Author: M Qaisar Siddiqui

  • राजस्थान के राजनीतिक घटनाटक्रम के लिये अगला सप्ताह महत्वपूर्ण होगा।

    अधिकांश राजनीतिक पण्डित गहलोत द्वारा बहुमत सिद्ध करना मान रहे है लेकिन ऊंट आखिर समय तक किसी भी करवट बैठ सकता है।

    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर
    पिछले दस दिन से राजस्थान की राजनीति मे अचानक आये भूचाल के कुछ हदतक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने के लिये अगला सप्ताह काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। बीटीपी के दो विधायको व एक माकपा से निलम्बित विधायक के साथ आने के अलावा दस निर्दलीय विधायकों का स्पोर्ट पुख्ता होने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब सदन मे बहुमत सिद्ध करने के साथ बगावत कर चुके विधायकों के सामने दुविधा की स्थिति खड़ी करना चाहते है ताकि उनके प्रस्ताव के समर्थन मे पायलट समर्थक विधायक मतदान करके सदस्यता बचाये या फिर खिलाफ मतदान करने पर सदस्यता खत्म करवाये।

    हालांकि राजनीतिक पण्डित मुख्यमंत्री गहलोत के पास 102 विधायको का समर्थन मानकर चल रहे। जिनमे अस्पताल मे गम्भीर रुप से बीमार भर्ती मंत्री भंवरलाल मेघवाल व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जौशी को भी गिनती मे शामिल करके चल रहे है। इसके अलावा दुसरी तरफ भाजपा व रालोपा के 75, कांग्रेस के बागी 19 व 3 निर्दलीय विधायकों को मिलाकर कुल 97-विधायक की गिनती बैठती है। माकपा का दूसरा विधायक गिरधारी महिया तटस्थ रह सकता है। पर वो गहलोत खेमे के साथ अभी तक जाता नजर नही आ रहा है। विधानसभा अध्यक्ष भी तभी मतदान कर पायेगा जब दोनो तरफ बराबर बराबर वोट आये। इसी तरह गहलोत खेमे के पक्ष मे विधानसभा अध्यक्ष व मंत्री भंवर लाल मेघवाल का मत पड़ना मुश्किल होगा। इन दो मतो को हटा देते है तो गहलोत के पास सो मत की तादाद बचती है। दुसरी तरफ 97 विधायक बचते है। यानि फर्क केवल तीन मत का रहेगा। अगर दो मत गहलोत खेमे से अलग ह़ो कर पायलट खेमे की तरफ आते ही सरकार गिर सकती है। तब गिरधारी महिया तटस्थ रहे।

    जयपुर की होटल मे बैठे मुख्यमंत्री गहलोत खेमे के विधायको मे एक दर्जन के करीब विधायक ऐसे है जो एक दम चुपचाप बैठकर सबकुछ देख रहे है। कुछ विधायक तो ऐसे भी है जो अपने पिताओ की राजनीतिक हत्या का आरोपी अशोक गहलोत को मानते रहे है। उन विधायकों के पिता विधानसभा से बाहर रहकर बदलते सभी हालात पर नजर लगाये हुये है। जो अंतिम समय पर फैसला लेकर अपने पूत्र-पूत्री विधायको को खास हिदायत दे सकते है। इसके विपरीत माकपा के दोनो विधायक का एक तरफ मतदान होना कतई नही होगा। हो सकता है कि माकपा को दोनो मत एक दूसरे मत का प्रभाव बराबर कर दे।

    गहलोत-पायलट के मध्य चल रहे राजनीतिक घटनाटक्रम मे किसी ना किसी रुप मे भाजपा भी शामिल होती नजर आ रही है। SOG व ACB अपने यहां दर्ज शिकायतो के बाद जानच करने के रुप मे शामिल है। वही चिहे पर्दे के पिछे से सही आयकर विभाग ने भी गहलोत समर्थकों के यहां रेड डाल चुका है। वही टेलीफोन टेपिंग मामले को लेकर CBI के भी आने की सम्भावन नजर आने लगी है। कांग्रेस ने SOG व ACB विभिन्न रपट दर्ज करवाई है। दुसरी तरफ भाजपा ने भी कांग्रेस नेताओं के खिलाफ पुलिस मे शिकायत दर्ज करवाई है। वही बसपा अध्यक्ष ने घटे राजनीतिक घटनाटक्रम पर बोलते हुये राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उक्त सब घटनाटक्रम से लगता है कि राष्ट्रपति शासन की सिफारिश होने के लिये भूमिका तैयार की जा रही बताते है।

