Category: राजस्थान

  • राजस्थान मे गहलोत-पायलट खेमे मे बंटी कांग्रेस मे शह व मात का खेल गति पकड़ने लगा।

    नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा के ग्रह क्षेत्र मे पहली दफा जाने पर अधिकांश विधायको व नेताओं के दूरी बनाने से गहलोत खेमे मे मायूसी
    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान मे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट खेमे मे कांग्रेस विधायको के बंटने पर करीब एक महीने तक चली विधायको की बाड़ेबंदी के बाद हाईकमान की पहल पर पायलट खेमे की कांग्रेस मे ससम्मान वापसी के बाद जब सचिन पायलट व उनके समर्थक विधायको के बाड़ेबंदी से आजाद होकर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र मे जाने पर भारी भीड़ का जमावड़ा हो रहा है वही गहलोत समर्थक विधायक अपने क्षेत्र मे चुपके से जाकर आ रहे है। गहलोत समर्थक कुछेक विधायको के पहले से कहकर अपने क्षेत्र मे जाने पर उनके कार्यक्रमों से भीड़ व कांग्रेस नेताओं ने दूरी बनाकर रखना ही उचित समझा। भीड़ व नेताओं की दूरी से उनके कार्यक्रम काफी फीके साबित हो रहे है।

    मुख्यमंत्री गहलोत खेमे के विधायक चुपचाप अपने क्षेत्र मे जा रहे है। गहलोत खेमे के शिक्षा मंत्री व नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा बाकायदा प्रैस रिलीज जारी करके अध्यक्ष बनने के बाद पहली दफा अपने ग्रह क्षेत्र सीकर गये तो उनके अलावा कांग्रेस के अन्य छ विधायको मे से पांच विधायको के अतिरिक्त लोकसभा उम्मीदवार ने उनके उक्त कार्यक्रम से पूरी तरह दूरी बना कर कांग्रेस नेताओं की आपसी खाई को ओर अधिक गहरी कर दिया है। डोटासरा के उक्त कार्यक्रम मे भीड़ भी अनुमान से काफी कम मुश्किल से जूट पाने से उनके दौरे का फीका रहने की चारो तरफ आम चर्चा बना हुवा है।। जबकि इसके विपरीत सचिन पायलट सहित विश्वेंद्र सिंह, रमेश मीणा व मुकेश भाखर के जयपुर से उनके निर्वाचन क्षेत्र तक गाडियों का भारी काफला साथ चला एवं निर्वाचन क्षेत्र मे काफी भीड़ स्वागत मे जमा होने से लगा कि जनसमर्थन अभी उक्त खेमे के पास ही है। इसके अतिरिक्त गहलोत खेमे के विधायक जोगेंद्र अवाना के अपने निर्वाचन क्षेत्र नदबई जाने पर कार्यक्रम मे उपस्थित लोगो ने सचिन पायलट जिंदाबाद के नारो से आसमान गुंजाये रखा।

    कुल मिलाकर यह है कि हाईकमान ने पायलट की वापसी करके केसी वेणुगोपाल को जयपुर भेज कर गहलोत-पायलट के हाथ मिलाकर अखबारों मे फोटो प्रकाशित करवाने के बाद दोनो का दिल से मिलन होना जरूर मान लिया हो। पर ढेड महिले पहले दोनो नेताओं के मध्य खींची राजनीतिक खाई अब ऊपर से निचे तक गहरी होती नजर आ रही है। दोनो धड़ो मे शह व मात का खेल अब गति पकड़ता साफ नजर आ रहा है। विधायको मे चाहे गहलोत की पकड़ पायलट के मुकाबले काफी मजबूत हो लेकिन इसके विपरीत जनता मे गहलोत के मुकाबले पायलट की पकड़ काब काफी मजबूत होना देखी जा रही है। जनता को प्रभावित करने व भाषण से जनता का जेहन बदलकर बाजी पलटने मे गहलोत काफी फिसड्डी माने जाते है। जबकि जनता के मिजाज को समझकर भाषण कला से जनता को प्रभावित कर हारी हुई बाजी को जीत मे बदलने मे पायलट के मुकाबले गहलोत कही पर भी ठहरते नही पाते है।

  • राजस्थान मे भाजपा व कांग्रेस मे वर्तमान समय मे सबकुछ ठीक नही चलता नजर आ रहा

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट खेमे मे बंटने के बाद पार्टी की होती किरकिरी पर हाईकमान द्वारा समझदारी दिखाते हुये उचित ऐक्शन लेकर मसले को कुछ हद तक ऊपरी तोर सुलझा कर एक तरह उभाल शांत कर लेने का संकेत दिया है। लेकिन राजस्थान भाजपा के नेताओं मे आपसी टकराव धीरे धीरे उफान खाने से लगता है कि भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी मे सर्वेसर्वा बनने के चक्कर मे सबकुछ ठीक नही चलता नजर आ रहा है।

    इसी 14-अगस्त को विधानसभा मे कांग्रेस सरकार द्वारा लाये गये विश्वास प्रस्ताव के पास होने के ऐनवक्त के पहले भाजपा के गोपीचंद मीणा, कैलाश मीणा, हरेंद्र नीमामा व गौतम मीणा नामक चार विधायको का अचानक सदन से गायब हो जाना एवं पूर्व मुख्यमंत्री राजे द्वारा भाजपा के पूर्व विधायक व सांसदो सहित नेताओं को फोन करके या करवा कर उनसे जयपुर उनके निवास पर मिलने आना को कहने से लगता है कि कांग्रेस मे गहलोत की तरह वसुंधरा राजे भी मुखीया बनने का मोह किसी किमत पर अभी भी छोड़ना नही चाहती है। जबकि भाजपा मे राजे के मुकाबले प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनीया व संघ समर्थक नेताओं का अलग बना धड़ा अब राजे से अधिक अपने को मजबूत मानकर आगामी चुनाव के लिये रणनीति बनाने मे लगा हुवा बताते है। राजनीति के पंडित कहते है कि गहलोत व राजे की पार्टी के प्रति निष्ठा होने का ठीक से आंकलन तब हो पायेगा जब उनकी पार्टी के सत्ता मे आने पर उनको मुख्यमंत्री बनाने से मना किया जायेगा। तब वो पार्टी के साथ रहते है या बगावत करके अलग धड़ा बनाकर दुसरो से मिलकर सत्ता का मुखीया बनने की कोशिश मे लगते है।

