Category: लेख, विचार

  • बिहार विधानसभा चुनाव:शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा,दाना डालेगा,भूल से फंसना नहीं

    चुनाव में बिहार के मुस्लिम समुदाय के लिए चुनौती

    *शारिब जि़या रहमानी*
    जदयू ने अपनी मुस्लिम फौज चुनावी मैदान में उतार दी है,इस से समझ आता है कि नीतीश कुमार कितने डरे होए हैंI मुस्लिम वोट अगर 100% जदयू से हट गया तो जदयू की सत्ता वापसी नामुमकिन है, बीजेपी से अलग नीतीश कुमार का अपना कोई वोट जनाधार नहीं है, और Covid19 पर विफलता और ग़रीब , मज़दूर के ग़ुस्से से वो परेशान हैं, जिन की घर वापसी का नीतीश ने विरोध किया था और किसी तरह आने के बाद भी सिर्फ़ जुमले बाज़ी होती रही, अब वे वापस जाने को मजबूर हैं, बेरोज़गारी मुद्दा बन जाए इस से वो परेशान हैं, सैलाब से हर साल तबाही आती है, सरकार विफल रहती है, पिछली घोषणाओं पर कोई जवाब नहीं है लकिन लुभावन जुमले बरस रहे हैं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस,पोस्टरों द्वारा नीतीश को मुसलमानों का मसीहा कहा जारहा है,हरगिज़ उन की जाल में नहीं आना है। वो तरह तरह से जुमले छोड़ेंगे, अगर इस बार इस पार्टी को वोट दे दिया तो CAA पर आप का आंदोलन, आप की जागरुकता की विशाल मुहिम बर्बाद होगी और वो समझेंगे कि मुसलमानों के साथ कुछ भी करो, वोट तो दे ही देंगे, इस बार इस रिवायत को बदलना हैI ऊर्दू को अनिवार्य विषय से हटा कर नीतीश कुमार ने उर्दू बल्कि अपने मुस्लिम विरोधी होने पर मुहर लगाई है,बार बार इस विषय पर ध्यान दिलाया जा रहा है, शिक्षा मंत्री को मेमोरेंडम दिए जा रहे हैं लेकिन नीतीश और उन के मुस्लिम चमचों पर कोई असर नहीं है, उर्दू अनुवादक और सहायक अनुवादक की परीक्षा टाल दी गई, यानी इस की घोषणा सिर्फ़ वोट लेने और चुनावी धोखे बाज़ी के लिए थी तभी तो बिहार स्टाफ़ सिलेक्शन कमिशन की वेबसाइट पर सारी चीजें अपलोड हो रही हैं लकिन अनुवादक परीक्षा पर चुप्पी हैI याद रहे जो भी जदयू का मुस्लिम चेहरा आप के पास आए या सोशल मीडिया पर गुण गान करे उससे CAA पर वोटिंग पर सवाल करें,जदयू की वजह से यह बिल Act बना हैI वे आपको बताएँगे कि बिहार सरकार ने NRC और NPR पर प्रस्ताव पारित कर दिया है कि बिहार में 2010 का NPR होगाI

    याद रहे कि यह धोका है,NPR 2010 वाला हो या 2020 वाला, दोनों नागरिकता Act से जुड़े हैंI जिस के साथ NRC भी है यानी जब NPR होगा तो NRC भी होगी,जब तक उसे नागरिकता से अलग नहीं किया जाता, CAA के साथ NPR ख़तरनाक है, क्यूँ कि धर्म के नाम पर नागरिकता मिलोगी और नागरिकता धूमिल की जाएगी जो संविधान के सिद्धांत, लोकतंत्र, एकता और बराबरी के ख़िलाफ़ है और जदयू ने इसे पास कराया है।

    एक और बात कि NRC लागू करने से बिहार सरकार कैसे मना कर सकती है? जदयू के मुस्लिम नेताओं के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि NRC लागू ना करना स्टेट का संविधानिक अधिकार ही नहीं है यानी जिस का अधिकार नहीं उस पर प्रस्ताव पारित हो रहा है और जहाँ वोट ना देने का अधिकार था वहाँ (पार्लियामेंट में) जदयू बिल पारित करवाती है, मुसलमान को इतना बेवकूफ़ ना बनाएं, मुसलमानों ने बदला लेने का मन बना लिया है, मुस्लिम वोट लेकर बीजेपी की गोद में बैठ कर जो धोका नीतीश कुमार ने दिया है वो भी याद है, बिहार में जगह जगह मुस्लिमों को निशाना बनाया गया, मुस्लिम असुरक्षित हैं, नीतीश राज में माब लिंचींग बढ़ी, फुलकारी, औरंगाबाद, सीतामढ़ी सब याद हैं, इनका जवाब जदयू के मुस्लिम बहादुर नहीं दे सकते हैं लकिन सब का हिसाब मुस्लिम, वोट से लेंगे, उन्हें सब याद हैIजदयू के प्रचारकों से जवाब लेना होगा।

    नीतीश कुमार की मुस्लिम और उर्दू विरोधी नीति से उनकी अस्ल छवि सामने आगई है,इस बार हर सीट पर जदयू के प्रत्याशी को हराने की नीति अपनानी होगी और महागठबंधन को उन्हीं जगह मजबूरी में वोट करना है जहां मजलिस का मज़बूत प्रत्याशी ना हो, तेजस्वी की मानसिकता को देखते हुए मजलिस का मैदान में होना अनिवार्य है लकिन मजलिस को भी 10/12 सीटों पर ही प्रत्याशी उतारना चाहिए,और बहुत मज़बूत लड़ाई चिन्हित सीटों पर होनी चाहिएI ताकि ज़्यादा सीटों पर मुस्लिम वोट के बट जाने से एनडीए को फ़ायदा भी ना हो और मुस्लिम नुमाइंदगी भी हो जाए।

    किसी भी तरह जाल में नहीं आना हैI वोट देते समय दिल पर हाथ रख कर महसूस कीजिए गा कि जिस दिन आप के वोट को लात मारकर नीतीश बीजेपी के साथ गए थे तो आप को कैसा लगा था? जब जदयू पार्लियामेंट में CAA पर वोट दे रही थी तो ख़ुद को आप कैसा ठगा महसूस कर रहे थे? तीन तलाक़ बिल पर पार्लियामेंट से भाग कर बिल को वो पारित कराने में मदद कर रही थी तो आप का दिल किया कह रहा था?

    हाँ आरजेडी गठबंधन से भी सवाल करते रहना है कि मुस्लिम ईशू पर पार्टी की किया पॉलिसी है? कितनी नुमाइंदगी दे रहे हो?आरजेडी में मुस्लिम लीडरशिप पनपने क्यूँ नहीं दी जाती है? वोट लेने के लिए मुस्लिम और विकास और मंत्रालय के लिए यादव? यादव ने लोकसभा चुनाव में आरजेडी को वोट नहीं दिया है, तेजस्वी इस पर चुप क्यूँ हैं? मुस्लिम इशू से उन्हें दिलचस्पी क्यूँ नहीं है? क्या मुस्लिम को वोट की मशीन और मजबूर समझ लिया है? इसलिए 10/12 मजलिस के मज़बूत उम्मीदवारों को वोट देकर आरजेडी का ग़ुरूर भी तोड़ना ज़रूरी है।

    मजलिस से भी सवाल है कि तेलंगाना में 7/8 और महाराष्ट्र,उप, बिहार में पार्टी विस्तार क्यूँ? तेलंगाना की तरह बिहार में भी 7/8 पर प्रत्याशी क्यूँ नहीं उतारते? KCR की पार्टी और उस की पॉलिसी, कॉग्रेस, आरजेडी,एसपी, एनसीपी से अलग कैसे है? जो नरसिम्हा रॉ के प्रेम में गिरफ़्तार है, KCR के कमयूनल एजेंडे पर चुप्पी रहती है लकिन सारी बहादुरी और ईमानी गर्मी तेलंगाना से बाहर निकलने लगती है? KCR को कमयूनल बोलने की हिम्मत ओवैसी में क्यूँ नहीं है? तेलंगाना में दोस्त के हाथों शहीद मस्जिदों पर भी मजलिस को जवाब देना होगा।
    कहना यह है कि सभी पार्टियों को आईना दिखाना है,यानी वोट देना भी है तो फ़्री में नहीं, जाग कर वोट देंगे, सिर्फ़ वोट की मशीन नहीं बनेंगे, अब तक की हमारी सियासी ग़लती यही है कि हम वोट बैंक बनते रहे, सवाल करना और हिसाब लेना नहीं सीखाI सियासत में सौदेबाज़ी और मोल भाऊ का महत्व है, जो जितना बड़ा डीलर होगा उतना बड़ा नेता समझा जाएगा, सियासत के लिए अब कोई उसूल और सिद्धांत नहीं है,आज की सियासत बेऊसुली का नाम हैI किसी भी पार्टी का कोई सिद्धांत नहीं है और ना अब कोई सिकूलर है। मुस्लिम समुदाय को भी यही रास्ता चुन्ना होगा।

