Category: राज्य
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बाढ़ग्रस्त इलाकों के जन प्रतिनिधियों ने बिजली बिल माफी को लेकर रखी अपनी मांग
पटना : बाढ़ग्रस्त इलाकों के जनप्रतिनिधि बिजली बिल माफ करने की सरकार से मांग कर रहे हैं. इसमें मधुबनी, दरभंगा और समस्तीपुर जिले के जनप्रतिनिधि शामिल हैं. उनका कहना है कि बाढ़ खत्म होने के बाद पीड़ितों को आय का साधन विकसित करने और नुकसान से उबरने में समय लग जायेगा. खासकर किसानों की दयनीय स्थिति है.ऐसे में बाढ़पीड़ितों का बिजली बिल माफ होना चाहिए. दूसरी ओर इस संबंध में ऊर्जा विभाग के मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि फिलहाल बाढ़पीड़ितों का बिजली बिल माफ करने के संबंध में सरकार के पास कोई योजना नहीं है.इस संबंध में पंचायती राज विभाग के मंत्री और मधुबनी जिले के बाबूबरही विधानसभा क्षेत्र के विधायक कपिलदेव कामत ने कहा कि सरकार बाढ़पीड़ितों की हर तरह से सहायता कर रही है. ऐसे में उनका बिजली बिल माफ हो जाये तो अच्छा है. उन्होंने कहा कि नेपाल से बागमती नदी में पानी के साथ बालू भी आया है. इससे मधुबनी जिले के लदनिया प्रखंड स्थित कुमारखंड पूर्वी और कुमारखंड पश्चिमी पंचायतों में करीब दो हजार हेक्टेयर जमीन में पांच फुट ऊंचाई तक बालू भर गया है.मांग उचितयोजना एवं विकास विभाग के मंत्री और समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर से विधायक महेश्वर हजारी ने कहा कि प्रजातंत्र में मांग करना उचित है. मुख्यमंत्री भी बाढ़पीड़ितों को हरसंभव सहायता का आश्वासन दिये हैं. उन्होंने कहा कि बिजली बिल माफ होना चाहिए, लेकिन सरकार वित्तीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही फैसला लेगी.बिल माफी से िमलेगी मदददरभंगा के विधायक संजय सरावगी ने कहा कि बाढ़पीड़ितों के लिए सरकार कई स्तर पर राहत कार्य चला रही है. पीड़ित परिवारों के खाते में छह-छह हजार रुपये भेज दिये गये हैं. फसल क्षति और मृत पशुओं का आकलन हो रहा है. इसके लिए भी मदद दी जायेगी. उन्होंने कहा कि बाढ़पीड़ितों खासकर किसानों का बिजली बिल भी माफ होना चाहिए.सरकार से रखेंगे मांगरोसड़ा के विधायक डॉ अशोक कुमार ने कहा कि बाढ़पीड़ितों का बिजली बिल माफ होना चाहिए. इस संबंध में संबंधित मंत्री और अधिकारियों से मिलकर अपनी मांग रखेंगेFazlul Mobeen -
मुसलमान सबको चाहिए लेकिन “विक्टिम” की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों।
आप सबको JNU का वो नारेबाज़ी वाला मामला तो याद ही होगा जिसमें JNU के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, छात्र नेता उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन तीनों को इस मामले में जेल भी जाना पड़ा था। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सात कश्मीरी छात्रों को भी मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन सब के अलावा 36 अन्य को कॉलम नंबर 12 में आरोपी बनाया गया था जो कि कथित तौर पर घटनास्थल पर मौजूद थे।
