए? ये आवाज़ हम उन चेहरों के लिए क्यों उठाएं जिन्होंने न कभी मुस्लिम हितों की रक्षा की, न कभी उनके मुंह से दो बोल निकले और न कभी उन्होंने आम मुस्लिम युवा राजनीति को जगह देने की बात की। इन चेहरों के लिए गोलबंद होना क्या ये मुस्लिम युवाओं के अंदर की अपनी साम्प्रदायिकता नहीं है? अधिकार की बात बिहार या देश के मुसलमानों के लिए होगी या किसी खास चेहरे के लिए। फिर ये आवाज़ कहां तक पहुंचेगी और इसको आम समर्थन कहां तक मिलेगा? अंसारी समाज से अली अनवर अंसारी के टिकट की आवाज़ तो उठती है लेकिन वो फिर डॉ. एजाज़ अली को भूल जाते हैं।

    सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों के अंदर की जो ये साम्प्रदायिकता है उसपर एक आम राय बनाने की ज़रूरत है। इसके लिए अल्पसंख्यक समाज के अंदर से निष्पक्ष समझ बनाने और आवाज़ उठाने पर ही कोई विरोध असरदार होगा।
    तेजस्वी यादव, उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतन राम मांझी सरीखे नेताओं को ये बिल्कुल स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि भाजपा को हराने के नाम पर आप आज अपनी मनमानी कर लीजिए। मुस्लिम समाज को अनदेखा कर लीजिए। लेकिन इसके बाद फिर 2020 में चुनाव है और उसके बाद भी चुनाव होंगे। आप लोगों का खुलकर विरोध होगा।
    लेखक एएमयू एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र, मुम्बई के अध्यक्ष हैं।

  • 2014 का चायवाला 2019 में चौकीदार बनकर है तैयार:जिशान नैय्यर

    ये न्यू इंडिया है यहाँ प्रधानमंत्री बनने के लिए चायवाले से लेकर चौकीदार भी बनना पड़ता है.
    लोकसभा चुनाव 2019 का बिग्गुल बज चुका है.सभी छोटे बड़े दल गठबंधन बनाने बिगाड़ने में लगे हुए हैं. एक तरफ़ राष्ट्रवाद का नारा दूसरी तरफ़ चौकीदार चोर है.

    2014 में मोदी चायवाला बनकर आये थे 2019 में चौकीदार बनकर मीडिया में छाए हुए हैं.औऱ जो बुनियादी मुद्दे थे वो बहुत पीछे छूट गया है.

    ये पहली बार होगा जब इतना बड़ा चुनाव अपने काम पर नही बल्कि मैं भी चौकीदार हूँ पर लड़ा जाएगा वैसे किस काम पर वो चुनाव लड़ेंगे जो लम्बे लम्बे वादे 2014 में किये थे.

    उसमें किया पूरा हुआ 2 करोड़ रोज़गार,किसानों का कर्ज़ माफ़. महंगाई नोटबन्दी जीएसटी 100 दिन में कालाधन आएगा गंगा सफ़ाई योजना 100 स्मार्टसिटी, सांसद आदर्श ग्राम योजना इसमें कितना काम हुआ कोई बताना नही चाहता ये काम मीडिया का है वो सत्ता के सामने भजनमण्डली कर रहा है.

    पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक का कितना फायदा होगा ये देखना होगा?

    एक तरफ़ है बीजेपी जो हर किसी से भी गठबंधन करने को तैयार रहती है उनको लगता है गठबन्धन से उनको मामूली फायदा भी होगा वो गठबन्धन कर लेती है आज के समय में 30 से ज्यादा पार्टीयों का गठबंधन है उन्होंने अपनी जीती हुई सीट नवादा को भी अपनी सहयोगी लोजपा को दे दिया.

    एनडीए में. 5 साल तक शिवसेना की गाली ताने सुनने के बाद भी उसने महाराष्ट्र में गठबंधन कर चुकी है असम में असम गनपरिषद से भी NRC के मामले में गठबंधन टूटा था आख़िर कार किसी तरह दोबारा गठबन्धन बन गया है.

    2014 में यूपी के 80 में से 72 सीट जीत कर बीजेपी दिल्ली में मजबूत सरकार चला रही है लेक़िन सपा बसपा के साथ आने से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है.सायद इसबार यहाँ उनको आधे से ज्यादा सीट का नुकसान उठाना पर सकता है.

    2014 में बीजेपी कई राज्यों में क्लीन स्वीप कर दिया था लेक़िन उस जादू को दोहराना बहुत कठिन है.लेक़िन उसके बावजूद बीजेपी को बंगाल औऱ केरल में अच्छे सीट जीतने कि उम्मीद है क्योंकि उनका ध्यान इन राज्यों में ज्यादा रहा है.

    दूसरी तरफ़ महागठबंधन पता नही ये कैसा गठबन्धन है जिसमें बंगाल में ममता कांग्रेस लेफ्ट पार्टियां अलग अलग चुनाव लड़ रहें हैं केरल में कांग्रेस सी.पी.एम. अलग अलग बिहार में सीटों को लेकर खींचतान ज़ारी है.

    चंद्रबाबू नायडू के साथ अब तक राहुल गांधी का अच्छा बन रहता था कुछ समय पहले तक वो ग़ैर बीजेपी नेताओं को एक फ्रंट पर लाने की कोशिस कर रहें थें लेक़िन जब लोकसभा का चुनाव आया तो टीडीपी अलग कांग्रेस अलग चुनाव लड़ रहें हैं.

    यूपी में सपा-बसपा के साथ कांग्रेस नही है लेक़िन कई जानकार बताते हैं कि कांग्रेस वहां अकेले जितनी मज़बूती से चुनाव लड़ेंगी उतना फायदा सपा-बसपा को मिलेगा क्योंकि कांग्रेस का वोटर बैंक भी स्वर्ण जातियां रही है वो जितना वोट काटेगी उतना गठबन्धन को फायदा होगा.

    काँग्रेस में प्रियंका कि एंट्री किया कर पाती है वो वक़्त ही बताया गया लेक़िन टीवी पर प्राइम टाइम में कांग्रेस को दोबारा प्रियंका के लोकप्रियता ने हाँसिल करवाया है.

    इस गठबंधन को चुनाव परिणाम के बाद वाला महागठबन्धन कहना ग़लत नही होगा अग़र बीजेपी को बहुमत नही मिला तो सब मिलकर केंद्र सरकार बनायेगें

    लेक़िन इसमें प्रधानमंत्री के दावेदार बहुत ज्यादा है अब 23 मई के इंतेज़ार कीजिये किया कोई नया प्रधानमंत्री मिलता है या मोदी दोबारा जनता की उम्मीदों पर खड़े उतरेंगे?

    ज़ीशान नैयर
    छात्र पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
    मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद