Author: M Qaisar Siddiqui

  • बहुमत का दावा करने वाले मुख्यमंत्री गहलोत आखिर समर्थक विधायको को बाड़ेबंदी मे कितने दिन ओर रखेगे।

    पवित्र त्योहार ईद-उल-अजहा व रक्षाबंधन के बाद स्वतंत्रता दिवस आने को है

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।

    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने नेतृत्व वाली सरकार को अभी भी बहुमत मे बताने के बावजूद पीछले एक पखवाड़े से भी अधिक समय से अपने समर्थक कांग्रेस विधायक व निर्दलीय विधायकों सहित बीटीपी व अन्य दलो के विधायको को जयपुर की आलीशान होटल मे बाड़ेबंदी मे कैद करके जनता के पैसो की बरबादी करते रहने का तात्पर्य समझ से परे है। बहमत अगर है तो चलाओ सरकार ओर विधायको को करे आजाद ताकि कोराना की महामारी व प्रदेश मे रोज एक हजार से अधिक आते मरीजो से छाये खोफ मे अपने क्षेत्र की जनता के मध्य रहकर उनके डर को कम करने की विधायक कुछ ना कुछ कोशिश कर सके। लेकिन गहलोत को विधायको की विश्वसनीयता पर शक होगा कि वो आजाद होते ही उनसे अलग छिटक कर कही विरोधी घड़े से जा ना मिले।

    ऊधर पायलट खेमा भी मुख्यमंत्री गहलोत सरकार के अल्पमत मे आने का दावा तो कर रहे है। लेकिन संख्या बल उनके पास भी ठीक ठाक अभी तक उतना जुट नही पाया है। जितने संख्या बल की उनको जरुरत है। फिर भी पायलट गूट ने गहलोत की कथित लगातार बनाई जाने वाली गांधीवादी छवि को जरूर सबके सामने लाकर गहलोत को केवल पद व सत्तालोलुपता के तौर पर ला खड़ा कर दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत के पीछे या उनके इशारे पर मतदाताओं का मतदान करना कभी प्रदेश मे देखा नही गया लेकिन कांग्रेस की हाईकमान से हाथ मिलाये रखने के चलते वो तीसरी दफा जनता की इच्छा के विपरीत मुख्यमंत्री बनने मे जरुर कामयाब रहे है। मुख्यमंत्री गहलोत का राजनीतिक प्रभाव का आंकलन तब भी हुवा था जब 1989 के लोकसभा चुनाव मे मुस्लिम समुदाय की नाराजगी के चलते उनके सामने जोधपुर लोकसभा चुनाव मे अब्दुल गनी सिंधी के निर्दलीय/इंसाफ पार्टी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते ही गहलोत चुनाव हार गये। 1989 के उस चुनाव के बाद एक दो दफा को छोड़कर अधिकांश लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस जोधपुर से हार ती आ रही है। अबके लोकसभा चुनाव मे गहलोत ने अपने पुत्र को उम्मीदवार बनाकर जनता पर थोपा तो जनता ने उसे बूरी तरह हराकर बैरंग लोटाया ही नही बल्कि गहलोत की स्वयं की बूथ से पुत्र वैभव को बहुत कम मत देकर उन्हें राजनीति का असल रुप दिखाया था।

    मोजुदा राजनीतिक घटनाटक्रम पर नजर दोड़ाये तो पाते है कि गहलोत केवल मात्र अपने मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये वो सब कुछ ताकत लगाकर कर रहे है, जो वो कर सकते है। जबकि प्रदेश की जनता चाहती है कि मुख्यमंत्री गहलोत रहे या पायलट या फिर दोनो को छोड़कर तीसरे विकल्प को तलासा जाये। लेकिन कांग्रेस सरकार कैसे भी बची रहे। पर कांग्रेस सरकार बचाये रखने मे सबसे बडा रोड़ा गहलोत की मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की जीद आड़े आ रही है।