इस विवाद से किसी को फ़ायदा हुआ हो या न हुआ हो लेकिन JNU के उसी विवाद से कन्हैया कुमार एक नेता बन कर उभरे और आज बेगूसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। बेगूसराय सीट पर CPI के उम्मीदवार कन्हैया कुमार, भाजपा के गिरिराज सिंह और महागठबंधन के प्रत्याशी डॉ तनवीर हसन चुनाव लड़ रहे हैं। कल यानी 9 अप्रैल को कन्हैया कुमार बेगूसराय से नामांकन करेंगे और CPI उनके नामांकन को अभूतपूर्व बनाना चाहती है। इसी सिलसिले में CPI अंचल परिषद की विस्तारित बैठक सोमवार को जिला कार्यालय कार्यानंद भवन में श्यामसुंदर झा की अध्यक्षता में की गई। मौके पर अंचल मंत्री अनिल कुमार अंजान ने कहा कि “9 अप्रैल को वाम मोर्चा के उम्मीदवार डा. कन्हैया कुमार के नामांकन को अभूतपूर्व बनाया जाएगा। एक-एक बूथ से संगठित जत्था आएगा, जिसमें सभी जाति और सांप्रदाय के लोग शामिल होंगे।”
हालाँकि ज़मीनी हक़ीक़त इस से परे है। ये सही है की कन्हैया के नामांकन को अभूतपूर्व बनाने ले लिए उन्होंने देश भर में लोगों को न्योता दिया है लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है की कन्हैया कुमार के उस निमंत्रण सूची से छात्र नेता उमर खालिद का नाम ग़ायब है। कल तक छात्र नेता का नाम कन्हैया कुमार की निमंत्रण सूची में था लेकिन रात उस सूची से उमर ख़ालिद का नाम निकाल दिया गया है। CPI को डर है की कन्हैया कुमार के नामांकन में उमर ख़ालिद के आने से कन्हैया कुमार का भूमिहार वोट कट जाएगा। इसलिए भूमिहार वोट कटने के डर से उमर ख़ालिद को इस अवसर पर नहीं बुलाया गया है।
आज कन्हैया कुमार ने भी साबित कर दिया की मुसलमान सबको चाहिए लेकिन विक्टिम की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों। इस का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं की इस अवसर पर JNU के गुमशुदा छात्र नजीब की माँ फ़ातिमा नफ़ीस को तो वहाँ बुलाया गया है लेकिन कन्हैया के कभी बहुत ही क़रीबी साथी उमर ख़ालिद को नहीं बुलाया है। अब आप ख़ुद अंदाज़ा लगा लीजिए कि जिस कन्हैया को आज एक उर्दू नाम वाले उमर ख़ालिद के अपने नामांकन समारोह में सम्मिलित होने से दिक्कत महसूस हो रही है, कल उनका मसलमानों के साथ रवैया कैसा होगा।
लाल सलाम। ?
मोहम्मद ख़ालिद हुसैन
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कन्हैया बेगूसराय से ही चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं?
Anamika Singh
जबकि वो अबतक वामपंथी चेहरे के रूप पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुके हैं.दिल्ली, गुजरात से लेकर वे केरल तक भाषण देने पहुँच गए. तो ये पूरे देश मे कहीं से भी चुनाव लड़ सकते हैं.
आइये थोड़ा सा मामला समझते.
कहा जाता है बेगूसराय वामपन्थियों का अड्डा है, लेकिन वामदल वहाँ मात्र एक बार चुनाव जीती है.
जबकि नवादा, नालन्दा जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में दो या दो अधिक बार वामदल चुनाव जीतकर आयी है.2014 में राजद(लालू यादव) से मुसलमान नेता लड़े थे लेकिन हार गए.उससे पहले में जदयू(नीतीश कुमार) से मुसलमान नेता लड़े और जीत गए.
इस बार महागठबंधन से मुसलमान उम्मीदवार खड़ा करने की तैयारी है. तो मुसलमानो का सीट खाने पर क्यों तुले है कन्हैया.बिहार में कन्हैया की सच्चाई सभी भूमिहारो को पता है, वहां के सवर्ण लंठ नहीं है बाकी राज्यों के सवर्णो की तरह जो कन्हैया को देशद्रोही कह दे.
बिहार के सवर्ण चाहते हैं कि मोदी जीते पर कन्हैया भी बेगूसराय से चुनाव लड़े और जीते.
ये बात आपको खुलेआम बिहार के सवर्ण कहते हुए मिल जाएंगे.
