Category: राजस्थान

  • राजस्थान के कुछ मंत्रियों को मंत्रिमंडल से अलग किया जा सकता है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राहुल गांधी के गुपचुप निर्देश के बाद प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डेय ने पीछले एक हफ्ते मे राजस्थान के लोकसभा उम्मीदवारो से ऐआईसीसी दफ्तर दिल्ली मे वन बाई वन मिलकर प्रत्येक से करीब पच्चास से पचपन मिनट तक गहन वार्ता करके सभी तथ्यों पर लिखित रिपोर्ट लेकर उसको यकजा करके राहुल गांधी को सोंपनै के बाद गहलोत मंत्रीमंडल से कुछ सदस्यों को पद से हाथ धोना पड़ सकता है।

    हालांकि पीसीसी से भी अलग से हार पर रिपोर्ट 25-जून तक राहुल गांधी तक पहुंचनी है। लेकिन इन सबके अलावा राहुल गांधी द्वारा चुपचाप अपने स्तर पर उक्त दोनो के अतिरिक्त बनवाई जा रही रिपोर्ट व अविनाश पाण्डेय की रिपोर्ट के मिलान के बाद जो तथ्य समान रुप से उभर कर आयेगे उन तथ्यों अनुसार राजस्थान मे कार्यवाही होना तय है। माना गया है कि शीर्ष नेताओं की मोजूदगी मे उम्मीदवार अपनी बात खुलकर नही रख सकता था। इसलिए उम्मीदवारों से एक एक करके अविनाश पाण्डेय से मिलकर वास्तविक रिपोर्ट तैयार करने का तय हुवा। जिस रिपोर्ट का मिलान भी राहुल गांधी द्वारा अपने स्तर तैयार करवाई गई रिपोर्ट से होगा। यानी काऊंटर पर काऊंटर लगाकर बनने वाली निष्कर्ष रिपोर्ट पर अमल होगा।

    राजनीतिक सुत्र बताते है कि राजस्थान के उम्मीदवारों ने किसान कर्ज माफी की घोषणा को ठीक से लागू नही करने के अलावा सरकार बदलने का मतदाताओं को अहसास तक नही होने को मोदी लहर से भी बडा हार का कारण बताया है। नेताओं की धड़ेबंदी व उदासीनता के अलावा कुछ मंत्रियों व विधायकों के उम्मीदवार के खिलाफ काम करना भी बताया गया है।

    ज्ञात रहे कि शेखावाटी के एक दिग्गज नेता व पूर्व मंत्री के राज्य सरकार मंत्रिमंडल गठित होते समय अंतिम समय नाम हटाया गया था। क्योंकि उस जिले कुछ विधायको व विधानसभा चुनाव मे हारे हुये उम्मीदवारों ने उनके उनके खिलाफ भितरघात करने की शिकायत हाईकमान तक की थी। उसी शिकायत के आधार पर उनकी पत्नी को लोकसभा का टिकट भी नही मिला बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे सरकार होने के बावजूद सभी लोकसभा सीट हारने को राहुल गांधी ने गम्भीरता से लिया बताते। बाडमेर, जोधपुर, नागोर, सीकर, टोंक-सवाईमाधोपुर, दोसा व अलवर सीट की जीतने की पूरी उम्मीद के बाद भी हारने को कांग्रेस जन बडा झटका मान रहे है। पच्चीस जून तक सभी रिपोर्ट मिलने के बाद राहुल गांधी द्वारा विभिन्न रिपोर्ट से अपने स्तर पर तैयार करवाई रिपोर्ट से मिलान करने के बाद कुछ मंत्रियो पर गाज गिरना तय है।

  • राजस्थान मे नेताओं की घड़ेबंधी से कांग्रेस अगले कुछ महिनो मे तार तार हो सकती है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    तत्तकालीन वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ पनपे जन विरोध के बावजूद छ: माह पहले हुये राजस्थान विधानसभा चुनाव मे बहुमत के किनारे पर अटकी कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं ने हालात से सबक लेने की बजाय बाहरी समर्थन से सरकार गठित होने पर दो पावर सेंटर के मध्य उलझ कर लोकसभा चुनाव मे एक दूसरे के समर्थक उम्मीदवारों को धूल चटाने की अंदर ही अंदर की गई कोशिशो से लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस के सभी उम्मीदवार भाजपा उम्मीदवारों के सामने धूल चाट गये।

    राजस्थान की गहलोत सरकार के मंत्रिमंडल के दो दलित सदस्यों को छोड़कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट सहित अन्य सभी मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्रो मे लोकसभा उम्मीदवार बूरी तरह पिछड़ने के बावजूद मंत्री लालचंद कटारिया के अलावा किभी भी मंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुये त्याग पत्र देने तक का नाटक करने का साहस नही जूटा पाये। जबकि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये त्याग पत्र देकर आज तक उस पर अड़े होने के बावजूद उनके किसी एक भी कांग्रेस नेता ने अनुशरण करने की हिम्मत दिखाने का दिखावा तक नही किया।