    उधर कांग्रेस मे सचिन पायलट के प्रति बिगड़े बोलो से बैकफुट पर आये मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सचिन पायलट की वापसी व प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे की विदाई करके अजय माकन को प्रभारी महामंत्री बनने के अलावा राजस्थान के सम्बंधित मामलो की सुनवाई करने के लिये तीन सदस्यीय हाई पावर कमेटी के गठन से गहरा धक्का लगा है। पायलट के वापस आने व कमेटी गठन से गहलोत काफी सकते मे आकर अपनी जबान पर लगता है कि चाहे कुछ समय के लिये ही सही पर ताला लगा लिया है। जबकि पायलट ने 19-अगस्त को साधारण विधायक की हेसियत से अपने निर्वाचन क्षेत्र टोंक की यात्रा करके प्रदेश भर की यात्रा की शुरुआत करने पर उन्हें मिले भारी जन समर्थन से गहलोत खेमे की एक दफा तो नींद उडा दी है। गहलोत की जनता मे कोई खास पकड़ नही होने के साथ साथ उन्हें कोई अच्छा वक्ता भी नही माना जाता है। गहलोत को अब तक दिल्ली हाईकमान को ढंग से मेनेज करने वाला नेता के तोर पर देखा जाता रहा जो अब वो पकड़ भी कमजोर होती दिख रही है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे कांग्रेस व भाजपा मे वर्तमान समय मे सबकुछ ठीक चलता नजर नही आ रहा है। अशोक गहलोत व वसुंधरा राजे को उनकी ही पार्टी से मजबूत चेलैंज मिलने लगा है। वही सचिन पायलट भी अब तीसरे नेता के तौर पर प्रदेश मे उभरते नजर आने लगे है। अगर पायलट ने राजस्थान भर का दौरा इसी तरह जारी रखा तो उनको मिलते भारी जनसमर्थन से गहलोत खेमे की काफी हद तक नींद उड जाने के साथ साथ उनके द्वारा मनोनीत करवाये प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा की भी पद से हटने की खबर सूननी पड़ सकती है।

  • राजस्थान के मुस्लिम समुदाय मे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों (IAS) के अन्य प्रदेशो से राजस्थान केडर मे आने से बदलाव देखा जा रहा है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के मुस्लिम समुदाय से भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) मे सीधे तौर पर चयनित चंद अधिकारियों मे से किसी एक को भी अभी तक राजस्थान केडर एलाट नही हो पाया है। लेकिन 1976 मे गाजीपुर यूपी के नवाब खानदान से तालूक रखने वाले सलाऊद्दीन अहमद खान IAS सीधे तौर पर चयनित होकर राजस्थान केडर मे पदस्थापित होने के सालो साल बाद जम्मू काशमीर के कमरुल जमन चोधरी, फिर जम्मू काश्मीर के ही अतर आमिर व फिर केरल के मोहम्मद जुनेद राजस्थान केडर मे बतोर आईऐएस पदस्थापित होने के बाद राजस्थान मे शेक्षणिक व आर्थिक तौर पर पीछड़े मुस्लिम समुदाय मे भी भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा देने का चलन जौर पकड़ने लगा है। चाहे अभ्यार्थी आईऐएस कभी कभार ही बन पा रहे हो लेकिन उक्त अधिकारियों की मोजूदगी मात्र से प्रभावित होकर जो युवक-युवती उक्त परिक्षाऐ दे रहे वो एलाईड सेवा मे जरूर स्थान पा रहे है।

    कल चोदाह आईऐएस की जारी सुची मे केरला के मलापुरम के रहने वाले मोहम्मद जुनेद को झालावाड़ उपखण्ड अधिकारी पद पर पदस्थापित होने के आदेश मिले है। जबकि इससे पहले इसी महीने जारी अन्य तबादला सूची मे अतर आमिर व कमर चोधरी को भी श्रीगंगानगर व उदयपुर पदस्थापित होने के आदेश मिले है।

    सीधे तोर पर चयनित आईऐएस अधिकारी सलाऊद्दीन अहमद खान राजस्थान मे पहले मुस्लिम पदस्थापित अधिकारी होने के बाद वो मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त होकर अब जयपुर मे ही अधिकांशतः निवास करते है। उनके सालो साल बाद सीधे तोर पर IAS चयनित होकर आये कमरुल जमा चोधरी, अतर आमिर, व मोहम्मद जुनेद अभी नये नये है। जिनमे से अभी किसी को भी जिला कलेक्टर पद पर रहने का अवसर नही मिल पाया है।

    भारतीय सिविल सेवा परीक्षा पास करके राजस्थान मे पदस्थापित होने वाले उक्त चारो अधिकारियों के अलावा राजस्थान प्रशासनिक सेवा व अदर सर्विसेज कोटे मे तरक्की पाकर भी अनेक मुस्लिम अधिकारी आईऐएस बने है। जिनमे वर्तमान मे हनुमानगढ़ कलेक्टर जाकीर हुसैन व झूंझुनू कलेक्टर उमरदीन खान भी है। उक्त दोनो वर्तमान जिला कलेक्टरस के अलावा जे.एम खान, एम.एस.खान, ऐ.आर खान, अशफाक हुसैन व शफी मोहम्मद कुरेशी भी भारतीय प्रशासनिक सेवा IAS अधिकारी रहे है। यह सभी जिला कलेक्टर पद पर पदस्थापित रह चुके है। इनके अलावा मोहम्मद हनीफ भी तरक्की पाकर भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि उक्त उल्लेखित आईऐएस अधिकारियों के अलावा राजस्थान गठन के समय रियासतों के विलय के समय रियासतो से आईऐएस समान स्तर के छ मुस्लिम अधिकारी भी राजस्थान मे पदस्थापित रहे है जिनमे अलाऊद्दीन खिलजी व रहमत अली जाफरी जिला कलेक्टर भी रहे है। लेकिन अब सीवे तोर पर यूपीएससी द्वारा चयनित आईऐएस अधिकारियों के राजस्थान केडर मे पदस्थापित होने से राजस्थान के मुस्लिम समुदाय के युवाओं मे भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा देने के प्रति लगाव बढने लगा है।

  • जैसलमेर मे मुख्यमंत्री गहलोत ने मीडिया से बात करते हुये सवालों के जवाब दिये।

    अशफाक कायमखानी।जैसलमेर। राजस्थान।
    मुख्यमंत्री गहलोत ने राजस्थान मे पीछले एक महिने मे घटे राजनीतिक घटनाटक्रम व मची उथल फूथल को भूलकर आगे बढने की कहते हुये मीडिया के सवालो के जवाब दिये।

