Category: चुनाव

  • लोकसभा चुनाव 2019:बिहार में सत्तारुढ़ पार्टी JDU ने नहीं किया घोषणापत्र जारी आखिर क्यों?

    चुनावी बिगुल बजने के बाद हर लम्हा राजनीतिक दलों से किसी न किसी घोषणा का इंतज़ार किया जाता है. कभी उम्मीदवारों की घोषणा का इंतज़ार होता है तो कभी उनके नामांकन का.

    इसी प्रक्रिया में पार्टियां अपना घोषणापत्र भी जारी करती हैं. हालांकि, हाल के सालों में पार्टियां अपने घोषणापत्रों को नए-नए नामों से जारी कर रही हैं.

    लोकसभा चुनाव का तीसरा चरण पूरा हो चुका है और सोमवार को चौथे चरण के मतदान के बाद आधी से ज़्यादा चुनावी यात्रा पूरी हो जाएगी. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बिहार में सत्तारुढ़ और बीजेपी के साथ गठबंधन में शामिल जेडीयू ने अभी तक अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है.

    जेडीयू का घोषणापत्र जिसे ‘निश्चय पत्र’ कहा जा रहा है, उसको जारी करने की तारीख़ 14 अप्रैल तय की गई थी लेकिन वह अभी तक जारी नहीं हो पाया है.

    क्यों नहीं हो पाया घोषणापत्र जारी?
    जेडीयू का घोषणापत्र जारी होने में इतनी देरी क्यों हो रही है? इस सवाल पर जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं कि तीसरे चरण तक जनता ने जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम पर वोट किया है और घोषणापत्र के लिए एक कमिटी बनी है जो इस पर अपनी राय देने के बाद इसे जारी करने की तारीख़ बताएगी.

    घोषणापत्र से इतर राजीव रंजन कहते हैं कि नीतीश कुमार ने अपने कामों से बिहार में नाम बनाया है, उन्होंने घोषणाओं से ज़्यादा काम किया है और इसी काम के आधार पर जनता उन्हें चुनावों में समर्थन दे रही है.

    ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि गठबंधन के सबसे बड़े दल बीजेपी के घोषणापत्र के कारण जेडीयू अपना घोषणापत्र जारी करने में हिचकिचा रही है. बीजेपी अपने घोषणापत्र में खुलकर धारा 370, 35ए, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर पर अपने वादे दोहराती रही है.

    क्या जेडीयू अपनी सहयोगी पार्टी के कारण घोषणापत्र लाने में देरी कर रही है? इस पर जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं, “घोषणापत्र अपनी जगह पर है लेकिन राम मंदिर, धारा 370 जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर बीजेपी हमारे विचारों का सम्मान करती रही है और इससे घोषणापत्र को जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.”

    वह कहते हैं, “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम इसीलिए होता है जिसमें असहमतियों पर सहमति बनाई जाती है और कई असहमतियों के बावजूद हम 17 सालों तक बीजेपी के साथ रहे. घोषणापत्र में क्या-क्या चीज़ें होंगी यह अभी गोपनीयता का विषय है.”

    बीजेपी ने अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ का नाम दिया है
    बीजेपी का क्या कहना?
    बिहार में बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर साथ चुनाव लड़ रही हैं. बीजेपी ने अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ के नाम से जारी किया है. बीजेपी का कहना है कि यह उसका रोडमैप है जो उसने लोगों की राय के बाद बनाया है.

    बीजेपी के घोषणापत्र में लिखित कुछ बिंदुओं के कारण क्या जेडीयू अपना घोषणापत्र लाने से बच रही है? इस सवाल पर बिहार बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं कि बीजेपी के साथ गठबंधन में मौजूद पार्टियां स्वतंत्र पार्टियां हैं और यह उन पर निर्भर करता है कि वह अपना घोषणापत्र लाते हैं या नहीं लाते हैं.

    निखिल आनंद कहते हैं कि बिहार की जनता मोदी सरकार के काम और नाम पर मतदान कर रही है और इसके लिए घोषणापत्र न लाए जाने को इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.

    धारा 370, 35ए और राम मंदिर मुद्दों पर वह कहते हैं कि बीजेपी इनको लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और यह पहली बार उनके घोषणापत्र में नहीं आया है और इन मुद्दों के कारण सहयोगी दलों से कोई मतभेद नहीं है.

    विपक्ष ने भी साधा निशाना
    जेडीयू का घोषणापत्र जारी न होने को राष्ट्रीय जनता दल ने भी बड़ा मुद्दा बनाया है. आरजेडी का कहना है कि इससे साबित होता है कि जेडीयू बीजेपी की बी टीम बन गई है.

    आरजेडी अपना घोषणापत्र जारी कर चुकी है जिसे उसने इसे ‘प्रतिबद्धता पत्र’ का नाम दिया है.

    आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं कि नीतीश कुमार ने भय की वजह से अपनी पार्टी का घोषणापत्र जारी नहीं किया है.