    विधानसभा अध्यक्ष द्वारा महेश जौशी की शिकायत पर जिन 19 कांग्रेस विधायकों को नोटिस देकर जवाब मांगा था। उसके खिलाफ उन विधायकों के कोर्ट चले जाने पर उनकी 20-जुलाई (सोमवार) को सुनवाई होनी है। सुनवाई मुकम्मल होकर कल जजमेंट आता है या फिर आगे डेट मिलती है। यह सबकुछ कल ही पता चल पायेगा। सुनवाई के दो-तीन दिन बाद मुख्यमंत्री सदन का सत्र बुलाकर बहुमत सिद्ध करने की कोशिश कर सकते है। लेकिन बहुत सिद्ध होना जीतना आसान मानकर चल रहे है। उतना आसान कतई नही है। कुछ विधायकों के सीने मे उस बात की आग सुलग रही है जिनके पिताओ की राजनीतिक हत्या अशोक गहलोत के हाथो हुई बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि गहलोत खेमे के होटल मे ठहरे अधिकांश विधायक गाने गाकर, खेल खेलकर, फिल्में देखकर व इटालियन खाना बनाने की विधि सीखकर कोराना काल मे भी जीवन का आनंद ले रहे है। वही कुछ विधायक फोटो व वीडियो से दूर मनोरंजन करने से पुरी तरह दूर रहते हुये होटल मे ठहरे हुये है। जो आखिर समय पर अपने मत का उपयोग मिले आदेश अनुसार कर सकते है जिस मत से निकले परिणाम को सालो साल याद किया जाये। इसके विपरीत सचिन पायलट खेमा बीना किसी नुकसान होने की परवाह किये हर हाल मे गहलोत सरकार गिराना चाहेगे। फिर सरकार गिरने के बाद नये विकल्प पर विचार कर सकते है। मत विभाजन की स्थिति मे पायलट के साथ भाजपा खडी मिलने की पक्की सम्भावना जताई जा रही है। विधायक खरीद फरोख्त कोशिश करने के तीन आरोपी विधायक अगर गहलोत के पक्ष मे मतदान करे तब ही सरकार बच सकती है।वरना सदन मे मत विभाजन अगर होता है तो परिणाम कुछ भी आ सकता है।

  • कोरोना योद्धाओं के रूप में लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा ने पत्रकारों को किया सम्मानित

    मुजफ्फरुल इस्लाम,अमिला(मऊ)। स्थानीय नगर में रविवार को समाजवादीपार्टी के लोहिया वाहिनीं के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा द्वारा एक सम्मान समारोह के तहत लगभग दो दर्जन से अधिक पत्रकारों को कोरोना वारियर्स के रूप के सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा ने सम्मानित करते हुए कहा कि कोरोना जैसे वैश्विक महामारी में जहाँ देश मे मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।ऐसे में आप सभी पत्रकार बंधुओं द्वारा अपने जान की बाजी लगा प्रत्येक खबरों को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का काम कर रहे है तो ऐसे में हमसभी का कर्तव्य एवं दायित्व है कि आप का उत्साहवर्धन कर समय समय पर सम्मान किया जाय। देश और प्रदेश में यदि चौथा स्तम्भ सुरक्षित रहेगा तभी भय भूख भरस्टाचार दूर होगा लोग सुरक्षित रहेंगे और समय समय पर सरकार , शासन ,प्रशासन के नुमाइंदो को भी आईना दिखाते हुए सुधार लाने में अहम भूमिका रहेगी।इस अवसर पर सीतराम कुशवाहा, मु कादिर , विक्की , आकिब सिद्दिकी, सुदर्शन कुमार, अशोक श्रीवास्तव, गुंजन राय, मुज़फ्फरुल इस्लाम, अज़हान आलम, रहमान चिश्ती,सहित दो दर्जन से अधिक पत्रकार मौजूद रहे।

  • मुख्यमंत्री गहलोत को प्रदेश स्तरीय राजनीतिक व सवैधानिक पदो पर मनोनयन का सिलसिला शूरु करने पर विचार करना चाहिए।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के गुज्जर नेता कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला ने एक दफा कहा था कि अशोक गहलोत कुछ देते तो है, लेकिन जब देते है तब तक वो बासी हो जाती है। यह कथन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अलावा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भी स्टीक साबित हो चुका है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते राजनीतिक नियुक्ति व संवेधानिक पदो पर मनोनयन करना बार बार टालते रहे ओर अंत मे उनकी सरकार को भाजपा ने सिंधिया की मदद से सत्ता से बाहर करके स्वयं भाजपा ने सरकार बना ली है। कमलनाथ तो राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति कर नही पाये ओर अब मध्यप्रदेश मे भाजपा सरकार धड़ाधड़ नियुक्तिया कर रही है। कमलनाथ की तरह ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रदेश मे कांग्रेस सरकार के ढेड साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद अभी तक राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति करने का सिलसिला शूरु तक नही किया है। जिसके चलते आम कांग्रेस वर्कर को सत्ता मे हिस्सेदारी नही मिलने से वो लगातार धीरे धीरे उदासीन होता जा रहा हैँ।

    गहलोत सरकार वर्तमान संकट मे हो सकता है कि एक दफा सदन मे बहुमत सिद्ध करके उभर जाये। लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात मे बनते बिगड़ते समीकरणों को देखकर सरकार का लम्बा चलना मुश्किल माना जा रहा है। बाड़ेबंदी मे कैद विधायक ज्योही बाहर खुली हवा मे आयेगे त्योही मावव स्वभाव के चलते फिर से सत्ता मे भागीदारी की बात करते हुये गुणा-भाग करने लगेंगे। भागीदारी सभी विधायकों को मिलना मुश्किल होगा। ऐसे हालात मे निराशा के भाव मे आये कांग्रेस व गहलोत सरकार समर्थक विधायकों से फिर अन्य लोग सम्पर्क कर अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर सकते है।उस स्थिति मे धीरे धीरे गहलोत समर्थक विधायकों की संख्या कम होती जायेगी ओर सरकार का रहना मुश्किल होता जायेगा।