  • राजीव गांधी हर वर्ग की आवाज थे,देश के विकास के सूत्रधार थे:चौधरी आफताब अहमद

    हरियाणा कांग्रेस विधायक दल के उप नेता चौ. आफताब अहमद ने भारत रत्न स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के 75 वें जन्मदिन सदभावना दिवस पर खिराजे अकीदत पेश करते हुए उन्हें लेख समर्पित किया है:

    देश के छठे प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की 75 वीं सालगिरह पर देश उन्हें याद कर रहा है, और याद कर रहा है उनके उस दौर को भी जिसमें लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता, विकास सब का बोलबाला था। आज के दौर में भले ही लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता, विकास मौजूदा सरकार के लिए कोई खास अहमियत नहीं रखते हैं। लेकिन किसी भी मुल्क की तरक्की में इन सभी का होना बड़ा जरूरी है।

    स्वर्गीय राजीव गांधी सभी के आदर्श व्यक्ति हैं, वो आधुनिक भारत के निर्माता थे जिन्होंने कम्प्यूट्रीकृत युग का सपना देखा फिर उसे पूरा करने के लिए अपना जीवन न्याछौवर कर दिया। आज उन्ही के मेहनत और लगन से हम एक क्लिक पर ही सारे काम आसानी से कर सकते हैं । उनके योगदान को भारतवासी कभी भुला नहीं सकता। उनके द्वारा देश की उन्नति के कार्यो की जितना तारीफ की जाए वो कम है।आज ऐसे प्रधानमंत्री कहीं देखने को नहीं मिलते ये केवल दुर्भाग्य ही है।

    स्वर्गीय राजीव गांधी में परिस्थितियों को परखने, समझने और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी। इस महान् नेता की निष्छलता एवं प्राकृतिक सेवा की प्रवृत्ति ने भारत को दुनिया की एक सृदृढ़ शक्ति के रूप में स्थापित किया। भारत रत्न राजीव एक संवेदनशील, कोमल दिल के महान् नेता थे, जो उनके दिल में होता था वही जबान पर होता था, आज तो नेता केवल जुमलेबजी तक ही सीमित रह गए हैं। आज के भारत की कल्पना सिर्फ भाषण की लफ्फाजी नहीं थी बल्कि इसके परिप्रेक्ष्य में नीहित एक कल्पनाशीलता एवं नियोजन था, इस नियोजन को कार्यक्रम में परिवर्तित करने के लिए राजीवजी ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया।

    देश में पंचायत राज की व्यवस्था, औद्योगिक क्रान्ति, हर हाथ को रोजगार, संचार युग की क्रान्ति, सूचना युग का भारत में प्रतिस्थापन हो, अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति जैसे क्रांतिकारी कदम एवं उनका क्रियान्यवन भारत के लिए वरदान साबित हुए हैं ।
    आज देश अगर दुनिया में एक मजबूत देश के रूप में जाना जाता है तो वो राजीव गाँधी की मेहनत का फल है।

    इंदिराजी की हत्या के बाद राष्ट्र की पूरी जिम्मेदारी राजीव गांधी के युवा और मजबूत कंधों पर आ गई। जब सारा देश जल रहा था उस समय देश को एक धेर्येशील मार्ग एवं सांत्वना की आवश्यकता थी, अचानक ही देश को एक प्रखर, उज्जवल, महाव्यक्तित्व से साक्षात्कार हुआ वे थे देश के नये प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी। राजीव जी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘वह केवल मेरी मां ही नहीं हम सब की मां थी, हिंसा, घृणा व देश से इंदिरा जी की आत्मा को दुख पहुंचता था, आप शांत रहे और धैर्य से काम ले’’। उनके इन शब्दों का देश के नागरिकों पर जादुई असर हुआ, लोगों के आंसू थमने लगे। ये उनके व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि देश में नफरत की आंधी रूक सी गई।

    अमेरिका की पत्रिका ने राजीव जी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व का खिताब देते हुए लिखा था कि ‘‘राजीव गांधी पूरब के सूरज है जिनसे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति को एक सांस्कृतिक, वैचारिक प्रकाष प्राप्त होगा’’।उसी विदेशी अखबार ने उनके निधन पर लिखा था कि ‘‘पूरब का सूरज दोपहर से पहले ही अस्त हो गया’’।

    राजीव गांधी के मन मे यह विचार बसा हुआ था कि भारत के निर्माण और ऊर्जा में बढ़ोत्तरी के लिये युवाओं को प्रोत्साहन और जिम्मेदारी सौंपना जरुरी है, इसलिए उन्होंने तमाम अन्र्तविरोधों की दरकिनार करते हुए युवाओं को 18 वर्ष में मताधिकार का अधिकार प्रदान किया। युवाओं के लिए अनंत संभावनाओं का भण्डार विकसित करने के लिए देश में आई.टी. संस्कृति को बढ़ावा दिया था । आज आधुनिक टेक्नोलॉजी से हम विश्व की विकास दर से कदम मिला रहे है।
    उस वक़्त विपक्ष ने बैलगाड़ी से संसद पहुच कर राजीव जी के सपनो का उपहास उड़ाया था लेकिन उन्होंने परवाह न करते हुए आज देश को एक नए मुकाम पर पहुचाया है । आज बीजेपी सरकार के छह सालों के गलत फैसलों के कारण युवा बेरोजगार है, मंहगाई आसमान छू रही है, किसान मर रहे हैं, महिलाएं महफूज़ नहीं है, देश की जीडीपी लुड़क गई है।

    इस समय देश को राजीव जी की याद आती है जो एक मौन कर्मषील व्यक्तित्व के धनी थे, जिनके भाषण में सच और भोलापन था, कुटिलता बिलकुल नहीं थी, जो फैसलें लेने में निडर और निर्णयों को क्रियान्वित करने में देर नहीं करते थे। यह भारत का दुर्भाग्य ही है जब भी इस देश में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी है भारत की तरक्की और अन्तराष्ट्रीय छवि में धूमिलता ही आई है।

    ( इस लेख के लेखक कांग्रेस विधायक दल के उप नेता, नूह विधायक चौधरी आफताब अहमद हैं )

  • जानिए मुसलमान कैसे और क्यों मनाते हैं ईद उल अजहा (बकरा ईद):खुर्रम मलिक

    कोरोना वायरस की वजह से आज पुरा विश्व एक अजीब सी परिस्थिति से गुज़र रहा है. और इस महामारी से झूझते हुए आज पूरे चार महीने गुज़र चुके हैं. और इस का असर हर ओर देखा जा सकता है. अबतक हमारे देश में इस की वजह से हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. हालात यह हो चुके हैं के देश में कोरोना केस की संख्या मोदी जी के जुमले की तरह 15 लाख पार कर चुका है.बीच में अनलाक की प्रक्रिया के तहत आम जीवन पटरी पर लौटती दिख रही थी और ऐसा लग रहा था के अब इस बीमारी से हमारा देश मुक्त हो जाएगा परंतु बढ़ते केस की वजह कर देश के कई राज्यों में फिर से लाक डाउन करना पड़ा. हमारे राज्य बिहार में भी ऐसा होता लग रहा है. यह बात अलग है के इस लेख को लिखे जाने तक ऐसी कोई आधिकारिक रिपोर्ट नहीं आई है के किया 1 अगस्त से फिर से 15 दिनों का लाक डाउन होगा या नहीं? लेकिन कोरोना वायरस की गंभीरता को देखते हुए ऐसा लगता है के ईद उल फ़ितर की तरह ईद उल अज़्हा की नमाज़ भी घरों में ही पढ़नी होगी .फिर से इस महामारी की वजह से स्कूल कॉलेज, बाज़ार बंद हैं वहीं दूसरी ओर मस्जिद मंदिर गिर्जा गुरुद्वारा भी बंद पड़े हैं. और ऐसे में मुसलमानों का पवित्र महीना ईद उल अज़्हा भी आ चुका है. और जैसा के सब को पता है के मौजुदा वक़्त कोरोना का है लेकिन ऐसे में ही नमाज़ भी पढ़नी है. तो जैसा के हमने ईद उल फ़ितर पर भी नमाज़ का तरीक़ा बताया था. इसी लिये ईद उल अज़्हा पर भी हम ने सोचा के आप लोगों को तरीक़ा बताया जाए. क्यों के ईद उल फ़ितर पर हमारे लेख को आप सब ने बहुत पसंद किया था.
    उम्मीद की जा रही है के 1 अगस्त शनिवार को मुसलमानों का पवित्र त्यौहार ईद उल अज़्हा मनाया जाएगा.

