Category: राजस्थान

  • कांग्रेस हाईकमान गहलोत की जीद के आगे नतमस्तक होने की बजाय कांग्रेस सरकार बचाये रखने के विकल्प तलास करे।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    मध्यप्रदेश की सरकार के तत्तकालीन मुखिया कमलनाथ व दिग्विजय सिंह की जीद का कांग्रेस हाईकमान ने साथ देकर मध्यप्रदेश की सरकार गिरने के बाद राजस्थान सरकार के मुखिया अशोक गहलोत की जीद के आगे भी अब नतमस्तक होकर कांग्रेस हाईकमान को राजस्थान की सरकार गवाने के बजाय सरकार बनी रहने के विकल्प पर मंथन करके सरकार बचाये रखने पर अंतिम फैसला नये विकल्प पर ले लेना चाहिए।

    स्पीकर जौशी द्वारा सुप्रीम कोर्ट मे दायर एसएलपी को वापस ले लिया है। वही कांग्रेस ने राजस्थान के राजभवन पर आज के प्रदर्शन करने के ऐहलान के बाद वहा प्रदर्शन करना रद्द कर दिया है। राज्यपाल द्वारा कल उक्त कांग्रेस प्रदर्शन को लेकर डीजीपी यादव व मुख्य सचिव राजीव को राजभवन तलब करके इंतजाम के बारे मे पुछने के बाद गहलोत खेमे को अपनी गलती का अहसास होने पर उन्होंने राजभवन की बजाय बाड़ेबंदी मे बंद विधायक वाली होटल मे ही विरोध सभा करने का तय करने से कांग्रेस खेमे मे बैचेनी होना साफ नजर आ रहा है।

    कांग्रेस नेताओं द्वारा बार बार भाजपा पर लोकतंत्र को कमजोर करने के लिये लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करने के आरोप लगाये जाते रहे है। हो सकता है कि इस आरोप मे कुछ हद तक सच्चाई भी हो। पर मदन दिलावर द्वारा बसपा विधायकों के विलय के खिलाफ स्पीकर सीपी जोशी के यहां लगाई याचिका पर बीना उनका पक्ष जाने उसको निरस्त करने व उस निर्णय की कापी तक उपलब्ध नही करवाने को लोकतंत्र मे कांग्रेस कहा तक जायज मान रही है। जबकि उक्त निर्णय की कोपी तक लेने के लिये विधायक को धरने पर बैठना पड़ रहा है।

    इधर गहलोत मंत्रीमंडल द्वारा विधानसभा का सत्र बूलाने का अधकचरा निवेदन पत्र दो दफा राजभवन भेजनै के बाद राज्यपाल द्वारा कुछ क्योरीज के साथ वापस लोटाने से कांग्रेस रणनीतिकारों की किरकिरी होना देखा जा रहा है। गहलोत खेमे द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटाखटाने पर उन्हे किसी तरह की राहत नहीं मिलते देख रणनीति मे बदलाव करते हुये जनता मे जाकर आंदोलन करने का तय किया बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि अधिकांश विधायक अभी चुनाव मे जाना नही चाहते है। पर गहलोत की चल रही रणनीति से लगता है कि राजस्थान मे बिहार चुनाव के साथ मध्यवर्ती चुनाव हो सकते है। पंखवाड़े से अधिक समय से बाड़ेबंदी मे बंद विधायकों के प्रति उनकी क्षेत्र की जनता मे अंसतोष पनप रहा। असंतोष अगर चरम पर पहुंच गया तो जनता होटल को घेरकर अपने विधायको को बाड़ेबंदी से मुक्त कराने की तरफ भी बढ सकती है। कांग्रेस हाईकमान को पल पल बदलते राजनीतिक हालात पर मंथन करके अशोक गहलोत की जीद के आगे नतमस्तक होने की बजाय सरकार बचाये रखने के विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

  • राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे स्वयं फंसते नजर आ रहे है।

    गहलोत की कोराना काल मे सरकार चलाने की बजाय कांग्रेस के 19-विधायकों की सदस्यता रद्द करवाने मे अधिक रुचि।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    1998 मे दिल्ली हाईकमान से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री का पद पहली दफा पाने वाले अशोक गहलोत ने तब से लेकर अब तक प्रदेश के जनाधार रखने वाले दिग्गज कांग्रेस नेताओं को एक एक करके धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाते रहने से कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली जाने के बावजूद 2018 मे फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गहलोत ने अपने पुराने रवैये के मुताबिक सचिन पायलट को राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाने का जो जाल बूना उसमे गहलोत स्वयं व उनके कारण कांग्रेस पार्टी फंसती नजर आ रही है।

    2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव परिणाम के मुताबिक कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंचने पर जनता की भावनाओं के विपरीत दिल्ली मे मोजूद कांग्रेस के कोकस से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री पद पाने के बाद हमेशा की तरह ब्यूरोक्रेसी के मार्फत सचिन पायलट व उनके समर्थक मंत्रियों को असरहीन करने की भरपूर गहलोत ने कोशिशे की। लेकिन मुख्यमंत्री की उक्त कोशिशों को पायलट व समर्थक विधायक सब समझते हुये सब्र से काम लेते हुये सरकार को पांच साल तक चलाना चाहते थे। पर गहलोत ने विभिन्न धाराओं के साथ स्वयं के मंत्री व कांग्रेस विधायकों के खिलाफ अंग्रेजी राज के समय के बने काले कालून देश द्रोह कानून की दफा 124-A का उपयोग करते उन्हें आरोपी बनाया तो वो सभी नेता दिल्ली हाईकमान को अपनी भावनाओं से अवगत करवाने जाने पर मुख्यमंत्री ने बीना वजह ऐसा माहोल बनाया कि दिल्ली गये सभी कांग्रेस विधायक बागी हो गये है। यानि उनके खिलाफ माहोल बनाने के लिये अपने समर्थक विधायको की बाड़ेबंदी करके पायलट समर्थकों को पहले जिन नेताओं को साईडलाईन किया उसी तरह उनको भी साईडलाईन करने की कोशिशें की पर गहलोत उस कोशिश मे अभी तक कामयाब नही हो पाये है।