    वह कहते हैं, “बीजेपी ने अपने घोषणापत्रों में जिन चीज़ों को लेकर वादा किया है, उस पर नीतीश कुमार को सफ़ाई देनी होती. इसी कारण उन्होंने घोषणापत्र लाने की हिम्मत नहीं की और यह संकेत है कि नीतीश जी बीजेपी में विलीन हो चुके हैं सिर्फ़ औपचारिकताएं बाकी हैं.”।

    (इनपुट बीबीसी)

  • AAP MP:संजय सिंह की EC से मांग,चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित हों मोदी

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:AAP सांसद ने वाराणसी के एडीएम को दिए अपने शिकायती पत्र में दावा किया कि पीएम मोदी की नामांकन रैली में 1 करोड़ 27 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, जो चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 70 लाख की खर्च सीमा का उल्लंघन है. इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए.

    आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव लड़ने से अयोग्य करने की मांग की है. संजय सिंह ने चुनाव आयोग से शिकायत कर कहा है कि पीएम ने अपने नामांकन के दौरान नियमों का उल्लंघन कर पैसे खर्च किए हैं, जिसके लिए पीएम मोदी को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए.

    संजय सिंह ने वाराणसी के एडीएम को दिए अपने शिकायती पत्र में दावा किया कि पीएम मोदी की नामांकन रैली में 1 करोड़ 27 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, जो चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 70 लाख की खर्च सीमा का उल्लंघन है. इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए.

    नेताओं के विमान पर 64 लाख खर्च

    संजय सिंह ने दावा किया है कि पीएम मोदी के नामांकन में निजी विमान के उपयोग में 64 लाख रुपये खर्च किए गए. इसके लिए उन्होंने तर्क दिया है कि पीएम के नामांकन के दिन प्रकाश सिंह बादल, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे वाराणसी पहुंचे थे. संजय सिंह ने अपने पत्र में लिखा, “एक विमान का एक घंटे का खर्च लगभग 2-3 लाख रुपये होता है, अनुमानित तौर पर एक जहाज आठ घंटे के लिए बुक किया गया तो कुल मिलाकर 16 लाख रुपये एक जहाज का खर्च आता है, अर्थात चार निजी विमान का अनुमानित खर्च 64 लाख रुपया है.”

    संजय सिंह का दावा है कि लगभग 100 से ज्यादा नेता देश के दूसरे स्थानों से वाराणसी पहुंचे और नरेंद्र मोदी के नामांकन में शामिल हुए. अगर एक व्यक्ति का औसत खर्चा 15 हजार रुपया जोड़ा जाए तो कुल राशि 15 लाख रुपये होती है.

    20 लाख ट्रेन का किराया

    आप सांसद ने कहा है कि नामांकन रैली में 2 हजार कार्यकर्ता गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों से ट्रेन के जरिए वाराणसी पहुंचे. उन्होंने हिसाब बताते हुए कहा है कि अगर एक व्यक्ति का खर्च 1 हजार रुपये जोड़ा जाए तो कुल खर्च 20 लाख रुपये होते हैं.

    इसके अलावा संजय सिंह ने कहा है कि होटल में नेताओं और कार्यकर्ताओं के रहने-खाने पर 8 लाख रुपया औसतन खर्च किया गया है. संजय सिंह के मुताबिक नामांकन के दिन 200 से अधिक चौपहिया वाहनों का इस्तेमाल किया गया. इन पर 6 लाख रुपये का खर्च आया. संजय सिंह ने कहा है कि नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए 5000 खाने के पैकेट लाए आए, इसमें एक आकलन के मुताबिक 5 लाख रुपये खर्च किए गए. इसके अलावा 5 लाख रुपये झंडा, फूल, बैनर और दूसरी प्रचार सामग्री पर खर्च किया गया.

    2 लाख सोशल मीडिया पर, 2 लाख का साउंड सिस्टम

    संजय सिंह के मुताबिक सोशल मीडिया पर प्रचार में 2 लाख खर्च किया गया, इसके अलावा नामांकन के दिन इस्तेमाल साउंड सिस्टम में भी 2 लाख खर्च हुआ.

    संजय सिंह ने आखरी में कहा है कि इस तरह से नामांकन में कुल 1 करोड़ 27 लाख रुपये खर्च किए गए जो चुनाव आयोग की सीमा से ज्यादा है. उन्होंने चुनाव आयोग से इस मामले की जांच की मांग की है और लोक प्रतिनिधि कानून 1951 की धारा 10 ए और धारा 77 (1) के तहत नरेंद्र मोदी को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग की है.