    ईद उल अज़्हा के दिन सुबह सवेरे उठना , मिसवाक(दतमन) करना, नहाना, खूशबू लगाना, अपनी हैसियत के हिसाब से अच्छा कपडा़ पहनना मुसतहब है.
    ईद की नमाज़ में अज़ान और तकबीर नहीं कही जाती है.
    घर में मिंबर की जगह कुर्सी इस्तेमाल कर सकते हैं. और अगर किसी को खु़तबा नहीं आता हो तो इस के बगै़र भी नमाज़ पढी़ जा सकती है…

    ईद की नमाज़ के लिये इमाम के अलावा तीन बालिग़ आदमी का होना ज़रूरी है. अगर य भी मुम्किन ना हो तो अलग से दो या चार रकत नफ़िल नमाज़ पढ़ना है.

    लेकिन सब से पहले इस के इतिहास पर कुछ बात कर लेते हैं.
    आखि़र किया है ईद उल अज़्हा का इतिहास?
    इस्लाम धर्म में इस का किया महत्व है और मुसलमान इसे क्यों मनाते हैं? आयिये जानते हैं.

    जैसा के हम सब जानते हैं कि यह पवित्र त्यौहार मुसलमानों के एक नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस सलाम की याद में मनाया जाता है. इतिहास में इस से जुड़ा एक बहुत ही मश्हूर क़िस्सा है के हज़रत इब्राहीम अo ने सपने में देखा के वह अपने बेटे हज़रत इसमाईल अलैहिस सलाम के गर्दन पर छुरी चला रहे हैं. यह बात आप ने अपने बेटे इसमाईल को बताई. और बेटे से राय पूछा तो बेटे ने कहा के अब्बा जान अगर ऐसा है तो यह अल्लाह का कोई हुकुम होगा. और आप को इस हुक्म पर अमल करना चाहिए. मैं तय्यार हूँ. फिर दोनों बाप बेटे एक सुनसान जगह पर गए. बेटे इस्माईल अo ने कहा के अब्बा जान आप अपनी आँखों पर कपडा़ बांध लीजिये किया पता आप को मेरी गर्दन पर छुरी चलाते वक़्त बेटे की मोहब्ब्बत बीच में आ जाए और आप इस वजह से आप अल्लाह के हुक्म को पूरा ना कर पाएं. और फिर बाप ने ऐसा ही किया .
    और जब क़ुर्बानी की जगह पर दोनों बाप नेटे पहुँचें तो बेटे इसमाईल अo आग्या का पालन करते हुए ज़मीन पर लेट गए और अपने पिता से कहा के आप मेरी गर्दन पर छुरी चलाएँ और अल्लाह के हुक्म को पूरा करें. तो इब्राहीम अo ने ऐसा ही किया. लेकिन जैसे ही बाप ने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई वैसे ही छुरी एक दुंबे( अरबमें एक जानवर) पर चली. और उस की क़ुर्बानी हो गई. बस अल्लाह को यही अदा पसंद आई और उसी दिन से मुसलमानों पर क़ुर्बानी वाजिब (ज़रूरी) कर दिया गया.
    इसी तरह अगर और बात करें तो इसलाम की दो ईदों में से एक ईद उल अज़्हा है. जो ज़िल हिज्जा की दस तारीख़ को मनाई जाती है. यह हज़रत इब्राहीम अo की अपने बेटे की क़ुर्बानी की अज़ीम यादगार है जिसे अल्लाह पाक ने रहती दुनिया तक इबादत के तौर पर ज़िंदा कर दिया आख़री नबी मुहम्मद साहब (सo अo वo) का फ़रमान है ” क़र्बानी के दिन इंसानों के आ’माल में से अल्लाह को इतना ज़ियादा महबूब अमल (कार्य) कोई नहीं जितना क़ुर्बानी के दिन क़ुर्बानी करना है”
    एक दूसरी जगह आप मुहम्मद साहब का फ़रमान है के “जो इंसान क़ुर्बानी की ताक़त रखता हो और फिर भी क़ुर्बानी ना करे, वह हमारी इबादत्गाह के क़रीब भी ना आए.
    क़ुरान ओ हदीस की रौशनी में यह बात साबित है के हर उस आक़िल (समझदार) बालिग़(व्यस्क) मुसलमान पर क़ुर्बानी वाजिब (ज़रूरी) है जिस के पास साढे़ बावन तोला चांदी या उस की क़ीमत का माल उस की ज़रूरयात से ज़ियादा हो. (यह माल चाहे सोना, चांदी या उस के ज़ेवर (गहने) हों. तिजारत (व्यापार) का माल या ज़रूरत से ज़ियादा घरेलु सामान हो, या ज़मीन हो)
    क़ुर्बानी का मक़सद सिर्फ़ जानवरों की क़ुर्बानी नहीं है, बल्कि इस का असल मक़सद यह है के इस क़ुर्बानी के नतीजे में हमारे अंदर फ़रमांबरदारी (आग्या का पालन) का जज़्बा पैदा हो जाए, और हम अल्लाह के हुकुम के आगे अपने जज़्बात और खा़हिशात को क़ुर्बान (त्याग) करने वाले बन जाएं.
    आज कल कुछ लोग क़ुर्बानी के बारे में में सही जानकारी ना होने की वजह कर ग़लत बयानबाज़ी करते हुए नज़र आते हैं.
    इसी लिये हमें अच्छी तरह जान लेना चाहिए के क़ुर्बानी के बदले उस की क़ीमत का सदक़ा करना या उस को ग़रीबों की ज़रूरयात पर ख़र्च कर देना हरगिज़ क़ुर्बानी का बदल नहीं हो सकता.
    लेकिन अभी कोरोना काल चल रहा है इस लिए क़ुर्बानी करने के साथ ही कुछ बातों का खा़स ख़्याल रखना होगा… जैसे के….
    सफ़ाई का खा़स ख़्याल रखें.
    शारीरिक दुरी बनाए रखें.
    क़ुर्बानी की बची हुई चीज़ें खाल, खू़न, और दूसरी गंदगी को ऐसी जगह पर ना डालें जिस से किसी को भी तकलीफ़ हो.
    माहौल को साफ़ सुथरा रखें.
    अपने साथ पुरी इंसानियत की भलाई, आपसी मोहब्बत और भाई चारा के लिये काम करें और साथ ही दुआ भी करें.

    हम यहाँ आप को यह बताना चाहते हैं कि ईद उल अज़्हा की नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा किया है. सब से पहले तो हमें किसी भी नमाज़ की नियत करनी होती है. वैसे नियत दिल से होनी चाहिए. अगर ज़ुबान से बोल दिया तो और भी अच्छा है. नियत इस तरह करना है. नियत करता हूँ मैं नमाज़ ईद उल अज़्हा की वाजिब. छे ज़ाएद तकबीरों के साथ, वास्ते अल्लाह त’आला के. रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़. नियत के बाद तक्बीर ए तहरीमा (हाथों को कंधे तक उठाना है और फिर पेट पर बांध लेना) के बाद सना पढ़ना है उस के बाद दो और तक्बीर कही जाएगी. पहली तक्बीर के बाद हाथों को कंधे तक ले कर जा कर छोड़ देना है, फिर दूसरी बार भी ऐसा ही करना है. तीसरी तक्बीर के बाद हाथों को बांध लेना है और सुरह फ़ातिहा और उस के बाद कोई भी सुरह पढ़ना है. उस के बाद रुकु में जाना है फिर सज्दे में और इस तरह एक रकत पूरी करनी है.
    दूसरी रकत के लिये खड़े होंगे तो सब से पहले सुरह फ़ातिहा और फिर कोई सुरह मिलाएंगे और उस के बाद रुकु में जाने से पहले पहले तीन ज़ाएद तक्बीरें (अल्लाह हु अकबर) कहते हुए हाथ छोड़ देंगे और चौथी तक्बीर कह कर रुकु में जाएंगे और सजदा के साथ सलाम फेर कर नमाज़ मुकम्मल करेंगे.

    नमाज़ के बाद जो सब से अहम है वह है ईद का खु़त्बा। यह दो है. ईद उल अज़्हा का खु़त्बा यह है.