    कांग्रेस पार्टी की नीतियों अनुसार प्रभारी महामंत्री का कार्य प्रदेश के नेताओं मे ढंग से समनवय बनाये रखकर पार्टी संगठन व सरकार को मजबूती देते रहे। लेकिन प्रभारी महासचिव अविनाश पाण्डे ने विधानसभा चुनाव के पहले तो पायलट की तारीफ करते रहे एवं ज्योही गहलोत मुख्यमंत्री बने तो पाण्डे ने रुख बदल कर केवल गहलोत के प्रति एक पक्षीय रवैया अपनाये रखा जिसका परिणाम आज कांग्रेस विधायकों के खण्डित होने के रुप मे नजर आ रहा है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत ईद-उल-जुहा व रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहार से पहले विधानसभा सत्र बूलाकर महुमत सिद्ध करने के बहाने पायलटों समर्थक विधायको की सदस्यता रद्द करवाने की कोशिश मे लगे हुये है। वहीं जरूरत के होटल मे बाड़ेबंदी मे ठहरे गहलोत समर्थको विधायकों ने एक अगस्त को ईद-उल-जुहा व तीन अगस्त को रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहारों पर अपने अपने क्षेत्र मे जाने का दवाब बना रहे बताते है। उसके बाद 15-अगस्त के स्वतंत्रता दिवस को भी सभी विधायक स्वतंत्रता के साथ मनाने की कह रहे है।जबकि गहलोत केवल अपने मुख्यमंत्री पद बचाये रखने के लिये कांग्रेस पार्टी की बली देने पर उतारु है। अभी भी समय है कि कांग्रेस गहलोत-पायलट को छोड़कर अन्य विकल्प पर विचार करे।

  • दरभंगा: डीएमसीएच की लचर व्यवस्था को लेकर इंसाफ मंच ने दिया प्रतिरोध धरना।

    # डीएमसीएच में लचर व्यवस्था से हुई जमाल अतहर रूमी, प्रो उमेश चंद्र और गंगा देवी की वो मौत की उच्चस्तरीय जांच हो- नेयाज अहमद

    दरभंगा, 29 जुलाई

    ‌जमाल अतहर रूमी, प्रोo उमेश चंद्र और गंगा देवी की डीएमसीएच में लापरवाही से हुई मौत मामले को लेकर इंसाफ मंच के बैनर तले किलघाट में इंसाफ मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष नेयाज अहमद, पूर्व पार्षद नफिसुल हक रिंकु नफिसुल हक रिंकू, भूषण मंडल, अकरम सिद्दकी व मकसूद आलम” पप्पू खां के नेतृत्व में प्रतिरोध धरना दिया गया। धरना में अकरम सिद्दीकी नफीस उल हक रिंकू रुस्तम कुरैशी रियाज खान कादरी मोहम्मद जमशेद अहमद अली तमन्ना अशोक पासवान राजा पासवान भूषण मंडल लक्ष्मण पासवान मोहम्मद कुर्बान मोहम्मद रेहान रशीदा खातून शनिचरी देवी अनिल पासवान पंचायत समिति, सफीउर रहमान अधिवक्ता मुर्तुजा राईन मनोज पासवान, संतोष यादव, मो जमशेद, मो अशलम, मो आरजू आदि ने शिरकत किया। धरना को सम्बोधित करते हुए इंसाफ मंच के नेयाज अहमद ने कहा कि डीएमसीएच में लापरवाही व लचर व्यवस्था से जमाल अतहर रूमी, प्रो उमेश चंद्र, और गंगा देवी को अपनी जान गवानी पड़ीं हैं।