    कांग्रेस माने या ना माने लेकिन राजस्थान मे सरकार व पार्टी स्तर पर कांग्रेस पूरी तरह अशोक गहलोत व सचिन पायलट नामक दो धड़ो मे ऊपर से लेकर निचे तक विभक्त हो चुकी है। उक्त दो पावर सेंटर व्यवस्था को खत्म कर अगर एक पावर सेंटर कायम नही हो पाया तो कांग्रेस सरकार अगले कुछ महीने बाद गिर कर प्रदेश मे कांग्रेस की हालत यूपी, बिहार व बंगाल की तरह होने की पटरी पर चढ सकती है। सरकार का इकबाल गायब हो चला है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीना राजनीतिक माइलेज लिये चुपके से अच्छी व प्रभावी योजनाओं के चालू करने के बावजूद पार्टी राजनीतिक फायदा नही उठा पा रही है। उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सोनिया गांधी व प्रियंका गांधी का वरदहस्त होना राजनीतिक हलको मे माना जाता है।

    दौसा व अजमेर से सांसद रहे सचिन पायलट को विधानसभा चुनाव जीतने के लिये अपने लोकसभा क्षेत्र की सीटो की बजाय परम्परागत मुस्लिम सीट रही टोंक को चूनना पड़ा। जिससे उनके राजनीतिक जनाधार व मजबूती का आंकलन होता है। लोकसभा चुनाव मे करारी हार के बावजूद पायलट ने अपने पिता राजेश पायलट की बरसी पर अधिकाधिक तादाद मे कांग्रेस विधायक व नेताओं के बरसी स्थल पर जमा कर अपनी राजनीतिक ताकत दर्शाने मे व्यस्त देखा गया। जबकि अशोक गहलोत अपना मुख्यमंत्री पद बचाये रखने के लियै जयपुर-दिल्ली का चक्कर लगा रहे है। गहलोत की लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद अभी तक राहुल गांधी से वार्ता ना होना भी राजनीतिक हलको मे काफी चर्चा व चिंता का विषय बना हुवा है।

    1998 मे गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार स्तर पर किसी तरह का विरोध नही पनपने के लिये उनके द्वारा विधायक व विधानसभा के उम्मीदवार रहे को उनके क्षेत्र का एक तरह से राजा घोषित करके उनकी इच्छा बीना उनके क्षेत्र मे पत्ता भी नही हिलने की निती से वो पूरे समय सरकार तो चलाते रहे लेकिन सत्ता के नशे व मिली खूली छूट के कारण मतदाताओं मे विधायकों के प्रति बढे विरोध के कारण अगली दफा जनता ने उनहे हराकर ही दम लिया। पहले दफा 1998 मे 156 सीट पाकर कांग्रेस के सरकार बनाई पर 2003 मे वो मात्र 56 सीट पर आ टीकी। इसी तरह 2008 मे 96 सीट जीतकर बसपा व निर्दलीय की मदद से कांग्रेस ने सरकार बनाई ओर फिर 2013 के चुनाव मे 21 सीट पर कांग्रेस आकर टीकी। अब 2019 मे 99 व फिर एक सीट ओर जीतकर 100 सीट पर सरकार कांग्रेस की चल रही है। जिस सरकार का पांच साल पुरा करना मुश्किल दिखाई दे रहा है।
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    राज्य मे सरकार होने के बावजूद लोकसभा की सभी पच्चीस सीटे हारने पर कांग्रेस पार्टी के अंदर ही अंदर मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ ज्वार भाटा उठने लगा तो गहलोत ने उसे शांत करने के लिये प्रदेश के स्थानीय निकाय व पंचायत के नवम्बर व फरवरी मे होने वाले चुनाव के ठीक पहले डिलिमिटेसन करने के आदेश करके कुछ समय के लिये नेताओं व प्रदेश के तमाम कार्यकर्ताओं को इसी मे व्यस्त कर दिया है। लेकिन सभी पच्चीस लोकसभा उम्मीदवारो से प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डेय के मिलकर फीडबैक लेने के समय सभी के मुहं से समान रुप से निकली एक बात की उनकी राजस्थान की सत्ता मे भागीदारी की विधायको की तरह व्यवस्था तय हो। इस बात से सरकार चलाने के लिये मुख्यमंत्री पर दवाब बढेगा।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान सरकार मे एक से अधिक पावर सेंटर होने से धड़ेबंदी को बढावा मिलने के अलावा लोकसभा चुनाव मे हार के बाद कांग्रेस नेता व वर्कर के मनोबल मे भारी गिरावट आने के अतिरिक्त केंद्र मे भारी बहुमत वाली भाजपा सरकार आने के बाद पूरे पांच साल गहलोत सरकार का चलना मुश्किल नजर आ रहा है। पंचायत व स्थानीय निकाय मे डिलिमिटेसन करने की घोषणा से पहले से उठे ज्वार भाटा को शांत करने की कोशिश माना जा रहा है। लेकिन यह स्थाई हल कतई नही है।