    वर्तमान समय मे राजस्थान मे रोजाना बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर दोड़ाये तो अनिश्चितता कायम होना देखा जा रहा है। गहलोत सरकार के बचने व गिरने के अलग अलग कयास लगाये जा रहे है। गहलोत-पायलट खेमे मे बंटा कांग्रेस विधायक दल के मध्य जारी शह व मात के खेल मे अब भाजपा भी कुदती नजर आने लगी है। प्रदेश मे अनिश्चितता की बनी उक्त स्थिति पर राज्यपाल की भी पूरी नजर है। आगे आगे देखना होगा कि प्रदेश की सियासत किस तरफ पलटी खाती है।

    राजनीतिक नियुक्ति व संवैधानिक पदो पर एक प्रक्रिया के तहत मनोनयन मे कमलनाथ व गहलोत एक दुसरे से अधिक फिसड्डी साबित हुये व हो रहे है। लेकिन इसके विपरीत मध्यप्रदेश मे सरकार गिरने व राजस्थान मे बदले राजनीतिक घटनाक्रमों के मध्य छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के मुखिया भूपेश भगेल ने सरकार मे संसदीय सचिव, राजनीतिक नियुक्तिया व संवैधानिक पदो पर धड़धड़ मनोनयन करके एक अलग तरह का माहोल बना दिया है। जिसके बाद वहां का आम कार्यकर्ता भी सत्ता मे अपनी हिस्सेदारी मानकर उत्साहित होकर पार्टी हित मे सक्रिय हो चला है। अगर प्रदेश की सरकार किसी वजह से गिर भी जाये तो संवेधानिक पदो पर नियुक्त उन लोगो को त्याग पत्र देने की आवश्यकता नही होती। वो अपना कार्यकाल चाहे तो पुरा कर सकते है।

    कुल मिलाकर यह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान की राजनीति मे आये भूचाल के मध्य ही पिछले एक सप्ताह मे संसदीय सचिव, राजनीतिक व संवेधानिक पदो पर नियुक्ति करने की झड़ी लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के रास्ते को अपनाने की बजाय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रास्ते को अपना कर प्रदेश मे खाली चल रही नियुक्तिया जल्द कर देनी चाहिए वरना बाद मे पछतावा हो सकता है जब चिड़िया खेत चूग जाये। अगर ऐसा हुवा तो आम कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें कभी माफ नही करेगा। उस स्थिति मे उदासीन हुवा कार्यकर्ता पार्टी हित मे उतना काम नही कर पायेगा जितना काम 2018 के चुनाव मे वसुंधरा राजे सरकार को हटाने मे किया था।

  • भारत में 15 सितंबर तक चरम पर होगा संक्रमण,गांवों में इस बीमारी को फैलने से रोकना होगा

    नई दिल्ली; भारत में कोरोनावायरस 15 सितंबर के आसपास चरम पर हो सकता है। लोगों को कोरोनावायरस को काबू करने के लिए बहुत ही जिम्मेदार रवैया अपनाना होगा। सबसे बड़ा काम इसे गांवों तक पहुंचने से रोकना है, क्योंकि यहां देश की दो तिहाई आबादी रहती है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट प्रोफेसर के श्रीनाथ रेड्‌डी ने शनिवार को ये बाते कहीं। उन्होंने कहा कि यह वायरस नई ताकत से बढ़ रहा है।

    राज्यों में अलग-अलग समय पर चरम पर पहुंचेगा कोरोना
    प्रोफेसर रेड्‌डी ने कहा- अलग-अलग जगहों (राज्यों) में अलग-अलग समय में कोरोना संक्रमण अपने चरम पर पहुंचेगा। डॉ. रेड्डी ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड भी रह चुके हैं। वे मौजूदा समय में हार्वर्ड में स्टडी के काम से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि इस समय हमारा मुख्य काम इस वायरस को छोटे शहरों और गांवों में पहुंचने से रोकना है। अगर हम इसे रोक लें तो अभी भी बड़ा नुकसान टाल सकते हैं।

    कई जगहों पर हुईं गलतियां

    प्रोफेसर रेड्डी ने कहा कि लॉकडाउन के दूसरे चरण तक कोरोना को फैलने से रोकने के लिए बहुत सख्ती से लॉकडाउन किया गया, लेकिन 3 मई के बाद लॉकडाउन में ढील मिली तो हमें जोरदार तरीके से घर-घर जाकर सर्वे, टेस्टिंग, आईसोलेशन करना चाहिए था, जो हमने नहीं किया।
    लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोई एहतियात का पालन नहीं किया गया। ऐसा लगा जैसे सब आजाद हो गए हैं। जैसे- स्कूल में एग्जाम के बाद छात्र रिजल्ट आने से पहले ही खुशी मनाने लगे हों।

    हमने बहुत ज्यादा समय अस्पलात और बेड कैपेसिटी को लेकर बिताया। हालांकि, यह भी जरूरी था, लेकिन ट्रेसिंग का पूरा जिम्मा केवल पुलिस को सौंप दिया गया। जबकि, इसे पब्लिक हेल्थ फंक्शन के रूप में देखना चाहिए था।(इनपुट भास्कर)