    पहला खु़त्बा…
    अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाह हु अकबर वलिल्लाहिल हम्दु

    अल्हम्दु लिल्लाही रब्बिल आ लमीन वल आ’क़िब’तू लिल मुत्तक़ीन, वससलातु वससलामु अला सय्येदेना मुहम्मदिन व’अला आ’लिही व’अस’हाबिही अज्म’ईन, अम्मा बा’द
    फ़अ’ऊज़ु बिल्लाही मि’नश शैतान नि’र्रजीम, बिस्मिल्ला’हिर रहमान निर्रहीम,
    इनना आ’तै’नाका कल’कौसर, फ़सल्लिलि रब्बिका वन्हर, इनना शानि’अ’का हुवल अब’तर,
    व’अन आयेशा रज़ि’अल्लाह हु त’आला अन’हा ,
    अन्ना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम, मा अ’मिला आद’मियुन मिन अमलि यौम’नहरि अहब्बा इलल्लाहि मिन इहराक़िद’दमि उन्नहु लयाति यौमल्क़यामति बिक़रूनिहा व’अश’हारिहा व’अज़’लाफ़िहा इनन’दमा ल’यक़’ऊ मिनल्लाहि बिमकानिन क़ब्ला अन’यक़’आ मिन’अल’अरज़ि फ़’तीबु बिहा नफ़सन,
    अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाह हु अकबर वलिल्लाहिल हम्दु

    अल्लाहुम्मा इन्नी अ’ऊज़ु बिका मिनल बरसि वल’जुनूनि वल’जज़ामि व’मिन सैय्ये’इल अस्क़ाम.
    अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाह हु अकबर वलिल्लाहिल हम्दु

    *दूसरा खु़तबा ….
    अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाह हु अकबर वलिल्लाहिल हम्दु

    नह’मदुहु व’नस’त’ईनुहु व’नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम. अम्मा बा’द
    फ़अ’ऊज़ु बिल्लाही मि’नश शैतान नि’र्रजीम, बिस्मिल्ला’हिर रहमान निर्रहीम,
    इननल्लाहा व’मलाइकतुहु यु’सल’लुना अलन’नबी, या अय्यु’हल’लज़ीना आ’मनू सल्लू अलैही व’सल्लिमु तस्लीमा.
    अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व’अला आलि मुहम्मदिन व’अ’लल खुलफ़ाई रा’शिदीन अल’मह’दिय्यीन. व’अ’ला अस’हा’बिहि अज’म’ईन. व’अ’ला मन त’बि’अ’हुम इला यौमिद दीन. इबाद’अल्लाह र’हि’म’कुमुल्लाह.
    इन्नल्लाहा या’मुरु बिल’अद’लि वल’इहसानि व’ई’ता’ई ज़िल’क़ुर्बा व’यन्हा अनिल फ़ह’शाइ वल’मुन’करि वल’बगई, य’इ’ज़ुकुम ल’अल’लकुम त’ज़क्करून. वल्ज़िकर
    अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाह हु अकबर वलिल्लाहिल हम्दु

    अब थोडी़ बात क़ुर्बानी के तरीक़े पर भी कर ली जाये.
    आयिये जानते हैं कि क़ुर्बानी का सही तरीक़ा किया है?
    जानवर की गर्दन पर छुरी चलाते वक़्त ज़बह करने से पहले बिस्मिल्लाह अल्लाह हु अकबर पढे़
    ज़बह करते हुए यह आयते़ भी पढ़ना भी साबित है.
    इन्नी वज्जहतु वजहिया लिल्लज़ी फ़’त’रस समावाति वल’अर’ज़ि हनीफ़न वमा अना मिनल मुश्रिकीन .क़ुल इनना सलाती व’नुसुकी व’महयाया व’म’माती लिल्लाही रब्बिल आ लमीन. ला शरीका लका व’बि’ज़ा’लिक उमिरतु व’अना अव’व’लुल मुस्लिमीन.
    ज़बह करने के बाद यह दुआ पढे़.
    अल्लाहुम्मा तक़ब्बल निम्नी कमा त’क़ब’बल’ता मिन हबीबिका मुहम्मदिन सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम व’मिन खलीक़िका इब्राहीमा अलैहिस सलाम.

    जानवर को ज़बह करते वक़्त ऐसा जुमला कहना ज़रूरी है जो सिर्फ़ अल्लाह त’आ’ला के ज़िक्र और हमद ओ सना पर हो.

    ज़बह करते वक़्त सिर्फ़ उर्दु में भी अल्लाह का नाम लिया जैसे के यह बोला के अल्लाह के नाम से ज़बह करता हूँ तो भी क़ुर्बानी हलाल हो जायेगी

    और नमाज़ में अल्लाह से दुआ करें के अल्लाह हमारे देश और दुनिया में इस कोरोना वायरस नामी महामारी को ख़तम कर दे और दुनिया में अमन चैन और शान्ती की फ़िज़ा बनी रहे.

  • मुख्यमंत्री गहलोत ने विधायकों को छोड़कर सत्ता सूख से संगठन व सांसदो को कभी तरजीह नही दी।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने खिलाफ विधायको मे बगावत के सूर नही निकलने इसलिए सभी विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के पंचायत-निकाय चुनाव की टिकट देने के अलावा पसंद के डिजायर प्रथा के मार्फत सरकारी कार्मिक लगाने के अतिरिक्त सभी तरह के विकास के काम उनकी मर्जी से होने की पूरी छूट दे कर उन्हें भरपूर सत्ता का सूख भोगने की परिपाटी जो 1998 मे डाली वो आज भी जारी कर रखी है। लेकिन अबकी दफा सचिन पायलट के विधायक-मंत्री बनकर सत्ता सूख भोगने की बजाय मुख्यमंत्री बनकर सत्ता अपने हिसाब से चलाने का दावा ठोके रखने का परिणाम यह निकला कि सत्ता के दो पावर सेंटर कायम होने के चलते विधायकों मे मुख्यमंत्री के प्रति आक्रोश लगातार पनपते जाने पर आज पायलट के नेतृत्व मे विधायकों ने राजस्थान मे नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर जो कदम उठाया है उससे सरकार लड़खड़ाने लगी है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने अब तक के सभी मुख्यमंत्री कार्यकाल मे संगठन के प्रदेश पदाधिकारियों सहित जिलाध्यक्ष व लोकसभा सभा सदस्य या कांग्रेस की तरफ से लोकसभा उम्मीदवार रहे नेताओं को सत्ता सूख से हमेशा कोसो दूर रखने की रणनीति को अपनाये रखा है। इन सब नेताओं के मुकाबले विधायकों को सत्ता पूरी तरजीह देकर सर्वेसर्वा बनाये रहने से कांग्रेस संगठन व नेताओं सहित आम कार्यकर्ताओं मे कांग्रेस की सरकार रहने के बावजूद जब इनकी छवनी जब एक पैसे मे भी नही चली तो उनमे उदासीनता आने से गहलोत के मुख्यमंत्री रहते आम विधानसभा चुनाव होने पर कांग्रेस हमेशा ओधे मुह गिरती आई है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने नेतृत्व वाली सरकार मे केवल मात्र विधायकों को खूश करने का एक अलग तरह की परिपाटी का जो चलन शुरु कर रखा है जिसके तहत विधानसभा के दोसो कांग्रेस उम्मीदवारो को तो सत्ता मे पूरी तरजीह दी। वही दोसो के मुकाबले कांग्रेस के पच्चीस लोकसभा उम्मीदवारों को रत्ती भर भी तरजीह नही देने का ही परिणाम यह निकला कि आज संकट की घड़ी मे वो सभी पच्चीस उम्मीदवार किसी भी तरह की मुख्यमंत्री के फेवर मे भूमिका निभाते नजर नही आये। या फिर वो सभी भूमिका निभाने मे सत्ता संघर्ष के चले नाटक मे सक्षम नही हो पाये। अगर मुख्यमंत्री गहलोत विधायकों के साथ साथ लोकसभा का चुनाव लड़े कांग्रेस उम्मीदवारों व संगठन के ओहदेदारों को सत्ता सूख मे चाहे विधायकों से कम लेकिन उन्हें भी अहमियत देते तो वो सभी नेता आज उनकी ढाल बनकर संकट के दौर मे साथ खड़े नजर आते।

    राजस्थान मे आम विधानसभा चुनाव के पहले होने के कारण अधिकांश लोकसभा उम्मीदवारों ने कांग्रेस के विधानसभा उम्मीदवारों को विजयी बनाने के लिये अपनी पूरी ताकत को झोंक कर कोशिश करने का परिणाम ही आया कि प्रदेश मे कांग्रेस की सरकार गठित हो पाई। इसके विपरीत गहलोत के नेतृत्व मे सरकार गठित होने के बाद जब लोकसभा चुनाव हुये तो उस चुनावों मे विधायक व विधानसभा उम्मीदवारों ने सत्ता के नशे मे सत्ता सूख मे अन्य को भागीदारी ना देने की मानसिकता के चलते लोकसभा चुनाव मे उदासीन रहकर काम किया बताते। अगर उक्त लोग अपने चुनाव की तरह लोकसभा उम्मीदवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करते तो प्रदेश मे बालाकोट-पुलवामा मामले के बावजूद 8-10 कांग्रेस से सांसद विजयी होते। एवं चुनाव हार का मंत अंतर भी निश्चित बहुत कम होता।

    कुल मिलाकर यह है कि आठ विधानसभाओं पर बना एक लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी अपनी कुछ ना कुछ राजनीतिक हेसियत जरुर रखता होगा। मुख्यमंत्री ने सरकार व अपना नेतृत्व बचाये रखने के लिये समर्थक विधायको को एक पखवाड़े से होटल मे बंद करके रख रखा है। जबकि सचिन पायलट सहित 19 कांग्रेस विधायक नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर राजस्थान के बाहर अज्ञात स्थान पर डेरा डाले हुयै है। ऐसे हालात मे मुख्यमंत्री की पहल व पसंद के मुताबिक पायलट को सभी पदो से हटाकर उनकी जगह नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया है। पायलट समर्थक दो मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। पूरी प्रदेश कांग्रेस कमेटी व उसके अग्रिम संगठनों को भी भंग कर दिया गया है। युवा-एनएसयूआई व सेवादल के प्रदेश अध्यक्ष बदल दिये गये है। फिर भी कांग्रेस सरकार पर आया संकट अभी टला नही है। बल्कि दिन ब दिन संकट पेचीदा होता जा रहा है।

  • कोयला निजीकरण: मोदी सरकार बनाम हेमंत सरकार

    अफ्फान नोमानी

    देश की सर्वोच्च सरकारी कंपनी और धरोहर का निजीकरण के बाद अब मोदी सरकार के निशाने पर है मध्य भारत में स्थित कोयला खदान. मोदी सरकार ने कोयला खदान की निजी कंपनी के हाथों नीलामी के लिए सूची भी तैयार कर दिया है. इस सुची में मध्य भारत ( ओड़ीशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश व झारखंड ) और पश्चिम बंगाल के कुछ छेत्रों के कोयला खदान है.

