Category: बिहार

  • बिहार:चमकी बुखार को आपदा घोषित करे सरकार:माले

    *चमकी बुखार की रोकथाम के लिए सरकार के पास कोई एक्शन प्लान नहीं*

    *भाकपा माले विधायक दल के नेता महबूब आलम के नेतृत्व में 1 टीम टीम ने एसकेएमसीएच पहुंचकर आईसीयू में भर्ती बच्चों का लिया जायजा*

    प्रेस रिलीज,पटना 15 जून 2019
    भाकपा माले विधायक दल के नेता महबूब आलम के नेतृत्व में आज एक उच्चस्तरीय जांच टीम ने मुजफ्फरपुर का दौरा किया और एसकेएमसीएच अस्पताल में चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों से मुलाकात की और घटना का जायजा लिया. इस टीम में महबूब आलम के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर के जिला सचिव कृष्ण मोहन, खेग्रामस के नेता शत्रुघ्न साहनी और आर वाई ए के प्रदेश सचिव सुधीर कुमार शामिल थे।
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    अस्पतालों का दौरा करने के उपरांत माले विधायक ने कहा है कि चमकी बुखार से बच्चों को बचाने के लिए कोई भी एक्शन प्लान बिहार सरकार के पास नहीं है. विगत कई सालों से इंसेफेलाइटिस जैसी अज्ञात बीमारी से सैकड़ों बच्चे मारे जा रहे हैं लेकिन सरकार ने लगता है इससे कोई सबक नहीं लिया और बीमारी शुरू होने के पहले रोकथाम का कोई भी उपाय नहीं किया. यह बिल्कुल आपराधिक लापरवाही है और सरकार की लापरवाही के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हुई है. हमारी पार्टी मांग करती है कि इस बुखार को तत्काल आपदा घोषित किया जाए और युद्ध स्तर पर राहत अभियान चलाया जाए।

    एसकेएमसीएच में माले जांच दल ने पीड़ित बच्चों व उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने पाया कि एक बेड पर दो-तीन बच्चे पड़े हुए है। बिस्तर का घोर अभाव है । वहां के अधीक्षक सुनील कुमार से भी जांच दल के नेताओं ने बात की और चमकी बुखार के कारण, बच्चों के इलाज तथा विकराल हो रही इस समस्या पर बातचीत की। अधीक्षक ने बताया बड़ी संख्या में बच्चे इसके शिकार बन रहे हैं । गरीबों के बच्चों को यह बीमारी सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है लेकिन बीमारी का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। इसे आम बुखार तथा प्रोटोकोल सिंड्रोम की तरह इलाज करना बड़ी ही लापरवाही है।

    माले विधायक महबूब आलम ने केंद्र व बिहार सरकार से मांग की है कि तत्काल विशेषज्ञों की टीम गांव-गांव भेजी जाए और राहत युद्ध स्तर पर संचालित किए जाएं तभी मरने वाले बच्चों की संख्या पर रोक लगाई जा सकती है । बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए.

    उन्होंने कहा अनुमंडल स्तर के अस्पतालों में आईसीयू और प्रखंड स्तर के अस्पतालों में इमरजेंसी सेवा तत्काल बहाल की जाए. कहा किस मामले में केंद्र व राज्य सरकार की आपराधिक लापरवाही इतनी बड़ी संख्या में मौतों मौतों की जिम्मेदार है.

  • सीतामढ़ी में कॉल कर युवक को बुलाया और प्रेमिका के सामने मार दी गोली

    सीतामढ़ी।रुन्नीसैदपुर थाना क्षेत्र के अथरी जगदीशा टोला में मंगलवार की रात प्रेमिका के परिजन ने उसके सामने ही प्रेमी की गोली मार कर हत्या कर दी। प्रेम प्रसंग को लेकर नाराज लड़की के परिजन ने साजिश के तहत फोन करके उसे घर बुलाया और हत्या कर दी। अपने परिजन के इस कृत्य से सदमे में आई लड़की ने तत्काल ही मोबाइल फोन से इसकी सूचना मृतक के परिजनों को दी, वहीं पुलिस के आने तक शव के पास डटी रही। पुलिस के समक्ष इस हत्याकांड की आंखों देखी सुनाकर अपने मां-बाप व बाबा समेत अन्य कई रिश्तेदारों को सीधे तौर कठघरे में ला दिया।

    हालांकि, पुलिस के पहुंचने से पूर्व ही लड़की की मां को छोड़ अन्य सभी आरोपी फरार हो चुके थे। पुलिस ने मौके से लड़की की मां विद्या चौधरी व चाचा राजेंद्र चौधरी को हिरासत में ले लिया। मृतक दिवाकर कुमार अथरी गांव के ही उमाशंकर सिंह का पुत्र था। लड़की भी इसी गांव की है। उसकी मानें तो उसके परिजनों ने साजिश के तहत मंगलवार की रात करीब ग्यारह बजे दिवाकर को फोन कर बुलाया और हत्या कर दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम करा परिजन को सौंप दिया। वारदात को लेकर मृतक के पिता उमाशंकर ङ्क्षसह के फर्द बयान पर प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस जांच में जुट गई है।