    सवाल- सर इस पूरे प्रकरण को कैसे देखें इसको, शाह की मात के तौर पर या लोटस को फेल करने के तौर पर?
    जवाब- फॉरेगेट एंड फॉरगिव, आपस में भूलो और माफ करो और आगे बढ़ो, देश के हित में, प्रदेश के हित में, प्रदेशवासियों के हित में और लोकतंत्र के हित में। डेमोक्रेसी खतरे में है। ये लड़ाई डेमोक्रेसी को बचाने की है, उसमें जो हमारे विधायकों ने इतना साथ दिया, 100 से अधिक विधायक एकसाथ रहना इतने लंबे समय तक, अपने आप में बहुत बड़ी बात है जो हिंदुस्तान के इतिहास में कभी नहीं हुआ होगा। तो ये डेमोक्रेसी को बचाने की लड़ाई है, आगे भी जारी रहेगी ये हमारी लड़ाई और बाकि जो एपिसोड हुआ है, एक प्रकार से भूलो और माफ करो की स्थिति में रहें, सब मिलकर चलें क्योंकि प्रदेशवासियों ने विश्वास करके सरकार बनाई थी हमारी। हमारी सबकी जिम्मेदारी बनती है कि उस विश्वास को बनाए रखें हम लोग और प्रदेश की सेवा करें, सुशासन दें और कोरोना का मुकाबला करें सब मिलकर। ये जीत जो है, ये जीत असली प्रदेशवासियों की जीत है। पूरे प्रदेशवासियों ने जो हमारे MLAs ने जो हौसला अफ़ज़ाई की टेलीफोन कर- करके, कोई चिंता नहीं, महीना-दो महीना लग जाए परवाह मत करो, जीत सरकार की होनी चाहिए, सरकार स्टेबल होनी चाहिए, उसके बाद में आप आओ हमारे घरों में। तो ये जो जज़्बा था पूरे प्रदेशवासियों का, उसकी जीत है ये। मैं उनको बधाई देता हूं, धन्यवाद देता हूं प्रदेशवासियों को और विश्वास दिलाता हूं कि जीत हमारी सुनिश्चित है, आने वाले वक्त में और दोगुने जोश से सब काम करेंगे, आपकी सेवा करेंगे।

    सवाल- सर आप जनता से कहते रहे ‘मैं थासूं दूर कोनी’, अब विधायकों को ये कहना पड़ा, अपने विधायकों?
    जवाब- ‘मैं थासूं दूर कोनी’ मैंने पहले भी कहा था, अब भी कह रहा हूं और विधायकों के आपस के अंदर संबंध अच्छे बने हैं। एक महीना साथ रहते हैं, तो आप समझ सकते हो कि कितने अंतरंग संबंध बने होंगे। सबने मिलकर एकजुट होकर संकल्प किया है कि हमें जाकर प्रदेशवासियों की सेवा करनी है, जो हमारा परम धर्म बनता है।

    सवाल- कई विधायक नाराज हैं?
    विधायकों की नाराजगी को हमने दूर करने का प्रयास किया है। उनकी नाराजगी होना स्वाभाविक है, जिस रूप में ये एपिसोड हुआ, उनको एक महीना रहना पड़ा, उससे नाराजगी होना स्वाभाविक था। उनको मैंने समझाया है कि देश और प्रदेश और प्रदेशवासियों के और लोकतंत्र को बचाने के लिए कई बार हमें कई बार सहन करना भी पड़ता है। हम सब आपस में मिलकर काम करेंगे । जो हमारे साथी चले गए थे वो भी वापस आ गए हैं। मुझे उम्मीद है कि सब गिले-शिकवे दूर करके सब मिलकर हम प्रदेश की सेवा करने का संकल्प पूरा करेंगे।

    सवाल- सर आपका पत्र बहुत चर्चा में रहा, जो पत्र विधायकों को लिखा आपने?
    जवाब- पत्र पक्ष को विपक्ष को सबको लिखा था और मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि उस पत्र का बड़ा इम्पैक्ट पड़ा। उसी कारण से बीजेपी के जो तीन-तीन प्लेन हायर किए उन्होंने एयरक्राफ्ट, गुजरात भेजने के लिए, मुश्किल से एक जा पाया, वो भी पूरा नहीं भरा हुआ था और उनका कल से कैंप लगना था क्राउन प्लाजा होटल के अंदर, मीटिंग थी, वहीं रहना था, बाड़ेबंदी हो रही थी, जो कहते थे हमें ‘बाड़ेबंदी क्यों कर रहे हो?’ ये क्या नौबत आ गई कि उनकी बाड़ेबंदी होने लग गई? उससे जो हालात बने हैं प्रदेश के सामने, पूरी तरह वो एक्सपोज़ हो गए। पूरा खेल उनका था, सरकार को टॉपल करने का षड्यंत्र था, जो उन्होंने कर्नाटक में भी, मध्यप्रदेश के अंदर भी जो कुछ भी किया, दुनिया जानती है और लोग पसंद भी नहीं करते हैं, वो ही षड्यंत्र राजस्थान का था जो पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है।

    सवाल- भाजपा जो आरोप लगा रही है, अशोक गहलोत इस पूरे प्रकरण पर क्या कहना चाहेंगे एक लाइन में, किसी की जीत, किसी की हार या क्या?
    जवाब- डेमोक्रेसी का हमारा जो, किसी की हार-जीत की बात नहीं होती है। उद्देश्य क्या है, सिद्धांत क्या हैं, नीतियां क्या हैं, कार्यक्रम क्या हैं हम लोगों के, उसपर हम लोग सोचते हैं, तो वो कांग्रेस के पक्ष में है। कांग्रेस का जो शानदार महात्मा गांधी के जमाने का इतिहास है, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, अंबेडकर साहब ने बनाया संविधान। 70 साल के बाद में भी हमारे यहां लोकतंत्र कायम रहा है और अब भी मैं कहना चाहूंगा, इस देश के अंदर लोकतंत्र आने वाली सदियों तक कायम रहे, ये हमारा सपना रहेगा जिंदगी का। उसको बचाने के लिए हम सब एकजुट रहेंगे और आप देखेंगे कि पूरा प्रदेश-पूरा देश एकजुट रहेगा। किसी कीमत पर जो मंसूबे हैं भारतीय जनता पार्टी के लोकतंत्र खत्म करने का, वो कभी पूरा नहीं होने देंगे। ये राहुल गांधी जी की भी सोच है, सोनिया गांधी जी की भी सोच है, हम सबकी सोच है, उसपर उनके नेतृत्व में चलेंगे और डेमोक्रेसी को बचाने के लिए कितना ही बड़ा संघर्ष करना पड़े, हम चूकेंगे नहीं और सत्य की जीत होती है, सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते।