    और डीएमसीएच अपनी गलती मानने के बदले उल्टे पीड़ित परिवारों पर मुक़दमा कर दिया। पूरे मामले का उच्चस्तरीय जांच व दोषियों पर कार्रवाई किया जाय नहीं तो आंदोलन को तेज करने को बाध्य होंगे। धरना को सम्बोधित करते हुए अकरम सिद्दीकी ने कहा कि डीएमसीएच में हुई इन मौतों के दोषियों को सलाखों के पीछे भेजकर डीएमसीएच की गुंडागर्दी को खत्म करें‌ और मृतक के परिजनों को‌ न्याय दिलाने में अपना भरपूर सहयोग दे। पूर्व पार्षद नफिसुल हक”रिंकू ने कहा कि जिला पार्षद जमाल अतहर रूमी की डीएमसीएच मौत क़ई सवाल खड़े करते हैं। जब रूमी को कोरोना नेगेटिव होने के बाद भी कोरोना मरीज के रूप में उनका ट्रीटमेंट कैसे हुआ इसका जवाब डीएमसीएच को देना होगा। दरभंगा जिला मुहर्रम कमिटी के सचिव रूस्तम कुरैसी ने कहा कि पीड़ित परिवार को न्याय देने के बदले उल्टे मुक़दमा करना इंसाफ की हत्या हैं। धरना की अध्यक्षता मो रियाज खान कादरी ने किया।

  • क़ुर्बानी को लेकर पुलिस की मनमानी कार्यवाही पर रोक लगाए सरकार: जमियत उलेमा-ए-हिंद

    *आख़िर किस कानून के अंतर्गत पुलिस प्रशासन बड़े जानवरों की क़ुर्बानी से रोक रही है-? जमीयत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष ने उठाया प्रश्न*।

    नई दिल्ली (28 जुलाई 2020)
    जमीयत उलमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना क़ारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी ने देश के विभिन्न भागों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में क़ुर्बानी को लेकर ज़िला पुलिस प्रशासन के माध्यम से तानाशाही और अत्याचार किए जाने पर रोष प्रकट किया है और कहा है कि क़ुर्बानी इस्लाम का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक धार्मिक कार्य है। इसमें किसी भी प्रकार की रुकावट (बाधा) खड़ी न की जाए। उन्होंने बताया कि जमीयत को लिखित तौर पर उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से शिकायतें मिली हैं कि पुलिस जानवरों को पकड़ कर ले जा रही है। और बहराइच, गाज़ीपुर, गाज़ियाबाद आदि में ज़िला प्रशासन ने बड़े जानवरों की क़ुर्बानी पर रोक लगा दी है। इसी तरह से देश के विभिन्न भागों से भी ऐसे ही क़ुरबानी में रुकावटों वाले समाचार प्राप्त हो रहे हैं. प्रश्न यह है कि आख़िर पुलिस ने किस क़ानून के तहत बड़े जानवरों पर प्रतिबंध लगाया है। और वह यह सब किसके इशारे पर कर रही है-? इस संबंध में पुलिस के माध्यम से अत्याचार, बर्बरता और तानाशाही तथा खुलेआम क़ानून का मज़ाक बनाए जाने से जनता में तीव्र असंतोष और रोष पाया जाता है। हम पुलिस के इस तरह के अत्याचारों की घोर निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि सरकारें इन सब पर तुरंत रोक लगाएं। और इस बात को सुनिश्चित बनाया जाए कि मुसलमान पूरी सरलता के साथ क़ुर्बानी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य को पूर्ण कर सकें।

    अध्यक्ष जमीअत उलमा ए हिंद ने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग और क़ुर्बानी से संबंधित सरकार ने जो गाइडलाइन जारी की है उस पर जनता चल रही है। मुस्लिम नेता तथा संस्थाएं इसके संबंध में लोगों को लगातार जागरुक कर रहे हैं। जहां तक गाइडलाइन की बात है तो इसमें कहीं भी बड़े जानवर की क़ुर्बानी पर प्रतिबंध नहीं है। अगर पुलिस प्रशासन इससे बढ़कर किसी के धार्मिक कार्यों में हस्तक्षेप करती है और मनमर्ज़ी के आदेश – नियम थोपती है तो इसके परिणाम बहुत ख़राब और नकारात्मक होंगे।

    अध्यक्ष जमीयत उलमा ए हिंद ने यह चेताया है कि अगर सरकार ने समय रहते क़दम नहीं उठाया तो देश में अशांति और दंगों की परिस्थितियां पैदा हो जाएंगी। और उसकी ज़िम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार होगी। उन्होंने जमीअत उलमा ए हिंद के कार्यकर्ताओं और ज़िम्मेदारों को भी अवगत कराते हुए निर्देश दिए हैं कि अगर उनके क्षेत्र में क़ुर्बानी को लेकर कोई परेशानी होती है या पुलिस अत्याचार करती है तो आप लिखित रूप में इसकी सूचना जमीयत उलमा ए हिंद के कार्यालय को दें। ताकि जमीयत उलमा ए हिंद के द्वारा सरकार और संबंधित अधिकारियों से मिलकर उस समस्या को हल कराने (समाधान) का पूरा पूरा प्रयत्न किया जाए।