दरअसल ये लोग सदा सदा के लिए मुसलमानो की राजनीति बेगूसराय से खत्म कर देना चाहते हैं.
बेगूसराय 20% मुसलमानो की आबादी से भरी है.यहां पर वामदल मात्र एक बार लोकसभा चुनाव 1967 में जीतती है,जबकि 1980,1984, 1989,1991,1996 और 2004 में तो वामपंथी दलों ने अपना उम्मीदवार भी नहीं उतारा.
हालांकि इसबार भी बेगूसराय में वामदल अकेले चुनाव जीत ले तो बिल्कुल सम्भव नहीं.इसलिए मीडिया जबरदस्ती बेगूसराय को वामपंथ का अड्डा और लेनिनग्राद कह कर प्रचारित किया जा रहा है.और बार बार वामदल तथा राजद से गठबंधन की फ़र्ज़ी खबरे चलाई जाती हैं.
अगर कन्हैया को वाकई वामपंथी विचारधारा पर चुनाव लड़ना है तो नवादा चुनाव क्षेत्र से लड़े जोकि भूमिहारो और यादव दबंगो का गढ़ रहा है.(यहां का यादवो में लालू यादव का कोई क्रेज नहीं है)
जय भीम और लाल सलाम का नारा भी बुलन्द होगा.
यहाँ 30% जनसंख्या दलितो की है. उन्हें कुछ बेहतर लाभ हो कन्हैया के वामपंथी विचारधारा से.जाति की बात आते ही कन्हैया छटपटाने लगते हैं.
बीबीसी द्वारा ‘बोले बिहार’ में दिए गए उनके इंटरव्यू में तो यही दर्शाता है.
इस प्रोग्राम को मोडरेट कर रही है रूपा झा जब उनसे जाति को लेकर सवाल करती हैं तो वे लेनिन की कथा सुनाने लगते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर भी जब उनसे जाति से मिलने वाली प्रिविलेज की बात करते हैं तो कन्हैया की छटपटाहट साफ नजर आती है.सवर्ण आरक्षण पर भी बिना कोई टिप्पणी नहीं है.
13 पॉइंट रोस्टर पर चुप्पी.“रवीश कुमार ने एक बात कही थी. जो जाति के मसले पर बात नहीं करना चाहता है वो सबसे बड़ा जतिवादी है”
पता नही इनका जय भीम और लाल सलाम कैसा है।
सम्वेदनाओं को हथियार बनाकर इन्होंने चुनाव लड़ने की सोची है तो जनता के लिए ये भी मोदी साबित होंगे.
रोहित वेमुला या नजीब की माँ इनके लिए वाकई बड़ा मुद्दा हैं तो इन्हें बेगूसराय से कम से कम चुनाव नहीं लड़ना चाहिए.
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उत्तरप्रदेश, मायावती और महिला: महिला सशक्तिकरण में फिसड्डी
Anamika Singh
उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी से लेकर मायावती जैसी सशक्त महिला मुख्यमंत्री दिए यूपी की जनता ने.
लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव यूपी से मात्र 14 महिला सांसद चुनी गई हैं.
फिलहाल यूपी में 80 लोकसभा सीट है,मायावती को तरह तरह के उपाधियों से नवाजा गया.
फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की 59 वीं सबसे शक्तिशाली महिला लीडर बताया.
न्यूज़वीक ने उन्हें दुनिया की 15 शक्तिशाली महिला लीडर में से एक तथा ‘बराक ओबामा ऑफ इंडिया’ भी कहा.
हालांकि अपने शासनकाल में महिला सुरक्षा देने में भी मायावती सफल हुई.
पर महिला सशक्तिकरण में फिसड्डी साबित हुई हैं.आंकड़ो पर आते हैं.?
2007 में मायावती(बसपा) आखिरी बार मुख्यमंत्री बनती हैं और इसबार मात्र 3 महिला विधायक चुनी जाती हैं.