  • राजस्थान मे चल रहे ताजा राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य ऐजेन्सी एसओजी-ऐसीबी के बाद अब केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री हो सकती है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान कांग्रेस विधायक दल के गहलोत-पायलट मे विभाजित हो चुके कांग्रेस विधायकों के बाद मचे राजनीतिक घमासान मे राज्य ऐजेन्सी ऐसीबी व एसओजी मे दर्ज शिकायतो के बाद उक्त दोनो ऐजेन्सी की इन्ट्री के बाद भाजपा प्रवक्ता ने दिल्ली मे प्रैस कांफ्रेंस करके गहलोत सरकार पर फोन टेपिंग करने का आरोप लगाते हुये पुरे मामलो की केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई से जांच कराने की मांग करने के बाद जनता मे जहन मे सवाल उठने लगा है कि राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य जांच ऐजेन्सीज के बाद क्या अब केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री होगी? इसके विपरीत इसी राजनीतिक घटनाक्रम के मध्य आयकर विभाग ने दो कांग्रेस नेताओं के अनेक ठिकानो पर रेड कर चुका हैँ।

    केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई से स्टेट के किसी मामले मे जांच कराना स्टेट की मर्जी पर निर्भर करता है। लेकिन किसी मुद्दे पर न्यायालय अगर आदेश जारी कर देता है तो उस आदेश की पालना मे केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी से जाचं की जा सकती बताते है।

    राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 109 विधायको के समर्थन होने के दावे को सीरीयस नही लिया जा सकता। भाजपा के 72 व रालोपा के 3 विधायको के साथ आरोपितो 3 निर्दलीय विधायको को मिलाकर कुल 78 विधायक बनते है। स्पीकर की तरफ से नोटिस मिलने वालो 19 कांग्रेस विधायकों को मिलाकर कुल 97 विधायक तो यही बन जाते है। एक विधायक भंवरलाल मेघवाल अस्पताल मे भर्ती होने पर कुल 98 विधायक तो यही हो जाते है। बचे 102 विधायक। उनमे माकपा का एक विधायक बलवान पूनीया गहलोत खेमे को समर्थन देने का ऐहलान कर चुके है। वही दूसरे माकपा विधायक गिरधारी दहिया अब तक पत्ते ना खोलते हुये अपने आपको अपने क्षेत्र मे होने की कह रहे है। बीटीपी के दो विधायक रामदयाल व राजकुमार कभी तटस्थ तो कभी गहलोत खेमे का साथ देने को कह चुके है। इसके अलावा दस निर्दलीय विधायक अभी तक तो गहलोत खेमे की बाड़ेबंदी मे बताते है। पर बाड़ेबंदी से बाहर आने पर वो किधर रुख कर ले यह कहना मुश्किल है। क्योंकि सदन मे वो चाहे जिधर मतदान करे उनकी सदस्यता जाने का खतरा उनको नही है। पार्टी विधायकों के मतदान करने पर उनकी सदस्यता पर प्रभाव जरूर डालता है। इसके विपरीत चाहे भाजपा उक्त घटनाक्रम को कांग्रेस के दो नेताओं का झगड़ा बताये लेकिन चाहे सामने ना सही पर राजनीति के जानकार किसी ना किसी रुप मे उनकी भूमिका होने की बात मान कर चल रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजनीति के जानकार मान कर चल रहे है कि बहुमत मिलने की पुख्ता होने पर मुख्यमंत्री सदन मे बहुमत सिद्ध करने की कोशिश करेगे ताकि उसके खिलाफ मतदान करने वाले कांग्रेस विधायको को अपनी विधानसभा सदस्यता से हाथ धोना पड़े ओर फिर खाली जगह पर उपचुनाव हो सके। वही पायलट खेमा जैसे तैसे करके कांग्रेस से कम से कम 36 विधायक अपने साथ लेकर अलग गूट बनाकर फिर सेफ गेम खेलने की कोशिश मे बताते है। भाजपा यह चाहेगी कि गहलोत सरकार पहले गिर जाये फिर वो सरकार बनाये। अन्यथा एक दफा राष्ट्रपति शासन जरुर लग जाये। ज्यो ज्यो समय गुजरेगा त्यो त्यो गहलोत खेमे की लगाम कमजोर व भाजपा की लगाम मजबूत होती जायेगी। पर अभी घटनाक्रमों मे अनेक बदलाव पल पल आते नजर आना तय है।

  • कांग्रेस ने अपने दो कद्दावर विधायक भंवरलाल शर्मा व विश्वेंद्र सिहं को प्राथमिक सदस्यता से किया निलम्बित

    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान कांग्रेस के विधायकों मे छिड़ा विवाद पल पल बढता जा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने आज जयपुर मे प्रैस कांफ्रेंस करते हुये कहा कि कांग्रेस विधायकों को 20-35 करोड़ मे खरीदनै की कोशिशें हो रही है। उन्होंने भाजपा पर जोरदार हमला बोलते हुये कहा के देश मे दस लाख से अधिक कोराना मरीज हो गये एवं चीन ने हमारी भूमि पर कब्जा कर लिया फिर भी भाजपा सत्ता सूख के लिये चूनी हुई राजस्थान सरकार को विधायको की खरीद-फरोख्त करके गिराने मे लगी है।

    विधायकों के खरीद-फरोख्त को लेकर कल जारी कथित ओडियो क्लिप को लेकर सुरजेवाला ने कांग्रेस के दिग्गज दो विधायक भवंरलाल शर्मा व विधायक विश्वेंद्र सिंह को कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलम्बित करने की जानकारी देते हुये केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को गिरफ्तार करने की मांग की है।