  • सचिन पायलट का गुजर होना भी उनका कांग्रेस मे वापसी का बडा कारण बना।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    हालांकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे को साथ लेकर आखिर तक सचिन पायलट की कांग्रेस मे वापसी के विरोध करते रहने के बावजूद दिल्ली मे मोजूद दिग्गज कांग्रेस नेताओं की पहल पर सचिन पायलट की गांधी परिवार के पूत्र-पूत्री की उपस्थिति मे ससम्मान वापसी मे उनका गूजर नेता होना भी एक अहम कारण माना जा रहा है।

    कांग्रेस का एक समय था जब पार्टी मे अवतार सिंह भडाना, रामवीर सिंह विधुड़ी व राजेश पायलट सहित कुछ अन्य गुजर राजनीतिक नेता समय समय पर हुवा करते थे। दिल्ली, यूपी, हरियाणा, राजस्थान व जम्मू काशमीर मे खासतौर पर गुजर मतदाताओं की एक बडी तादाद मोजूद है। जिनको साधने के लिये गुजर बिरादरी मे सामाजिक नेता तो ओर भी हो सकते है लेकिन बिरादरी मे वर्तमान समय मे कांग्रेस के पास सचिन पायलट ही लोकप्रिय गुजर राजनीतिक नेता है। जिसके नाम पर गुजर मतदाताओं को लुभाया जा सकता है। इसके विपरीत अशोक गहलोत मैनेजर अच्छे हो सकते है लेकिन उनके नाम पर उनकी बिरादरी के मत राजस्थान मे ही कांग्रेस को अच्छी तादाद मे कभी नही नही मिल पाये है। वही गहलोत के नाम से राजस्थान व उससे बाहर उनकी बिरादरी के मतो को साधना नामुमकिन बताते है।

    सचिन पायलट के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनकर राजस्थान आने के बाद तीन विधानसभा व दो लोकसभा के हुये उपचुनाव मे कांग्रेस उम्मीदवारों के जीतने मे गुजर मतदाताओ का कांग्रेस की तरफ आकर पायलट को अपना राजनीतिक नेता मानते हुये मतदान करना प्रमुख कारण रहा बताते। गुजर वेसे तो परम्परागत रुप से माली मतदाताओं की तरह गुजर भी भाजपा का मतदाता रहा है। लेकिन जबसे सचिन पायलट को अध्यक्ष बनाकर हाईकमान ने राजस्थान भेजा तब से आम गुजर मतदाता को लगा कि सचिन को मुख्यमंत्री बनाने के लिये सभी जगह कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष मे मतदान करना अनिवार्य है। 2018 के विधानसभा चुनाव मे गुजर मतदाताओं ने उक्त लाईन पर ही मतदान किया था।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत की इच्छा के विपरीत राहुल गांधी व प्रियंका गांधी की पहल पर सचिन पायलट की कांग्रेस मे वापसी के अनेक कारणो मे एक प्रमुख कारण दिल्ली-यूपी-हरियाणा-राजस्थान व जम्मू काशमीर मे गुजर मतदाताओं की बहुलता होने पर उन मतो को साधने के लक्ष्य होना भी माना जा रहा है।

  • मुख्यमंत्री गहलोत समर्थक दस निर्दलीय विधायको के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    दलबदल कानून के तहत राजनीतिक दल से जीते विधायको को एक कानून के दायरे मे बांधते हुये विधायक काल पुरा करने तक उन्हें शर्तो से बांधा गया है। उसी तरह निर्दलीय विधायकों को भी कुछ शर्तों के तहत बांधा गया है। निर्दलीय विधायक किसी भी राजनीतिक दल मे शामिल नही हो सकता है।वह उस कार्यकाल मे निर्दलीय विधायक बने रहकर ही अपना कार्यकाल पुरा कर सकता है।

    राजस्थान के वर्तमान कुल तेराह निर्दलीय विधायको मे से दस निर्दलीय विधायक गहलोत घटक के समर्थन मे। उनको इस तरह की आजादी भी मिली हुई है कि वो किसी भी दल का समर्थन कर सकते है लेकिन किसी दल विशेष के पार्टी स्तर के कार्यक्रमो मे भाग नही लेने की शर्त उन पर लागू होना बताते है। जबकि संयम लोढा, महादेव सिंह, बाबूलाल नागर , राजकुमार, आलोक बेनीवाल, बलजीत यादव, कांतिलाल मीणा सहित सहित दस निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री निवास व होटल के बाड़ेबंदी मे आयोजित होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक मे शामिल श होने से प्रतीत होता है कि वो निर्दलीयों विधायक की बजाय अन्य दल की कार्यवाही मे हिस्सा लेकर वो किसी खास के विधायक होना अधिक पसंद कर रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि कांग्रेस विधायक दल की बैठको मे दस निर्दलीय विधायकों के शामिल होते रहने को लेकर कुछ लोग उनकी सदस्यता को खत्म कराने को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

  • बसपा विधायको के विलय प्रक्रिया की खामियां राजस्थान कांग्रेस सरकारी के गले की फांस बना।