2012 में अखिलेश(सपा) की सरकार बनती है मात्र 35 महिला विधायक चुनी जाती हैं
सपा 34 महिला प्रतिनिधि खड़ा करती है जिसमें 22 जीतकर विधायक बनती हैं
बसपा 33 कंडीडेट खड़ा करती है.2017 में सपा+कांग्रेस 33 महिला उम्मीदवार उतारते हैं
वही बसपा मात्र 20 महिला उम्मीदवारो को टिकट प्रदान करती है.
जबकि भाजपा 43 महिला को उम्मीदवारी देती है और 32 जीतकर आते हैं.भाजपा की तरफ से आनेवाली महिला उम्मीदवार किसी काम की नहीं हैं वो बस महिला के नाम पर मुखौटा है.
अब आते हैं बसपा यानी मायावती जिसकी लीडर हैं फ़िलहाल.
बसपा को कांशीराम ने बनाया. उन्होंने मायावती को कमान दी.
मायावती 4 बार यूपी की मुख्यमंत्री चुनी जाती हैं.
बसपा अम्बेडक्राइट पार्टी है अर्थात डॉ आंबेडकर के विचारों पर चलती है.
अम्बेडकर का मानना था अगर समाज में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दृढ़ हो तो समाज सभ्य हो जाएगा.लेकिन उन्हीं के विचारों को मानने वाली पार्टी ने सबसे कम महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं.
उत्तरप्रदेश में फिलहाल 403 विधानसभा की सीटे हैं.
और महिला वोटर यहां 45% के आस पास है.अगर मायावती ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट प्रदान करती तो आज बसपा यूपी की ही नहीं बल्कि भारत की सबसे बड़ी पार्टी होती.
तथा समाज काफी हद तक बदल गया होता.
मायावती के पास मौका था 403 विधानसभा उम्मीदवारों में 300 उम्मीदवार महिला उतार सकती थी.
80 लोकसभा उम्मीदवार में से 50 लोकसभा उम्मीदवार महिलाओं के खेमे में डाल देती.300 में से 50 उम्मीदवार सवर्ण पृष्ठभूमि से आनेवाली महिला.
50 मुस्लिम समाज से तथा 100 पिछड़ा और 100 दलित समाज से.कुछ इसी तरह से लोकसभा उम्मीदवारी में महिलाओं की भागीदारी तय कर देतीं.
2014 के लोकसभा चुनाव में महिला भागीदारी यूपी की देखते हैं?
बसपा- 7(जीत-0)
कांग्रेस-12(जीत-1)
सपा-11(जीत-1)
भाजपा-11(जीत-10)
अपना दल की अनुप्रिया पटेल भाजपा गठन्धन की तरफ से कैबिनेट मंत्री थीं.अगर ऐसा करती तो टकले सन्तरे के लंठो की फौज एंटी रोमियो स्क्वाड बनके प्रेमी जोड़ों को न पीटते.
पुलिस आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओ पर लाठियां न बरसाती.
शिक्षामित्रों पर लाठियां न बरसती.
और भी न जाने कितने इंसिडेंट हुए महिला उत्पीड़न को लेकर.इसबार तो मायावती ने हद कर दी है, कोई उम्मीद नहीं बची है इनसे जैसा इनका बिहेवियर रहा है.हो सकता मायावती और अखिलेश को इसके बाद अपने अम्बेडक्राइट और समाजवादी होने का अक्ल आये.