    भरतपुर राजा विश्वेंद्र सिंह वर्तमान गहलोत सरकार मे तीन दिन पहले तक मंत्री थे। वहीं यह सांसद व अनेक दफा विधायक बन चुके है। राजस्थान जाट समाज के बडे नेता भी है। दूसरे निलम्बित विधायक भंवरलाल शर्मा सात दफा विधायक व एक दफा मंत्री बन चुके है। शर्मा लोकदल, जनता दल, भाजपा व कांग्रेस के निशान पर सरदारशहर से विधायक बने है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस विधायकों को जारी किये गये नोटिस पर हाईकोर्ट की डिविजनल बैंक मे आज दोपहर एक बजे सुनवाई होनी है। जिसके जजमेंट का गहलोत-पायलट खेमे पर काफी असर पड़ेगा।

  • राजस्थान मे खण्डित होती कांग्रेस के गहलोत-पायलट धड़े मे द्वंद्व पल पल बढता ही जा रहा है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    कुछ दिन पहले राज्यसभा चुनाव मे कांग्रेस के सभी विधायक व समर्थक विधायकों द्वारा एक साथ मतदान करके तीन मे से अपने दो उम्मीदवार जिता कर विपक्षी दल भाजपा को मात देने के करीब दो सप्ताह बाद ही अशोक गहलोत व सचिन पायलट के मध्य क्या राजनीतिक वर्चस्व की जंग को हवा लगी कि दोनो नेताओ को अपने अपने समर्थक विधायकों को बाड़ेबंदी मे बंद करने को मजबूर होना पड़ा। मुख्यमंत्री गहलोत ने सचिन पायलट पर अनेक गम्भीर आरोप लगाने के अलावा उन पर व्यक्तिगत आरोपो की झड़ी लगाने के बावजूद पायलट स्वयं अब तक चुप्पी साधे हुये है।

    राजस्थान कांग्रेस के अशोक गहलोत व सचिन पायलट के नेतृत्व मे कांग्रेस विधायकों के बने अलग अलग धड़ो के अलग अलग प्रदेश के होटलो मे जमे होने से राजस्थान की जनता के जेहन मे वर्तमान सरकार के प्रति अनेक तरह के सवाल उठने लगने के साथ आम धारणा बनकर उनके गले से आवाज निकल कर आ रही है कि उक्त घटे घटनाक्रम के बाद राजस्थान से कांग्रेस की आगे चलकर विदाई होना निश्चित है। कांग्रेस के नेताओं द्वारा पार्टी से अधिक स्वयं के हित को तरजीह देने की वजह एवं ऊटपटांग हरकतें करने के कारण देश भर मे कांग्रेस हाशिये मे चली गई है। लेकिन कांग्रेस जन अब भी इस हकीकत से कोई सबक लेकर आगे बढने को तैयार नजर नही आ रहे है। पिछले छ दिन से राजस्थान मे कांग्रेस नेता पार्टी के बजाय राजनीति मे अपने आपको शीर्ष पर बनाये रखने के लिये अशोक गहलोत व पायलट के नाम से कांग्रेस विधायकों के धड़ो को होटल मे बाड़ेबंदी करके रखने से हो रही फजीहत के बाद अब एक दुसरे धड़े पर ओछे आरोप-प्रत्यारोप भी लगाने से चूक नही रहे है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे की तरफ से कल ओडियो क्लिपिंग जारी करते हुये एक व्यक्ति से दुसरे व्यक्ति की हो रही बात को पायलट खेमे ने एक विधायक व एक मध्यस्थ के बीच बात होना बताया जा रहा है। जिसमे एक केन्द्रीय मंत्री के इशारे पर विधायको को तोड़कर लाने को बताया जा रहा है। वही उसके बाद उक्त विधायक ने वीडियो जारी करके मुख्यमंत्री के इशारे पर उनके एक ओएसडी पर फर्जी ओडियो क्लिप बनाने का आरोप लगाते हुये उस क्लिपिंग को पूरी तरह फर्जी बताया है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान कांग्रेस के विधायकों के गहलोत-पायलट धड़े मे बंटने के बाद मुश्किल मे फंसी सरकार व कांग्रेस पार्टी की प्रदेश मे खराब होती छवि से कांग्रेस नेताओं द्वारा सबक लेकर कोई सार्थक पहल करके दोनो धड़ो के मध्य सम्मान जनक समझोता कराने के बजाय लगी आग मे घी डालने का काम हो रहा है। आरोप-प्रत्यारोप के लिये ओछे हथकण्डे भी अपनाने का दौर शुरु हो चुका है। एक तरफ मामला न्यायालय मे पहुंच चुका है। दुसरी तरफ जनता के न्यायालय मे भी अब चाहे ना सही लेकिन कुछ महिनो बाद मध्यवर्ती चुनाव के रुप मे मामला जाता लग रहा है।