    मुख्यमंत्री गहलोत अपनी रणनीति के तहत लगातार सचिन पायलट पर भाजपा से मिलकर सरकार गिराने का आरोप लगाकर उनको अलग थलग करने की उम्मीद दिल मे पालकर जनता से सहानुभूति पाने की भरपूर कोशिशे करना जारी रखा हुवा है। वही सचिन पायलट ने अपने आपको अभी तक कांग्रेस मे होना व कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य दल मे नही जाने का लगातार कहना जारी रखने के बावजूद गहलोत ने सचिन पायलट व कुछ मंत्रियों को मंत्रीमंडल से जल्दबाजी मे बरखास्त करने व अध्यक्ष पद से हटाने के बाद सुलह की गुंजाइश को एक तरह से आंशिक रुप से खत्म करने मे सफलता जरूर पा ली है।

    मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा बूने जाल के तहत मुख्यमंत्री आवास व होटल मे कांग्रेस विधायक दल की बैठक बूलाई जिसमे उन 19-विधायकों के शामिल नही होने की शिकायत को लेकर मुख्य सचेतक महेश जौशी विधानसभा स्पीकर के पास गये एवं स्पीकर ने चंद घंटो मे उन्हें नोटिस जारी कर नोटिस की तामिल प्रशासन की मदद से घरो पर चिपका कर करने की कोशिश की। असल मे गहलोत इस बहाने उन 19 कांग्रेस विधायकों की सदस्यता रद्द करवाने चाहते थे लेकिन उनकी मंशा को भांपकर वो 19-विधायक उस नोटिस के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय की शरण मे चले गये जहां उस पर स्टे हो जाने के बाद फायनल जजमेंट तक मामला विचाराधीन है। लेकिन स्पीकर के नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट मे सुनवाई होने के बावजूद स्पीकर सुप्रीम कोर्ट गये जहां सुनवाई हो रही है।

    मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा अपनी सरकार के प्रत्येक कार्यकाल मे सत्ता मे सबकी हिस्सेदारी तय करने की बजाय हमेशा सत्ता को अपने इर्द गिर्द कायम रखा है। बोर्ड-निगम व आयोगो का गठन एवं संवेधानिक पदो पर नियुक्ति या तो की नही। अगर कुछ नियुक्ति व गठन किये तो सरकार के जाते समय अपने कार्यकाल के अंतिम दौर मे किये जो सरकार बदलते ही हटा दिये जाते रहे है। गहलोत की उक्त कार्यशैली के कारण भी आम कार्यकर्ताओं मे उदासीनता व असंतोष का आलम छाता रहा है।

    जब गहलोत का फेंका हर पाशा पहली दफा उनके उलटा पड़ने लगा तो उन्होंने हड़बड़ी मे कुछ ऐसे कदम उठा लिये जो अब तक बनाई गई उनकी कथित छवि के विपरीत व असल रुप के अनुसार पाई गई। मुख्यमंत्री गहलोत के अपनी सरकार चलाने की बजाय विधायकों को होटल मे बाड़ेबंदी मे रखने के अलावा किसी तरह उन 19-विधायकों की सदस्यता रद्द कराने मे अधिक रुचि होना देखा गया जो अभी तक संभव नही हो पाया है। सड़क से राजभवन तक कोशिश करने के साथ राजभवन की सुरक्षा को लेकर धमकाने वाले ब्यान से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। विधायकों को साथ लेकर राजभवन जाकर वहां धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी करना उनमे बोखलाहट होना दर्शाता है। इससे पहले अपने साथी रहे पायलट को नकारा व निकम्मा तक बताने से तो साफ लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत अब आपा खोते जा रहे है।

    कांग्रेस द्वारा पहले 27-जुलाई को राजभवन पर प्रदर्शन करने का ऐहलान किया। उस ऐहलान के बाद राज्यपाल ने जब डीजीपी यादव व मुख्य सचिव राजीव को राजभवन तलब करके हालात जाने तो कांग्रेस ने भारत के एकमात्र जयपुर स्थित राजभवन पर प्रदर्शन नही करने का कहकर बाड़ेबंदी मे मोजूद विधायकों वाली होटल मे ही विरोध सभा करने का ऐहलान घबराहट मे कर दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने 2008 के शासन की तरह इस दफा भी बसपा के छ विधायकों को कांग्रेस मे शामिल कर लिये जाने के बाद विलय को विधान विरोधी बताते हुये बसपा व विधायक दिलावर पहले स्पीकर के पास याचिका लेकर गये फिर माननीय न्यायालय मे याचिका लेकर गये है, जहां सुनवाई होनी है। इसके अतिरिक्त बसपा के राष्ट्रीय महामंत्री सतीशचंद्र मिश्रा ने उक्त बसपा के सभी विधायकों को विधानसभा मे कांग्रेस के बहुमत प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के खिलाफ पाबंद किया है। उक्त मामले को लेकर दायर याचिका व मिश्रा द्वारा बसपा विधायकों को व्हीप जारी करके पाबंद करने से कांग्रेस खेमे मे भारी खलबली मचना देखा जा रहा है।