  • राजस्थान मे लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस की करारी हार के बाद निकले तथ्यो पर कांग्रेस मे मचा घमासान।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    लोकसभा चुनाव मे राजस्थान की सभी पच्चीस सीटो पर कांग्रेस के रहे उम्मीदवारो को 17-18 जून को दिल्ली ऐआईसीसी दफ्तर बूलाकर प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डेय ने एक एक से व्यक्तिगत तौर पर तफ्सील मे वार्ता करके लिखित मे रिपोर्ट लेने के अलावा पार्टी के अन्य स्तर पर भीतरघात व उदासीनता की मिली सुचनाओं के बाद कांग्रेस मे घमासान मचने की आशंका जताई जा रही है। राजस्थान के दोसो विधानसभा क्षेत्रो मे से 185-विधानसभा क्षेत्रो मे कांग्रेस के पीछड़ने यानि सौ कांग्रेस विधायको मे से 88-विधायको के क्षेत्र मे कांग्रेस उम्मीदवारों के पीछड़ने के निकले आकंडो के बाद कांग्रेस मे सरकार व संगठन स्तर पर अजीब खामोशी छाई हुई है।

    राजस्थान के दलित व मुस्लिम समुदाय के बारह कांग्रेस विधायकों, दो दलित निर्दलीय विधायकों व एक मुस्लिम पूर्व विधायक के क्षेत्रो को छोड़कर बाकी सभी 185-क्षेत्रो मे कांग्रेस के पीछड़ने को लेकर कांग्रेस हाईकमान गम्भीर मंथन कर रहे है। राजस्थान के मंत्रीमंडल के मात्र रमेश मीणा व ममता भूपेश के क्षेत्रो को छोड़कर बाकी सभी मंत्रियो सहित मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र मे पीछड़ने को कांग्रेस के अंदर ही अंदर आग लगा रखी है। कांग्रेस के विधायक प्रथ्वीराज मीणा के टोडाभीम, रमेश मीणा के सपोटरा, जाहिदा खान के कामा, जोहरी मीणा के राजगढ़-लक्ष्मनगढ, आमीन खा का शिव, रफीक खान का आदर्श नगर, इंदिरा मीणा का बामनवास, दानिस अबरार का सवाईमाधोपुर, मुरारी मीणा का दौसा, रुपाराम का जैसलमेर, गणेश घोघरा का डूंगरपुर, व ममता भुपेश का सिकराय से कांग्रेस आगे रही है। उक्त बाराह विधायकों के क्षेत्रो के अलावा दो निर्दलीय विधायक ओमप्रकाश हुड़ला के महुवा व रामकेश मीणा के गंगापुर क्षेत्र मे कांग्रेस आगे रही है। व एक मात्र पूर्व विधायक जाकीर हुसैन के मकराना क्षेत्र मे कांग्रेस आगे रहने के बाद अंदर ही अंदर आवाज उठने लगी है कि दो मंत्रियों के अलावा जिन दस विधायकों व समर्थन दे रहे एक निर्दलीय विधायक को मंत्रिमंडल मे जगह देकर उन्हें नवाजा जाये ओर जिन मंत्रियों के क्षेत्र मे कांग्रेस पीछे रही है उनको मंत्रीमंडल से हटाया जाये। एवं एक मात्र पूर्व विधायक जाकीर हुसैन के क्षेत्र मकराना मे कांग्रेस के आगे रहने पर उन्हें मंत्री दर्जा देकर नवाजा जाये।

    राजस्थान के सभी पच्चीस लोकसभा उम्मीदवारों से हार के कारणो पर 17-18 जून को ऐआईसीसी दफ्तर मे प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डेय की लम्बी बातचीत मे उम्मीदवारों ने खूलकर अपनी बात रखने के बाद कांग्रेस के 185 विधानसभा क्षेत्र जहां पर कांग्रेस पीछे रही है। उन क्षेत्रो के विधायक व पूर्व विधायकों मे से अधीकांश नेताओ को शक के घेरे मे लाखड़ा कर दिया है। अगर उक्त वार्ता के तथ्य किसी भी स्तर पर लीक होते है अनेक दिग्गज कांग्रेस नेता, विधायक व मंत्रियों पर खासा राजनीतिक असर पड़ सकता है।

  • राजस्थान कांग्रेस के मोजूदा समय मे मजबूत जाट नेतृत्व का पूरी तरह अभाव।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    हालाकि भारत मे लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम होने के बाद से ही राजस्थान स्तर पर कांग्रेस पार्टी के अलावा लोकदल व माकपा मे पीछले एक दशक पहले तक काफी मजबूत जाट नेतृत्व रहने के मुकाबले अब जाकर सभी दलो के साथ साथ कांग्रेस मे भी मजबूत जाट नेतृत्व का अभाव होने के कारण राजनीति मे जाट वोइस का असरदार होना कतई नही माना जा सकता।