  • राजस्थान मे कांग्रेस सरकार अब गिरे या बचे, पर कांग्रेस को काफी नुकसान हो चुका।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के मध्य अपने आपको सुपर पावर बनाने के लिये पीछले ढेड साल से चल रहे कोल्ड वार के तहत तीन दिन मे घटे घटनाक्रम के बाद यह तय हो चुका है कि अब सरकार गिरे या बचे लेकिन घटे घटनाक्रम से कांग्रेस पार्टी को काफी नुकसान हो चुका है। साधारण कार्यकर्ता जो बूथ पर खड़ा होकर मतदान करवाने के साथ साथ घर घर जाकर मतदाताओं को कांग्रेस की तरफ अपने तर्को की ताकत के बल पर आकर्षित करता है। वो कार्यकर्ता उक्त नेताओं के आपसी झगड़े से अपने आपको ठगा हुवा महसूस करने के कारण काफी मायूस व उदासीन होता नजर आ रहा है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपना राजनीतिक कद ऊंचा बनाये रखने के लिये मुकाबील आने वाले नेता का कद हमेशा छोटा करने की भरपूर कोशिश करते रहे है। हमेशा की तरह इस बार भी गहलोत ने प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे से मिलकर सचिन पायलट का राजनीतिक कद छोटा करने की शूरुआत से लेकर आखिर तक भरपूर कोशिश करते रहने के बावजूद जब उनका कद छोटा नही हो पा रहा था। तब जाकर विभिन्न ऐजेन्सियों के मार्फत कुछ विधायकों द्वारा आपसी बातचीत के ब्योरे पर एसओजी व ऐसीबी मे विधायक महेश जौशी के मार्फत शिकायत दिलवाने के बाद मुकदमा दर्ज होने पर सचिन पायलट सहित कुछ अन्य नेताओं को संदिग्ध बता कर उन्हें उसमे खसीटने की कोशिश करने के बाद आखिरकार पायलट व उनके साथी मंत्रियों को बरखास्त तो करवा दिया लेकिन उक्त हरकत का परिणाम आगे चलकर कांग्रेस का प्रदेश से सफाया होने का रास्ता तय कर दिया है। गहलोत ने हमेशा राजनीति मे अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये प्रत्येक अवसर का अपने हित मे उपयोग किया है। गहलोत के मुख्यमंत्री रहते राजस्थान मे जब जब विधानसभा चुनाव हुये उन सभी आम विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस ओंधे मुहं गिरी है।

    अशोक गहलोत व सचिन पायलट के मध्य चले शह व मात के खेल मे रोज घटते घटनाक्रमों के बाद चाहे उक्त दोनो नेता अपनी अपनी जीत मान रहे हो। लेकिन दोनो के झगड़े से राजस्थान मे कांग्रेस को भारी नुकसान हो चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी चलाने के लिये कम से कम प्रदेशो मे उस पार्टी की सरकार होना आवश्यक है। पंजाब मे कांग्रेस की कम मुख्यमंत्री केप्टेन अमरींद्र सिहं की सरकार होना अधिक माना जाता है। कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिये उसकी मदद करने के लिये ले देख मात्र राजस्थान की सरकार बचती है। जिसकी संगठन चलाने के लिये महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। वर्तमान घटे घटनाक्रमों के बाद यह तय हो चुका है कि गहलोत बहुमत सिद्ध करे या पायलट की वापसी हो जाये। घटे घटनाक्रम से कांग्रेस विधायकों व नेताओं मे अविश्वास इतना बढ चुका है कि उनका लम्बे समय तक एक रहना मुश्किल है। फिर उनके सामने भाजपा जैसी पार्टी है जो सरकार गिराने के लिये किसी भी स्तर तक जा सकती है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अबतक के अपने कार्यकाल मे पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा नेता वसुंधरा राजे का विशेष ख्याल रखा। राजे के तीन मतो की बल पर पुत्र को राजस्थान क्रिकेट ऐसोसिएशन का अध्यक्ष बनवाया लिया है एवं राजे के सरकारी आवास खाली करने के हाईकोर्ट आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक गहलोत सरकार गई। इसके विपरीत उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के खिलाफ सरकारी स्तर पर जितने षडयंत्र किये जा सकते है उतने षड्यंत्र किये जाते रहे बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान सरकार के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के मध्य सरकार को लेकर अपने अपने समर्थक विधायकों की बाड़ेबंदी करने एवं गहलोत-पाण्डे की जोड़ी के दवाब के बाद सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री व अध्यक्ष पद से बरखास्त करने के अलावा दो अन्य मंत्री रमेश मीणा व विश्वेंद्र सिहं को मंत्री पद से बरखास्त करवाने के बाद मसला अधिक पेचीदा हो चुका है। इसकै अतिरिक्त पायलट समर्थक विधायकों के घर नोटिस चस्पा होने के बाद विवाद ओर अधिक गहराता दिखाई दे रहा है। चाहे आगे चलकर कुछ भी समझोता या विभाजन हो। लेकिन यह तय है कि उक्त घटे घटनाक्रमों से कांग्रेस को राजस्थान मे काफी नुकसान हो चुका है।

  • राजस्थान कांग्रेस मे गहलोत-पायलट के मध्य छिड़ी वर्चस्व की जंग मे घटे घटनाक्रम मे अचानक चार पदो पर हुई नियुक्तियों मे मुस्लिम नदारद रहा।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के मध्य पीछले कुछ महीनों से चल रही राजनीतिक वर्चस्व की जंग मे कल अचानक घटे घटनाक्रम से आये नये मोड़ के बाद सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष पद से बरखास्त करके शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा को नया पीसीसी चीफ मनोनीत किया गया है। डोटासरा के अलावा युवा कांग्रेस, सेवादल व एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष भी पार्टी हाईकमान द्वारा नये मनोनीत किये गये है। जिनमे एक भी मुस्लिम को अध्यक्ष पद पर मनोनीत नही करने को कांग्रेस द्वारा अपने परम्परागत वोटबैंक मुस्लिम समुदाय की पूरी तरह अनदेखी करना प्रदेश मे चर्चा का विषय बना हुवा है कि मुस्लिम कांग्रेस राजनीति मे ना तीन मे है ओर ना तेराह मे गिने जा रहे है। जबकि कांग्रेस के वर्तमान समय मे नो मुस्लिम विधायक है जो अभी तक अशोक गहलोत के केम्प मे ही बैठे हुये है।