    मुख्यमंत्री गहलोत व कांग्रेस पार्टी बार बार बहुमत होने का दावा करने पर जनता के मध्य सवाल उठने लगने लगे है कि अगर बहुमत है तो वो आराम से सरकार चलाये उन्हें कोन रोक रहा है। लेकिन फिर भी वो कोविड के प्रदेश मे आसमान छुते आंकड़े व रोजाना एक हजार से अधिक पाये जाने वाले कोराना पोजीटिव मरीजों के बावजूद सरकार को होटल मे बंद कर रखा है।जबकि विधायकों का मुश्किल समय मे उनके क्षेत्र की जनता बेसब्री से इंतजार कर रही है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे गहलोत-पायलट खेमो मे बंटे कांग्रेस विधायकों के बाद जारी आपसी संघर्ष मे गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे फंसते नजर आ रहे है। sog व acb एवं 124-A का अपने ही लोगो के खिलाफ उपयोग करने के अतिरिक्त अपनी खामियो को छुपाने के लिये सारे इल्जाम भाजपा पर लगा कर सहानुभूति पाने की कोशिश से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ता नजर आ रहा है। अपनी कमजोरी छुपाने के लिये अपने ही साथी को नकारा व निकम्मा बता देने के बाद जनता मे गहलोत को लेकर अलग तरह की बहस छिड़ चुकी है। जिस तरह कांग्रेस हमेशा भाजपा व संघ का डर दिखाकर मुस्लिम समुदाय को वोटबैंक की तरह उपयोग कर उनके हितो पर कठोराघात करती आई है। उसी तरह अशोक गहलोत भी वर्तमान राजनीतिक घटनाटक्रम मे अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालकर अपने आपके मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये हर बात का इल्जाम भाजपा पर लगाने से नही छुकते हुये भावनाओं से खेलने की रणनीति अपना रहे है। जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि अगर स्वयं को सर्वेसर्वा बनाये रखने की इच्छा के तरह परिवार के सदस्य को नाहक कुचलनै की कोशिश मे परिवार मे अगर फूट पड़ती है तो जहां तक संभव हो पाता है उतना विरोधी भी लाभ उठाने की भरपूर कोशिश करते ही हमेशा आये है। अभी भी समय है कि गहलोत को अपने मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये अड़यल रुख को त्याग कर कांग्रेस को बचाये रखने के लिये किसी तीसरे नेता को मुख्यमंत्री क्षका पद देकर पार्टी मे एकता व मजबूती बनाये रखने के लिये आगे आना चाहिए।वरना प्रदेश मे कांग्रेस के लिये हालात साजगार साबित नही होंगे।

  • राजस्थान मे लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस उम्मीदवार रहे नेता व पूर्व सांसद राजनीतिक घटनाटक्रम मे नई करवट ले सकते है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    लोकसभा चुनाव मे राजस्थान की सभी पच्चीस सीटो से चुनाव लड़ चुके कांग्रेस उम्मीदवारों मे से दो-चार को छोड़कर अधिकांश उम्मीदवार प्रदेश मे पल पल घट व बदल रहे राजनीतिक घटनाटक्रम पर नजर रखते हुये अपनी महत्ती भूमिका अदा करने का तय करके राजनीतिक करवट लेकर मोजुदा समय मे अहम किरदार निभा सकते है।

    राजनीतिक सुत्र बताते है कि कांग्रेस से जुड़े अधिकांश लोकसभा उम्मीदवार व पार्टी से जुड़े पूर्व सांसद जयपुर मे जल्द एक बैठक करके मोजूदा राजनीतिक घटनाटक्रम पर मंथन करके व्यू रचना बनाकर उस पर अमल कर सकते है। प्रदेश मे माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अब केन्द्र सरकार से सीधा टकराव होने की सम्भावना पूरी तरह बन चुकी है। वही कांग्रेस विधायक भी कम ज्यादा तादाद मे दो भागो मे बंट चुके है। गहलोत सरकार बहुमत सिद्ध करे या अल्पमत मे आये या फिर राष्ट्रपति शासन लगे। लेकिन सम्भवतः चालू वर्ष के आखिर मे बिहार चुनाव के साथ राजस्थान मे भी मध्यवर्ती विधानसभा चुनाव होना माना जा रहा है।

    राजस्थान के राजनीतिक घटनाटक्रम के तहत कांग्रेस विधायक गहलोत-पायलट खेमो मे विभक्त होकर होटल्स मे कैद हो चुके है। वही लोकसभा चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों व कांग्रेस पार्टी से जुड़े पूर्व सांसद एक जगह बैठकर मोजुदा राजनीतिक संकट मे नया कुछ कर सकते है। इनमे से अनेक उम्मीदवार तो काफी मजबूत व सीनियर लीडर्स की श्रेणी मै
    मे आते है।

  • मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे को लग सकता है बडा झटका।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे शामिल कराने को लेकर भाजपा विधायक मदन दिलावर व बसपा ने पहले स्पीकर के यहा 16-मार्च को शिकायत करके बसपा विधायको के कांग्रेस मे विलय को गलत करार देते हुये प्रार्थना करने पर जब स्पीकर सीपी जोशी द्वारा अभी तक उस पर निर्णय नही लेने के पश्चात आखिरकार मदन दिलावर ने उक्त मामले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय मे दिलावर व बसपा द्वारा दायर याचिका पर 27-जुलाई को सुनवाई होनी है।