यह पोस्ट अनामिका सिंह के फेसबुक वॉल से ली गई है
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“कन्हैया कुमार खायें-पीयेँ-अघायेँ हुए सवर्णों के नेता है”
पटना का मौर्यालोक मार्केट राजनीतिक प्राणियों का चारागाह है। प्रति दिन शाम में लेखक, पत्रकार, छात्रनेता, राजनेता, शिक्षक, समाजसेवी, डॉक्टर, व्यापारी, बयूरोक्रेट इत्यादि का लगने वाला जमावड़ा बिहार की राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त है। उस जमावड़े में शामिल कुछ लोग केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने की बात करते हैं साथ में कन्हैया कुमार की जीत की भी कामना करते हैं। आप जब उनलोगों की जाति जानने का प्रयास करेंगे तब आप बखूबी समझ जायेंगे की वह किस जाति समूह के लोग हैं।
एक दिन पटना के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑफिस में बेगूसराय मंडल भाजपा के महामंत्री से भेंट हुई। वह भी जाति से भूमिहार थे। बातचीत में ऐसा लगा कि उनकी भी इच्छा थी कि कन्हैया बेगूसराय से चुनाव लड़े। आप निजि जीवन में भाजपा से सहानुभूति रखने वाले कुछ भूमिहार जाति के लोगों से बात करें। बात करने के दौरान एक बात सभी मे कॉमन होगा वह यह कि सबकुछ के बावजूद कन्हैया भाषण अच्छा करता है।मैंने यह उदाहरण इसलिए दिया है ताकि यह समझा जा सके कि कन्हैया कुमार के भूमिहार जाति से होने और बेगूसराय से चुनाव लड़ने के बीच का सम्बन्ध समझ सके। वह भले ही आवेदन देकर भूमिहार जाति में जन्म नहीं लिए हो मग़र बेगूसराय में उनकी जाति उनकी पहचान बनती जा रही है।
बीबीसी के एक कार्यक्रम में कन्हैया जाति के प्रश्न पर जवाब देते हुए कहते है कि क्या वह अपने माता-पिता बदल ले। मेरा मानना यह है कि जातीय श्रेष्ठता के प्रश्न पर इतना घुमाकर जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं है। बल्कि यह स्थापित सत्य है कि सवर्ण जाति में जन्म लेने पर लॉबी, नेटवर्किंग, मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठता इत्यादि स्वयं से विकसित होता जाता है।
इसी 15 मार्च को बिहार की राजधानी पटना में बीबीसी हिंदी के द्वारा “बोले बिहार” नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस कार्यक्रम के एक हिस्सा में कन्हैया कुमार को बतौर वक्ता बुलाया गया। कार्यक्रम को वरिष्ठ पत्रकार रूपा झा मॉडरेट कर रही थी। इस पूरे कार्यक्रम में कन्हैया कुमार ने जिस तरह से जाति के प्रश्न का उत्तर दिया वह बिल्कुल ठहलाने जैसा था।वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने जब जातीय पहचान के संदर्भ में प्रश्न किया तब कन्हैया कुमार रूस के लेनिन का उदाहरण देकर और रूस के विघटन की बात करके प्रश्न को टाल गये। जब्कि सच्चाई यही है कि रूस के भौगोलिक एवं सामाजिक संरचना में जमीन-आसमान का फ़र्क़ है। भूगोल एवं समाज का राजनीति में बड़ा हस्तक्षेप होता है।
रूस के विघटन में रूस की भौगोलिक संरचना सबसे बड़ी वजह थी। भारत के संदर्भ में उसी रूस की थ्योरी को फिट करके नहीं देखा जा सकता है। बल्कि रूस की सामाजिक संरचना में जाति जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था मग़र वहाँ की जो सामाजिक संरचना थी उसको कम्युनिस्ट सही से एड्रेस नहीं कर सकी जिसका परिणाम हुआ कि रूस से कम्युनिस्ट की सरकार चली गयी। इसलिए भारत के राजनीतिक बदलाव को रूस के सन्दर्भों में जस्टिफाई करना एक प्रबुद्ध स्कॉलर का काम नहीं है।वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार हमेशा कहते है कि जो जाति के मुद्दें पर बहस नहीं करना चाहता है वही असल जातिवादी है। इस पूरे एपिसोड में कन्हैया कुमार ने जाति वाले सवाल को टाल दिया। रूपा झा के सवाल को भी कन्हैया ने टालने का प्रयास किया। वह मानने को तैयार ही नहीं थे कि एक विशेष जाति वर्ग के होने के कारण बेगूसराय में उनको लाभ मिल रहा है। बल्कि जाति के सवाल को रात में सड़कों पर निकलने वाली महिलाओं की छेड़खानी से तुलना करके जवाब दिया।
महिला तो स्वयं में एक शोषित वर्ग है और उसी वर्ग को उदाहरण मान लेना तर्कपूर्ण नहीं है। देश भर के दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थानों में सैकड़ों रिसर्च से साबित हो चुका है कि महिला स्वयं में शोषित वर्ग है और यदि महिला दलित समुदाय से है तब दोहरा शोषण झेलती है। फिर कन्हैया जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति जाति जैसे संवेदनशील मुद्दें को इतने हल्के में लेकर कैसे चल सकते है? ग़ज़ब तो तब लगा जब हॉल में बैठें लोग कन्हैया के जवाब के बाद ताली पीट रहे थे।
जहाँ तक सवाल भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी के कमज़ोर होने का है तब कन्हैया ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकारा की कम्युनिस्ट पार्टी समाज के बदलते स्वरूप को समझकर आंदोलन का रूप नहीं बदल सकी है। मैं कन्हैया की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ। भारत कल भी जातिवादी समाज था और आज भी जातिवादी समाज है। भारत की राजनीतिक सच्चाई को तबतक नहीं समझा जा सकता है जबतक जातियों की आंतरिक राजनीति को नहीं समझ लिया जाये।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा वर्ग (Class) विभेद को मुद्दा बनाकर राजनीति किया है। जबकि होना यह चाहिए था कि कार्ल मार्क्स की उस थ्योरी को भारत में जाति में फिट करके देखना चाहिये था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाबा साहब अम्बेडकर मार्क्स और हेगेल की थ्योरी को जाति की संरचना पर फिट करके देखना चाहते थे। क्योंकि उच्च जाति में जन्म लेना एक एडवांटेज रहा है।कम्युनिस्ट आंदोलन में सबसे अधिक सहभागिता दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की रही है। लेकिन प्रतिनिधित्व हमेशा सवर्ण एवं ब्राह्मणों के हाथ में रहा। उदाहरण के रूप में बेगूसराय, चम्पारण, जहानाबाद, गया, आरा इत्यादि जिलों में भूमिहार जाति का दबदबा रहा है। बिहार में भूमिहार ही सबसे अधिक जमीन के मालिक है। दलितों का सबसे अधिक शोषण यही जाति वर्ग के लोग भी किये है। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यही है कि कम्युनिस्ट आंदोलनों के अग्रणी नेता भी शोषक समुदाय के लोग है।
समाजवादी आंदोलन के बाद लालू, मुलायम, नीतीश, पासवान जैसे नेताओं का जब उभार हुआ तब दलितों, पिछड़ों एवं मुसलमानों में प्रतिनिधित्व को लेकर एक चेतना का विकास हुआ। यही से दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कम्युनिस्ट आंदोलन से निकलकर समाजवादी राजनीति की तरफ़ शिफ़्ट हुए और नेतृत्व परिवर्तन का यही दौर था जिसे कम्युनिस्ट लोग जंगलराज से पुकारते है।