    राजस्थान कांग्रेस के सरदार हरलाल सिंह, चोधरी रामनारायण, परशराम मदेरणा, डा.चंद्रभान, चोधरी नारायण सिंह जैसे जाट नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे है। जबकि अलग अलग समय मे नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, रामदेव सिहं महरिया, कुम्भाराम आर्य, शीशराम ओला, डा.कमला, सुमित्रा सिंह, कर्नल सोनाराम जैसे अनेक जाट बीरादरी से तालूक रखने वाले जनप्रिय नेता रह चुके है।

    राजस्थान की जाट बीरादरी को वैसे तो कांग्रेस का परम्परागत मतदाता माना जाता है। लेकिन पहले हरिदेव जौशी व रामनिवास मिर्धा के विधायक दल के नेता पद चुनाव मे मिर्धा की हार एवं फिर 1998 मे बहुमत आने के बावजूद सम्भावित मुख्यमंत्री चेहरा परशराम मदेरणा की जगह अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद तो मानो जाट मतदाताओं मे कांग्रेस के प्रति एक खरास का भाव पनप आया। जिस खारेपन का अहसास रुक रुक कर जाट बीरादरी मे आज भी कांग्रेस के प्रति होता देखा जा रहा है।

    प्रमुख रुप से जोधपुर, अजमेर, जयपुर व बीकानेर सम्भाग मे राजनीतिक दबदबा रखने वाली जाट बीरादरी की शूरुआती राजनीति की चमक-धमक सिद्धांत की मजबूत लकीर की तरह सभी तरह के मतदाताओं को साथ लेकर चलने मे महत्वपूर्ण नेतृत्व देने मे सक्षम थी। जिस नेतृत्व को विभिन्न राजनीतिक दलो की कुटिल चाल व कमजोर जाट नेतृत्व के उभरने के कारण आज जाट राजनीति के यह हालात बने है। लोकदल के समय कांग्रेस की राजनीति को बैलेंस किये रखने मे जाट नेताओं का प्रदेश की राजनीति मे खासा दखल था। लोकदल के खातमे के बाद भाजपा मे जाट नेताओं का प्रवेश हुवा ओर भाजपा सरकार मे राजस्थान व केंद्र सरकार मे जाट मंत्री बने व बने हुये है। लेकिन कांग्रेस मे जो जाट नेताओं की वोईस व दबदबा हुवा करता था वो भाजपा मे ना पनप पाया ओर नाहि आगे जाकर पनपने की उम्मीद है।

    शेक्षणिक तौर पर पुराने जाट नेता नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परशराम मदेरणा, रामदेव सिह महरिया, सुमित्रा सिंह व डा. कमला सहित अनेक उस मुश्किल हालात मे भी काफी मजबूत थे। लेकिन पीछले कुछ सालो मे जाट नेताओं की एक नये रुप मे खेप आई है। उन नेताओं की शैक्षणिक योग्यताओं का पैमाना अलग नजर आता है। पूराने जाट नेता शैक्षणिक तौर पर मजबूत होने के बावजूद खेत व गावं के साथ साथ आमजन से काफी हद तक जूड़े हुये होने के अलावा अपने सिंद्धातों पर हर हाल मे अड़िग रहने वाले थे।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे कांग्रेस को मजबूती देकर पुरानी वाली दमदार व असरकारक स्थिति मे लाने के लिए कांग्रेस के थींकटैंक को कांग्रेस के परम्परागत मतदाता दलित-मुस्लिम के साथ जाट मतदाताओं को जोड़ने के उपाय तलासने होगे। उक्त तीनो मतदाताओं का गठजोड़ फिर से होकर कांग्रेस की तरफ अगर हो जाता है तो फिर अन्य मतदाताओं का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ खींचा चला आयेगा। दूसरी तरफ जाट बीरादरी को सोचना होगा कि उनका राजनीतिक नेतृत्व पहले के मुकाबले कमजोर व बैअसर क्यो होता जा रहा है। जबकि बीरादरी की शेक्षणिक व राजनीतिक चेतना मे पहले के मुकाबले काफी बदलाव आना माना जा रहा है।

  • गायों को गुड़ व तरबूज खिलाकर राज खान ने मनाया कायम खा दिवस।

    अशफाक कायमखानी।फतेहपुर।
    साहस,बहादुरी,वीरता और वफादारी के अलावा शहिदो की खान के पर्याय कायमखानी समाज के दादा-ऐ-कौम नवाब कायम खाँ की 600 वीं पुण्य तिथि के मौके पर समाजसेवी राजखान ने फतेहपुर शेखावाटी व रतनगढ़ की गौशालाओ मे जाकर गायो को गुडं व तरबूज खिलाकर अपने अलग तरह से मनाते हुये साम्प्रदायिक सौहार्द की नई मिसाल पैश की है।

    केटीसी फाउंडेशन के चेयरमैन राज खान ने पिंजरापोल गौशाला में गायों को एक पिकअप तरबूज व गुड़ खिला कर मूक प्राणियों के प्रति दया व सेवा करने का संदेश देते हुये अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।