    हालांकि न्यायालय का उक्त याचिका पर सुनवाई के बाद जो निर्णय आयेगा उसके बाद बसपा विधायको के अस्तित्व पर प्रभाव पड़ना तय है। लेकिन हाईकोर्ट मे दिलावर द्वारा उक्त प्रकरण को लेकर दायर याचिका के बाद कानून के जानकार व राजनितिज्ञ उक्त प्रकरण को लेकर चर्चा करने जरुर लगे है। अगर न्यायालय का आदेश विलय प्रक्रिया के खिलाफ आता है तो बसपा विधायको की सदस्यता पर भी सवाल खड़े हो सकते है। अगर उक्त छ विधायकों की विलय प्रक्रिया की खामियों के कारण सदस्यता रद्द होती है तो मुख्यमंत्री खेमे द्वारा अब 102 विधायको का समर्थन होना जताया जा रहा उस संख्या बल मे कमी आने से गहलोत खेमे को बडा झटका लग सकता है।

    कुल मिलाकर यह है कि बसपा विधायकों के कांग्रेस मे विलय होने को लेकर मदन दिलावर व बसपा द्वारा 16-मार्च को स्पीकर सीपी जौशी के यहा चुनौती देने के चार महिने तक जौशी द्वारा निर्णय नही लेने के पश्चात आखिरकार दिलावर ने उच्च न्यायालय मे याचिका दायर करने के पश्चात सोमवार 27-जुलाई को सुनवाई होना तय हुवा है।

  • मुख्यमंत्री गहलोत ने विधायकों को छोड़कर सत्ता सूख से संगठन व सांसदो को कभी तरजीह नही दी।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने खिलाफ विधायको मे बगावत के सूर नही निकलने इसलिए सभी विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के पंचायत-निकाय चुनाव की टिकट देने के अलावा पसंद के डिजायर प्रथा के मार्फत सरकारी कार्मिक लगाने के अतिरिक्त सभी तरह के विकास के काम उनकी मर्जी से होने की पूरी छूट दे कर उन्हें भरपूर सत्ता का सूख भोगने की परिपाटी जो 1998 मे डाली वो आज भी जारी कर रखी है। लेकिन अबकी दफा सचिन पायलट के विधायक-मंत्री बनकर सत्ता सूख भोगने की बजाय मुख्यमंत्री बनकर सत्ता अपने हिसाब से चलाने का दावा ठोके रखने का परिणाम यह निकला कि सत्ता के दो पावर सेंटर कायम होने के चलते विधायकों मे मुख्यमंत्री के प्रति आक्रोश लगातार पनपते जाने पर आज पायलट के नेतृत्व मे विधायकों ने राजस्थान मे नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर जो कदम उठाया है उससे सरकार लड़खड़ाने लगी है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने अब तक के सभी मुख्यमंत्री कार्यकाल मे संगठन के प्रदेश पदाधिकारियों सहित जिलाध्यक्ष व लोकसभा सभा सदस्य या कांग्रेस की तरफ से लोकसभा उम्मीदवार रहे नेताओं को सत्ता सूख से हमेशा कोसो दूर रखने की रणनीति को अपनाये रखा है। इन सब नेताओं के मुकाबले विधायकों को सत्ता पूरी तरजीह देकर सर्वेसर्वा बनाये रहने से कांग्रेस संगठन व नेताओं सहित आम कार्यकर्ताओं मे कांग्रेस की सरकार रहने के बावजूद जब इनकी छवनी जब एक पैसे मे भी नही चली तो उनमे उदासीनता आने से गहलोत के मुख्यमंत्री रहते आम विधानसभा चुनाव होने पर कांग्रेस हमेशा ओधे मुह गिरती आई है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने नेतृत्व वाली सरकार मे केवल मात्र विधायकों को खूश करने का एक अलग तरह की परिपाटी का जो चलन शुरु कर रखा है जिसके तहत विधानसभा के दोसो कांग्रेस उम्मीदवारो को तो सत्ता मे पूरी तरजीह दी। वही दोसो के मुकाबले कांग्रेस के पच्चीस लोकसभा उम्मीदवारों को रत्ती भर भी तरजीह नही देने का ही परिणाम यह निकला कि आज संकट की घड़ी मे वो सभी पच्चीस उम्मीदवार किसी भी तरह की मुख्यमंत्री के फेवर मे भूमिका निभाते नजर नही आये। या फिर वो सभी भूमिका निभाने मे सत्ता संघर्ष के चले नाटक मे सक्षम नही हो पाये। अगर मुख्यमंत्री गहलोत विधायकों के साथ साथ लोकसभा का चुनाव लड़े कांग्रेस उम्मीदवारों व संगठन के ओहदेदारों को सत्ता सूख मे चाहे विधायकों से कम लेकिन उन्हें भी अहमियत देते तो वो सभी नेता आज उनकी ढाल बनकर संकट के दौर मे साथ खड़े नजर आते।

    राजस्थान मे आम विधानसभा चुनाव के पहले होने के कारण अधिकांश लोकसभा उम्मीदवारों ने कांग्रेस के विधानसभा उम्मीदवारों को विजयी बनाने के लिये अपनी पूरी ताकत को झोंक कर कोशिश करने का परिणाम ही आया कि प्रदेश मे कांग्रेस की सरकार गठित हो पाई। इसके विपरीत गहलोत के नेतृत्व मे सरकार गठित होने के बाद जब लोकसभा चुनाव हुये तो उस चुनावों मे विधायक व विधानसभा उम्मीदवारों ने सत्ता के नशे मे सत्ता सूख मे अन्य को भागीदारी ना देने की मानसिकता के चलते लोकसभा चुनाव मे उदासीन रहकर काम किया बताते। अगर उक्त लोग अपने चुनाव की तरह लोकसभा उम्मीदवार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करते तो प्रदेश मे बालाकोट-पुलवामा मामले के बावजूद 8-10 कांग्रेस से सांसद विजयी होते। एवं चुनाव हार का मंत अंतर भी निश्चित बहुत कम होता।