    कोयला निजीकरण को लेकर मध्य भारत में मोदी सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर तेज हो गया है. पश्चिम बंगाल में कोयला खदान के मजदूर लगातार तीन दिनों से भूख हड़ताल कर रहे है. झारखंड में कुल 22 कोयला खदानें है जो 103 वर्ग किलोमीटर में है। सभी 22 कोयला खदान के मजदुर यूनियन कोयला निजीकरण के खिलाफ विरोध जुलुस निकाल रहे है. झारखंड में कोयला निजीकरण मामले पर सीएम हेमंत सोरेन से लेकर सभी झामुमो, कांग्रेस व राजद के विधायक व नेता सहित अन्य पार्टी के नेता भी कोयला निजीकरण का विरोध कर रहे है.

    झारखंड कोयला खदान में एक ललमटिया भी है जो महागामा विधानसभा छेत्र में आता है. महागामा विधानसभा छेत्र के विधायक कांग्रेस के दीपिका पांडेय सिंह है जो कोयला निजीकरण मामला उठने के बाद शुरू से ही मोदी सरकार के निजीकरण नीति के खिलाफ सक्रीय दिख रही है. दुर्भाग्य से राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कोयला निजीकरण विरोध की खबरें सुर्खियों में नहीं है लेकिन स्थानीय मीडिया ( इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और वेब ) में प्रतिदिन कोयला निजीकरण विरोध की खबरें सुर्खियों में है. विधायक दीपिका पांडेय सिंह अपने कार्यकर्ता के साथ मजदुर यूनियन को लेकर कोयला निजीकरण के खिलाफ विरोध कर रही है.

    झारखंड में कोयला निजीकरण पर सियासत गरम है.इसी को लेकर निजीकरण विरोधी की प्रमुख चेहरा विधायक दीपिका पांडेय सिंह से वार्तालाप किया. बातचीत के दौरान दीपिका पांडेय सिंह ने कहा की ” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना लोगों की कीमत पर कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए कोयला क्षेत्र का निजीकरण करने की है. भाजपा सरकार ने कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए इसके निजीकरण की योजना बनायी है. हम जनता के हित में निजीकरण के खिलाफ लड़ते रहेंगे. अगर कोयला निजीकरण हुआ तो सबसे पहले हमारे लाश से गुजरना होगा. क्योकि जल,जंगल, जमींन और झारखंड की सभी संपदा बचाना हम झारखंडवासी का मौलिक अधिकार है. और इसको बचाने के लिए हेमंत सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है. झारखंड की हेमंत सरकार मोदी सरकार से क़ानूनी लड़ाई लड़ रही है. अभी तो सिर्फ 22 कोयला खदान छेत्रों में आंदोलन शुरू हुआ है, जरुरत पड़ी तो पुरे राज्य में जन आंदोलन होगा. लेकिन हम झारखंडवासी किसी निजी कंपनी को किसी भी कोयला खदान में घुसने नहीं देंगे. झारखंड की संपदा से झारखंडवासी का आर्थिक रूप से जुड़ाव है. जो कमाने खाने का एक मात्र जरिया है. अगर निजीकरण होता है तो उद्योगपति अपनी मर्जी चलाएगा जिससे बहुत संख्या में स्थानीय लोग बेरोजगार हो जायेगे. और हम ऐसा मजदूर वर्ग के हित में नहीं होने देंगे “.

    सवाल है मोदी सरकार के निशाने पर सबसे ज्यादा झारखंड के कोयला खदान ही क्यों है? वजह साफ़ है झारखंड की सभी 22 कोयला खदानें कुल मिलाकर 103 वर्ग किलोमीटर में है। सभी 22 कोयला खदानों में लगभग 386 करोड़ टन कोयले का भंडार है। इसलिए 22 कोयला खदानों से झारखंड के खजाने में आने वाली कुल राशि 90 हजार करोड़ के पार होगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जून को कोयला ब्लॉकों की ऑनलाइन नीलामी की प्रक्रिया शुरू की थी. लेकिन मोदी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हेमंत सरकार की दखल के बाद कोयला खदानों की नीलामी में पेच आ गया है. देश में कोयला क्षेत्र के निजीकरण के खिलाफ लाखों कोयला मजदूर हड़ताल पर हैं। इसमें वामपंथी संगठनों के अलावा आरएसएस से जुड़ी बीएमएस तक को भारी दबाब में शामिल होना पड़ा है. इस मामले के विभिन्न जानकर भी निजीकरण के खिलाफ है. माइंस मिनरल एंड पीपल के अध्यक्ष श्रीधर रामामूर्ति का कहना है की ” अगर कोयला का निजीकरण होता है तो निजी कंपनिया अंधाधुंध खनन करेंगी और कोल इंडिया जैसे सार्वजनिक छेत्र के उपक्रम को हाशिए पर पहुँचा देंगी “.
    मई के शुरूआत में जब कोयला निजीकरण विरोध हुआ तो 18 मई 2020 को बीसीसीएल ने केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री प्रल्हाद जोशी का बयान जारी किया. मंत्री ने कहा है कि कोल इंडिया का निजीकरण नहीं होगा। उन्होंने कहा कि कंपनी के पास पर्याप्त कोयला भंडार है, जो देश में 100 वर्षों से अधिक तक बिजली बनाने के लिए पर्याप्त है। सरकार को कोल इंडिया पर गर्व है और आने वाले समय में इसे और मजबूत किया जाएगा।

    लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोयला ब्लॉकों की ऑनलाइन नीलामी की प्रक्रिया की खबर से 18 जून के बाद कोयला निजीकरण पर सियासत गर्म है. झारखण्ड, पश्चिम बंगाल,ओड़िसा और छत्तीसगढ़ में विरोध जारी है.

    सवाल है की क्या विदेशी कम्पनियों से खनन करा कर भारतीय जरूरतों की पूर्ति हो सकेगी? जब सरकारी कंपनी खनन करने में सक्षम है तो निजी कंपनी की जरुरत क्या है? गौरतलब हो कि 1973 में कोयला खनन के राष्ट्रीयकरण के बाद निजी कंपनियों के खनन की इजाजत नहीं थी। कोयला खनन की सरकारी कंपनियों की क्षमता पर्याप्त है और उनमें जरूरत के मुताबिक इजाफा की भी गुंजाइश है लेकिन सरकार का असली मकसद कोयला क्षेत्र में कॉरपोरेट्स के लिए लूट व अकूत मुनाफाखोरी के लिए बाजार तैयार करना है। भारत में महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन में कोयला का भंडार होना भारतीयों के लिए एक बड़ा वरदान है. और इसे बचाना राष्ट्र हित में है.

    अब देखना यह है राष्ट्र हित में इसे बचाने में कितना कामयाब हो पायेगी हेमंत सरकार.

    लेखक अफ्फान नोमानी रिसर्च स्कॉलर, लेक्चरर व स्तंभकार है

  • काफी संघर्ष के बाद जेल से रिहा हुई बहन सफ़ूरा ज़रगर को मुबारकबाद

    अफ्फान नोमानी

    जम्मू में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ी ,जामिया मिलिया से सोशियोलॉजी में एमफिल कर रही व साथ ही जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी (जेसीसी) की मीडिया संयोजक सफ़ूरा ज़रगर, जामिया से जेल तक संघर्ष भरी दास्तां सब याद रखा जायेगा. सलाम तेरे साहस व हिम्मत को जिसने निरंकुश सत्ता की आँखों मे आँखें डालकर हमेशा लोकतंत्र व संविधान की आत्मा को जिंदा रखा. गर्भवती के बावजूद स्वतंत्र आवाज को बुलंद रखा. हक़ व इंसाफ के लिए अडिग रही व जुल्म व अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करना संघर्षशील साथियों के लिए मिसाल है.