    प्राथमिकी में एक अज्ञात समेत लड़की की मां विद्या देवी, बाबा सत्यदेव चौधरी उर्फ लालबाबू चौधरी व चाचा राजेंद्र चौधरी को नामजद किया गया है। बताया गया है कि दिवाकर का गांव की ही एक लड़की से प्रेम प्रसंग चल रहा था। दोनों के बीच के रिश्ते को परिजनों की सहमति नहीं मिली थी। इसके बाद दोनों ने घर छोडऩे का फैसला ले लिया। दो दिसंबर 2018 को दोनों दूसरे प्रांत में भाग खड़े हुए। घटना को लेकर तीन दिसंबर 2018 को लड़की के पिता धर्मेंद्र कुमार चौधरी के आवेदन पर अपहरण की प्राथमिकी थाने में दर्ज की गई। करीब पांच माह बाद पुलिस द्वारा बरामद की गई लड़की ने अपने अपहरण के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया गया था। न्यायालय में उसने दिवाकर के साथ शादी कर जीवन व्यतीत करने की इच्छा जताई थी।

    मामले में हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर दिवाकर हाल ही में रिहा हुआ था। जेल से रिहाई के बाद दोनों के बीच एक बार फिर से परवान चढ़ते रिश्ते को लेकर लड़की पक्ष के लोग आक्रोशित थे। थानाध्यक्ष देवेंद्र प्रसाद सिंह ने बताया कि मामले की तहकीकात जारी है।(सोर्स जागरण)

  • अब बुजुर्ग माता-पिता की सेवा नहीं की तो होगी जेल, कैबिनेट मे लिया गया फैसला

    मिल्लत टाइम्स,पटना:बिहार कैबिनेट की मंगलवार को हुई बैठक में फैसला लिया गया कि बिहार में रहने वाली संतान अगर अब मां-पिता की सेवा नहीं करेंगे तो उनको जेल की सजा हो सकती है। माता-पिता की शिकायत मिलते ही एेसी संतान पर कार्रवाई होगी। मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया है। इतना ही नहीं, वृद्धजन पेंशन के आवेदन पर 21 दिन में निर्णय लेना होगा।

    15 प्रस्‍तावों पर लगी मुहर
    मंगलवार को बिहार कैबिनेट की हुई बैठक में कुल 15 प्रस्तावों पर मुहर लगायी गई, जिसमें कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादी घटनाओं में शहीद बिहारी जवान के आश्रितों को बिहार सरकार ने नौकरी देने का फैसला लिया है। इसके तहत भागलपुर के शहीद रतन कुमार ठाकुर और बेगूसराय के पिंटू कुमार सिंह के आश्रितों को नौकरी दी जाएगी।

    आवेदनों को लटका कर नहीं रखा जा सकेगा
    प्रदेश में एक अप्रैल 2019 के प्रभाव से लागू की गई वृद्धजन पेंशन योजना के आवेदनों को अब लटका कर नहीं रखा जा सकेगा। किसी भी बुजुर्ग द्वारा दिए गए आवेदन का निपटारा प्रखंड विकास पदाधिकारी को 21 दिनों के अंदर करना होगा। वृद्धजन पेंशन योजना को सरकार ने बिहार लोक सेवाओं के अधिकार अधिनियम 2011 के दायरे में ला दिया है।

    लोक सेवाओं के अधिकार कानून से जोड़ा गया है
    मंत्रिमंडल की बैठक के बाद कैबिनेट के प्रधान सचिव संजय कुमार ने बताया कि राज्य सरकार ने प्रदेश के वैसे बुजुर्ग जिन्हें कहीं से कोई पेंशन नहीं मिल रही है, उनके लिए वृद्धजन पेंशन योजना की शुरुआत की गई है। 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को 400 रुपये और 80 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को 500 रुपये मासिक पेंशन दी जानी है। महत्वपूर्ण योजना से कोई बुजुर्ग वंचित न रहे, इसके लिए इस नई योजना को लोक सेवाओं के अधिकार कानून से जोड़ा दिया गया है। योजना के लाभ के मिले आवेदन का निपटारा 21 कार्य दिवस में करने की बाध्यता होगी।

    पुलवामा, कुपवाड़ा शहीद के एक परिजन को नौकरी

    मंत्रिमंडल ने कश्मीर के पुलवामा और कुपवाड़ा में बिहार के शहीद सपूत भागलपुर के रतन कुमार ठाकुर, पटना के संजय कुमार सिन्हा और बेगूसराय के शहीद पिंटू कुमार के किसी एक परिजन को सरकारी नौकरी में नियुक्त करने का प्रस्ताव स्वीकृत किया है। परिजन की नियुक्ति उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर तृतीय अथवा चतुर्थ वर्गीय श्रेणी में हो सकेगी। शहीद जवान की पत्नी परिवार के जिस सदस्य के नाम की अनुशंसा करेंगी उन्हें सरकारी नौकरी में नियुक्त किया जाएगा।

    माता-पिता की शिकायत का निपटारा डीएम करेंगे

    समाज कल्याण विभाग के एक प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल ने 2007 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम में संशोधन किया है। पूर्व में बच्चों द्वारा प्रताडि़त किए जाने वाले माता-पिता को न्याय के लिए जिलों के परिवार न्यायालय में अपील करनी होती थी। जहां सुनवाई प्रधान न्यायाधीश के स्तर पर होती थी। अब माता-पिता जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित अपील अधिकरण में अपील करेंगे। डीएम ही मामले की सुनवाई करेंगे।

    किसान सलाहकारों का मानदेय बढ़ाया गया

    राज्य सरकार ने किसानों को सलाह देने के लिए प्रदेश स्तर पर 6404 किसान सलाहकारों की सेवा ले रखी है। पूर्व में किसान सलाहकारों को मानदेय के रुप में दो रुपये दिए जा रहे थे। जिसे मंत्रिमंडल की सहमति के बाद बढ़ा दिया गया है। किसान सलाहकारों को अब दो सौ के स्थान पर एक हजार रुपये आकस्मिकता मद में दिए जाएंगे। मंत्रिमंडल ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए 95.22 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं।

    बीच विस्तार योजना के लिए 76.56 करोड़

    मंत्रिमंडल ने गुणवत्ता पूर्ण बीजों की पहुंच सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में करने और इसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार योजना के लिए 76.56 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। स्वीकृत राशि इस वर्ष खर्च की जा सकेगी।

    प्रमुख प्रस्तावों पर लगी मुहर….