  • पी चिदंबरम ने कहा-देश को निराश कर रहा आयोग,मोदी के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना चाहता

    मिल्लत टाइम्स,मुंबई:कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने शनिवार को चुनाव आयोग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कार्रवाई करने में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया। चिदंबरम ने कहा, आयोग देश के लोगों को निराश कर रहा है।

    तीसरे चरण तक एनडीए पर बढ़त बना रही है कांग्रेस
    चिदंबरम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, मोदी की हर रैली में 10 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो रहा है। लेकिन चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में मोदी पर कार्रवाई नहीं करना चाहता है।

    चिदंबरम ने दावा किया कि अभी तक जहां चुनाव हुए हैं, इस स्थिति में कांग्रेस गठबंधन एनडीए पर अच्छी खासी बढ़त बना रहा है। इससे पहले मोदी ने शुक्रवार को कहा था, कांग्रेस इस चुनाव में 50 भी सीटें नहीं जीत पाएगी।

    चिदंबरम के साथ मौजूद महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने कहा, धुले में शुक्रवार को नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु के हेलिकॉप्टर से एक बॉक्स लाया गया। इस मामले की जांच होनी चाहिए।

    उन्होंने तंज कसा, इस बॉक्स में आम तो नहीं होंगे। इसमें और कुछ था। आयोग को इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए और मामले की जांच करनी चाहिए।

    इससे पहले सुरेश प्रभु ने शुक्रवार को वीडियो क्लिप को गलत बताया था। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि धुले में सुरेश प्रभु के हेलिकॉप्टर से संदिग्ध बॉक्स उतारा गया था। इस मामले में जब प्रभु से पूछा गया कि आरोप हैं कि बॉक्स में 15 करोड़ रुपए थे, इस पर उन्होंने जवाब दिया कि उनके जेब में 15 रुपए तक नहीं है, तो 15 करोड़ का सवाल कहां से आ गया।

    (इनपुट भास्कर)

  • भोपाल:हमनाम निर्दलीय प्रत्याशी के घर पहुंचीं प्रज्ञा,साध्वी के मनाने पर बोली अब नहीं लड़ेंगे चुनाव

    मिल्लत टाइम्स,भोपाल:भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर शुक्रवार को अपनी हमनाम और निर्दलीय प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर के घर पहुंचीं। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव न लड़ने की अपील की। साध्वी की अपील पर निर्दलीय प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर ने चुनाव न लड़ने का ऐलान किया।

    भोपाल सीट से भाजपा के टिकट पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ही नहीं, बल्कि उनकी हमनाम निर्दलीयप्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर ने भी नामांकन किया। अपने हमनाम प्रत्याशी के चुनाव मैदान में उतरने से न केवल साध्वी, बल्कि भाजपा भी परेशान थी। इसका जिक्र खुद साध्वी प्रज्ञा ने गुरुवार को सीहोर की आमसभा में भीकिया था। भाजपा और साध्वी का डर था, हमनाम प्रत्याशी होने सेवोटर्स कंफ्यूज हो सकते हैं और उनके वोट बंट सकते हैं।

    प्रज्ञा ने भगवा कपड़ा ओढ़ाकर निर्दलीय प्रत्याशी का सम्मान किया

    साध्वी प्रज्ञा शुक्रवार सुबह भाजपा उपाध्यक्ष प्रभात झाके साथनिर्दलीय प्रत्याशीके घर पहुंचीं। साध्वी ने प्रज्ञा ठाकुर को भगवा कपड़ा ओढ़ाकर उनका सम्मान किया। साध्वी की अपील के बाद प्रज्ञा ठाकुर तुरंत मान गई और नाम वापस लेने का ऐलान कर दिया।

    ये भी बढ़ा रहे हैं साध्वी की मुश्किलें

    भोपाल मेंएक और उम्मीदवार ऐसेहैं, जिसे लेकर चर्चा हो रही है। मुंबई हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे के जूनियर और महाराष्ट्र के रिटायर्ड अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर रियाजुद्दीन गयासुद्दीन देशमुख ने निर्दलीय नामांकन किया। वो प्रज्ञा सिंह ठाकुर के शहीद करकरे पर दिए बयान से नाराज हैं। इसलिए उन्होंने उनके खिलाफ चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। साध्वी नेहेमंत करकरे को लेकर विवादित बयान दिया था।

  • हलफनामा:मोदी के पास 38,750 रुपए कैश,कुल संपत्ति 2.51 करोड़;5 साल में 50% का इजाफा

    मिल्लत टाइम्स,वाराणसी:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को वाराणसी से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया। हलफनामे के मुताबिक, पिछले 5 साल में मोदी की संपत्ति में करीब 50% का इजाफा हुआ है। घर के दाम में 10 लाख की बढ़ोतरी भी दिखाई गई, पर सोने की अंगूठियों के दाम पिछली बार से कम दिखाए गए हैं।

    मोदी की चल-अचल संपत्ति 2.51 करोड़ रु.