    कुल मिलाकर यह है कि आठ विधानसभाओं पर बना एक लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी अपनी कुछ ना कुछ राजनीतिक हेसियत जरुर रखता होगा। मुख्यमंत्री ने सरकार व अपना नेतृत्व बचाये रखने के लिये समर्थक विधायको को एक पखवाड़े से होटल मे बंद करके रख रखा है। जबकि सचिन पायलट सहित 19 कांग्रेस विधायक नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर राजस्थान के बाहर अज्ञात स्थान पर डेरा डाले हुयै है। ऐसे हालात मे मुख्यमंत्री की पहल व पसंद के मुताबिक पायलट को सभी पदो से हटाकर उनकी जगह नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया है। पायलट समर्थक दो मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। पूरी प्रदेश कांग्रेस कमेटी व उसके अग्रिम संगठनों को भी भंग कर दिया गया है। युवा-एनएसयूआई व सेवादल के प्रदेश अध्यक्ष बदल दिये गये है। फिर भी कांग्रेस सरकार पर आया संकट अभी टला नही है। बल्कि दिन ब दिन संकट पेचीदा होता जा रहा है।

  • राजस्थान:मुस्लिम समुदाय की बेटियों ने सीनियर (आर्ट) परीक्षा परिणाम मे कामयाबी का परचम लहराया।

    सुरेय्या ने 98.80 व मुस्कान ने 95 व निमरा ने 95.60 प्रतिशत अं पाये।

    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक तौर पर पीछड़े माने जाने वाले कलंक को अब लड़को से कई गुणा आगे बढकर बेटियों के आ रहे परीक्षा परिणामो को देखकर लगता है कि बेटियों ने उस कलंक को मिटाने का अब निश्चय कर ही लिया है।

    हालही मे माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान के सीनियर कक्षा के परिणामों पर नजर दौड़ाये तो पाते है कि बडी तादाद मे मुस्लिम बेटियो ने 90-95 प्रतिशत अंक ही नही अनेको ने तो 95- से 99 प्रतिशत अंक से पास करते हुये नये कीर्तिमान बनाये। अनेक शिक्षक बताते है कि विज्ञान संकाय मे उक्त तरह के हायर नम्बर मिलते रहने देखा जाता रहा है। पर अब आर्ट विषय मे भी उक्त तरह के हायर अंक पाना बेटियों द्वारा कीर्तिमान कायम करना ही है।

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान द्वारा आज जारी सीनियर आर्ट विषय का परीक्षा परिणाम जारी करने पर प्रांत भर की हजारों मुस्लिम बेटियो ने अच्छे अंक लाकर जो समुदाय के माथे पर अशिक्षा का कलंक मिटाने की सफल कोशिश की है। उनमे से कुछ उदाहरणो पर नजर डालते है तो पाते है कि झालावाड़ जिले के पिड़ावा कस्बे की सरकारी बालिका स्कूल की छात्रा सुरेय्या खान ने 98.80 अंक पाये है। वही सीकर जिले के कासली गावं की बेटी मुस्कान खान ने 95.00 प्रतिशत अंक पाये है। एवं उसी की चचेरी बहन निमरा बानो ने 95.60 प्रतिशत अंक पाये है।

    कुल मिलाकर यह है कि सीनियर आर्ट के आज आये परीक्षा परिणाम मे सुरेय्या, मुस्कान व निमरा नामक बेटियां मात्र उदाहरण के तौर पर देखी जा सकती है। हजारो बेटियां ऐसी है जिन्होने 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाकर समुदाय के सामने एक नजीर पेश की है कि अगर समाज बेटियो की शिक्षा पर अधिकाधिक फोकस करके उनको भी सुविधाएं व गाईडेंस प्रदान करे तो वो वतन की खिदमात बेहतर ढंग से अंजाम देने को तैयार है।

  • मुख्यमंत्री गहलोत के बोल से आज पूरी कांग्रेस की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    प्रदेश मे पायलट-गहलोत के मध्य बंटती नजर आ रही कांग्रेस एवं रोजाना घटते राजनीतिक घटनाक्रमो के चलते राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज पत्रकारों से मिलतें हुये राजस्थान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट पर आरोपो की झड़ी लगाते हुये उनको नकारा व निकम्मा तक बता दिया। निकम्मा व नकारा बताने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे है कि कांग्रेस पार्टी के सविधान अनुसार किसी भी प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति करने से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष व शीर्ष नेतृत्व कण्डीडेट की उपयोगिता व काबलियत का सो दफा आंकलन करके मनोनयन करता है। मुख्यमंत्री गहलोत ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को नकारा व निकम्मा बताकर एक तरह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की क्षमता पर ही गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आज पत्रकारों को सम्बोधित करते हुये अपनी छवि के विपरीत बोलते हुये काफी दवाब मे नजर आये। मुख्यमंत्री ने कहा कि वो राजस्थान मे मुख्यमंत्री बन कर आये है वो कोई बैंगन व सब्जी बेचने नही आये है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज की अपनी प्रैस कांफ्रेंस मे सचिन पायलट व भाजपा नेताओं पर अनेक गम्भीर आरोप लगाये है। शाम होते होते भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनीया ने मुख्यमंत्री को चैलेंज करते हुये कहा कि उनके स्वयं व राठौड़ के दिल्ली जाकर बागी विधायकों से मिलने का आरोप सरसर गलत है। चाहे तो इस मामले की सीबीआई जांच करा ली जाये। दुसरी तरफ गहलोत द्वारा पायलट पर लगाये आरोपों पर स्वयं सचिन पायलट ने ज्यादा कुछ नही कहा पर दुख होना बताया। पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह व हेमाराम चोधरी ने वीडियो जारी करके मुख्यमंत्री को घेरते हुये उनके द्वारा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट पर आरोप लगाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।