    -मुख्यमंत्री वृद्धा पेंशन योजना को राइट टू सर्विस एक्ट में जगह दी गई है।

    -गुणवत्ता पूर्ण बीज के लिए 76.56 करोड़ रुपये स्वीकृत।

    -सुपौल में हाइड्रो पावर का एक्सटेंशन स्टेशन बनेगा,130 मेगावाट का होगा उत्पादन।

    -डागमरा जल विद्युत परियोजना का एक्सटेंशन, कुल 11.68 करोड़ की स्वीकृत

    -राज्य खाद्य आयोग के सदस्यों के आवास भत्ता में संशोधन, आवास भत्ता में हुई वृद्धि।

    -बिहार नगर तथा निवेशन सेवा नियमावली 2019 की स्वीकृति

    -भागलपुर में गंगा नदी पर विक्रमशिला सेतु के समानांतर पुलनिर्माण 4 लेन बनेगा नया ब्रिज

  • मलिक ने NEET की परीक्षा में 4999 रैंक लाकर बढ़ाया जमुई व नवादा जिले का सम्मान!

    कहा जाता है कि जब किसी लक्ष्य को पाने के लिए दिल मे लगन और जुनून हो तो सफलता परिस्थितयो की मोहताज नही होती उसे इंसान प्राप्त कर ही लेता है. इन्ही पंक्तियों को चरितार्थ किया है जमुई जिले के अलीगंज प्रखंड के कैथा गांव निवासी पेशे से विदेश में कार्यरत औद्योगिक सुरक्षा पर्यवेक्षक आफताब आलम के छोटे पुत्र यासिर आफताब ने आल इंडिया में रैंक लाकर सफलता का परचम फहराया है.

    यासिर आफताब ने नीट की परीक्षा में कुल 720 अंको में 614 अंक प्राप्त किया है और आल इंडिया रैंक 4999 है.
    यासिर के बड़े भाइयो ने भी मारी थी जेईई एडवांस में बाजी
    यासिर के दो बड़े भाई शारिक अफताब और आमिर आफताब ने भी जेईई एडवांस में सफलता हासिल की थी. वे अभी NIT और जामिया दिल्ली में अध्ययन कर रहे है.

    वही यासिर ने मिल्लत टाइम्स से बातचीत करते हुए अपनी सफलता का श्रेय अपने माता मुमताज़ सुल्ताना और अपने गुरुजनों की दी है एवं प्रेरणा अपने नाना स्वर्गिय डॉ सुल्तान अहमद से प्राप्त कर सफलता हासिल की है !
    ज्ञातव्य हो की देशभर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की ओर से आयोजित राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (नीट) के परिणाम बुधवार को घोषित किए गए।

    यासिर ने NEET की परीक्षा में कुल 720 अंकों में 614 अंक प्राप्त किया है। यासिर ने पहले ही प्रयास में नीट की परीक्षा में सफलता हासिल कर अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया है। 12वी तक कि पढ़ाई नवादा से पूरी की है जहां 12वी में उसने भी अच्छे अंक प्राप्त किया।

  • बिहार:नीतीश कुमार की ओर से किया गया इफ्तार पार्टी के आयोजन में नहीं शामिल हुई बीजेपी

    मिलल्लत टाइम्स,पटना: जदयू ने आज इफ्तार पार्टी का आयोजन पटना हज भवन में किया है. इफ्तार पार्टी में मांझी और नीतीश गर्म जोशी से मिले लेकिन इस पार्टी में बीजेपी ही शामिल नहीं हुई. इफ्तार पार्टी में बीजेपी के शामिल नहीं होने को लेकर जदयू प्रदेश अध्यक्ष ने सफाई भी दी है. प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि उनकी व्यस्तता होगी इस वजह से नहीं आए होंगे. उन्होंने कहा कि इसके सियासी मायने नहीं निकालने चाहिए.

    अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या सच में बीजेपी और जदयू के बिच कुछ मनमुटाव चल रहा है क्युकी पहले तो बीजेपी जदयू के इफ्तार पार्टी में शामिल होती रही है. बीजेपी नेता कुछ भू बयान देने से बच रहे है. जदयू भी अभी अपने पत्ते नहीं खोल रही है. नीतीश कुमार के राजनीतिक कैरियर पर नजर डालेंगे तो समझ में आ जायेगा कि देर से ही सही जवाब देने में माहिर है साथ ही स्वाभिमान से आजतक समझौता नहीं किया। लालू ने महागठबंधन में नीचा दिखाना शुरू किया तो बीजेपी के साथ जुड़ने के बहाने ढूंढने लगे और हम सब जानते हैं कैसे बीजेपी के साथ मिल तुरंत सरकार बना लिया था.

    जदयू के पार्टी में मांझी के अलावा पार्टी के कई दिग्गज नेता के साथ लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान और चिराग पासवान भी शामिल हुए. पटना के हज भवन में आयोजित दावत ए इफ़्तार के कार्यक्रम में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम माँझी शामिल हुए उनके साथ पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ दानिश रिज़वान भी मौजूद थे.