    फाउंडेशन के महासचिव मुबारिक अली जाजोद ने बताया कि इस अवसर पर सदीक भारतीय स्मृति संस्थान के अध्यक्ष शिशुपाल सिंह नारसरा, यूसुफ खाँ, संतोष सहित कई लोग मौजूद थे।

    इसी तरह रतनगढ़ में भी लायंस क्लब व केटीसी फाउंडेशन के तत्वावधान में गौशाला में एक पिकअप तरबूज वितरित किए गए। इस दौरान लायंस क्लब अध्यक्ष पवन कुमार तोषावड़, ओमप्रकाश चौहान, जयाकांत बिंवाल, संदीप कंदोई सहित कई गणमान्य लोग मौजूद थे। इस अवसर राज खान ने एक लाख रुपए की लागत से रतनगढ़ गौशाला की छत की मरम्मत करवाने की घोषणा की।

  • क्रषि बिजली कनेक्शन बिल सबसिडी मामला राजस्थान सरकार के गले की फांस बन सकता है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान मे कांग्रेस सरकार गठित होते ही जल्दबाजी मे सरकार ने बीना कोई खास होमवर्क किये किसानों की कर्ज माफी की घोषणा करने मे अनेक खामियां रहने के कारण आम किसानों को जो इस घोषणा से फायदा होना चाहिये था। उन किसानों को फायदा ना होकर भाजपा सरकार के समय हुई कर्ज माफी की घोषणा से जीन किसानों को फायदा पहुंचा था उसी केटेगरी वाले किसान को दोहरा फायदा पहुंचा।

    इस तरह की खामियां वाली कर्ज माफी से सरकार के पक्ष मे माहोल बनने की बजाय किसानों मे असंतोष व आक्रोश का माहोल बना, जिसके कारण किसानों ने लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस उम्मीदवारों के खिलाफ मतदान करके अपने आक्रोश की भभकती भट्टी मे जल डाल कर शांत किया। उक्त विशुद्ध कर्जमाफी घोषणा से राजस्थान सरकार सबक लेने की बजाय कुछ दिन अर्थ सरकार के पास रहने के झंझाल व लालच के चलते क्रषि बिजली कनेक्शन के बिल मे सीधे तोर पर सबसिडी देने वाली प्रक्रिया के बजाय किसान को पहले बिल की पूरी राशि जमा करानी होगी फिर बैंक के मार्फत सबसिडी पानी होगी।

    उक्त तरह की सबसिडी पाने की जटिल प्रक्रिया के शूरु होने पर मोजूदा सरकारों को किसानों की सख्त नाराजगी झेलनी पड़ेगी। उक्त जटिल प्रक्रिया मे उस किसान के नाम से बैक मे खाता खुलवाया पड़ेगा जिसके नाम से बिल आता है। अधीकांश कनेक्शन के काफी पूराने होने के कारण कनेक्शन धारी की म्रत्यु हो चुकी है। लेकिन उनके वारीसान उसी कनेक्शन को चालू मजबूरी मे रखते है। क्योंकि नया कनेक्शन मिलना मुश्किल है। वही कनेक्शन कटवाने पर दूसरा कनेक्शन मिलना भी मुश्किल है।

    उक्त योजना के सामने भोलेभाले व आर्थिक रुप से कमजोर किसान बीरादरी को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। कुछ महिनो मे स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव आने वाले है। जिसके कारण किसानों मे उत्पन्न होने वाले गुस्से के इजहार से सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उक्त योजना की तरह ही केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने घरेलू गैस पर सबसिडी बैंक खाते के मार्फत आना शुरु करने के बाद केंद्र मे अभी तक कांग्रेस सरकार गठित नही हो पाई है।

  • राजस्थान के 253 भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों मे 5 मुस्लिम अधिकारी।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान मे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तैनाती मे मुस्लिम अधिकारियों की सहभागिता हमेशा से ऊंट के मुहं मे जीरा समान रहती है। जिसमे मे सीधे तौर पर भारतीय सीवील सेवा परीक्षा मे चयनित अधिकारियों की संख्या तो एक हाथ की पांच उगंलियो के समान गिनती करने समान आज तक के इतिहास मे दर्ज है।

    भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा मे चयनीत होकर सीधे तौर पर राजस्थान केडर मे आने वाले आईएएस अधिकारियों मे सबसे पहले 1975-76 मे यूपी के गाजीपुर के रहने वाले सलाऊद्दीन अहमद आये, जो बाद मे राजस्थान के मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हुये है। सलाऊद्दीन अहमद साहब के आने के बाद काफी बडा अर्शा गुजर जाने के बाद कशमीर से पहले कमरुल जमा चोधरी व फिर अतर आमीर नामक दो आईएएस अधिकारी राजस्थान केडर मे आये है। इनके बाद 2018 मे केरल के रहने वाले मुहम्मद जुनैद पीपी बतौर आईएएस राजस्थान मे आये है। जिनकी अभी मसूरी मे ट्रेनिंग चल रही है। इनके अलावा मोजुदा समय मे राजस्थान प्रशासनिक सेवा व अन्य सेवा से तरक्की पाकर भारतीय प्रशासनिक सेवा केडर मे शामिल हुये उमरदीन खान व जाकीर हुसैन भी राजस्थान मे कार्यरत है। जिनमे से जाकीर हुसैन हनुमानगढ़ के फरवरी माह से जिला कलेक्टर पद पर पदस्थापित है।