    ।अशफाक कायमखानी।
    जयपर: कहते है कि जब किसी की चलती रहती है तो हाथी भी आसानी से निकल जाता है। लेकिन जब कानून के दावपेंच की उलझन मे कोई घटना उलझ जाये तो मानो किड़ी का भी बचकर निकलना मुश्किल हो जाता है।उसी तरह 2008 की तरह इस दफा भी गहलोत सरकार द्वारा बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे मिलाने को लेकर अब जाकर विलय प्रक्रिया के कानून के दावपैच मे उलझना कांग्रेस के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिये ना उगलते बन रहा है ओर नाही निगलते बन रहा है।
    राजस्थान के बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे विलय को लेकर उठ रहे सवालो का जवाब मुख्यमंत्री गहलोत कोई कानूनी दलील से ना देकर राज्यसभा मे टीडीपी के चार सदस्यों के भाजपा मे शामिल होने का बार बार उदाहरण देकर अपना बचाव करते नजर आ रहे है। इस मसले पर कानून के अनेक जानकारों से बात करने पर अनेक रोचक तथ्य निकल कर आ रहे है। जिनके बाद लगता है कि उक्त मामले को लेकर जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय का जजमेंट आयेगा वो एक अलग न नई नजीर बनेगी।
    बसपा के छ विधायको के विलय प्रक्रिया जैसे अनेक विवादो को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का जिन जिन लोगो ने अबतक दरवाजा खटखटाया है वो सभी व्यक्ति विशेष ने खटखटाया है। अब पहली दफा व्यक्ति विशेष की बजाय किसी राष्ट्रीय पार्टी ने अपने विधायको की विलय प्रक्रिया के विरोध को लेकर दरवाजा खटखटाया है। जिस मामले मे काफी जान बताते है। दुसरा पहलू यह है कि राष्ट्रीय पार्टी के विधायक अगर किसी अन्य दल मे शामिल होते है तो उनको पहले अलग पार्टी का विधीवत गठन करना होता है फिर पार्टी को चुनाव विभाग मे रजिस्ट्रड करके उसको राजनीतिक दल के रुप मे मान्यता दिलवाने के बाद पार्टी का किसी अन्य पार्टी मे विलय किया जा सकता है। उक्त प्रक्रिया को राजस्थान के सभी छ:बसपा विधायको ने अपनाया नही है।
    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे गहलोत सरकार के राजनीतिक संकट के भंवरजाल मे फंसने के बाद आपसी आरोप-प्रत्यारोप लगाने के अलावा विभिन्न मसलो को लेकर अदालत के दरवाजे तक विवाद पहुंच चुके है। जिनमे से बसपा विधायको के कांग्रेस मे शामिल होने का विवाद कांग्रेस की गले की फांस बनता नजर आ रहा है। अगर विधानसभा सत्र के पहले अदालत का अंतरिम आदेश बसपा विधायको को मतदान से अलग रखने का आता है तो गहलोत सरकार के लिये यह बडा झटका साबित हो सकता। वही मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी के विधायको के किसी दूसरे मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल मे विलय करने के विरोध मे पार्टी द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने को लेकर आने वाला जजमेंट भारत के राजनीतिक इतिहास मे एक नई नजीर बन सकता है।

  • अशोक गहलोत के अपने आपको मुख्यमंत्री बनाये रखने की जीद के चलते दर्ज रपट मे दफा 124-A की मामूली चूक से राजस्थान का खेल बिगड़ा।

    अशफाक कायमखानी।
    जयपुर: पार्टी मे पनपने वाले अपने कम्पिटिटर को योजनाबद्ध तरीके से राजनीतिक रुप से निपटाने के जादूगर के तौर पर मशहूर अशोक गहलोत अपने आपको प्रदेश मे सर्वेसर्वा बनाये रखने के लिये जो चाले आज तक चलते रहे है उनमे उनमे अक्सर सफल होते रहने से उत्साहित होने के कारण अबकी दफा अपने साथी तत्तकालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को राजनीतिक रुप से निपटाने की लम्बे समय से कोशिश करने के चलते उनके खिलाफ दर्ज रपट मे 124-A देश द्रोह लगवाने की मामूली चूक व पायलट के धेर्य व उठे कदम का आंकलन ठीक से नही करने की चूक के चलते मुख्यमंत्री गहलोत को आज यह मुश्किल हालात राजनीतिक जीवन मे पहली दफा देखने पड़ रहे है। मोजुदा राजनीतिक संकट मे उनकी कथित तौर पर अबतक बनाई जाती रही गांधीवादी छवि को भी भारी धक्का लगने के साथ ही उनके केवल स्वयं को मुख्यमंत्री पद पर बनाये रखने के लिये वो सबकुछ राजनीतिक रुप से करने की जीद पर अड़े रहने वाले एक अलग छवि के नेता के तौर पर प्रचलित करके उनको रख दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत से मिलने के लिये मंत्रियो व उनके दल के विधायको को कई दिनो तक मशक्कत करनी होती थी। आज उपजे राजनीतिक संकट मे समय ने क्या पलटी मारी है कि बाड़ेबंदी मे बंद समर्थक विधायकों से वो स्वयं होटल जाकर साथ बैठ रहे है ओर होटल मे सो रहे है तथा मान मनुहार करने के अलावा उनके बताये कार्यो को हवा की तरह निपटाये जा रहे है। होटल की बाड़ेबंदी मे बंद विधायको की पसंद अनुसार रोजाना अधिकारियों की तबादला सूचीया आने की चर्चा आम जबान पर है। जिस आदेश केनिकलवाने के लिये विधायकों के दौड़ लगाते लगाते उनके जूते घिस जाया करते थे वोही आदेश अब होटल मे बंद विधायकों की पसंद अनुसार जारी हो रहे बताते है।

    राजनीतिक टिप्पणी कार बताते है कि एक पंखवाड़े पहले राज्यसभा चुनाव मे कांग्रेस के खाते मे 123 मत पड़ने के बाद अचानक मुख्यमंत्री गहलोत को पार्टी के अंदर अपने कम्पिटिटर पायलट को कुचलने के लिये महेश जौशी द्वारा ऐसीबी व एसओजी मे रपट विभिन्न धाराओं के साथ 124-A मे दर्ज करवाने की जल्दबाजी करने की जरूरत क्यो पड़ी। साथ ही सचिन पायलट व दो मंत्रियों को बरखास्त करने की जल्दबाजी से लगता है कि गहलोत ने यह सबकुछ करने का मन बहुत पहले से बना रखा था। लेकिन यह सबकुछ अब सूलह सफाई मे सबसे बडी बांधा बनता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री को सोचना चाहिये था कि सभी नेता ताकत से कुचले नही जा सकते है। कभी कभार कछुआ व खरगोश की दौड़ वाली कहानी की भी पुनरावृति होती है।