    हमें याद है सीएए आंदोलन का संघर्ष भरा वो लम्हा जब जामिया से जेएनयू, जेएनयू से एएमयू व आईआईटी तक हर तरफ संविधान की रक्षा के लिए ,अपनी पहचान के लिए निरंकुश सत्ता के खिलाफ बिगुल बच चूका था. निरकुंश पुलिस की लाठी का स्वंतत्र आवाज पर प्रहार से पुरे मुल्क में कोहराम मच गया. सफ़ूरा जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की मीडिया प्रभारी पद पर होते हुवे जाबांज नौजवानों को एक साथ लेकर मुहीम में जो परवान चढ़ा वो मुल्क के हर कोने में गूंज उठा. जो संगठन निरकुंश सत्ता के खिलाफ बोलने से घबराते थे उनका भी धीरे-धीरे स्वर तेज होने लगा. सत्ता में बैठी भाजपा सरकार ने घबराकर आनन-फानन में सीएए विरोधी कार्यकर्ता को गिरप्तार करना शुरू कर दिया. देश के विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में खासकर सीएए विरोधी कार्यकर्ता को गिरप्तार किया गया. कई राज्यों में बहुत से सीएए विरोधी कार्यकर्ता पुलिस की अंधाधुन लाठी चार्ज से शहीद हो गए. वो जामिया ही है जहाँ की छात्रों द्वारा सीएए विरोधी मुहीम ने शाहीनबाग आंदोलन को जन्म दिया और एक शाहीनबाग की बुनियाद पर देश के विभिन्न जगहों पर शाहीनबाग का जन्म हुआ. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध आंदोलन ने देश भर में इस कदर तूल पकड़ा की गैर भाजपा शासित राज्यों में सीएए के विरोध में बिल पास किया गया. केंद्र में बैठी भाजपा सरकार बैकफुट पर आ गयी थी लेकिन इसी बीच गहरी साजिश के तहत दिल्ली में दंगा हुआ. सैकड़ो निर्दोष लोग मारे गए. कई कंपनी, दुकान और घरों में आग जनी हुई और लोग अपने घरों से बेघर हो गए. लेकिन सरकार ने दिल्ली दंगा का निष्पक्ष जाँच कराने के बजाय दंगाई को खुली छूट मिली और दंगा पीड़ितों को मदद करने वाले एक विशेष समुदाय के लोगो को निशाना बनाया गया.

    मालूम हो कि इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस से यह सुनिश्चित करने को कहा था कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते दिल्ली दंगा मामले की जांच धीमी नहीं पड़नी चाहिए, जिसके बाद हिंसा मामले में पुलिस 13 अप्रैल तक 800 से अधिक लोगों को गिरप्तारी हुई जिसमें 85% से ज्यादा एक विशेष समुदाय वर्ग के नौजवानों, व्यवसाय व शिक्षण संस्थानो से जुड़े लोगों को गिरप्तार किया गया. उसी कड़ी में जामिया के शोधार्थी छात्र सफ़ूरा ज़रगर, मीरान हैदर, आसिफ इकबाल तन्हा और एल्युमनी एसोसिएशन ऑफ जामिया मिलिया इस्लामिया के अध्यक्ष शिफाउर्ररहमान खान को गिरफ्तार किया गया.

    इन छात्रों पर राजद्रोह, हत्या, हत्या के प्रयास, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच नफरत को बढ़ावा देने और दंगा करने के अपराध के लिए भी मामला दर्ज किया गया . बड़ी तादाद में जेएनयू , एएमयू , बीएचयू व उस्मानिया यूनिवर्सिटी सहित अन्य यूनिवर्सिटी छात्र छात्रों को भी गिरप्तार किया गया.

    गिरफ्तार सीएए विरोधी कार्यकर्ताओं में सफ़ूरा ज़रगर का नाम ज्यादा सुर्ख़ियों में रही. 27 वर्षीय सफ़ूरा ज़रगर अपनी पहली गर्भावस्था के दूसरे तिमाही में 10 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया गया था. सफ़ूरा ज़रगर की गिरफ्तारी उस समय सामने आई है जब कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए मोदी सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन कर रखा था. जो अपना रमजान के पहले दिन तिहाड़ जेल में बिताया. गर्भावस्था में सफुरा जर्गर की रमजान में गिरप्तारी की खबर ने एक विशेष समुदाय वर्गो के दिलों को झकझोर कर रख दिया. विभिन्न संगठनों के जिम्मेदार ,समाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ पत्रकारों ने सफ़ूरा ज़रगर की रमजान में गिरप्तारी को अमानवीय करार देते हुवे दुःख प्रकट किया. सफ़ूरा ज़रगर निरंकुश सत्ताधारी पार्टी के आँखों की किरकरी की अहम वजह यह रही की जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की मीडिया प्रभारी पद पर होते हुवे सभी जाबांज युवाओं को एकजुट किया और सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन को तेज करने की कोशिश की और बहुत ही मुखर होकर नागरिक संशोधन कानून (सीएए) को देश के 180 मिलियन मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करता है और देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के ख़िलाफ बताया. राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित होने के बाद केंद्र की सत्ता में बैठी सरकार को यह बात हजम नहीं हुई.

    अंतत: 10 अप्रेल 2020 को दिल्ली पुलिस ने गिरप्तार किया और बाद में अदालत में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कड़े आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम 2019 ( UAPA ) के तहत कार्रवाई की. मामला गिरप्तारी से करवाई तक ही नहीं रुकता है बल्कि गिरप्तारी के बाद सोशल मीडिया पर गंदी मानसिकता व नफरती दक्षिणपंथी गिरोह ने उनकी शादी और गर्भावस्था को लेकर अश्लीलता, फूहड़ता ,सेक्सिस्ट ट्रोलिंग जो हो सकता था सफुरा के खिलाफ हर तरह के प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल किया गया. घटिया मीम्स और सफूरा की तस्वीरों से छेड़छाड़ कर छवि खराब करने की कोशिश हुई. उनके गर्भ में पल रहे बच्चे के पिता की पहचान को लेकर आला दर्जे के झूठ गढ़े गए. जबकि सच्चाई यही है की सफुरा एक नेक और प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाई करने वाली वर्त्तमान में शादीशुदा गर्भवती महिला है. काबिलेतारीफ बात यह है की हर तरह के प्रोपेगैंडा के बावजूद सफ़ूरा ज़रगर अडिग रही और मजबूती से क़ानूनी लड़ाई लड़ती रही.

    अंतत: लंबी क़ानूनी प्रक्रिया व संघर्ष भरी जिंदगी बिताने के 73 दिनों बाद आज दिनांक 23 जून 2020 गत मंगलवार को सफ़ूरा ज़रगर को दिल्ली हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर जमानत दे दी.

    काफी संघर्ष के बाद जेल से रिहा हुई बहन सफ़ूरा ज़रगर को मुबारकबाद. जिंदगी रहे सलामत ये दुआ है हमारी.

    लेखक अफ्फान नोमानी रिसर्च स्कॉलर व लेक्चरर है. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

  • बिहार और आरजेडी : शारिब ज़िया रहमानी

    लालू यादव ने परिवार के इलावा किस को आगे बढ़ाया
    हाँ जो मुस्लिम चेहरा उठा भी उस को दबा दिया, शहाबुद्दीन,तस्लीम,अब्दुल बारी,तनवीर कई मिसालें हैं
    आज भी लालू परिवार के इलावा कोई सीएम चेहरा बता दें जो आरजेडी को पसंद आजाये

    यूपीए में पहले सीएम चेहरा सामने आना चाहए
    लालू को पुत्र प्रेम छुड़ना होगा तभी गठबंधन कामयाब होगा
    जब तक यह अकड़ रहेगी, गठबंधन की ऐसी ही स्थिति होगी, लोक सभा इलेक्शन के समय भी अंतिम समय तक खिंचा तानी रही उस का भी यूपीए को नुक़सान उठाना पड़ा, कम से कम 5/7 सीटें तेजस्वी की वजह से एनडीए की गोद में गईं

    लोक सभा में यादव ने आरजेडी को वोट नहीं दिया था
    तो मुस्लिम क्यूँ लालू परिवार के भविष्य के लिए वोट दे?
    तेजस्वी की हिम्मत नहीं होई कि इलेक्शन के बाद अपने कास्ट से पूछें जिस यादव के लिए लालू खड़े रहे उस ने धोका क्यूँ दिया? पहले 100% यादव का वोट सुनिश्चित करें तब हम सोचेंगे

    मुस्लिम मर्डर पर तेजस्वी की बोली नहीं निकलती है, मुस्लिम इशू पर चुप हैं तो फिर हम आप को कुर्सी पर बैठाने के ठेकेदार भी नहीं हैं
    समय है, सोच समझ कर फ़ैसला कर लें

  • बिहार विधानसभा इलेक्शन 2020 में हमारी पॉलिसी:सैफ़ुर रहमान

    छात्र डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्म ऐनड मास कम्युनिकेशन मानू हैदराबाद