    गहलोत-पायलट के मध्य जारी राजनीतिक वर्चस्व की जंग के आसमान छुने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाईकमान के मार्फत अचानक संगठन स्तर पर बदलाव करवाकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद पर शिक्षा मंत्री गोविंद डोटासरा (जाट), राजस्थान युवा कांग्रेस अध्यक्ष पर विधायक गणेश घोघरा (आदिवासी), एनएसयूआई के अध्यक्ष पद पर अभिषेक चोधरी (जाट) व प्रदेश सेवादल अध्यक्ष पद पर हेमेंद्र शेखावत (राजपूत) को मनोनीत करवा कर पायलट खेमे को मात देने की कोशिश करते हुये केंद्रीय स्तर पर मोजूद कांग्रेस हाईकमान के कोकस पर अभी भी अपनी मजबूत पकड़ होना साबित किया है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत वेसे ऊपर से अपने आप को सेक्यूलर व गांधीवादी होने के साथ साथ मुस्लिम हितैषी दिखाने की भरपूर कोशिश करते रहे है। जिसके कारण चाहे प्रदेश स्तर पर ना सही पर राष्ट्रीय स्तर पर इस मामले मे उनकी उजली छवि देखी जाती है। जबकि अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री काल पर नजर दोड़ाये तो मुस्लिम समुदाय के प्रति उनके काम करने का तरीका इससे अलग नजर आता है। जब से अशोक गहलोत की राजनीति मे चमक-धमक बढी है तब से उनके ग्रह जिले जोधपुर से मुस्लिम विधायक बनने का सीलसीला खत्म हो चुका है। अशोक गहलोत के पीछले कार्यकाल मे जोधपुर के बालेसर मे मुस्लिम-मालियो मे विवाद हुवा तो उसमे सरकारी स्तर पर मुस्लिम समुदाय को कुचला गया था। जिसकी रिपोर्ट विभिन्न समाचार पत्रो की सुर्खियां बनी थी। इन्ही गहलोत के कार्यकाल मे जैसलमेर-बाडमेर जिले के 32 मुसलमानों को रासुका मे बंद किया गया था।

    अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बनने से पहले राजस्थान सरकार मे ग्रहमंत्री रहे है। तब काला कानून “टाडा” के दूरूपयोग होने के खिलाफ आवाज बूलंद होने के मध्य तत्तकालीन ग्रहमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश मे टाडा कानून के तहत पहली गिरफ्तारी एक मुसलमान की करने के आदेश दिये थे। अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री कार्यकाल मे भरतपुर के गोपालगढ़ कस्बे की मस्जिद मे नमाजियों पर पुलिस द्वारा गोली चलाकर मारने की शर्मनाक घटना घटित हुई थी। जिसमे पीडित मुसलमानों को ही मुलजिम बनाकर गिरफ्तार किया गया था। सीआई फूल मोहम्मद को सवाईमाधोपुर के सुरवाल कस्बे मे सरेआम डयूटी के समय चलाकर मारने की घटना को कभी भूलाया नही जा सकता है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री गहलोत के वर्तमान कार्यकाल मे महाधिवक्ता व अतिरिक्त महा अधिवक्ताओं के मनोनयन मे मुस्लिम प्रतिनिधित्व नही दिया गया। मंत्रीमण्डल गठन मे एक मात्र शाले मोहम्मद को मंत्री बनाया गया जिसको अल्पसंख्यक मंत्रालय तक सीमित रखा गया है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे कांग्रेस की सत्ता लाने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस के वर्तमान असमंजस वाले हालात मे भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उनकी कांग्रेस पार्टी की दया द्रष्टि का पात्र नही समझा गया तो माने कांग्रेस व गहलोत के अच्छे दिनो मे तो समुदाय को अछूत बना कर रखा जा सकता है। कल चारो पदो पर हुये मनोनीत अध्यक्षों के लिये इलेक्सन नही बल्कि मनोनयन (सलेक्शन) हुवा है। मनोनयन मे पार्टी व नेताओं की केवल कृपा दृष्टि व जेहनी सोच निर्भर करती है।

  • उत्तर प्रदेश में नागरिक अधिकार का उल्लंघन और लॉ एंड ऑर्डर सिस्टम का दुरुपयोग

    नई दिल्ली/लखनऊ

    आॅनलाइन संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में जारी संयुक्त बयान
    संविधान-विरोधी तथा भेदभाव पूर्ण नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 (सीएए) पास होने के बाद से केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्यों ने देशभर में हुए लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ बर्बर रवैया अपनाया है। इसने उन सभी नैतिकताओं की धज्जियां उड़ा दी हैं, जिन पर यह देश क़ायम हुआ है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले को सांप्रदायिक रंग दिया और पुलिस और दक्षिणपंथी गुंडों को खुली छूट और माफी दे दी कि वे गोलियां चलाएं, संपत्तियों को तबाह करें और विरोध एवं शांतिपूर्ण आंदोलन के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार के इस्तेमाल पर उन्हें प्रताड़ित करें।
    अब लॉकडाउन के हालात का दुरुपयोग राज्य के सभी विरोधियों से इंतकाम लेने के लिए किया जा रहा है। पुलिस आए दिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, नेताओं, छात्रों और निर्दोष लोगों को डरा-धमका रही है और उन्हें परेशान कर रही है। उन्हें फर्ज़ी मुकदमों में फंसाकर उन पर काले कानून थोपे जा रहे हैं। गैर-अदालती हत्याओं, गैरकानूनी गिरफ्तारियों और निर्दोषा लोगों को परेशान करने की घटनाएं खतरनाक हद तक बढ़ रही हैं।