    मुख्यमंत्री गहलोत व दिल्ली हाईकमान मे उनके खास पदाधिकारी साथियो का समर्थन पाकर व दर्ज रपट के बावजूद जब पायलट खेमा दवाब मे आता नही दिखने के बाद जब विधानसभा सत्र मे पायलट समर्थक विधायकों द्वारा भाग लेने की घोषणा से हाईकमान के हाथ-पैर फूलने लगे है। सदन मे गहलोत खेमा हारे या सचिन पायलट खेमा हारे, तो उस स्थिति मे हारेगी तो कांग्रेस ही। राजस्थान मे अगर ऐसी नजीर पड़ती है तो वो नजीर कांग्रेस को अन्य प्रदेशो मे भी परेशान कर सकती है। ऐसे हालात को भांपकर दिल्ली के जो नेता पहले गहलोत से मिलकर पायलट खेमे को कुचलने की बात करते थे वो नेता ही अब बीच का रास्ता निकलने की भागदौड मे लगे हुये है। अगर समझोता होता है तो उस स्थिति मे एकदफा गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटना होगा ओर पायलट को भी पहले हट चुके पदो से अभी भी दूर होने पर हां करनी होगी। गहलोत के पास उपरी तौर पर 99 के बहुमत का आंकड़ा नजर आने मे काफी पोल होने का स्वयं गहलोत को भी अहसास है। वही हाईकमान भी उस खतरे का भलीभांति भांप चुका बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि अपनी आदत के मुताबिक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा पार्टी के अंदर मोजूद अपने कम्पिटिटर को कुचलने के लिये पावर का बेजा उपयोग करते हुये 124-A मे उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश का अहसास पायलट समर्थको को समय रहते होने के बाद उनके राजस्थान छोड़कर SOG व ACB की पहुंच से दूर चले जाने से गहलोत को काफी धक्का लगा है।आहूत विधानसभा सत्र मे पायलट समर्थक विधायकों के भाग लेने की घोषणा के बाद कांग्रेस नेताओं के हाथ-पैर फूलने लगे है। वो अब हर हाल मे बीच का रास्ता निकालने मे भागदौड करने लगे है। पर उस निकाले जाने वाले रास्ते पर गहलोत व पायलट का सहमत होना राजनीतिक संकट से कांग्रेस को उभारने के लिये काफी निर्भर करेगा।

  • जैसलमेर मे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मीडिया से खुलकर बात की।

    अशफाक कायमखानी।जैसलमेर।
    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जैसलमेर मे अपने समर्थक विधायको की बाड़ेबंदी करने के बाद आज मीडिया से बात करते हुये कहा कि ऐसे मौके पर हम आए हैं जब ईद भी है और राखी भी आ रही है, जो बहुत बड़े त्यौहार होते हैं। आप मजबूरी देखिए डेमोक्रेसी को बचाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ रहा है। देश के अंदर हालात बहुत गंभीर हैं पूरे मुल्क में, लोकतंत्र खतरे के अंदर है सभी तरह से। जो फैसले कर रही है भारत सरकार आप देख रहे हो क्या स्थिति बन गई है देश के अंदर और सरकारें एक के बाद एक चुनी हुई सरकारें जो हैं, चाहे वो मणिपुर हो, गोवा हो, अरुणाचल प्रदेश हो, कर्नाटक सबको मालूम है क्या हुआ, मध्यप्रदेश में क्या हुआ। इसलिए मैं बार-बार बोलता हूं हालात बड़े गंभीर हैं देश के, तो राजस्थान की जनता ने जो साथ दिया है हमारा आज घर-घर में चर्चा है कि चुनी हुई सरकार हमारे द्वारा, बीजेपी कौन होती है गिराने वाली? सरकार कांग्रेस की बनती है,

    भारतीय जनता पार्टी की बनती है, कोई दिक्कत नहीं है। कभी परंपरा रही नहीं है कि हम उनकी सरकार को गिराने के लिए षड्यंत्र करें, हमने कभी नहीं किया, बल्कि रोका हमने, शेखावत जी के वक्त में हमने रोका, जो षड्यंत्र कर रहे थे उनकी अपनी ही पार्टी के, मैंने जाकर कहा गवर्नर साहब को, हम इसको लाइक नहीं करते हैं। प्रधानमंत्री जी को मैंने कहा नरसिम्हा राव जी को कि ये जो हमारी पार्टी के कुछ लोग लगे हुए हैं इन कामों में, ये लोकतंत्र के खिलाफ में हैं, हमारी परंपरा अलग रही है। फिर भी दुर्भाग्य से इस बार बीजेपी का खेल बहुत बड़ा है हॉर्स ट्रेडिंग का क्योंकि खून उनके मुंह लग चुका है कर्नाटक के अंदर, मध्यप्रदेश के अंदर, इसलिए वो प्रयोग यहां कर रहे हैं, पूरा गृह मंत्रालय इस काम में लग चुका है। धर्मेंद्र प्रधान जी की तरह कई मंत्री लगे हुए हैं, पीयूष गोयल जी लगे हुए हैं, कई नाम छुपे रुस्तम की तरह भी वहां पर हैं, हमें मालूम है। हम किसी की परवाह नहीं कर रहे हैं, हम तो लोकतंत्र की परवाह कर रहे हैं। हमारी लड़ाई किसी से नहीं है, राहुल गांधी जी ने कहा था एक बार गुजरात के अंदर कि विचारधारा आरएसएस की, बीजेपी की रहेगी देश के अंदर, हमें ऐतराज़ भी नहीं है। लड़ाई होती है लोकतंत्र में विचारधारा की, नीतियों की, कार्यक्रमों की होती है। लड़ाई ये नहीं होती है कि आप चुनी हुई सरकार को बर्बाद कर दो, उसको टॉपल कर दो, फिर लोकतंत्र कहां बचेगा? लड़ाई हमारी लोकतंत्र को बचाने के लिए है, व्यक्तिगत किसी के खिलाफ नहीं है। मोदी जी को चाहिए, प्राइम मिनिस्टर हैं वो, दो बार उनको मौका दिया है जनता ने, थाली बजवाई, ताली बजवाई, मोमबत्ती लगवाई, लोगों ने उनकी बात पर विश्वास किया, ये बहुत बड़ी बात है, उन प्रधानमंत्री को चाहिए, जो कुछ तमाशा हो रहा है राजस्थान के अंदर, उसको बंद करवाएं। हॉर्स ट्रेडिंग की रेट बढ़ गई है, जैसे ही डिक्लेयर हुआ विधानसभा का सत्र और रेट बढ़ा दी उन्होंने, आप बताइए क्या तमाशा हो रहा है? आज हर नागरिक का कर्त्तव्य है देश के अंदर-प्रदेश के अंदर, आप लोगों का भी कर्त्तव्य भी है मीडियावालों का भी, सच्चाई का साथ दो, इनको सबक ऐसा मिले राजस्थान से, आगे ये भविष्य में कोई गवर्नमेंट टॉपल इस रूप में करने की हिम्मत नहीं करें, ये मेरा मानना है।