कम्युनिस्ट पार्टी में प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कन्हैया ने रामावतार शास्त्री को बड़ी चालाकी से एक यादव नेता के प्रतीक के रूप में पेश कर दिया। आज भी दूरस्थ भारत की एक बड़ी आबादी कन्हैया कुमार और रवीश कुमार को दलित समझती है। भला उस आबादी को 1967 में चुने गये सांसद राम अवतार शास्त्री की जाति कैसे मालूम होगी? हाँ, मगर 1967 के समय के लोगों को मालूम था कि राम अवतार शास्त्री यादव समुदाय से आते थे।इनसब मुद्दों पर बहस करने से पूर्व कन्हैया कुमार को थोड़ा राजनीतिक प्रतिनिधित्व (Political Representation) और राजनीतिक सहभागिता (Political Participation) के बीच के अंतर को समझना चाहिये। यह तो स्थापित सत्य है कि कम्युनिस्ट आंदोलन में शोषितों के नाम पर सबसे अधिक सहभागिता (Participation) पिछड़ी जाति, दलित, अल्पसंख्यकों की रही है।
मगर क्या सहभागिता (Participation) के अनुपात में दलित, पिछड़े एवं अल्पसंखयकों को प्रतिनिधित्व (Representation) मिला? कन्हैया ने दबे लफ़्ज़ों में यह मैसेज देने का प्रयास किया कि कम्युनिस्ट पार्टी यादव जाति के लोगों को सांसद बनाती रही है। इसलिए महागठबंधन के अगुआ तेजस्वी यादव को चाहिये कि बेगूसराय से भूमिहार कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाने के बारे में विचार करें।
एक युवा ने कन्हैया कुमार से पूर्व छात्रनेता चंद्रशेखर उर्फ चंदू और बाबहुली नेता शहाबुद्दीन साहब के संदर्भ में प्रश्न किया। कन्हैया ने एक अप्रत्याशित उत्तर दिया जिसकी उम्मीद कोई नहीं कर सकता था। कन्हैया बार-बार यह बताने का प्रयास करते रहे कि चन्द्रशेखर सीपीआई के नहीं थे बल्कि सीपीआई (एमएल) के नेता थे। अब जब चारों तरफ से वाम एकता की बात हो रही है उस समय चंदू के प्रश्न पर चंदू को सीपीआई (एमएल) से जोड़कर स्वयं को चंदू से अलग कर लेना कितना न्यायसंगत है? जब सीपीआई और सीपीआई (एमएल) आपस में मिलने को तैयार नहीं है फिर कन्हैया किस तरह के महागठबंधन में शामिल होने की कल्पना कर रहे है?क्या वह सिर्फ़ इसलिए चंदू के सवाल को टाल गये की महागठबंधन के प्रत्याशी बनने के रूप में उन्हें शहाबुद्दीन साहब के परिवार का अनैतिक समर्थन करना पड़ेगा? चन्द्रशेखर उर्फ चंदू 1990 में एमफिल के लिए जेएनयू गये। वह जेएनयू जाने से पूर्व पटना यूनिवर्सिटी के छात्र थे। वह पटना यूनिवर्सिटी में सीपीआई की छात्र विंग AISF के सक्रिय सदस्य थे। वह जब जेएनयू गये तब सीपीआई(एमएल) की छात्र विंग आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) के ढाँचा को अपनी परिश्रम से खड़ा किये थे। कन्हैया कुमार भी सीपीआई की विंग AISF के नेता है। इसलिए कन्हैया द्वारा चंदू को सीपीआई से सिरे से खारिज़ कर देना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
भक्त का विरोध करते-करते लोग कब अंधसमर्थक की फ़ौज खड़ी कर लेते है पता भी नहीं चलता है। जब जेएनयू घटना के बाद कन्हैया कुमार जेल से छूटकर कैंपस पहुँचे तब एक जोरदार भाषण दिया। कन्हैया का कहना था कि संयोग से जेल में उनको खाना लाल और नीलें रँग के कटोरे में परोसा गया। मालूम नहीं उनकी यह बात कितनी सत्य पर आधारित है, वही जाने।दरअसल, वह यह बताना चाहते थे कि भगत सिंह और बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों को साथ लेकर आगे बढ़ा जायेगा। मग़र भगतसिंह और अम्बेडकर के विचारों को एकसाथ लेकर कैसे चला जा सकता है? जब्कि भगतसिंह और अम्बेडकर के विचारों में नार्थ पोल और साउथ पोल का फ़र्क़ है। उदाहरण के रूप में (1) भगतसिंह साइमन कमीशन का विरोध कर रहे थे। जब्कि अम्बेडकर पूरा एक ड्राफ़्ट लेकर साइमन कमीशन से दलितों की हिस्सेदारी माँगने चले गये।