  • राजस्थान के राजनीतिक घटनाटक्रम के लिये अगला सप्ताह महत्वपूर्ण होगा।

    अधिकांश राजनीतिक पण्डित गहलोत द्वारा बहुमत सिद्ध करना मान रहे है लेकिन ऊंट आखिर समय तक किसी भी करवट बैठ सकता है।

    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर
    पिछले दस दिन से राजस्थान की राजनीति मे अचानक आये भूचाल के कुछ हदतक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने के लिये अगला सप्ताह काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। बीटीपी के दो विधायको व एक माकपा से निलम्बित विधायक के साथ आने के अलावा दस निर्दलीय विधायकों का स्पोर्ट पुख्ता होने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब सदन मे बहुमत सिद्ध करने के साथ बगावत कर चुके विधायकों के सामने दुविधा की स्थिति खड़ी करना चाहते है ताकि उनके प्रस्ताव के समर्थन मे पायलट समर्थक विधायक मतदान करके सदस्यता बचाये या फिर खिलाफ मतदान करने पर सदस्यता खत्म करवाये।

    हालांकि राजनीतिक पण्डित मुख्यमंत्री गहलोत के पास 102 विधायको का समर्थन मानकर चल रहे। जिनमे अस्पताल मे गम्भीर रुप से बीमार भर्ती मंत्री भंवरलाल मेघवाल व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जौशी को भी गिनती मे शामिल करके चल रहे है। इसके अलावा दुसरी तरफ भाजपा व रालोपा के 75, कांग्रेस के बागी 19 व 3 निर्दलीय विधायकों को मिलाकर कुल 97-विधायक की गिनती बैठती है। माकपा का दूसरा विधायक गिरधारी महिया तटस्थ रह सकता है। पर वो गहलोत खेमे के साथ अभी तक जाता नजर नही आ रहा है। विधानसभा अध्यक्ष भी तभी मतदान कर पायेगा जब दोनो तरफ बराबर बराबर वोट आये। इसी तरह गहलोत खेमे के पक्ष मे विधानसभा अध्यक्ष व मंत्री भंवर लाल मेघवाल का मत पड़ना मुश्किल होगा। इन दो मतो को हटा देते है तो गहलोत के पास सो मत की तादाद बचती है। दुसरी तरफ 97 विधायक बचते है। यानि फर्क केवल तीन मत का रहेगा। अगर दो मत गहलोत खेमे से अलग ह़ो कर पायलट खेमे की तरफ आते ही सरकार गिर सकती है। तब गिरधारी महिया तटस्थ रहे।

    जयपुर की होटल मे बैठे मुख्यमंत्री गहलोत खेमे के विधायको मे एक दर्जन के करीब विधायक ऐसे है जो एक दम चुपचाप बैठकर सबकुछ देख रहे है। कुछ विधायक तो ऐसे भी है जो अपने पिताओ की राजनीतिक हत्या का आरोपी अशोक गहलोत को मानते रहे है। उन विधायकों के पिता विधानसभा से बाहर रहकर बदलते सभी हालात पर नजर लगाये हुये है। जो अंतिम समय पर फैसला लेकर अपने पूत्र-पूत्री विधायको को खास हिदायत दे सकते है। इसके विपरीत माकपा के दोनो विधायक का एक तरफ मतदान होना कतई नही होगा। हो सकता है कि माकपा को दोनो मत एक दूसरे मत का प्रभाव बराबर कर दे।

    गहलोत-पायलट के मध्य चल रहे राजनीतिक घटनाटक्रम मे किसी ना किसी रुप मे भाजपा भी शामिल होती नजर आ रही है। SOG व ACB अपने यहां दर्ज शिकायतो के बाद जानच करने के रुप मे शामिल है। वही चिहे पर्दे के पिछे से सही आयकर विभाग ने भी गहलोत समर्थकों के यहां रेड डाल चुका है। वही टेलीफोन टेपिंग मामले को लेकर CBI के भी आने की सम्भावन नजर आने लगी है। कांग्रेस ने SOG व ACB विभिन्न रपट दर्ज करवाई है। दुसरी तरफ भाजपा ने भी कांग्रेस नेताओं के खिलाफ पुलिस मे शिकायत दर्ज करवाई है। वही बसपा अध्यक्ष ने घटे राजनीतिक घटनाटक्रम पर बोलते हुये राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उक्त सब घटनाटक्रम से लगता है कि राष्ट्रपति शासन की सिफारिश होने के लिये भूमिका तैयार की जा रही बताते है।