  • पटना:महात्मा गांधी सेतू पश्चिमी लेन बनकर तैयार 31 जुलाई को नितिन गडकरी करेंगे उद्घाटन,जाम से लोगों को मिलेगी राहत

    मुजफ्फर आलम, पटना: पटना के महात्मा गांधी सेतु का पश्चिमी लेन नए अवतार में बनकर तैयार हो गया है और इस पुल पर आम लोग भी 31 जुलाई से अपनी गाड़ियों से आवाजाही कर सकेंगे।
    बिहार के लोगों के लिए अच्छी खबर है। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को एक सूत्र में बांधने वाला गांधी सेतु पुल एक बार फिर से दुरुस्त होकर, एक नए रंग में दिखाई देने वाला है। महात्मा गांधी सेतु की पश्चिमी लेन बनकर तैयार है और 31 जुलाई से इस पुल पर आम लोग भी अपनी गाड़ियों से आवागमन करते नजर आएंगे। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इसका उद्घाटन करेंगे।

    लेन को पूरी तरह स्टील से बनाया गया है
    पुराने और जर्जर सुपर स्ट्रक्चर को हटाकर महात्मा गांधी सेतु की नई लेन का निर्माण किया गया है। पश्चिमी लेन पूरी तरह से स्टील से बना है, जो देखने में भी बहुत आकर्षक है। पश्चिमी लेन को बनाने में लगभग 700 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसका निर्माण 3 वर्षों में किया गया था। इस नए लेन के निर्माण में जो कि साढ़े पांच किलोमीटर लंबे है, 45 स्पैन लगाए गए हैं। हालांकि पश्चिमी लेन की सुपर संरचना लोहे की है, लेकिन पुराने पुल के 46 स्तंभों का इसमें उपयोग किया गया है। यह चौड़े स्टील के ट्रबना है जो इसे काफी मजबूत बनाती है।

    नितिन गडकरी 31 जुलाई को करेंगे उद्घाटन
    केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी 31 जुलाई को सुबह 11 बजे इसका उद्घाटन करेंगे। नितिन गडकरी का पटना आने का प्लान नहीं है, बल्कि इस नई लेन का उद्घाटन वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए करेंगे। इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव, सुशील मोदी सहित कई नेता शामिल होंगे। आपको बता दें कि इस पुल का निर्माण जो कि 5.575 किलोमीटर लंबी है , 1980 में किया गया था। इसकी शिलान्यास तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी। जो केवल 30 साल में जर्जर हो गया था।

    एशिया का सबसे लंबा पूल था गांधी सेतु
    एशिया का सबसे लंबा पुल होने का गौरव प्राप्त था महात्मा गांधी सेतु को। इसे देखने दूर-दूर से लोग आते थे, लेकिन इसने 30 सालों में ही अपना दम तोड़ना शुरू कर दिया था। 2014 में, केंद्र और राज्य सरकार के बीच नए सिरे से गांधी सेतु की मरम्मत के लिए समझौता हुआ। ईस्ट लेन भी अगले महीने बंद हो जाएगी। दोनों लेन के निर्माण के बाद, जेपी सेतु और राजेंद्र पुल से लोड कम होगा और लोगों को जाम से छुटकारा मिल सकेगा।