    हलफनामे के मुताबिक, मोदी की कुल चल-अचल संपत्ति 2,51,36,119 रु. है जबकि 2014 में दिए हलफनामे के अनुसार उनकी कुल चल-अचल संपत्ति 1,65,91,582 थी। मोदी ने 2014 में गांधीनगर स्थित घर की कीमत 1 करोड़ रु. बताई थी। इस बार हलफनामे में इस मकान की कीमत 1.10 करोड़ रु. हो गई है। 4 सोने की अंगूठियों की कीमत 1,13,800 रु. बताई है। 2014 में 45 ग्राम की इन अंगूठियों की कीमत 1,35,000 बताई थी, यानी इस बार इनकी कीमत 21200 रु. घट गई। हलफनामे में बताया गया कि मोदी के गांधीनगर स्थित एसबीआई बैंक के खाते में 4,143 रु. हैं। एफडी में 1,27,81,574 रु., 7,61,466 रु. की एनएससी और 1,90,347 रु. की एलआईसी है। मोदी के एक कंपनी में 20 हजार रु. के शेयर हैं। कैश के रूप में उनके पास 38,750 रु. हैं।

    2014 के हलफनामे में क्या दर्शाया गया था
    कैश 32,700 रु.
    बैंक खातों में जमा रकम 58.54 लाख रु.
    कंपनी मेंशेयर 20 हजार रु.
    एनएससी 2.35 लाख रु.
    एलआईसी। 1.99 लाख रु.

    4 चरणों में 5378 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 4.50 करोड़
    चार चरणों में 5378 उम्मीदवारों के हलफनामों का विश्लेषण एडीआर ने किया है। इसके आधार पर इनकी औसत संपत्ति 4.50 करोड़ रु. निकली। पहले चरण में 1266 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 6.63 करोड़, दूसरे चरण में 1590 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 3.9 करोड़, तीसरे चरण में 1594 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.95 करोड़ और चौथे चरण में 928 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 4.50 करोड़ रु. रही।

    (इनपुट भास्कर)

  • प्रधानमंत्री मोदी ने कहा-बनारस के फक्कड़पन में ये फकीर भी रम गया

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:मेगा रोड शो और गंगा जी की आरती के बाद पीएम मोदी ने एक सभा को भी संबोधित किया. जिसमें उन्होंने कहा कि पांच साल पहले जब मैं काशी आया था तो मैंने कहा था मां गंगा ने मुझे बुलाया हैं. मुझे एक सांसद के रुप में काशी के ज्ञान से जुड़ने और उसे आगे बढ़ाने का अवसर मिला. मैं इसके लिए बाबा विश्ववाथ और मां गंगा के प्रति पूर्ण श्रद्धाभाव से नमन करता हूं. काशी ने मुझे सिर्फ एमपी नहीं पीएम बनने का आशीर्वाद दिया. मुझे 130 करोड़ भारतीयों के विश्वास की ताकत दी. पीएम ने अपने संसदीय क्षेत्र में कहा कि मैया ने ऐसा दुलार दिया, काशी के भाइयों-बहनों ने इतना प्यार दिया कि बनारस के फक्कड़पन में ये फकीर भी रम गया.

    ये मेरा सौभाग्य है कि काशी की वेद परंपरा को ज्ञान के विश्लेषण और तार्किक अनुभवों से जुड़ सका. काशी का ये प्रसाद मुझे अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन को तार्किक बनाने की शक्ति देता है. काशी की धार्मिक आस्था से महात्मा बुद्ध, गोस्वामी तुलसीदास, संत रविदास, कबीरदास, रामानंद जैसे विचारकों ने प्रेरणा ली. सत्य, न्याय, अहिंसा और ज्ञान की इस प्रेरणा ने मुझे भी वैश्विक स्तर पर इन मूल्यों के साथ खड़े होने का संबल दिया है.

  • पीएम मोदी ने कहा-पिछले 5 साल में किसी मंदिर पर आतंकी हमला नहीं हुआ

    मिल्लत टाइम्स नई दिल्ली:आतंकवाद के मुद्दे पर पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए पीएम मोदी ने कहा कि यहां संकटमोचन मंदिर समेत हमारे आस्था के केंद्रों पर 2005 से 2014 तक लगातर आतंकी हमले हुए. यहां पर आरती कर रहे निर्दोष भक्तों की कायरतापूर्ण हत्या को याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

    उस समय की सरकार हर हमले के बाद वार्ता के अलावा कुछ नहीं करती थी. पिछले 5 साल में किसी मंदिर पर आतंकी हमला नहीं हुआ. आतंकियों को बता दिया कि नया भारत सहता नहीं, मुंहतोड़ जवाब देता है. मानवता का फर्जी चोला पहनने वालों पर भी लगाम कसी. हमने आतंकियों को बता दिया कि नया भारत सहता नहीं, मुंहतोड़ जवाब देता है. पीएम मोदी के मुताब‍िक, मैं देश हित के अलावा किसी और का हित नहीं सोचूंगा.

  • लोकसभा चुनाव2019:जावेद अख़्तर कन्हैया के प्रचार में ये क्या बोल गए?