(2) अम्बेडकर हमेशा डेमोक्रेटिक तऱीके से क़लम को हथियार बनाकर लड़ाई लड़ने की बात करते थे। जब्कि भगतसिंह सेंट्रल हॉल पर बम फेंक रहे थे। (3) शूद्रों पर हो रहे अत्याचार के लिए अम्बेडकर ने सवर्णों एवं ब्राह्मणों को दोषी ठहराते थे इसलिए उनका मत था कि ब्रिटिश भारत में सामाजिक न्याय ब्राह्मण भारत से अधिक मिलने की संभावना है। लेकिन भगतसिंह इसबात को नकारते थे।ऐसे अनेकों वैचारिक विरोधभास है जिससे साबित होता है कि कन्हैया कुमार के सामाजिक रूप से विशेष सुविधा प्राप्त सवर्णों के नेता है। यदि ऐसा नहीं होता तब वह सामाजिक न्याय को मज़बूती प्रदान करने के लिए बेगूसराय से मुहिम छेड़ते और कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर ही किसी दलित या पिछड़े या अल्पसंख्यक समाज के किसी नेता को मज़बूती से समर्थन देकर चुनाव लड़ाते। इससे सहभागिता के अनुपात में प्रतिनिधित्व भी बढ़ता और सामाजिक न्याय की विचारधारा भी मज़बूत होती। साथ में कम्युनिस्ट पार्टी की विश्वसनीयता भी वापस लौटती।
तारिक़ अनवर चम्पारणी
(लेखक, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुम्बई से दलित एंड ट्राइबल स्टडीज में मास्टर इन सोशल वर्क, MSW, हैं और वर्तमान में बिहार में किसानों के साथ काम कर रहे हैं)
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पर्यटन और पुरातत्व विभाग कर रही है पीर शाहनूर शाह माजार शरीफ का अनदेखा।एकता,मजहबी भाईचारा का प्रतीक है माजार
पर्यटन और पुरातत्व विभाग कर रही है पीर शाहनूर शाह माजार शरीफ का अनदेखा।एकता,मजहबी भाईचारा का प्रतीक है बारपेटा जिला के भेल्ला खन्दकारपारा गांव के पीर हजरत शाहनुर शाह देवान माझार शरीफ।
चाईजुर रहमान/मिल्लत टाइम्स,आसाम:आसाम के बारपेटा जिला के अन्तर्गत भेल्ला खन्दकारपारा गांव के पीर हजरत शाहनुर शाह देवान का माझार शरीफ सौ सौ सालो से एकता, मजहबी भाईचारा का प्रतीक बनकर खड़ा है। 15 सौ शताब्दी मे बगदाद शरीफ से आये पीर आउलीया शाहनुर शाह देवान साहाब ने यहा द्वीन ईसलाम का शान्ति के वाणी प्रचार की थी। उसके लाखो तादाद के भक्त बने थे।
पीर सहाब द्वारा ईसलाम के वाणी सुनकर आसपास के बहुत सारे गांव के लोगो ने ईसलाम कबुल किये थे। गौरतलब है कि उस समय पुरे आसाम मे आहोम का राज था और आहोम राजा शिवसिंह भी पीर हजरत शाहनुर शाह देवान साहाब का मुरीद बने थे। आहोम राणी तथा नि:सन्तान फुलेश्वरी को पीर साहाब की दुआ से सन्तान प्राप्त हुआ था। बहुत सालो तक यहा पर रहने के बाद पीर साहाब इसी जगह पर इन्टेकाल की थी। उस समय से पीर साहाब के माझार मे जियारत करने के लिए हिन्दू, मुस्लिम, सिख हर समुदाय के लोग आते है।
देश के मुम्बई, दिल्ली से भी लोग यहा शिरकत करके जियारत करते है। मोहरम महीने मे लोगो का तादाद काफी ज्यादा होते है। माझार के साथ यहा एक मस्जिद और मादारचा भी है। मादारचा मे आसाम के विभिन्न जगह से तालेबा द्वीन ईसलाम का ज्ञान हासिल कर रहे है । दुख और दुर्भाग्य की बात यह है कि पर्यटन और पुरातत्व बिभाग का नजर अभीतक नही पड़ा है इस एतिहासिक जगह पर। अगर सरकार मदद के लिए आगे आए तो बहुत ही सुन्दर पर्यटन स्थल बन सकते है। स्टूडेंट्स की गवेषणा का विषय भी बन सकता है पीर आउलीया शाहनुर शाह देवान का यह माझार शरीफ।