    दानिश ने बताया कि रमज़ान के पाक महीने में दावत ए इफ्तार के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है और आज जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के अनुरोध पर जीतन राम माँझी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए हज भवन पहुँचे हैं. दानिश ने कहा कि कल जीतन राम मांझी जी के आवास पर हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के द्वारा दावत-ए-इफ़्तार का आयोजन किया गया है जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ ही महागठबंधन के तमाम नेता शामिल होंगें. दानिश ने कहा कि जदयू के इफ़्तार के पहले राष्ट्रीय जनता दल द्वारा आयोजित दावत-ए-इफ़्तार कार्यक्रम में भी माँझी ने भाग लिया था.

  • लोकसभा चुनाव 2019:बिहार में सत्तारुढ़ पार्टी JDU ने नहीं किया घोषणापत्र जारी आखिर क्यों?

    चुनावी बिगुल बजने के बाद हर लम्हा राजनीतिक दलों से किसी न किसी घोषणा का इंतज़ार किया जाता है. कभी उम्मीदवारों की घोषणा का इंतज़ार होता है तो कभी उनके नामांकन का.

    इसी प्रक्रिया में पार्टियां अपना घोषणापत्र भी जारी करती हैं. हालांकि, हाल के सालों में पार्टियां अपने घोषणापत्रों को नए-नए नामों से जारी कर रही हैं.

    लोकसभा चुनाव का तीसरा चरण पूरा हो चुका है और सोमवार को चौथे चरण के मतदान के बाद आधी से ज़्यादा चुनावी यात्रा पूरी हो जाएगी. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बिहार में सत्तारुढ़ और बीजेपी के साथ गठबंधन में शामिल जेडीयू ने अभी तक अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है.

    जेडीयू का घोषणापत्र जिसे ‘निश्चय पत्र’ कहा जा रहा है, उसको जारी करने की तारीख़ 14 अप्रैल तय की गई थी लेकिन वह अभी तक जारी नहीं हो पाया है.

    क्यों नहीं हो पाया घोषणापत्र जारी?
    जेडीयू का घोषणापत्र जारी होने में इतनी देरी क्यों हो रही है? इस सवाल पर जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि तीसरे चरण तक जनता ने जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम पर वोट किया है और घोषणापत्र के लिए एक कमिटी बनी है जो इस पर अपनी राय देने के बाद इसे जारी करने की तारीख़ बताएगी.

    घोषणापत्र से इतर राजीव रंजन कहते हैं कि नीतीश कुमार ने अपने कामों से बिहार में नाम बनाया है, उन्होंने घोषणाओं से ज़्यादा काम किया है और इसी काम के आधार पर जनता उन्हें चुनावों में समर्थन दे रही है.

    ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि गठबंधन के सबसे बड़े दल बीजेपी के घोषणापत्र के कारण जेडीयू अपना घोषणापत्र जारी करने में हिचकिचा रही है. बीजेपी अपने घोषणापत्र में खुलकर धारा 370, 35ए, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर पर अपने वादे दोहराती रही है.

    क्या जेडीयू अपनी सहयोगी पार्टी के कारण घोषणापत्र लाने में देरी कर रही है? इस पर जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं, “घोषणापत्र अपनी जगह पर है लेकिन राम मंदिर, धारा 370 जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर बीजेपी हमारे विचारों का सम्मान करती रही है और इससे घोषणापत्र को जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.”

    वह कहते हैं, “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम इसीलिए होता है जिसमें असहमतियों पर सहमति बनाई जाती है और कई असहमतियों के बावजूद हम 17 सालों तक बीजेपी के साथ रहे. घोषणापत्र में क्या-क्या चीज़ें होंगी यह अभी गोपनीयता का विषय है.”

    बीजेपी ने अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ का नाम दिया है
    बीजेपी का क्या कहना?
    बिहार में बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर साथ चुनाव लड़ रही हैं. बीजेपी ने अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ के नाम से जारी किया है. बीजेपी का कहना है कि यह उसका रोडमैप है जो उसने लोगों की राय के बाद बनाया है.

    बीजेपी के घोषणापत्र में लिखित कुछ बिंदुओं के कारण क्या जेडीयू अपना घोषणापत्र लाने से बच रही है? इस सवाल पर बिहार बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं कि बीजेपी के साथ गठबंधन में मौजूद पार्टियां स्वतंत्र पार्टियां हैं और यह उन पर निर्भर करता है कि वह अपना घोषणापत्र लाते हैं या नहीं लाते हैं.

    निखिल आनंद कहते हैं कि बिहार की जनता मोदी सरकार के काम और नाम पर मतदान कर रही है और इसके लिए घोषणापत्र न लाए जाने को इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.

    धारा 370, 35ए और राम मंदिर मुद्दों पर वह कहते हैं कि बीजेपी इनको लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और यह पहली बार उनके घोषणापत्र में नहीं आया है और इन मुद्दों के कारण सहयोगी दलों से कोई मतभेद नहीं है.

    विपक्ष ने भी साधा निशाना
    जेडीयू का घोषणापत्र जारी न होने को राष्ट्रीय जनता दल ने भी बड़ा मुद्दा बनाया है. आरजेडी का कहना है कि इससे साबित होता है कि जेडीयू बीजेपी की बी टीम बन गई है.

    आरजेडी अपना घोषणापत्र जारी कर चुकी है जिसे उसने इसे ‘प्रतिबद्धता पत्र’ का नाम दिया है.

    आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं कि नीतीश कुमार ने भय की वजह से अपनी पार्टी का घोषणापत्र जारी नहीं किया है.

    वह कहते हैं, “बीजेपी ने अपने घोषणापत्रों में जिन चीज़ों को लेकर वादा किया है, उस पर नीतीश कुमार को सफ़ाई देनी होती. इसी कारण उन्होंने घोषणापत्र लाने की हिम्मत नहीं की और यह संकेत है कि नीतीश जी बीजेपी में विलीन हो चुके हैं सिर्फ़ औपचारिकताएं बाकी हैं.”।

    (इनपुट बीबीसी)

  • लोकसभा चुनाव2019:जावेद अख़्तर कन्हैया के प्रचार में ये क्या बोल गए?

    बिहार के बेगूसराय में सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के समर्थन में एक सभा को संबोधित करते हुए मशहूर लेखक-गीतकार और राज्यसभा के पूर्व सांसद जावेद अख़्तर ने 39 मिनट का भाषण दिया.

    जावेद अख्तर
    शुरुआती 30 मिनटों में उन्होंने बीजेपी, आरएसएस, मुस्लिम लीग, नरेंद्र मोदी वग़ैरह के बारे में बहुत कुछ कहा. मैं उन पर कुछ नहीं कहना चाहता.
    मैं बात करना चाहता हूं उनके भाषण के आख़िरी नौ मिनटों पर.
    जावेद अख़्तर के मुताबिक़, कोई उन्हें कह रहा था कि मुसलमानों को एक होकर वोट देना चाहिए. उनको ये बात सही नहीं लगती क्योंकि धर्म के आधार पर वोट नहीं करना चाहिए. भला ऐसा कौन होगा जो जावेद अख़्तर की इस बात से इनकार करेगा.
    उसके बाद वो बेगूसराय से एक दूसरे उम्मीदवार डॉक्टर तनवीर हसन का लगभग मज़ाक़ उड़ाते हुए और उनके पूरे वजूद को नकारते हुए कहते हैं, ”यहां एक और साहब भी इलेक्शन लड़ रहे हैं.”
    मैं मानता हूं कि जावेद अख़्तर मुंबई में रहते हैं इसलिए बिहार के किसी एक लोकसभा सीट के किसी उम्मीदवार का नाम याद रखने की उम्मीद उनसे नहीं की जानी चाहिए, ख़ास तौर पर उस उम्मीदवार का नाम जिसको भारत की अधिकतर मीडिया ने भी जानबूझकर या अनजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया है.
    लेकिन किसी उम्मीदवार का नाम याद नहीं रहना और उसका मज़ाक़ उड़ाना ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं. उर्दू का इतना बड़ा शायर, जांनिसार और सफ़िया अख़्तर का लख़्त-ए-जिगर, मजाज़ का भांजा, कैफ़ी का दामाद और शबाना का शौहर लफ़्ज़ों और लहजे के इस फ़र्क़ को तो ज़रूर जानता होगा.


    कन्हैया कुमार

    किस पर तंज़ कर रहे थे अख़्तर
    जावेद अख़्तर ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा साफ़ तौर पर बेगूसराय के मुसलमान वोटरों की तरफ़ था. और इसे इशारा कहना भी सही नहीं क्योंकि अगले ही जुमले में उन्होंने कह दिया, ”अगर आपने कन्हैया को वोट नहीं दिया तो फिर बीजेपी जीतेगी. तो फिर ऐसा कीजिए ना, जाइए सलाम वालैकुम कहिए और कहिए हुज़ूर ये बीजेपी के लिए वोट लेकर आया हूं. तो कम से कम बीजेपी वाले आपका एहसान तो मानेंगे. आप अगर वहां (तनवीर हसन) वोट दे देंगे जो बीजेपी की मदद तो कर देगा लेकिन बीजेपी पर एहसान नहीं होगा. ये तो बड़ी नादानी की बात होगी.”
    जावेद अख़्तर ख़ुद को बेशक नास्तिक कहते हैं लेकिन वो ये तो ज़रूर जानते होंगे कि दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान जब एक दूसरे से मिलते हैं वो ‘अस्सलाम वालैकुम’ कहते हुए एक दूसरे का अभिवादन करते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है आप पर अल्लाह की सलामती हो.
    जावेद अख़्तर एक शायर हैं इसलिए हंसी-मज़ाक उनका हक़ है लेकिन उन्होंने जिस तरह से ‘सलाम वालैकुम’ कहा वो लहजा इस शब्द और उसको बोलने वाले करोड़ों लोगों का मज़ाक़ उड़ाने जैसा था.
    अपने भाषण के दौरान जावेद अख़्तर बार-बार ये कहते रहे कि जो लोग (यानी कि अब तो साफ़ हो गया कि उनका मक़सद बेगूसराय के मुसलमान वोटरों से था), तनवीर हसन को वोट देना चाहते हैं उन्हें सीधा गिरिराज सिंह के पास चले जाना चाहिए.
    जावेद अख़्तर के लफ़्ज़ों में बेगूसराय से वो जो ‘एक और साहब इलेक्शन लड़ रहे हैं’ वो राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस-आरएलएसपी-हम-वीआईपी पांच पार्टियों के गठबंधन के उम्मीदवार डॉक्टर तनवीर हसन हैं.