    बिहार के बेगूसराय में सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के समर्थन में एक सभा को संबोधित करते हुए मशहूर लेखक-गीतकार और राज्यसभा के पूर्व सांसद जावेद अख़्तर ने 39 मिनट का भाषण दिया.

    जावेद अख्तर
    शुरुआती 30 मिनटों में उन्होंने बीजेपी, आरएसएस, मुस्लिम लीग, नरेंद्र मोदी वग़ैरह के बारे में बहुत कुछ कहा. मैं उन पर कुछ नहीं कहना चाहता.
    मैं बात करना चाहता हूं उनके भाषण के आख़िरी नौ मिनटों पर.
    जावेद अख़्तर के मुताबिक़, कोई उन्हें कह रहा था कि मुसलमानों को एक होकर वोट देना चाहिए. उनको ये बात सही नहीं लगती क्योंकि धर्म के आधार पर वोट नहीं करना चाहिए. भला ऐसा कौन होगा जो जावेद अख़्तर की इस बात से इनकार करेगा.
    उसके बाद वो बेगूसराय से एक दूसरे उम्मीदवार डॉक्टर तनवीर हसन का लगभग मज़ाक़ उड़ाते हुए और उनके पूरे वजूद को नकारते हुए कहते हैं, ”यहां एक और साहब भी इलेक्शन लड़ रहे हैं.”
    मैं मानता हूं कि जावेद अख़्तर मुंबई में रहते हैं इसलिए बिहार के किसी एक लोकसभा सीट के किसी उम्मीदवार का नाम याद रखने की उम्मीद उनसे नहीं की जानी चाहिए, ख़ास तौर पर उस उम्मीदवार का नाम जिसको भारत की अधिकतर मीडिया ने भी जानबूझकर या अनजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया है.
    लेकिन किसी उम्मीदवार का नाम याद नहीं रहना और उसका मज़ाक़ उड़ाना ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं. उर्दू का इतना बड़ा शायर, जांनिसार और सफ़िया अख़्तर का लख़्त-ए-जिगर, मजाज़ का भांजा, कैफ़ी का दामाद और शबाना का शौहर लफ़्ज़ों और लहजे के इस फ़र्क़ को तो ज़रूर जानता होगा.


    कन्हैया कुमार

    किस पर तंज़ कर रहे थे अख़्तर
    जावेद अख़्तर ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा साफ़ तौर पर बेगूसराय के मुसलमान वोटरों की तरफ़ था. और इसे इशारा कहना भी सही नहीं क्योंकि अगले ही जुमले में उन्होंने कह दिया, ”अगर आपने कन्हैया को वोट नहीं दिया तो फिर बीजेपी जीतेगी. तो फिर ऐसा कीजिए ना, जाइए सलाम वालैकुम कहिए और कहिए हुज़ूर ये बीजेपी के लिए वोट लेकर आया हूं. तो कम से कम बीजेपी वाले आपका एहसान तो मानेंगे. आप अगर वहां (तनवीर हसन) वोट दे देंगे जो बीजेपी की मदद तो कर देगा लेकिन बीजेपी पर एहसान नहीं होगा. ये तो बड़ी नादानी की बात होगी.”
    जावेद अख़्तर ख़ुद को बेशक नास्तिक कहते हैं लेकिन वो ये तो ज़रूर जानते होंगे कि दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान जब एक दूसरे से मिलते हैं वो ‘अस्सलाम वालैकुम’ कहते हुए एक दूसरे का अभिवादन करते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है आप पर अल्लाह की सलामती हो.
    जावेद अख़्तर एक शायर हैं इसलिए हंसी-मज़ाक उनका हक़ है लेकिन उन्होंने जिस तरह से ‘सलाम वालैकुम’ कहा वो लहजा इस शब्द और उसको बोलने वाले करोड़ों लोगों का मज़ाक़ उड़ाने जैसा था.
    अपने भाषण के दौरान जावेद अख़्तर बार-बार ये कहते रहे कि जो लोग (यानी कि अब तो साफ़ हो गया कि उनका मक़सद बेगूसराय के मुसलमान वोटरों से था), तनवीर हसन को वोट देना चाहते हैं उन्हें सीधा गिरिराज सिंह के पास चले जाना चाहिए.
    जावेद अख़्तर के लफ़्ज़ों में बेगूसराय से वो जो ‘एक और साहब इलेक्शन लड़ रहे हैं’ वो राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस-आरएलएसपी-हम-वीआईपी पांच पार्टियों के गठबंधन के उम्मीदवार डॉक्टर तनवीर हसन हैं.