    ज़रूरी है कि कानपुर और यूपी के अन्य हिस्सों में हुई कुछ अपराधियों की गैर-अदालती हत्या पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच कराई जाए।
    यूपी पुलिस सामाजिक कार्यकर्ताओं को दंगाई का नाम देकर उनकी धरपकड़ कर रही है। पुलिस के अत्याचार को सही ठहराने के लिए लोगों की जायज़ आवाज़ों को देश-विरोधी बताया जा रहा है। हाल ही में सरकारी अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यायल (एएमयू) के छात्र कार्यकर्ता शर्जील उस्मानी को फर्ज़ी मुकदमों में गिरफ्तार किया गया। पॉपुलर फ्रंट की प्रदेश एड्हाॅक कमेटी के सदस्य मुफ्ती मोहम्मद शहज़ाद को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें यह दरख्वास्त की गई थी कि उत्तर प्रदेश में 19 दिसम्बर 2019 को और उसके बाद सीएए/एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी मौजूदा या पूर्व जज के नेतृत्व में निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए। डॉक्टर कफील की गिरफ्तारी इंतकामी राजनीति का खुला सुबूत है, जिसके तहत बीजेपी सरकार उनकी जिं़दगी को तबाहो बर्बाद करने के लिए हर रास्ता अपना रही है। ऐसे कई कार्यकर्ताओं को फर्ज़ी मामलों में जेलों में डाला और उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है। इन कार्यकर्ताओं के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट (यूएपीए) और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका या एनएसए) जैसे काले कानून इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

    विडम्बना यह है कि उन कार्यकर्ताओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंग्स्टर व समाज विरोधी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट, 1986 (गैंग्स्टर एक्ट) और यूपी गुंडा (रोकथाम) एक्ट, 1970 (गुंडा एक्ट) जैसे काले कानून इस्तेमाल किये जाते हैं, जिन्होंने देश में जीने के अपने अधिकार के लिए लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ी, जबकि असल गुंडे, गैंग्स्टर और समाज विरोधी तत्व पूरे राज्य में आज़ाद घूम रहे हैं और उन्हें माफी हासिल है। इसके अलावा उन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर एक के बाद एक फर्ज़ी मुकदमे लगाए जा रहे हैं, जो पहले से ही जेल में हैं या जो ज़मानत पर रिहा हो चुके हैं।
    यूपी प्रशासन ने अब सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई कथित तोड़फोड़ का हर्जाना वसूल करने के बहाने लोगों की संपत्तियां कुर्क करने की एक और नई अत्याचारी कार्यवाही शुरू कर दी है। किसी पर भी दंगों में शामिल होने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जा सकता है और उसकी संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। यह लोगों को जेलों में डालकर न केवल उनकी ज़िंदगी बर्बाद करने, बल्कि उनकी संपत्तियों से उन्हें बेदखल करके उनके भविष्य को हमेशा के लिए तबाह करने की एक नई रणनीति है। राज्य सरकार ऐसी अलोकतांत्रिक तथा हिंसक कार्यवाहियों द्वारा राज्य में हर तरह के विरोध को नेस्तनाबूद कर देना चाहती है। दुर्भाग्य की बात है कि राज्य की बड़ी अपोज़िशन पार्टियां इन मुद्दों पर खामोश हैं और इस तरह वे राज्य सरकार को इन कार्यवाहियों को अंजाम देने का खुला रास्ता दे रही हैं।

    यह संयुक्त प्रेस वार्ता यूपी सरकार की तानाशाही कार्यवाहियों की कड़ी निंदा करती है। हम समझते हैं कि सांप्रदायिक राजनीति को खारिज करने वाले सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे आगे आएं और उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार के उल्लंघन के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करें। साथ ही संवैधानिक मूल्यों पर यकीन रखने वाले देश के हर नागरिक और नागरिक समाज को शांतिपूर्ण तरीके से इसके खिलाफ कदम उठाना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश में राजकीय अत्याचार के पीड़ितों को हर तरह की कानूनी एवं लोकतांत्रिक मदद देना देश की लोकतांत्रिक ताकतों का कर्तव्य है।

    प्रेस वार्ता में भाग लेने वाले प्रतिनिधिः
    1. रवि नायर, ऐसएएचआरडीसी, दिल्ली
    2. उबेदुल्ला ख़ान आज़मी, पूर्व सांसद, उत्तर प्रदेश
    3. सीमा आज़ाद, संपादक, दस्तक, इलाहाबाद
    4. एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद, उपाध्यक्ष, एसडीपीआई
    5. एडवोकेट के.के. राॅय, इलाहाबाद हाई कोर्ट
    6. ई.एम. अब्दुल रहमान, वाइस चेयरमैन, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया
    7. राजीव यादव, महासचिव, रिहाई मंच, उत्तर प्रदेश
    8. एडवोकेट ए. मोहम्मद यूसुफ, राष्ट्रीय सचिव, एनसीएच