    कन्हैया कुमार, गिरीराज सिंह और तनवीर हसन

    तनवीर का क़द
    वो बिहार की सबसे बड़ी पार्टी (बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में सबसे ज़्यादा 80 सीटें जीतने वाली पार्टी) राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और एक वरिष्ठ नेता हैं. 2014 में जब जावेद अख़्तर की मुंबई समेत पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में मोदी की लहर थी तब तनवीर हसन ने मोदी के उम्मीदवार भोला सिंह को कड़ी टक्कर दी थी और सिर्फ़ 58 हज़ार वोटों से हारे थे. और बीजेपी के जिस भोला सिंह से तनवीर हसन हारे थे वो पहले उसी सीपीआई के एक बड़े नेता थे.
    उसी चुनाव में सीपीआई के उम्मीदवार को सिर्फ़ 1.92 लाख वोट मिले थे. और उस समय सीपीआई और जनता दल यूनाइटेड का गठबंधन था यानी कि क़रीब दो लाख जो वोट मिले थे उसमें जेडीयू की भी हिस्सेदारी थी.
    इसलिए आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो तनवीर हसन का पलड़ा हर हालत में कन्हैया से भारी है लेकिन मेरा मक़सद जावेद अख़्तर को एक लोकसभा की सीट पर पांच साल पहले मिले वोटों के आंकड़ों के जाल में फंसाना नहीं है. न ही मुझे इस बात में कोई ख़ास दिलचस्पी है कि बेगूसराय में इस बार कौन जीतेगा और कौन किसको हरा सकता है या हराएगा. मैं एक पत्रकार हूं और मेरे लिए बेगूसराय भारत की 543 लोकसभा सीटों में से सिर्फ़ एक सीट है.
    मैं तो कुछ और ही कहना चाहता हूं.
    जावेद अख़्तर ने ख़ुद कहा कि मुंबई के अमीर इलाक़ों तक में बेगूसराय का ज़िक्र हो रहा है और वहां भी लोगों का ध्यान इस सीट पर है.
    उन्होंने कहा कि बेगूसराय इसलिए अहम है क्योंकि एक तरफ़ एक ऐसी ताक़त है (उनका इशारा बीजेपी के गिरिराज सिंह से था) जिसके पास मज़बूत संगठन है, पैसा है, मीडिया है और दूसरी तरफ़ सिर्फ़ एक लड़का (कन्हैया कुमार) जिसके साथ आप (वहां बैठे लोग या आम जनता) हैं.

    तो जावेद साहब आपने जिस कन्हैया को सिर्फ़ एक लड़का कहकर हमदर्दी बटोरने की कोशिश की वो इतना भी बेचारे नहीं जितना आपने बताने की कोशिश की. वो एक ग़रीब मगर सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक तौर पर संपन्न हैं.
    जेएनयू से पीएचडी की है, वहां के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे हैं. उनके चुनावी ख़र्चे के लिए कुछ ही दिनों में 70 लाख रुपए लोगों से जमा हो गए. जिनके समर्थन में ख़ुद जावेद अख़्तर मुंबई से चलकर बेगूसराय आए और जिस पर इस देश की अधिकतर मीडिया मेहरबान है वो भला ‘सिर्फ़ एक लड़का’ कैसे कहा जा सकता है.
    लेकिन मेरे लिए ये भी कोई बहुत अहम बात नहीं है.
    जावेद अख़्तर ने गिरिराज सिंह का हवाला देते हुए कहा कि बेगूसराय में इस बात को तय करना है कि भारत के अल्पसंख्यकों को देश का हिस्सा समझना है या उन्हें पाकिस्तान का वीज़ा देना है. ये बहुत ही अहम सवाल है लेकिन ये सवाल देश के 543 सीटों पर है सिर्फ़ बेगूसराय में नहीं और अगर सारे देश में ये सवाल नहीं तो फिर बेगूसराय में ये सवाल क्यों? लेकिन अगर जावेद साहब के सवाल को जायज़ मान भी लिया जाए तो उनका जवाब सुनकर मुझे ज़्यादा अफ़सोस हुआ.
    जावेद अख़्तर ने तनवीर हसन का एक बार फिर मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्हें बीच (गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार) में पड़ी ‘कौड़ी’ और ‘पत्ता’ क़रार दिया.
    पहली बात तो ये कि न जाने किस आधार पर उन्होंने ये मान लिया कि बेगूसराय में गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार के बीच सीधी लड़ाई है और तनवीर हसन इस दौड़ में हैं ही नहीं.

    क्या लालू का मोदी विरोध किसी से कम है?
    जावेद अख़्तर जिस उम्मीदवार के हक़ में वोट मांगने आए हैं उनको सबसे आगे बताना उनका न सिर्फ़ हक़ है बल्कि फ़र्ज़ भी है. हालांकि ज़मीनी हालात उनके हक़ और फ़र्ज़ दोनों से अलग हैं फिर भी मैं उनके इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता.

    लेकिन उन्होंने तनवीर हसन के लिए जिस तरह से कौड़ी और पत्ता जैसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया यक़ीनन वो जावेद अख़्तर साहब के कद के लोगों को शोभा नहीं देती.
    उन्होंने बेगूसराय के मुसलमान वोटरों को इस पत्ते (तनवीर हसन) से होशियार रहने के लिए भी कहा. राष्ट्रीय जनता दल और उसके सहयोगी पार्टियों के बारे में कहा कि तनवीर हसन के जो कमिटेड (कैडर वोट) वोट हैं उनका कमिटमेंट किसी एक पार्टी (राजद) या किसी एक नेता (लालू प्रसाद) से है और ये कमिटमेंट इस देश के कमिटमेंट से ज़्यादा बड़ा नहीं है.