    कन्हैया कुमार, गिरीराज सिंह और तनवीर हसन

    तनवीर का क़द
    वो बिहार की सबसे बड़ी पार्टी (बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में सबसे ज़्यादा 80 सीटें जीतने वाली पार्टी) राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और एक वरिष्ठ नेता हैं. 2014 में जब जावेद अख़्तर की मुंबई समेत पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में मोदी की लहर थी तब तनवीर हसन ने मोदी के उम्मीदवार भोला सिंह को कड़ी टक्कर दी थी और सिर्फ़ 58 हज़ार वोटों से हारे थे. और बीजेपी के जिस भोला सिंह से तनवीर हसन हारे थे वो पहले उसी सीपीआई के एक बड़े नेता थे.
    उसी चुनाव में सीपीआई के उम्मीदवार को सिर्फ़ 1.92 लाख वोट मिले थे. और उस समय सीपीआई और जनता दल यूनाइटेड का गठबंधन था यानी कि क़रीब दो लाख जो वोट मिले थे उसमें जेडीयू की भी हिस्सेदारी थी.
    इसलिए आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो तनवीर हसन का पलड़ा हर हालत में कन्हैया से भारी है लेकिन मेरा मक़सद जावेद अख़्तर को एक लोकसभा की सीट पर पांच साल पहले मिले वोटों के आंकड़ों के जाल में फंसाना नहीं है. न ही मुझे इस बात में कोई ख़ास दिलचस्पी है कि बेगूसराय में इस बार कौन जीतेगा और कौन किसको हरा सकता है या हराएगा. मैं एक पत्रकार हूं और मेरे लिए बेगूसराय भारत की 543 लोकसभा सीटों में से सिर्फ़ एक सीट है.
    मैं तो कुछ और ही कहना चाहता हूं.
    जावेद अख़्तर ने ख़ुद कहा कि मुंबई के अमीर इलाक़ों तक में बेगूसराय का ज़िक्र हो रहा है और वहां भी लोगों का ध्यान इस सीट पर है.
    उन्होंने कहा कि बेगूसराय इसलिए अहम है क्योंकि एक तरफ़ एक ऐसी ताक़त है (उनका इशारा बीजेपी के गिरिराज सिंह से था) जिसके पास मज़बूत संगठन है, पैसा है, मीडिया है और दूसरी तरफ़ सिर्फ़ एक लड़का (कन्हैया कुमार) जिसके साथ आप (वहां बैठे लोग या आम जनता) हैं.

    तो जावेद साहब आपने जिस कन्हैया को सिर्फ़ एक लड़का कहकर हमदर्दी बटोरने की कोशिश की वो इतना भी बेचारे नहीं जितना आपने बताने की कोशिश की. वो एक ग़रीब मगर सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक तौर पर संपन्न हैं.
    जेएनयू से पीएचडी की है, वहां के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे हैं. उनके चुनावी ख़र्चे के लिए कुछ ही दिनों में 70 लाख रुपए लोगों से जमा हो गए. जिनके समर्थन में ख़ुद जावेद अख़्तर मुंबई से चलकर बेगूसराय आए और जिस पर इस देश की अधिकतर मीडिया मेहरबान है वो भला ‘सिर्फ़ एक लड़का’ कैसे कहा जा सकता है.
    लेकिन मेरे लिए ये भी कोई बहुत अहम बात नहीं है.
    जावेद अख़्तर ने गिरिराज सिंह का हवाला देते हुए कहा कि बेगूसराय में इस बात को तय करना है कि भारत के अल्पसंख्यकों को देश का हिस्सा समझना है या उन्हें पाकिस्तान का वीज़ा देना है. ये बहुत ही अहम सवाल है लेकिन ये सवाल देश के 543 सीटों पर है सिर्फ़ बेगूसराय में नहीं और अगर सारे देश में ये सवाल नहीं तो फिर बेगूसराय में ये सवाल क्यों? लेकिन अगर जावेद साहब के सवाल को जायज़ मान भी लिया जाए तो उनका जवाब सुनकर मुझे ज़्यादा अफ़सोस हुआ.
    जावेद अख़्तर ने तनवीर हसन का एक बार फिर मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्हें बीच (गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार) में पड़ी ‘कौड़ी’ और ‘पत्ता’ क़रार दिया.
    पहली बात तो ये कि न जाने किस आधार पर उन्होंने ये मान लिया कि बेगूसराय में गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार के बीच सीधी लड़ाई है और तनवीर हसन इस दौड़ में हैं ही नहीं.

    क्या लालू का मोदी विरोध किसी से कम है?
    जावेद अख़्तर जिस उम्मीदवार के हक़ में वोट मांगने आए हैं उनको सबसे आगे बताना उनका न सिर्फ़ हक़ है बल्कि फ़र्ज़ भी है. हालांकि ज़मीनी हालात उनके हक़ और फ़र्ज़ दोनों से अलग हैं फिर भी मैं उनके इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता.

    लेकिन उन्होंने तनवीर हसन के लिए जिस तरह से कौड़ी और पत्ता जैसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया यक़ीनन वो जावेद अख़्तर साहब के कद के लोगों को शोभा नहीं देती.
    उन्होंने बेगूसराय के मुसलमान वोटरों को इस पत्ते (तनवीर हसन) से होशियार रहने के लिए भी कहा. राष्ट्रीय जनता दल और उसके सहयोगी पार्टियों के बारे में कहा कि तनवीर हसन के जो कमिटेड (कैडर वोट) वोट हैं उनका कमिटमेंट किसी एक पार्टी (राजद) या किसी एक नेता (लालू प्रसाद) से है और ये कमिटमेंट इस देश के कमिटमेंट से ज़्यादा बड़ा नहीं है.