  • कांग्रेस हाईकमान गहलोत की जीद के आगे नतमस्तक होने की बजाय कांग्रेस सरकार बचाये रखने के विकल्प तलास करे।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    मध्यप्रदेश की सरकार के तत्तकालीन मुखिया कमलनाथ व दिग्विजय सिंह की जीद का कांग्रेस हाईकमान ने साथ देकर मध्यप्रदेश की सरकार गिरने के बाद राजस्थान सरकार के मुखिया अशोक गहलोत की जीद के आगे भी अब नतमस्तक होकर कांग्रेस हाईकमान को राजस्थान की सरकार गवाने के बजाय सरकार बनी रहने के विकल्प पर मंथन करके सरकार बचाये रखने पर अंतिम फैसला नये विकल्प पर ले लेना चाहिए।

    स्पीकर जौशी द्वारा सुप्रीम कोर्ट मे दायर एसएलपी को वापस ले लिया है। वही कांग्रेस ने राजस्थान के राजभवन पर आज के प्रदर्शन करने के ऐहलान के बाद वहा प्रदर्शन करना रद्द कर दिया है। राज्यपाल द्वारा कल उक्त कांग्रेस प्रदर्शन को लेकर डीजीपी यादव व मुख्य सचिव राजीव को राजभवन तलब करके इंतजाम के बारे मे पुछने के बाद गहलोत खेमे को अपनी गलती का अहसास होने पर उन्होंने राजभवन की बजाय बाड़ेबंदी मे बंद विधायक वाली होटल मे ही विरोध सभा करने का तय करने से कांग्रेस खेमे मे बैचेनी होना साफ नजर आ रहा है।

    कांग्रेस नेताओं द्वारा बार बार भाजपा पर लोकतंत्र को कमजोर करने के लिये लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करने के आरोप लगाये जाते रहे है। हो सकता है कि इस आरोप मे कुछ हद तक सच्चाई भी हो। पर मदन दिलावर द्वारा बसपा विधायकों के विलय के खिलाफ स्पीकर सीपी जोशी के यहां लगाई याचिका पर बीना उनका पक्ष जाने उसको निरस्त करने व उस निर्णय की कापी तक उपलब्ध नही करवाने को लोकतंत्र मे कांग्रेस कहा तक जायज मान रही है। जबकि उक्त निर्णय की कोपी तक लेने के लिये विधायक को धरने पर बैठना पड़ रहा है।

    इधर गहलोत मंत्रीमंडल द्वारा विधानसभा का सत्र बूलाने का अधकचरा निवेदन पत्र दो दफा राजभवन भेजनै के बाद राज्यपाल द्वारा कुछ क्योरीज के साथ वापस लोटाने से कांग्रेस रणनीतिकारों की किरकिरी होना देखा जा रहा है। गहलोत खेमे द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटाखटाने पर उन्हे किसी तरह की राहत नहीं मिलते देख रणनीति मे बदलाव करते हुये जनता मे जाकर आंदोलन करने का तय किया बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि अधिकांश विधायक अभी चुनाव मे जाना नही चाहते है। पर गहलोत की चल रही रणनीति से लगता है कि राजस्थान मे बिहार चुनाव के साथ मध्यवर्ती चुनाव हो सकते है। पंखवाड़े से अधिक समय से बाड़ेबंदी मे बंद विधायकों के प्रति उनकी क्षेत्र की जनता मे अंसतोष पनप रहा। असंतोष अगर चरम पर पहुंच गया तो जनता होटल को घेरकर अपने विधायको को बाड़ेबंदी से मुक्त कराने की तरफ भी बढ सकती है। कांग्रेस हाईकमान को पल पल बदलते राजनीतिक हालात पर मंथन करके अशोक गहलोत की जीद के आगे नतमस्तक होने की बजाय सरकार बचाये रखने के विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

  • डीएमसीएच में लचर व्यवस्था से हुई जमाल अतहर रूमी,प्रो उमेश चंद्र और गंगा देवी की मौत की उच्चस्तरीय जांच हो- नेयाज अहमद