    इलेक्शन और सियासत सिर्फ हार जीत का खेल नहीं है बल्कि इससे कहीं जियादा है
    मुस्लिम कौम का सबसे ज़ियादा अफसोसनाक पहलू है कि इस मामले में छुपी हुई बहुत सारी हकीकतों को नहीं देख पाते नतीजा होता है की सेकुलर कहलाने वाली पार्टियां और फिरका परस्त कही जाने वाली पार्टियां दोनों सियासी तौर पर इनको बेवकूफ बना रही होती हैं
    एक फिरकाप्रस्तों का डर दिखाकर हमें मुकम्मल तौर से सियासी गुलाम बनाए रखने का इरादा रखती है तो दूसरी पार्टी इसमें सहयोगी होकर अज़ाब बनी हुई है। हम जानते है कि मौजूदा जमहूरियत में हुकूक की लड़ाइयां पार्टी के सतह पर लड़ी जासकती है व्यक्ति के आधार पर नहीं।
    फर्द चाहे जितना ईमानदार हो वह पार्टी का नुमाइंदा होता है कौम का नुमाइंदा नहीं बन पाता। अगर हमारी आँखें खुली हुई है तो इस कड़वी हकीकत को तलाक बिल के मौके से पार्लियामेंट के अन्दर होने वाली बहस में देख सकते हैं जिस में असदुद्दीन ओवैसी की चिंघाड़ती हुई आवाज और मौलाना असरारूल हक़ साहब का उस रोज़ उस बहस से किनारा कशी इस हकीक़त को सच साबित करती है, उसी तरह कई सियासी लीडरान मुसलमानों के लिए सबसे खतरनाक पास होने वाले बिल के खिलाफ कायम हुए शाहीनबागों में सिर्फ इसलिए कदम नहीं रख सके कि उनका ताल्लुक उस पार्टी से था जिसने इस बिल की हिमायत की थी।
    उसी तरह से हमारी आँखों ने वह मंजर देखा कि बिहार के शेर शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब के खिलाफ चंद ऐसे लोगों को मैदान में उतरने पर मजबूर हो जाना पड़ा जिनका ताल्लुक पार्टी की सतह पर मुखालिफ कैम्प से था। हालांकि उनकी जिंदगी कौम की हमदर्दी के दावे से भरी हुई नजर आती है और शायद इस दावे में एक-दो फीसदी सच्चाई भी है लेकिन पार्टी में अपनी हैसियत मजबूत करने की चाह आखिरकार उनको मजबूर कर दिया कि …….
    सेक्युलर भारत के इतिहास में और भी बहुत से चेहरे मिल जाएंगे जिन्हें कौम ने इसलिए कि वह कुछ कौमी मसाएल पर आगे आकर काम करते हुए नजर आए थे । कौम के लिए बहुत हमदर्द समझकर आगे बढ़ाया लेकिन वह आगे चलकर हमारे लीडर की जगह पार्टी के डिलर बन कर रह गए ।
    शायद उनकी मजबूरियों ने उन्हें जकड़ लिया, क्योंकि
    कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
    यू ही कोई बेवफा नहीं होता।
    इसलिए अगर हम देखना चाहें तो हमे 70 साल की तारीख और हिन्दुस्तान में फैले हुए बहुत सारे मुस्लिम एम.एल.ए और एम.पी अपने रवैयों के जरिए हमेशा इसका एहसास दिलाते रहते हैं।

    जमहूरियत में हार सिर्फ हार नहीं होती है बल्कि आइंदा के जीत का दरवाजा भी खोलती है और बहुत मर्तबा हमारी हार किसी और के हार के हार का सबब भी बनती है। ऐसे समय में अगले इलेक्शन में पार्टियों के बीच होने वाले तोड़-जोड़ में इसका असर साफ नजर आता है।
    पिछले इलेक्शन में लालू और नितीश को क्या हार के डर ने ही एक दूसरे के करीब नहीं कर दिया था?
    लेकिन यह तोड़-जोड़ उस शख्स
    के हिस्से में नहीं आता जो आपके क्षेत्र में आपका वोट लेकर किसी पार्टी के उम्मीदवार को हराने के सबब बना बल्कि उस पार्टी के हिस्सा में आता है जिसके टिकट पर उसने अपने आपको इलेक्शन के मैदान में उतारा था इसीलिए वह हर हाल में एक तरफ़ अपनी पार्टी की पोजीशन को मजबूत कर देते हैं और दूसरी तरफ हमारे बीच आ रही बेदारी को दुसरी गुलामी के हाथों बेच देते हैं और हम फिर अपनी इस गलती की वजह से अपने नए मसिहा के तलाश में अपने जीवन ख्याल और अपनी फिक्री हरकत को तेज कर देते हैं और यह भूल जाते हैं किसी पहचाने हुए चेहरे के सियासी आरजू ने पिछले इलेक्शन में हमारे कदम को एक गलत रास्ते पर डाल दिया था
    ऐलाक़ाई सतह पर होने वाली इस गलती की सजा कभी हम सुबाई सतह पर ऊठाते हैं कभी मुलकी सतह पर
    जब वाकयात इस हकीकत को सही साबित कर रहे हैं तो अब मुसलमानों को चाहिए कि अपनी सोच का रुख फर्द की सियासत से हटाकर पार्टी की सियासत की तरफ कर दें इसके अलावा कोई चारा नहीं है क्योंकि ..
    “फर्द कायम रबते मिललत से है तन्हा कुछ नहीं
    मौज है दरिया में और बेरूने दरीया कुछ नहीं”

    इसलिए इस बार बिहार के मुसलमानों से दरखास्त करता हूं कि हराने जिताने और किसी फ़रद को आगे बढ़ाने की सियासत को छोड़कर अपनी सियासी कीयादत के हाथ को इस कदर मजबूत करें के सेक्युलर कहे जाने वाली पार्टी आपकी तरफ हाथ बढ़ाने के लिए मजबूर हो जाए और उनका रवैया जो हमारे साथ है कि आप टोपी पहनकर मेरे साथ मत खड़े हो जाएं लेकिन वोट देने के लिए हमेशा मजबूर रहें में तब्दीली आऐ इस तरह से हमारे क़ियादतों के हाथों में बारगेनिंग पोजीशन हासिल हो जाऐगी जिससे हमें हक़िक़ी सेयासी वक़ार हासिल होने लगेगा और ईस मक़सद को हासिल करने के लिऐ हमारे सामने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI)
    और मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन (MIM)जैसी पार्टियां बिहार असेंबली इलेक्शन में मौजूद हैं
    हमेशा के पछतावे से कहीं बेहतर है कि इनकी पोजीशन कुछ भी हो हम इनके हाथों को मजबूत कर इनके व ईनके जरिए खुद के सियासी वकार को आगे बढ़ाएं और आगे के लिए एक बेहतर मजबूत विकल्प तैयार करलें
    शुक्रिया

  • क्यों लालू प्रसाद यादव को बिहार में सामाजिक न्याय का मसीहा कहा जाता है?

    Zain Shahab Usmani

    भारतीय राजनीति के बहुचर्चित बिहारी नेता लालू प्रसाद यादव की उम्र 73 साल हो गई है। वो गोपालगंज ज़िले के फुलवरिया गाँव में एक गरीब यादव परिवार में जन्मे थे।

    स्कूलिंग के बाद पटना यूनिवर्सिटी में स्नातक और कानून की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में लालू ने कदम रखा। धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ने लगी। पटना यूनिवर्सिटी के छात्र यूनियन का चुनाव जीतकर प्रेसिडेंट बन चुके लालू ने सक्रिय राजनीति में आने का संकेत दिया।

    जेपी आंदोलन में लालू और निखरे

    जब इंदिरा गाँधी का विरोध शुरू हो चुका था तब लालू यादव जेपी के साथ आंदोलन में शामिल हो चुके थे। फिर जब देशभर में इमरजेंसी लगी तो पूरे देश में नेताओं के साथ लाखों आंदोलनकारियों को भी जेल में बंद कर दिया गया। उन आंदोलनकारियों में लालू भी थे।

    जब इमरजेंसी खत्म हूई तो 1977 के लोकसभा चुनाव में जेपी की अगुआई में जनता पार्टी को जीत मिली। काँग्रेस पहली बार देश की सत्ता से बाहर हो गई। तब लालू प्रसाद यादव 29 वर्ष के युवा सांसद के तौर पर सारन लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे।

    सक्रिय राजनीति में लालू का कद बढ़ता चला‌ गया

    लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शुरू हुआ बिहार में लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक सफर। सन् 1980 से सन् 1989 तक 2 बार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता के तौर पर ख्याति प्राप्त की।

    बिहार में सत्ता ने करवट ली और साल 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। देखते ही देखते सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर लालू की छवि बन गई। बिहार की सत्ता में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ते ही पूर्ण रूप से बदलाव आ चुका था।