    सवाल- दूसरे खेमे में वैसे तो शान्ति है पर ट्वीट पॉलिटिक्स हो रही है, गजेंद्र सिंह लगातार ट्वीट कर रहे हैं?
    जवाब- देखिए वो तो खाली झेंप मिटा रहे हैं, उनको इस्तीफा देना चाहिए खुद को ही, जो आदमी पकड़ा गया हो ऑडियो टेप के अंदर, सरकार को टॉपल करने के षड्यंत्र में शामिल हो और उनके खिलाफ पहले से ही कई मुकदमे चल रहे हैं, गरीबों का पैसा लूट लिया है राजस्थान के अंदर। गरीब चाहे किसी भी कौम का है, गांव-गांव में इंतज़ार कर रहा है कब मुझे पैसा वापस मिलेगा, जिस राज्य में गजेंद्र सिंह शेखावत साहब के जो दोस्त लोग हैं उन सबने मिलकर, इनका खुद का नाम भी आ रहा है, वो संजीवनी कॉपरेटिव सोसायटी नाम आ रहा है, कोर्ट ने भी आदेश जारी कर दिए हैं, अब मॉरल रूप से उनको इस्तीफा देना चाहिए और उनके ट्वीट में भी दम नहीं है।

    सवाल- सर कितने विधायकों का समर्थन है आपको?
    जवाब- 200 लोगों का।

    सवाल- इस बार कह रहे हैं कि अशोक गहलोत का स्वभाव बदला हुआ है, आमतौर पर कूल रहने वाले अशोक गहलोत अग्रेसिव हैं?
    जवाब- कहां मैं अग्रेसिव हूं, मैं बड़े प्यार से मोहब्बत से बात करता हूं, आदर करता हूं केंद्रीय मंत्रियों का चाहे वो किसी पार्टी के हों, उसमें कोई कमी नहीं है और मैं मुस्कुराता हूं तो मुझे गॉड गिफ्टेड है, मैं क्या कर सकता हूं?

    सवाल- सर माफ करने की प्रवृत्ति आपकी रही है। अगर उस खेमे से कुछ लोग आते हैं तो क्या माफ किया जाएगा आपकी तरफ से?
    जवाब- ये तो हाईकमान पर निर्भर करता है, हाईकमान अगर उनको माफ करती हैं तो मैं गले लगाऊंगा सबको, मेरा कोई प्रेशर पॉइंट नहीं है, मुझे पार्टी ने बहुत कुछ दिया है, विश्वास किया है मुझपर, मैं विभिन्न पदों पर रहा हूं, 3 बार केंद्रीय मंत्री रहा हूं, 3 बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहा हूं, 3 बार AICC महामंत्री रहा हूं और 3 बार मैं मुख्यमंत्री बना हूं, मुझे क्या चाहिए? मैं जो कुछ कर रहा हूं सेवा के लिए कर रहा हूं, पब्लिक सेवा के लिए कर रहा हूं और जो हाईकमान तय करेगा मुझे किसी में ऐतराज़ नहीं है।

    सवाल- सतीश पूनिया ने सवाल उठाया है कि जयपुर से जैसलमेर शिफ्ट हो गए, इनको कहीं और ले जाते डर था तो?
    जवाब- क्या है कि ये लोग नए-नए नेता बने हैं, ये वसुंधरा जी से टक्कर लेना चाहते हैं। तो वसुंधरा जी से टक्कर लेने के लिए क्या है इनमें आपस में प्रतिस्पर्धा है, राठौड़ साहब में, पूनिया साहब के अंदर, गुलाबचंद कटारिया जी भले आदमी हैं, थोड़ा कम बोलते हैं, मीडिया के सामने आते हैं तब वो हमें गाली-गलौज करते हैं, तो इनमें कोई दम नहीं है किसी में भी और वसुंधरा जी पता नहीं वो कहां गायब हो गई हैं।

    सवाल- सर आप ये कह रहे हैं कि भाजपा का ये पूरा खेला षड्यंत्र है लेकिन ये भी बात कही जा रही है कि प्रदेश की भाजपा के शीर्षस्थ नेता कहीं न कहीं आपकी सरकार बचाने में आपके साथ में हैं?
    जवाब- आपकी जानकारी में है तो मुझे बताइए फिर मैं उनसे संपर्क करूं।

    सवाल- सर प्रधानमंत्री को शिकायत की थी आपने उसका कुछ जवाब दिया प्रधानमंत्री जी ने, चिट्ठी भी लिखी थी आपने?
    जवाब- मैंने उनको बता दिया, जब असेंबली बुलाई नहीं जा रही थी तब मैंने अवगत करवा दिया, अब आगे तो वो उनके ऊपर है। एक मैं मांग करना चाहूंगा, आज ही मैंने तय किया है, प्रधानमंत्री जी को मैं एक पत्र भी लिखूंगा कि एक और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करो आप देश के मुख्यमंत्रियों के साथ में क्योंकि कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं देश के अंदर-प्रदेश के अंदर। प्रदेश में हमने बहुत शानदार व्यवस्था कर रखी है, आज जो संख्या मरीजों की बढ़ रही है पॉजिटिव केसेज़ की, चिंता करने की इसलिए आवश्यकता नहीं है। कई राज्य तो टैस्ट ही नहीं कर रहे हैं। पहले हमारे यहां पर सुविधा नहीं थी टैस्टिंग की, पुणे और दिल्ली भेजते थे हम टैस्टिंग के लिए, आज हमारे यहां 40 हजार टैस्ट पर डे हो सकते हैं, ये कैपेसिटी हो गई है। टैस्टिंग हमने इसलिए बढ़ाई है, एक थ्योरी है, अगर आप टैस्टिंग बढ़ाओगे, वहां तक पहुंचोगे जो आखिरी मरीज है या पॉजिटिव है, इलाज शुरु कर दोगे तो वो आगे नहीं फैलाएगा, इसलिए हमने टैस्टिंग बढ़ाई है। संख्या बढ़ रही है पर मृत्युदर 1 पर्सेंट से भी कम हो गई है यहां पर, देश के अंदर पहला राज्य राजस्थान है जहां पर मृत्युदर 1 पर्सेंट से कम हो गई है। रिकवरी रेट हमारे यहां शानदार है, डबलिंग रेट यहां अच्छी है, इलाज शानदार हो रहा है, हमारे यहां जो दवाइयां हैं, प्लाज्मा थैरेपी शुरु की है हमने जयपुर में, जोधपुर में, उदयपुर में, बीकानेर के अंदर वो बहुत कामयाब हुई है, सभी तरह से आज पूरे देश में दुनिया में राजस्थान की चर्चा हो रही है जो हमने मैनेजमेंट किए हैं। संख्या इसलिए बढ़ रही है क्योंकि हमने बहुत बड़ी तादाद में, 25 हजार के लगभग हम टैस्ट करवा रहे हैं, कई राज्य तो 10 हजार भी नहीं करवा पा रहे हैं। इसलिए हमने तो ऑफर किया है दूसरे राज्यों को, अगर आपको जरूरत है तो हम आपको 5 हजार टैस्ट पर डे राजस्थान में करके देगी सरकार, आपकी जनता के लिए देगी, हमें खुशी होगी।