    यहां पर जावेद अख़्तर साहब को ये याद दिलाना ज़रूरी है कि उन्होंने जिस एक नेता का ज़िक्र इशारों में किया उनका नाम लालू प्रसाद है. और इस समय ख़ुद जावेद अख़्तर साहब देश के साथ जिस कमिटमेंट की बात कर रहे हैं, लालू प्रसाद पिछले तीस सालों से वो कमिटमेंट निभा रहे हैं.
    लालू प्रसाद में हज़ारों ख़ामियां हो सकती हैं और हैं भी, लेकिन जावेद अख़्तर साहब जिस आरएसएस, मोदी और गिरिराज सिंह का ख़ौफ़ दिखा रहे थे उस संघ-बीजेपी-मोदी का हिंदी पट्टी में सबसे प्रखर विरोधी चेहरा भला लालू प्रसाद के अलावा दूसरा कौन हो सकता है. तो फिर इस ख़तरे से लालू की पार्टी का उम्मीदवार क्यों न लड़े, ये लड़ाई सिर्फ़ कन्हैया लड़े, इसकी कोई जायज़ वजह मुझे तो समझ में नहीं आती.
    जावेद साहब ने आगे कहा कि तनवीर साहब के बिना खेल में मज़ा नहीं था. उनका कहना था, ”अगर तनवीर साहब उम्मीदवार नहीं होते तो सभी मुसलमान कन्हैया को वोट दे देते लेकिन तनवीर साहब के होने के कारण मुसलमानों के लिए आज़माइश की घड़ी है.”
    उन्होंने भाषण के आख़िर में कहा कि ”ये भी हम देखेंगे कि आपको (मुसलमानों) सेक्युलरिज़्म सिर्फ़ दूसरों से चाहिए या ख़ुद भी रखते हैं.”

    मुसलमानों पर सवाल?
    तनवीर हसन की पूरी शख़्सियत को ख़ारिज करते हुए जावेद अख़्तर ने उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मुसलमान बता दिया. वो ये भूल गए कि कन्हैया की जितनी उम्र है उससे ज़्यादा लंबा तनवीर हसन का संघर्ष भरा सियासी सफ़र रहा है. एक मुसलमान होने के अलावा तनवीर हसन एक मज़बूत पार्टी और एक मज़बूत गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार हैं. लेकिन इन सभी चीज़ों को भुलाकर जावेद अख़्तर ने एक ऐसा चश्मा लगाकर देखा जिसमें उन्हें तनवीर हसन सिर्फ़ एक मुसलमान दिखे.
    न सिर्फ़ तनवीर हसन बल्कि उन्होंने बेगूसराय के सारे मुसलमान वोटरों को भी मज़हब के चश्मे से देखा.
    जावेद अख़्तर ने ये कहते हुए उन्हें कठघरे में डाल दिया कि ये उनके लिए आज़माइश की घड़ी है.
    जावेद अख़्तर के लिए सेक्युलरिज़्म की पहचान ये है कि मुसलमान एक दूसरे मुसलमान यानी तनवीर हसन को वोट न दे. अगर बेगूसराय का मुसलमान तनवीर हसन को वोट देता है तो वो जावेद अख़्तर की नज़रों में कम्युनल हो जाएगा.
    क्या जावेद अख़्तर साहब किसी हिंदू मोहल्ले में कन्हैया के ही समर्थन में जाकर ये कह सकते हैं कि आप गिरिराज सिंह को वोट नहीं देकर कन्हैया को वोट दें और ये हिंदुओं के सेक्युलरिज़्म की परीक्षा है. जावेद अख़्तर साहब सेक्युलरिज़्म का सारा बोझ मुसलमानों के ही कंधे पर क्यों?
    अगर कन्हैया गठबंधन का साझा उम्मीदवार होता और तनवीर हसन किसी दूसरी छोटी पार्टी से या निर्दलीय खड़े होते और मुसलमान सिर्फ़ मज़हब के नाम पर तनवीर हसन को वोट देते तो जावेद साहब की बातों में शायद कुछ दम होता. लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल उल्टा है.
    बेगूसराय के दूसरे सभी धर्म और जाति के लोगों की तरह मुसलमानों को भी अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देने का हक़ है. लेकिन जावेद अख़्तर साहब का मानना है कि मुसलमान अगर कन्हैया को वोट दे तो सेक्युलरिज़्म की परीक्षा में पास और अगर तनवीर हसन को वोट दे तो वो इस आज़माइश में फ़ेल होगा.