    रियासतो के विलय के बाद बने राजस्थान प्रदेश मे छ मुस्लिम अधिकारी भी आगे चलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बनकर अनेक जगह जिला कलेक्टर भी रहे। जिनमे बूंदी रियासत से आये अलाऊद्दीन खिलजी प्रमुख थे। जो अनेक जगह जिला कलेक्टर के पद पर भी पदस्थापित रहे है। रियासतो से आये छ अधिकारियों के अलावा जे.एम खान, ऐ.आर खान, एम. एस खान, शफी मोहम्मद , अशफाक हुसैन व मोहम्मद हनीफ खान भी राजस्थान प्रशासनिक व अन्य सेवा से तरक्की पाकर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बन चुके है। जिनमे जे.एम खान, ऐ.आर खान, एम.एस खान व अशफाक हुसैन जिला कलेक्टर पद पर पदस्थापित रह कर सेवानिवृत्त हो चुके है। इनमे शफी मोहम्मद राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहते प्रतापगढ़ के जिला कलेक्टर रहे है। जबकि उनका भारतीय प्रशासनिक सेवा मे तरक्की बाद मे हुई बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान के कुछ युवा भारतीय सीवील सेवा परीक्षा पास करके भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जरुर बने है। लेकिन उन्हे राजस्थान केडर नही मिल पाया। बल्कि पीछले एक दशक मे कमरुल जमा चोधरी, अतर आमीर व मुहम्मद जुनैद पीपी का भारतीय प्रशासनिक सेवा मे चयनित होने के बाद उन्हें राजस्थान केडर अलाट जरुर हुवा है।
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  • राजस्थान मे हार पर मंथन करने पर कांग्रेस किसी भी स्तर पर तैयार नही।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान मे कांग्रेस सरकार होने के बावजूद राज्य की सभी पच्चीस लोकसभा सीटो पर हार का मजा चखने वाली कांग्रेस किसी भी स्तर पर हार पर मंथन करने को अभी तक तैयार नही है। खानापूर्ति के लिये चुनाव परिणाम के बाद पीसीसी मुख्यालय मे एक बैठक बूलाई गई जिसमे किसी भी सहभागी को बोलने की इजाजत ना होकर केवल प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे ने एक लाईन का राहुल गांधी के प्रति विश्वास जताने का प्रस्ताव रखा। जिसका पीसीसी चीफ व मुख्यमंत्री के समर्थन करने के साथ साथ उपस्थित लोगो का प्रस्ताव के समर्थन मे हाथ उठवाकर मीटिंग को समाप्त कर दिया।

    हार के कारणो पर मंथन करने के लिये किसी भी जिला व ब्लाक स्तरीय कमेटियों ने अभी तक बैठक नही की है। ओर नाही किसी एक भी विधायक ने अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के साथ इस मुद्दे पर बैठक करने का अभी तक साहस जूटा पाये है। इसके विपरीत विधायक व मंत्री तो अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के सवालों के जवाब देने से कतराते हुये उनसे मिलने की बजाय गुमनामी की चादर ओढे घूम रहे है। सभी पच्चीस लोकसभा उम्मीदवार भी चुनाव सम्बंधित अनेक दर्द दिल मे लिये घूम रहे है। लेकिन उन दर्द को सूनने के लिये प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने अभी तक उम्मीदवारों की बैठक तक नही बूलाई है। कांग्रेस के अनेक विधायक-मंत्री व नेताओं ने स्वयं कांग्रेस उम्मीदवार की खाट खड़ी करने मे जी जान लगाई है। उस दर्द को लोकसभा उम्मीदवार पार्टी मंच पर रखना चाहते है पर ऐसा अभी तक नही हो पाया है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के विधानसभा क्षेत्रो मे कांग्रेस उम्मीदवार के पीछे रहने के कारण दोनो ही अब इस मुद्दे पर मंथन करने की बजाय चालाकी के साथ इस हार के बहाने एक दूसरे पर राजनीतिक वार करने मे लगे हुये है। चुनाव के समय राजस्थान के प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डेय ने एक ब्यान मे कहा था कि जिन मंत्रियों के क्षेत्र मे कांग्रेस पीछे रहगी उनको परिणाम भूगतने होगे एवं जिन मंत्रियों व विधायकों के क्षेत्रो मे कांग्रेस आगे रहेगी उन मंत्री-विधायको को नवाजा जायेगा। पर अब दोसो विधानसभा क्षेत्रो मे से 185 विधानसभा क्षेत्रो मे कांग्रेस के पीछड़ने से सब कुछ गूड़-गोबर होकर रह गया है। मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष हार पर मंथन करने के बजाय एक दूसरे को राजनीतिक रुप से घेरने मे अधिक दिलचस्पी दिखा रहे है। सचिन पायलट प्रदेशाध्यक्ष के साथ साथ सरकार मे उपमुख्यमंत्री पद का दोहरा लाभ लेते आ रहे है