    सवाल- सर जैसलमेर में विधायकों को लाए हैं?
    जवाब- आप सबको मालूम है, जब मैं आता हूं तो आपके चेहरे भी खिल जाते हैं, मेरा भी चेहरा खिल जाता है।

    सवाल- सर तनोट माता में आपकी गहरी आस्था है, क्या तनोट माता मंदिर भी ले जाएंगे?
    हमारे मेंबर्स कई पहली बार आए हैं जैसलमेर, सब तनोट भी जाएंगे, और जगह भी जाएंगे, वो उनपर निर्भर करता है। हमारे यहां उनकी तरह बंदिश नहीं है। टेलीफोन छीन लिए सबके, बात नहीं कर सकते, हमारे यहां टेलीफोन भी, आना-जाना भी सब जारी रखा।

  • बहुमत का दावा करने वाले मुख्यमंत्री गहलोत आखिर समर्थक विधायको को बाड़ेबंदी मे कितने दिन ओर रखेगे।

    पवित्र त्योहार ईद-उल-अजहा व रक्षाबंधन के बाद स्वतंत्रता दिवस आने को है

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।

    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने नेतृत्व वाली सरकार को अभी भी बहुमत मे बताने के बावजूद पीछले एक पखवाड़े से भी अधिक समय से अपने समर्थक कांग्रेस विधायक व निर्दलीय विधायकों सहित बीटीपी व अन्य दलो के विधायको को जयपुर की आलीशान होटल मे बाड़ेबंदी मे कैद करके जनता के पैसो की बरबादी करते रहने का तात्पर्य समझ से परे है। बहमत अगर है तो चलाओ सरकार ओर विधायको को करे आजाद ताकि कोराना की महामारी व प्रदेश मे रोज एक हजार से अधिक आते मरीजो से छाये खोफ मे अपने क्षेत्र की जनता के मध्य रहकर उनके डर को कम करने की विधायक कुछ ना कुछ कोशिश कर सके। लेकिन गहलोत को विधायको की विश्वसनीयता पर शक होगा कि वो आजाद होते ही उनसे अलग छिटक कर कही विरोधी घड़े से जा ना मिले।

    ऊधर पायलट खेमा भी मुख्यमंत्री गहलोत सरकार के अल्पमत मे आने का दावा तो कर रहे है। लेकिन संख्या बल उनके पास भी ठीक ठाक अभी तक उतना जुट नही पाया है। जितने संख्या बल की उनको जरुरत है। फिर भी पायलट गूट ने गहलोत की कथित लगातार बनाई जाने वाली गांधीवादी छवि को जरूर सबके सामने लाकर गहलोत को केवल पद व सत्तालोलुपता के तौर पर ला खड़ा कर दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत के पीछे या उनके इशारे पर मतदाताओं का मतदान करना कभी प्रदेश मे देखा नही गया लेकिन कांग्रेस की हाईकमान से हाथ मिलाये रखने के चलते वो तीसरी दफा जनता की इच्छा के विपरीत मुख्यमंत्री बनने मे जरुर कामयाब रहे है। मुख्यमंत्री गहलोत का राजनीतिक प्रभाव का आंकलन तब भी हुवा था जब 1989 के लोकसभा चुनाव मे मुस्लिम समुदाय की नाराजगी के चलते उनके सामने जोधपुर लोकसभा चुनाव मे अब्दुल गनी सिंधी के निर्दलीय/इंसाफ पार्टी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते ही गहलोत चुनाव हार गये। 1989 के उस चुनाव के बाद एक दो दफा को छोड़कर अधिकांश लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस जोधपुर से हार ती आ रही है। अबके लोकसभा चुनाव मे गहलोत ने अपने पुत्र को उम्मीदवार बनाकर जनता पर थोपा तो जनता ने उसे बूरी तरह हराकर बैरंग लोटाया ही नही बल्कि गहलोत की स्वयं की बूथ से पुत्र वैभव को बहुत कम मत देकर उन्हें राजनीति का असल रुप दिखाया था।

    मोजुदा राजनीतिक घटनाटक्रम पर नजर दोड़ाये तो पाते है कि गहलोत केवल मात्र अपने मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये वो सब कुछ ताकत लगाकर कर रहे है, जो वो कर सकते है। जबकि प्रदेश की जनता चाहती है कि मुख्यमंत्री गहलोत रहे या पायलट या फिर दोनो को छोड़कर तीसरे विकल्प को तलासा जाये। लेकिन कांग्रेस सरकार कैसे भी बची रहे। पर कांग्रेस सरकार बचाये रखने मे सबसे बडा रोड़ा गहलोत की मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की जीद आड़े आ रही है।

    कांग्रेस पार्टी की नीतियों अनुसार प्रभारी महामंत्री का कार्य प्रदेश के नेताओं मे ढंग से समनवय बनाये रखकर पार्टी संगठन व सरकार को मजबूती देते रहे। लेकिन प्रभारी महासचिव अविनाश पाण्डे ने विधानसभा चुनाव के पहले तो पायलट की तारीफ करते रहे एवं ज्योही गहलोत मुख्यमंत्री बने तो पाण्डे ने रुख बदल कर केवल गहलोत के प्रति एक पक्षीय रवैया अपनाये रखा जिसका परिणाम आज कांग्रेस विधायकों के खण्डित होने के रुप मे नजर आ रहा है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत ईद-उल-जुहा व रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहार से पहले विधानसभा सत्र बूलाकर महुमत सिद्ध करने के बहाने पायलटों समर्थक विधायको की सदस्यता रद्द करवाने की कोशिश मे लगे हुये है। वहीं जरूरत के होटल मे बाड़ेबंदी मे ठहरे गहलोत समर्थको विधायकों ने एक अगस्त को ईद-उल-जुहा व तीन अगस्त को रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहारों पर अपने अपने क्षेत्र मे जाने का दवाब बना रहे बताते है। उसके बाद 15-अगस्त के स्वतंत्रता दिवस को भी सभी विधायक स्वतंत्रता के साथ मनाने की कह रहे है।जबकि गहलोत केवल अपने मुख्यमंत्री पद बचाये रखने के लिये कांग्रेस पार्टी की बली देने पर उतारु है। अभी भी समय है कि कांग्रेस गहलोत-पायलट को छोड़कर अन्य विकल्प पर विचार करे।