    यहां पर जावेद अख़्तर साहब को ये याद दिलाना ज़रूरी है कि उन्होंने जिस एक नेता का ज़िक्र इशारों में किया उनका नाम लालू प्रसाद है. और इस समय ख़ुद जावेद अख़्तर साहब देश के साथ जिस कमिटमेंट की बात कर रहे हैं, लालू प्रसाद पिछले तीस सालों से वो कमिटमेंट निभा रहे हैं.
    लालू प्रसाद में हज़ारों ख़ामियां हो सकती हैं और हैं भी, लेकिन जावेद अख़्तर साहब जिस आरएसएस, मोदी और गिरिराज सिंह का ख़ौफ़ दिखा रहे थे उस संघ-बीजेपी-मोदी का हिंदी पट्टी में सबसे प्रखर विरोधी चेहरा भला लालू प्रसाद के अलावा दूसरा कौन हो सकता है. तो फिर इस ख़तरे से लालू की पार्टी का उम्मीदवार क्यों न लड़े, ये लड़ाई सिर्फ़ कन्हैया लड़े, इसकी कोई जायज़ वजह मुझे तो समझ में नहीं आती.
    जावेद साहब ने आगे कहा कि तनवीर साहब के बिना खेल में मज़ा नहीं था. उनका कहना था, ”अगर तनवीर साहब उम्मीदवार नहीं होते तो सभी मुसलमान कन्हैया को वोट दे देते लेकिन तनवीर साहब के होने के कारण मुसलमानों के लिए आज़माइश की घड़ी है.”
    उन्होंने भाषण के आख़िर में कहा कि ”ये भी हम देखेंगे कि आपको (मुसलमानों) सेक्युलरिज़्म सिर्फ़ दूसरों से चाहिए या ख़ुद भी रखते हैं.”

    मुसलमानों पर सवाल?
    तनवीर हसन की पूरी शख़्सियत को ख़ारिज करते हुए जावेद अख़्तर ने उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मुसलमान बता दिया. वो ये भूल गए कि कन्हैया की जितनी उम्र है उससे ज़्यादा लंबा तनवीर हसन का संघर्ष भरा सियासी सफ़र रहा है. एक मुसलमान होने के अलावा तनवीर हसन एक मज़बूत पार्टी और एक मज़बूत गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार हैं. लेकिन इन सभी चीज़ों को भुलाकर जावेद अख़्तर ने एक ऐसा चश्मा लगाकर देखा जिसमें उन्हें तनवीर हसन सिर्फ़ एक मुसलमान दिखे.
    न सिर्फ़ तनवीर हसन बल्कि उन्होंने बेगूसराय के सारे मुसलमान वोटरों को भी मज़हब के चश्मे से देखा.
    जावेद अख़्तर ने ये कहते हुए उन्हें कठघरे में डाल दिया कि ये उनके लिए आज़माइश की घड़ी है.
    जावेद अख़्तर के लिए सेक्युलरिज़्म की पहचान ये है कि मुसलमान एक दूसरे मुसलमान यानी तनवीर हसन को वोट न दे. अगर बेगूसराय का मुसलमान तनवीर हसन को वोट देता है तो वो जावेद अख़्तर की नज़रों में कम्युनल हो जाएगा.
    क्या जावेद अख़्तर साहब किसी हिंदू मोहल्ले में कन्हैया के ही समर्थन में जाकर ये कह सकते हैं कि आप गिरिराज सिंह को वोट नहीं देकर कन्हैया को वोट दें और ये हिंदुओं के सेक्युलरिज़्म की परीक्षा है. जावेद अख़्तर साहब सेक्युलरिज़्म का सारा बोझ मुसलमानों के ही कंधे पर क्यों?
    अगर कन्हैया गठबंधन का साझा उम्मीदवार होता और तनवीर हसन किसी दूसरी छोटी पार्टी से या निर्दलीय खड़े होते और मुसलमान सिर्फ़ मज़हब के नाम पर तनवीर हसन को वोट देते तो जावेद साहब की बातों में शायद कुछ दम होता. लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल उल्टा है.
    बेगूसराय के दूसरे सभी धर्म और जाति के लोगों की तरह मुसलमानों को भी अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देने का हक़ है. लेकिन जावेद अख़्तर साहब का मानना है कि मुसलमान अगर कन्हैया को वोट दे तो सेक्युलरिज़्म की परीक्षा में पास और अगर तनवीर हसन को वोट दे तो वो इस आज़माइश में फ़ेल होगा.

    अगर जावेद अख़्तर साहब को इस देश की इतनी ही फ़िक्र है तो देश की बाक़ी 542 सीटों की फ़िक्र क्यों नहीं. अगर कन्हैया जीत भी जाते हैं और बीजीपी की सरकार बन जाती है तो क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा? उनके मुताबिक़ देश को जो ख़तरा है वो तो बना रहेगा.
    जावेद अख़्तर साहब ने बीजेपी विरोधी सभी पार्टियों पर इस बात के लिए क्यों नहीं दबाव बनाया कि वो बीजेपी विरोधी वोट न बंटने दें. ये सारा बोझ बेगूसराय के मुसलमानों को अकेले उठाने के लिए क्यों कह रहे हैं.
    लेकिन अगर केवल वैचारिक और सैद्धांतिक स्तर पर भी देखा जाए तो तनवीर हसन की गिरिराज सिंह पर जीत (अगर हुई तो) ज़्यादा अहमियत रखती है. जिस मुसलमान क़ौम को गिरिराज सिंह पिछले पांच सालों से बात-बात पर पाकिस्तान भेजने की धमकी देते रहे हैं अगर उसी क़ौम का एक व्यक्ति भारतीय संविधान के अंतर्गत कराए जा रहे चुनाव में लोकतांत्रिक तरीक़े से उनको मात देता है तो ये भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी बड़ी बात होगी!