    विधानसभा अध्यक्ष द्वारा महेश जौशी की शिकायत पर जिन 19 कांग्रेस विधायकों को नोटिस देकर जवाब मांगा था। उसके खिलाफ उन विधायकों के कोर्ट चले जाने पर उनकी 20-जुलाई (सोमवार) को सुनवाई होनी है। सुनवाई मुकम्मल होकर कल जजमेंट आता है या फिर आगे डेट मिलती है। यह सबकुछ कल ही पता चल पायेगा। सुनवाई के दो-तीन दिन बाद मुख्यमंत्री सदन का सत्र बुलाकर बहुमत सिद्ध करने की कोशिश कर सकते है। लेकिन बहुत सिद्ध होना जीतना आसान मानकर चल रहे है। उतना आसान कतई नही है। कुछ विधायकों के सीने मे उस बात की आग सुलग रही है जिनके पिताओ की राजनीतिक हत्या अशोक गहलोत के हाथो हुई बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि गहलोत खेमे के होटल मे ठहरे अधिकांश विधायक गाने गाकर, खेल खेलकर, फिल्में देखकर व इटालियन खाना बनाने की विधि सीखकर कोराना काल मे भी जीवन का आनंद ले रहे है। वही कुछ विधायक फोटो व वीडियो से दूर मनोरंजन करने से पुरी तरह दूर रहते हुये होटल मे ठहरे हुये है। जो आखिर समय पर अपने मत का उपयोग मिले आदेश अनुसार कर सकते है जिस मत से निकले परिणाम को सालो साल याद किया जाये। इसके विपरीत सचिन पायलट खेमा बीना किसी नुकसान होने की परवाह किये हर हाल मे गहलोत सरकार गिराना चाहेगे। फिर सरकार गिरने के बाद नये विकल्प पर विचार कर सकते है। मत विभाजन की स्थिति मे पायलट के साथ भाजपा खडी मिलने की पक्की सम्भावना जताई जा रही है। विधायक खरीद फरोख्त कोशिश करने के तीन आरोपी विधायक अगर गहलोत के पक्ष मे मतदान करे तब ही सरकार बच सकती है।वरना सदन मे मत विभाजन अगर होता है तो परिणाम कुछ भी आ सकता है।

  • मुख्यमंत्री गहलोत को प्रदेश स्तरीय राजनीतिक व सवैधानिक पदो पर मनोनयन का सिलसिला शूरु करने पर विचार करना चाहिए।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के गुज्जर नेता कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला ने एक दफा कहा था कि अशोक गहलोत कुछ देते तो है, लेकिन जब देते है तब तक वो बासी हो जाती है। यह कथन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अलावा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भी स्टीक साबित हो चुका है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते राजनीतिक नियुक्ति व संवेधानिक पदो पर मनोनयन करना बार बार टालते रहे ओर अंत मे उनकी सरकार को भाजपा ने सिंधिया की मदद से सत्ता से बाहर करके स्वयं भाजपा ने सरकार बना ली है। कमलनाथ तो राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति कर नही पाये ओर अब मध्यप्रदेश मे भाजपा सरकार धड़ाधड़ नियुक्तिया कर रही है। कमलनाथ की तरह ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रदेश मे कांग्रेस सरकार के ढेड साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद अभी तक राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति करने का सिलसिला शूरु तक नही किया है। जिसके चलते आम कांग्रेस वर्कर को सत्ता मे हिस्सेदारी नही मिलने से वो लगातार धीरे धीरे उदासीन होता जा रहा हैँ।

    गहलोत सरकार वर्तमान संकट मे हो सकता है कि एक दफा सदन मे बहुमत सिद्ध करके उभर जाये। लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात मे बनते बिगड़ते समीकरणों को देखकर सरकार का लम्बा चलना मुश्किल माना जा रहा है। बाड़ेबंदी मे कैद विधायक ज्योही बाहर खुली हवा मे आयेगे त्योही मावव स्वभाव के चलते फिर से सत्ता मे भागीदारी की बात करते हुये गुणा-भाग करने लगेंगे। भागीदारी सभी विधायकों को मिलना मुश्किल होगा। ऐसे हालात मे निराशा के भाव मे आये कांग्रेस व गहलोत सरकार समर्थक विधायकों से फिर अन्य लोग सम्पर्क कर अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर सकते है।उस स्थिति मे धीरे धीरे गहलोत समर्थक विधायकों की संख्या कम होती जायेगी ओर सरकार का रहना मुश्किल होता जायेगा।

    वर्तमान समय मे राजस्थान मे रोजाना बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर दोड़ाये तो अनिश्चितता कायम होना देखा जा रहा है। गहलोत सरकार के बचने व गिरने के अलग अलग कयास लगाये जा रहे है। गहलोत-पायलट खेमे मे बंटा कांग्रेस विधायक दल के मध्य जारी शह व मात के खेल मे अब भाजपा भी कुदती नजर आने लगी है। प्रदेश मे अनिश्चितता की बनी उक्त स्थिति पर राज्यपाल की भी पूरी नजर है। आगे आगे देखना होगा कि प्रदेश की सियासत किस तरफ पलटी खाती है।

    राजनीतिक नियुक्ति व संवैधानिक पदो पर एक प्रक्रिया के तहत मनोनयन मे कमलनाथ व गहलोत एक दुसरे से अधिक फिसड्डी साबित हुये व हो रहे है। लेकिन इसके विपरीत मध्यप्रदेश मे सरकार गिरने व राजस्थान मे बदले राजनीतिक घटनाक्रमों के मध्य छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के मुखिया भूपेश भगेल ने सरकार मे संसदीय सचिव, राजनीतिक नियुक्तिया व संवैधानिक पदो पर धड़धड़ मनोनयन करके एक अलग तरह का माहोल बना दिया है। जिसके बाद वहां का आम कार्यकर्ता भी सत्ता मे अपनी हिस्सेदारी मानकर उत्साहित होकर पार्टी हित मे सक्रिय हो चला है। अगर प्रदेश की सरकार किसी वजह से गिर भी जाये तो संवेधानिक पदो पर नियुक्त उन लोगो को त्याग पत्र देने की आवश्यकता नही होती। वो अपना कार्यकाल चाहे तो पुरा कर सकते है।