  • राजस्थान कांग्रेस मे उठापटक व विद्रोह की राजनीति जल्द परवान चढ सकती है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    चार माह पहले राजस्थान विधानसभा चुनाव मे सरकार बनाने के करीब पहुंचने वाली कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष सचिन पायलट व तत्तकालीन समय के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मे जीत का श्रेय लेने की होढ इस तरह मची हुई थी कि दिल्ली मे हाईकमान के सामने मुख्यमंत्री बनने के लिये एक तरह से दोनो मे युद्ध सा छिड़ा हुवा था। पायलट को जब लगा कि वो मुख्यमंत्री की दोड़ मे पीछड़ने लगे है तो उन्होंने दिल्ली पर दवाब बनाने के लिये अपनी बीरादरी के सेंकड़ो लोगो को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया था। लेकिन दिल्ली मे एक खास कोकस मे गहरी पेठ होने के अलावा सोनिया गांधी की खास मेहरबानी के कारण गहलोत बाजी जीत कर फिर एक दफा मुख्यमंत्री बन गये। लेकिन उस समय मात खाने वाले सचिन पायलट के घाव अभी भी ताजा बताते है।

    घाटे मे झगड़ा होने की कहावत को झूठलाते हुये भाजपा की देश मे जब मात्र दो लोकसभा सीट आई तो पार्टी पूरी तरह एकजूट होकर केंद्रीय नेतृत्व के साथ खड़ी होने के परिणामस्वरूप आज बहुमत की सरकार दूसरी दफा बना कर एक बडी राजनीतिक ताकत के रुप मे उभर आये है। जबकि इसके विपरीत भारत मे अधीकांश समय सत्ता मे रहने वाली कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर आज खतरा मंडराने व राजनीतिक तोर पर बूरे दौर मे आते ही कांग्रेस नेता एकजुट होकर केन्द्रीय नेतृत्व को ताकत देने की बजाय डूबते जहाज से भागते चूहों की कहावत को चरितार्थ करने की होढ मचा रखी है। राजस्थान स्तर पर चार महीने पहले जिन नेताओ ने जीत का श्रेय लेने की होढ मचा रखी थी। वो नेता लोकसभा चुनाव मे हार की जिम्मेदारी लेने से कोसों दूर भाग रहे है।

    राजस्थान मे मोजूद मीडिया का एक तबका अपने हिसाब से स्टोरी प्लांड करके कांग्रेस नेताओं मे धड़ेबंदी व आपसी टकराव उत्पन्न करके नेताओं मे आपसी टकराव के हालात बनाने मे लगा है। वहीँ कांग्रेस के कुछ विधायक कठिन समय मे पार्टी नेतृत्व को मजबूती देने की बजाय अनुशासन तोड़कर आपसी मनमुटाव को हवा देने की कोशिश करने लगे है। कुछ नेता बूरे दौर मे राजस्थान मे नेतृत्व परिवर्तन की मांग को पार्टी मंच की बजाय बाहर मीडिया के मार्फत उठाने मे लगे है। जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के हार की जिम्मेदारी लेते हुये त्याग पत्र देकर एक महीने मे दूसरा अध्यक्ष बनाने की कहने के बाद से पूरी कांग्रेस मे भारतीय स्तर पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस नेताओं को भाजपा के दो सीटो के समय भी एकजुट रहने से प्रेरणा लेकर बूरे दौर से उभरने के रास्ते तलासते हुये सामुहिक प्रयास करने चाहिए। अधीकांश समय सत्ता मे रहने के कारण कांग्रेस नेता मजबूत विपक्ष की भूमिका भी ठीक से निभा नही पा रहे है।

    राजनीतिक तौर पर यह तय हो चुका बताते है कि राजस्थान स्तर पर चाहे हार की जिम्मेदारी लेने से हर एक कांग्रेस नेता दूर भागता रहे लेकिन अभी तक यह तय है कि कांग्रेस हाईकमान राजस्थान सरकार का नेतृत्व परिवर्तन करने के लिये कतई तैयार नही है। जबकि केंद्र सरकार के कुछ नेता व भाजपा हर हाल मे किसी ना किसी रुप मे राजस्थान सरकार को बेदखल करने की फिराक मे बताते है। उनकी कोशिशों से राजस्थान सरकार मे बगावत होकर या फिर मुख्यमंत्री की दोड़ मे लगे एक नेता के अपने समर्थक विधायकों के साथ विद्रोह करके भाजपा के समर्थन से या फिर भाजपा मे शामिल होकर सरकार बनाने के चांसेज भी काफी हाई बताते है।