    कभी बिहार की जो राजनीति सवर्णों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वह अब नए रूप में पिछड़ों और वंचितों के इर्द-गिर्द घूमने लगी। उसी सामाजिक न्याय के आन्दोलन का ही नतीजा है कि आज नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। एक समय ऐसा भी आया कि जीतन राम मांझी भी बिहार के मुख्यमंत्री बने। इस बदलाव के बाद बिहार में कई नेता उभरे।

    बिहार की राजनीति का वह 15 साल

    लालू प्रसाद यादव यादव सन् 1990 से लेकर 2005 तक अकेले अपने दम पर बिहार की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे। जिसका मुख्य कारण मुस्लिम-यादव गठजोड़ है।

    जिसके तहत ठोस जनाधार और अन्य पिछड़ी जातियों के सहयोग से अपनी चुनावी रणनीति बनाए रखने में लालू कामयाब होते रहे।

    आज भी है लालू के पास मज़बूत जनाधार

    आज भी लालू प्रसाद यादव के पास एक मज़बूत जनाधार है, जो बिहार के अंदर किसी दल या नेता के पास नहीं है। इसका उदाहरण 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखाई दिया है।

    फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में जब-जब लालू यादव कमज़ोर हुए और खुद को किंग मेकर के रूप में दर्शाया, तो यह साबित हो गया कि लालू यादव के पास मज़बूत जनाधार था और है।

    बात कहने का लालू का अपना खास अंदाज़

    अपनी बात कहने का लालू यादव का खास अंदाज़ है। रेलवे में कुल्हड़ की शुरुआत करने से लेकर चरवाहा स्कूल खोलने और दलितों की बस्तियों में जाकर बच्चों को अपने हाथों से नहलाने का लालू यादव का अंदाज़ हमेशा ही सुर्खियों में रहता है। अपने विरोधियों पर भी वो अलग ही तेवर में हमला करते रहे हैं।

    लालू ने अपने खास अंदाज़ के ज़रिये किसी को भी नहीं छोड़ा। वो मोदी, अमित शाह या फिर भाजपा सभी पर हमलावर दिखाई देते हैं। शायद ही देशभर में कोई भाजपा के विरोध में लालू प्रसाद यादव के बराबर आक्रमक हो।

    अब तक देशभर में लालू यादव की छवि एक मज़बूत सेक्युलर और भाजपा विरोधी नेता की रही है। लालू प्रसाद यादव को उनकी इसी छवि ने बिहार में सामाजिक न्याय का मसीहा बना दिया।

  • काश हम पहले सम्भल जाते तो आज यह हालात नही देखने पड़ते:अशफाक कायमखानी।

    जयपुर।भारत के अन्य हिन्दी भाषी राज्यो के मुकाबले चाहे राजस्थान के मुस्लिम समुदाय की भारतीय राजनीतिक पटल पर खास चर्चा नही होती होगी लेकिन एक समय था जब राजस्थान के मेव-सिंधी मुस्लिम-गद्दी-खेलदार व कायमखानी बिरादरी के लोग मेहनत के बल पर जमीन के सीने को चीर कर उससे खाद्य सामग्री की उपज करके अपने बच्चों व अन्य वतन भाइयो का पेट को भोजन उपलब्ध कराने मे अहम किरदार अदा करते थे। इसके साथ ही उक्त बिरादरियों मे बच्चों को तालीम दिलवाकर फौज व पुलिस की सेवा मे भेजने का सीलसीला भी कायम था। लेकिन आजादी के बाद रफ्ता रफ्ता उक्त बिरादरियों मे खेती करने का चलन कम होता गया ओर खेती की जमीन बेचने का शोक आम होता गया। उक्त जमीन बिकने से जो पैसा आया वो किसी उधोग-धंधे मे लगने के बजाय पारम्परिक रीती रिवाजों मे फिजूल खर्च को बढावा देने मे बरबाद होता गया। जिसके कारण आज वैश्विक महामारी कोराना संकट के लोकडाऊन व विश्वव्यापी मंदी मे मुस्लिम समुदाय के हाथ पुरी तरह खाली होते नजर आये।

    राजस्थान के मुस्लिम समुदाय को समझने के लिये पाते है कि एक तरफ शहरो मे दस्तकार बिरादरियो का रहना था जो हाथ से अपने खानदानी काम करके अपना गुजारा किया करते थे। दुसरी तरफ वो बिरादरी थी जो देहातो मे रहकर आग बरसाती गर्मी मे खेती-बाड़ी करके जीवनयापन किया करती थी। लेकिन धीरे धीरे बदलाव की बयार यू चली कि उक्त देहाती बिरादरियों मे भी शहरी भौतिक सुविधाओं के प्रति शौक बढा ओर वो इस चक्कर मे अपनी मूल जड़ो से कटने लगे ओर आराम तलब जीवनशैली को अपनाने लगे। अधीकांश देहातियों ने शिक्षा पाने या बच्चों को शिक्षा दिलवाने के लिये शहरो की तरफ रुख करना बताया लेकिन कुछेक को छोड़कर बाकी सभी शिक्षा को ठीक से पाने मे असफल होने के कारण पीछड़ते पीछड़ते रसातल पर पहुंच गये। यानि बद से बदतर हालात मे पहुंचने का सीलसीला चल पड़ा।

    राजस्थान के अलवर-भरतपुर मे मेव, मारवाड़ मे सिंधी मुस्लिम, सवाईमाधोपुर मे गद्दी-खेलदार व शेखावाटी व मारवाड़ के कुछ भाग मे कायमखानी बिरादरियों का रहना है व रहा है। जिनका पहला जीवनयापन का प्रमुख जरिया खेती व पशुपालन ही हुवा करता था। उक्त बिरादरियों के लिये कहा जाता है कि यह मुश्किल हालात मे अभावो के मध्य रहकर भी जीवन को आगे बढाने के आदी थे। कठोर व गठीला बदन के साथ साथ कद-काठी के ठीक हुवा करते थे जबतक यह देहातो मे रहे है।

    देश बंटवारे के दंश से उभरते उभरते जब 1965-70 का दौर आया तो उक्त देहाती मुस्लिम बिरादरियों मे जदीद तालीम का चलन बढने लगा ही था कि उसी के साथ अन्य प्रदेशों के कुछ कथित लोग यहां आकर धर्म के नाम पर शिक्षा व इबादत के नाम अपना वर्चस्व जमाने के लिये घर घर व परिवार परिवार मे फूट डालना शुरु क्या किया कि जदीद तालीम की रफ्तार को ब्रेक ऐसा लगा कि आज प्रदेश का मुस्लिम समुदाय को दलित व पीछड़ो से भी बदतर स्थिति मे सरकारी रिपोर्ट मे माना जाने लगा है।

    सरकारी खजाने मे समुदाय की हिस्सेदारी ना के बराबर है। अधिकारी व कर्मचारी ऊंगलियों पर गिने जा सकते है। सत्ता सूख से कोसो दूर है। ओर जदीद तालीम की तरफ जो रुझान होना चाहिए था जो रुझान हो नही पाया व हो नही रहा है। आपसी टकराव व मसलको मे उलझकर बीना वजह भटकने की राह पकड़ने को आतूर नजर आ रहे है। उच्च मापदण्ड वाली शिक्षा ना पाने की वजह से सरकारी व गैरसरकारी सेवाओं मे प्रतिनिधित्व खत्म होने के कगार पर है। अरब मे मजदूरी के रास्ते मे अवरोध खड़े हो चुके है। गावो मे बेरोजगारों के झूंण्ड के झूंड घूमते व बैठे नजर आते है। अधीकांश बच्चे पांचवीं-दसवीं के आगे शिक्षा ग्रहण कर नही पा रहे है। युवाओं मे दक्षता की काफी कमी है। मयारी तालीम नही होने की वजह से युवाओं कमतर हांका जाता है। लोकडाऊन-5 गुजरने को है। लोकडाऊन मे घरो मे बैठकर अगर उक्त मुद्दों पर मामूली भी मंथन किया होगा तो भविष्य मे अंधेरा ही अंधेरा नजर आया होगा। उक्त अंधेरे से निकलने का रास्ता मयारी तालीम पाने ही मात्र उपाय नजर आया।

    कुल मिलाकर यह है कि लोकडाऊन-5 चल रहा है। लोकडाऊन की शुरुआत से लेकर अब तक काफी समय घर पर निठल्ले बैठने का अवसर मिला है। बैठकर खूब मंथन भी हुवा होगा कि ऐसे हालात मे हम कहां आकर ठहरे है। जदीद तालीम की अहमियत का भी पुरी तरह अहसास हुवा होगा। जदीद तालीम से समुदाय को दूर रखने वाले साजिशकर्ताओ की असलियत का भी अहसास हुवा होगा। अभी भी समय है कि दीन को सही तरिके से समझकर जदीद तालीम की अहमियत को पहचान कर तालीम को पूरी तरह अपना लेना होगा। वरना आगे हालात ओर भी बदतर हो सकते है।