    अगर जावेद अख़्तर साहब को इस देश की इतनी ही फ़िक्र है तो देश की बाक़ी 542 सीटों की फ़िक्र क्यों नहीं. अगर कन्हैया जीत भी जाते हैं और बीजीपी की सरकार बन जाती है तो क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा? उनके मुताबिक़ देश को जो ख़तरा है वो तो बना रहेगा.
    जावेद अख़्तर साहब ने बीजेपी विरोधी सभी पार्टियों पर इस बात के लिए क्यों नहीं दबाव बनाया कि वो बीजेपी विरोधी वोट न बंटने दें. ये सारा बोझ बेगूसराय के मुसलमानों को अकेले उठाने के लिए क्यों कह रहे हैं.
    लेकिन अगर केवल वैचारिक और सैद्धांतिक स्तर पर भी देखा जाए तो तनवीर हसन की गिरिराज सिंह पर जीत (अगर हुई तो) ज़्यादा अहमियत रखती है. जिस मुसलमान क़ौम को गिरिराज सिंह पिछले पांच सालों से बात-बात पर पाकिस्तान भेजने की धमकी देते रहे हैं अगर उसी क़ौम का एक व्यक्ति भारतीय संविधान के अंतर्गत कराए जा रहे चुनाव में लोकतांत्रिक तरीक़े से उनको मात देता है तो ये भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी बड़ी बात होगी!

    (इनपुट बीबीसी के शुक्रिया के साथ)

  • NIA कोर्ट ने कहा-प्रज्ञा के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं लगा सकते,हमारे पास कानूनी अधिकार नहीं

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की याचिका को रद्द कर दिया है। प्रज्ञा भोपाल लोकसभा सीट से भाजपा की उम्मीदवार हैं। कोर्ट ने कहा कि हमारे पासकिसी प्रत्याशी के चुनाव लड़ने पर रोक लगानेकाकानूनी अधिकार नहीं है। यह काम चुनाव आयोग का है।यह अदालत आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकती। इस मामले पर साध्वीप्रज्ञा ने कहा, ”कांग्रेस लगातार षडयंत्र कर रही है। मगर जीत निश्चित रूप से हमारी होगी क्योंकि धर्म और सत्य हमेशा जीतता है।”

    याचिकाकर्ता ने कहा- बीमारी का बहाना बना रहीं प्रज्ञा
    कोर्ट में 2008 मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग को लेकर याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, प्रज्ञा कोर्ट में चल रही सुनवाई में हिस्सा नहीं ले रही हैं। वे खराब स्वास्थ्य का बहाना बना रही हैं, लेकिन वे चुनाव के लिए प्रचार कर रही हैं, जहां वे बीमार नजर नहीं आ रहीं।

    एनआईए ने मंगलवार को अदालत से कहा था कि यह मामला चुनाव आयोग से संबंधित है। यह हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

    निसार सैय्यद ने साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ एनआईए कोर्ट में याचिका दायर की थी। मालेगांव ब्लास्ट में उनके बेटे की मौत हो गई थी।

    साध्वी प्रज्ञा इस मामले में मुख्य आरोपी हैं। स्वास्थ्य कारणों से उन्हें जमानत दी गई है। शिकायतकर्ता ने कहा कि वह इतनी गर्मी में चुनाव लड़ने के लिए स्वस्थ हैं। साध्वी कोर्ट को गुमराह कर रही हैं।

    जवाब में साध्वी ने कहा था, ”याचिका राजनीति से प्रेरित है। यह केवल पब्लिसिटी स्टंट के लिए किया गया काम है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट का समय बर्बाद किया है। उस पर जुर्माना लगाकर याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए।”

    मालेगांव ब्लास्ट में 6 लोगों की मौत हुई थी
    29 सितंबर, 2008 को उत्तरी महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुए ब्लास्ट में 6 लोग मारे गए थे जबकि 100 से अधिक घायल हुए थे। एनआईए ने जांच के बाद साध्वी को क्लीन चिट दी थी। कोर्ट में यह मामला अभी भी चल रहा है।

    (इनपुट भास्कर)

  • शिवराज ने ،DM को धमकाया बोले-हमारे दिन भी आएंगे,तब तेरा क्या होगा;राकेश सिंह की भी फिसली जुबान

    भोपाल: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उमरेठ में हेलिकॉप्टर उतारने‌ की इजाजत न मिलने परविवादास्पद बयान दिया। उन्होंने कहा, ”सत्ता के मद में चूर मत हो। ये पिट्ठू कलेक्टर सुन ले रे, हमारे दिन भी जल्दी आएंगे, तब तेरा क्या होगा?”

    उधर,भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह की एक अन्य सभा मेंभगवा की जगह आतंकवाद कोत्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतीक बता बैठे।राकेश सिंह ने कहा,”भगवा कभी आतंकवाद नहीं होता, भगवा धारण करने वाला कभी आतंकवादी नहीं होता। आतंकवाद तो प्यार, तपस्या और बलिदान का प्रतीक होता है।”