    हालांकि राजस्थान कांग्रेस के प्रथ्वीराज मीणा नामक एक विधायक ने पार्टी मंच की बजाय मीडिया के मार्फत सरकार स्तर पर सीधे तौर पर नेतृत्व परिवर्तन की मांग करते हुये उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करने पर पार्टी हाईकमान ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुये विधायक को दिल्ली तलब करके उससे लिखित मे स्पष्टीकरण मांगा है। राजनीतिक सूत्र बताते है कि विधायक प्रथ्वीराज मीणा के मुहं से नेतृत्व परिवर्तन की निकले शब्द मात्र उन अकेले विधायक या नेता का ना होकर एक बडे ग्रूप के रचे बोल बताते है। यह नेतृत्व परिवर्तन की मांग किसी ना किसी रुप मे लगातार जब तक उठती रहेगी जब तक कांग्रेस विधायकों का एक धड़ा भाजपा से मिलकर या फिर भाजपा मे शामिल होकर सरकार ना बना ले। अगर ऐसा होता है तो मानो जो नेता लाख कोशिशों के बावजूद कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री नही बन पाये, वो भाजपा या भाजपा के समर्थन से राजस्थान के मुख्यमंत्री बन सकते है।

    कुल मिलाकर यह है कि जून माह मे भारतीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी के लिये काफी महत्वपूर्ण बताते है। पार्टी स्तर पर भारी बदलाव या बडी बगावत हो सकती है। राजस्थान सरकार के लिये बजट सत्र भी काफी कुछ उठापटक साथ लेकर आने वाला बताते है।

  • भाजपा व कांग्रेस का राजस्थान के दो विधानसभा उप चुनाव मे शक्ति परिक्षण होगा

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के झूंझुनू जिले की मंडावा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह व नागोर जिले की खीवंसर विधानसभा क्षेत्र से रालोपा विधायक हनुमान बेनीवाल के झूंझुनू व नागोर लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बनने के बाद उन दोनो के विधायक पद से त्यागपत्र देने के बाद अब दोनो सीटो पर उप चुनाव होने है। जिन चुनावो मे कांग्रेस व अन्य उम्मीदवारों मे कड़ा मुकाबला होनै की उम्मीद जताई जा रही है।

    उक्त भाजपा व रालोपा के दोनो विधायको के त्याग पत्र देने के बाद राजस्थान मे दो रिक्त सीट होने के बाद बचे 198 विधायको मे 100 विधायक कांग्रेस की टिकट पर जीते हुये होने के चलते कांग्रेस का मौजूदा समय मे स्पष्ट बहुमत हो चुका है। लेकिन जल्द होने वाले दोनो उपचुनाव मे कांग्रेस व स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सरकार की प्रतिष्ठा जूड़ चुकी है। रालोपा नेता व सांसद हनुमान बेनीवाल के दोनो सीटो से अपने उम्मीदवार लड़ाने का ऐहलान कर देने से भाजपा खेमे मे बेचैनी होना बता रहे है। वही मंडावा से लगातार हार रहे कांग्रेस जाट उम्मीदवार को बदलकर मुस्लिम को टिकट देने की मांग कांग्रेस के हलके मे उठने से कांग्रेस मे हलचल मचा कर रखदी है। मंडावा के स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस के अलावा सांसद असदूद्दीन ओवेसी की पार्टी से टिकट पाकर चुनाव लड़ने की कोशिशें करने के बाद क्षेत्र मे अलग तरह की चर्चा को जन्म दे रहा है।

    हालांकि मंडावा से दो दफा लगातार कांग्रेस उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ रहा है।ओर खीवंसर से बेनीवाल चार दफा से लगातार विधायक जीतजे आने से क्षेत्र के मतदाताओं पर उनकी पकड़ काफी मजबूत मानी जा रही है। उपचुनाव मे बेनीवाल के परिवार से ही खींवसर से फिर उपचुनाव मे उम्मीदवार बनने की खबर है। वही मंडावा से भाजपा के निवर्तमान भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह के परिवार से फिर से भाजपा उम्मीदवार बनने की उम्मीद है। दोनो जगह कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिये नये उम्मीदवार पर दाव खेलना होगा वरना परिणाम वोही पुराने आने की उम्मीद अधिक बताई जा रही है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान के होने वाले दोनो उपचुनाव मे कांग्रेस के पास खोने के लिये तो कुछ नही है। पर भाजपा व रालोपा को अपनी अपनी सीट बचाये रखने की चुनौती जरूर बनी हुई है। कांग्रेस अगर समझदारी से उम्मीदवार बदलकर चुनावों मे उतरे तो चाहे दोनो जगह ना सही पर मंडावा सीट जरूर निकाल सकती है। देखना होगा कि उपचुनाव मे कांग्रेस अपनी लगातार होती हार को जीत मे बदल पाती है या फिर वोही ढाक के तीन पात परिणाम आते है।