    कुल मिलाकर यह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान की राजनीति मे आये भूचाल के मध्य ही पिछले एक सप्ताह मे संसदीय सचिव, राजनीतिक व संवेधानिक पदो पर नियुक्ति करने की झड़ी लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के रास्ते को अपनाने की बजाय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रास्ते को अपना कर प्रदेश मे खाली चल रही नियुक्तिया जल्द कर देनी चाहिए वरना बाद मे पछतावा हो सकता है जब चिड़िया खेत चूग जाये। अगर ऐसा हुवा तो आम कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें कभी माफ नही करेगा। उस स्थिति मे उदासीन हुवा कार्यकर्ता पार्टी हित मे उतना काम नही कर पायेगा जितना काम 2018 के चुनाव मे वसुंधरा राजे सरकार को हटाने मे किया था।

  • राजस्थान मे चल रहे ताजा राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य ऐजेन्सी एसओजी-ऐसीबी के बाद अब केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री हो सकती है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान कांग्रेस विधायक दल के गहलोत-पायलट मे विभाजित हो चुके कांग्रेस विधायकों के बाद मचे राजनीतिक घमासान मे राज्य ऐजेन्सी ऐसीबी व एसओजी मे दर्ज शिकायतो के बाद उक्त दोनो ऐजेन्सी की इन्ट्री के बाद भाजपा प्रवक्ता ने दिल्ली मे प्रैस कांफ्रेंस करके गहलोत सरकार पर फोन टेपिंग करने का आरोप लगाते हुये पुरे मामलो की केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई से जांच कराने की मांग करने के बाद जनता मे जहन मे सवाल उठने लगा है कि राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य जांच ऐजेन्सीज के बाद क्या अब केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री होगी? इसके विपरीत इसी राजनीतिक घटनाक्रम के मध्य आयकर विभाग ने दो कांग्रेस नेताओं के अनेक ठिकानो पर रेड कर चुका हैँ।

    केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई से स्टेट के किसी मामले मे जांच कराना स्टेट की मर्जी पर निर्भर करता है। लेकिन किसी मुद्दे पर न्यायालय अगर आदेश जारी कर देता है तो उस आदेश की पालना मे केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी से जाचं की जा सकती बताते है।

    राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 109 विधायको के समर्थन होने के दावे को सीरीयस नही लिया जा सकता। भाजपा के 72 व रालोपा के 3 विधायको के साथ आरोपितो 3 निर्दलीय विधायको को मिलाकर कुल 78 विधायक बनते है। स्पीकर की तरफ से नोटिस मिलने वालो 19 कांग्रेस विधायकों को मिलाकर कुल 97 विधायक तो यही बन जाते है। एक विधायक भंवरलाल मेघवाल अस्पताल मे भर्ती होने पर कुल 98 विधायक तो यही हो जाते है। बचे 102 विधायक। उनमे माकपा का एक विधायक बलवान पूनीया गहलोत खेमे को समर्थन देने का ऐहलान कर चुके है। वही दूसरे माकपा विधायक गिरधारी दहिया अब तक पत्ते ना खोलते हुये अपने आपको अपने क्षेत्र मे होने की कह रहे है। बीटीपी के दो विधायक रामदयाल व राजकुमार कभी तटस्थ तो कभी गहलोत खेमे का साथ देने को कह चुके है। इसके अलावा दस निर्दलीय विधायक अभी तक तो गहलोत खेमे की बाड़ेबंदी मे बताते है। पर बाड़ेबंदी से बाहर आने पर वो किधर रुख कर ले यह कहना मुश्किल है। क्योंकि सदन मे वो चाहे जिधर मतदान करे उनकी सदस्यता जाने का खतरा उनको नही है। पार्टी विधायकों के मतदान करने पर उनकी सदस्यता पर प्रभाव जरूर डालता है। इसके विपरीत चाहे भाजपा उक्त घटनाक्रम को कांग्रेस के दो नेताओं का झगड़ा बताये लेकिन चाहे सामने ना सही पर राजनीति के जानकार किसी ना किसी रुप मे उनकी भूमिका होने की बात मान कर चल रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजनीति के जानकार मान कर चल रहे है कि बहुमत मिलने की पुख्ता होने पर मुख्यमंत्री सदन मे बहुमत सिद्ध करने की कोशिश करेगे ताकि उसके खिलाफ मतदान करने वाले कांग्रेस विधायको को अपनी विधानसभा सदस्यता से हाथ धोना पड़े ओर फिर खाली जगह पर उपचुनाव हो सके। वही पायलट खेमा जैसे तैसे करके कांग्रेस से कम से कम 36 विधायक अपने साथ लेकर अलग गूट बनाकर फिर सेफ गेम खेलने की कोशिश मे बताते है। भाजपा यह चाहेगी कि गहलोत सरकार पहले गिर जाये फिर वो सरकार बनाये। अन्यथा एक दफा राष्ट्रपति शासन जरुर लग जाये। ज्यो ज्यो समय गुजरेगा त्यो त्यो गहलोत खेमे की लगाम कमजोर व भाजपा की लगाम मजबूत होती जायेगी। पर अभी घटनाक्रमों मे अनेक बदलाव पल पल आते नजर आना तय है।