    (इनपुट बीबीसी के शुक्रिया के साथ)

  • मधुबनी:मिल्लत टाइम्स की ख़बरों का असर,अशरफ अली फातमी ने अपना नामांकन लिया वापस

    वोटो के विभाजन से बचने और NDA को हराने के के लिए डॉक्टर शकील अहमद को दिया अपना समर्थन

    एम कैसर सिद्दीकी/मिल्लत टाइम्स,मधुबनी: ज्ञात हो कि कांग्रेस के सीनियर लीडर डॉ शकील साहब ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन दाखिल किया था उसके बाद ही आरजेडी के सीनियर लीडर अशरफ अली फातमी का टिकट कट जाने के कारण उन्होंने भी दरभंगा को छोड़कर मधुबनी में आकर बीएसपी पार्टी की तरफ से अपना नामांकन किया था दोनों को एक साथ आने की वजह से मधुबनी की वोटरों में कंफ्यूजन आ गया कि हम किसे वोट करें और किसे नहीं करें

    उसी को लेकर मिल्लत टाइम्स ने मतदाताओं से राय लिया तो उन्होंने कहा कि दोनों में से किसी कोई एक बैठ जाते हैं तो हम एक को वोट करेंगे वरना दोनों अगर खड़े रहेंगे तो हम कैसे तय करेंगे किसे वोट दे और किसे नहीं दे अगर दोनों लड़ेंगे तो हम महागठबंधन को वोट देंगे, इसी को लेकर अली अशरफ फातमी से मिल्लत टाइम्स ने इंटरव्यू लिया था और उसके बाद अली अशरफ फातमी ने अपनी कुर्बानी देते हुए उन्होंने अपना नामांकन वापस लेने का फैसला किया

  • बिहार:कांग्रेस के दिग्गज नेता शकील अहमद ने दिया इस्तीफा,मधुबनी से निर्दलीय किया नामांकन

    मिल्लत टाइम्स,मधुबनी।:पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. शकील अहमद ने बागी तेवर अख्तियार कर लिया है। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद से इस्तीफा दे दिया है। साथ ही मंगलवार को मधुबनी लोकसभा क्षेत्र से नामांकन की घोषणा करने के बाद आज उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल किया।

    विदित हो कि लोकसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन में हुई सीट शेयरिंग में मधुबनी सीट विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) के खाते में गई है। यहां वीआइपी के बद्री पूर्वे महागठबंधन के अधिकृत प्रत्‍याशी हैं। लेकिन डॉ. शकील अहमद ने भी यहां से नामांकन करने की घोषणा की थी।

    डॉ. शकील अहमद का तर्क है कि महागठबंधन के तहत सुपौल कांग्रेस के हिस्से में है, लेकिन वहां कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन के विरुद्ध राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) के एक नेता ने निर्दलीय के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया और राजद ने उसका समर्थन भी कर दिया है। इसी तरह उन्‍हें भी मधुबनी में कांग्रेस के समर्थन की उम्‍मीद है।

    डॉ. शकील अहमद ने कहा कि उन्‍होंने क्षेत्र की जनता, कांग्रेसजनों और समाज के विभिन्न तबकों के दबाव पर चुनाव लडऩे का फैसला किया है। डॉ. शकील अहमद ने एक ट्वीट भी किया है। ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि वे कल मधुबनी संसदीय सीट से अपना नामांकन दाखिल करेंगे। यह जानकारी भी दी है कि उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा कर दिया है।

  • शिवहर राजद अध्यक्ष का विवादित बयान , “फैसल अली” को अकबर बताया

     

    शिवहर ( मिल्लत टाइम्स)

    महागठबंधन के शिवहर लोकसभा प्रत्याशी सैयद फैसल अली के स्वागत समारोह के बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवहर राजद अध्यक्ष दीपू वर्मा द्वारा फैसल अली को दूसरा अकबर बताया गया है । जिसके बाद उनके बयान पर पलटवार होने शुरू हो गए हैं ।

     

    मोतीहारी के युवा नेता और जिला पार्षद संजय सिंह ने शिवहर राजद जिलाध्यक्ष दीपू वर्मा द्वारा एक प्रेस वार्ता में शिवहर लोकसभा के राजद प्रत्याशी सैयद फैसल अली को दूसरा अकबर कहने पर कटाक्ष किया है। श्री सिंह ने कहा कि राजद के लोगो का अकबर प्रेम उबाल मार रहा है।अब भी इनके दिमाग मे अकबर महान वाला कीड़ा है।जिस कारण उन्होंने अपने लोकसभा प्रत्याशी सैयद फैसल अली को अकबर की संज्ञा दी है।परन्तु उन्हें भूलना नही चाहिए कि शिवहर छोटा चित्तौरगढ़ के नाम से प्रख्यात है।और चित्तौरगढ़ पर शासन हमेशा महाराणा प्रताप ने किया,अकबर ने नही।उन्होंने कहा कि चित्तौरगढ़ की जनता के दिल मे हमेशा महाराणा प्रताप ही रहते है,अकबर के लिए कोई जगह नही है। सिंह ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में शिवहर की जनता अकबर और महाराणा प्रताप में से स्वयं अपना प्रतिनिधि चुन लेगी।