    डीएमसीएच की लचर व्यवस्था को लेकर इंसाफ मंच ने बुलाई गणमान्य नागरिकों की बैठक।

    29 जुलाई को क़िलाघाट में आयोजित होगा प्रतिरोध धरना।

    भीगो(दरभंगा) 27 जुलाई
    जमाल अतहर रूमी, प्रोo उमेश चंद्र और गंगा देवी की डीएमसीएच में लापरवाही से मौत मामले को लेकर दरभ़ंगा के पूर्व पार्षद नफिसुल हक रिंकु के निवास स्थान नफिसुल हक रिंकू, वार्ड पार्षद रुस्तम कुरैसी और एआईपीएफ के भूषण मंडल की तीन सदस्यीये अध्यक्षता में बैठक आयोजित हुआ। बैठक में इंसाफ मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष नेयाज अहमद, रियाज खान कादरी, उजैल अहमद अंसारी अकरम सिद्की, मो रेहान, मो तम्मने, मो जावेद, मो उमर, मो आफताब अलि, मकसूद आलम ” पप्पू ख़ाँ, मनोज पासवान, संतोष यादव, मो जमशेद, मो अशलम, मो आरजू आदि ने शिरकत किया। बैठक को सम्बोधित करते हुए इंसाफ मंच के नेयाज अहमद ने कहा कि डीएमसीएच में लापरवाही व लचर व्यवस्था से जमाल अतहर रूमी, प्रो उमेश चंद्र, और गंगा देवी को अपनी जान गवानी पड़ीं हैं। और डीएमसीएच अपनी गलती मानने के बदले उल्टे पीड़ित परिवारों पर मुक़दमा कर दिया। पूरे मामले का उच्चस्तरीय जांच व दोषियों पर कार्रवाई की मांग पर आंदोलन तेज किया जाएगा।

    बैठक को सम्बोधित करते हुए अकरम सिद्दीकी ने कहा कि डीएमसीएच में हुई इन मौतों के दोषियों को सलाखों के पीछे भेजकर डीएमसीएच की गुंडागर्दी को खत्म करें‌ और मृतक के परिजनों को‌ न्याय दिलाने में अपना भरपूर सहयोग दे। पूर्व पार्षद नफिसुल हक”रिंकू ने कहा कि जिला पार्षद जमाल अतहर रूमी की डीएमसीएच मौत क़ई सवाल खड़े करते हैं। जब रूमी को कोरोना नेगेटिव होने के बाद भी कोरोना मरीज के रूप में उनका ट्रीटमेंट कैसे हुआ इसका जवाब डीएमसीएच को देना होगा। दरभंगा जिला मुहर्रम कमिटी के सचिव रूस्तम कुरैसी ने कहा कि पीड़ित परिवार को न्याय देने के बदले उल्टे मुक़दमा करना इंसाफ की हत्या हैं।
    बैठक से 29 जुलाई को क़िलाघाट में 12 बजे दिन से लॉकडॉन का पालन करते हुए प्रतिरोध धरना देने का निर्णय लिया गया।

  • राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे स्वयं फंसते नजर आ रहे है।

    गहलोत की कोराना काल मे सरकार चलाने की बजाय कांग्रेस के 19-विधायकों की सदस्यता रद्द करवाने मे अधिक रुचि।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    1998 मे दिल्ली हाईकमान से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री का पद पहली दफा पाने वाले अशोक गहलोत ने तब से लेकर अब तक प्रदेश के जनाधार रखने वाले दिग्गज कांग्रेस नेताओं को एक एक करके धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाते रहने से कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली जाने के बावजूद 2018 मे फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गहलोत ने अपने पुराने रवैये के मुताबिक सचिन पायलट को राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाने का जो जाल बूना उसमे गहलोत स्वयं व उनके कारण कांग्रेस पार्टी फंसती नजर आ रही है।

    2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव परिणाम के मुताबिक कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंचने पर जनता की भावनाओं के विपरीत दिल्ली मे मोजूद कांग्रेस के कोकस से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री पद पाने के बाद हमेशा की तरह ब्यूरोक्रेसी के मार्फत सचिन पायलट व उनके समर्थक मंत्रियों को असरहीन करने की भरपूर गहलोत ने कोशिशे की। लेकिन मुख्यमंत्री की उक्त कोशिशों को पायलट व समर्थक विधायक सब समझते हुये सब्र से काम लेते हुये सरकार को पांच साल तक चलाना चाहते थे। पर गहलोत ने विभिन्न धाराओं के साथ स्वयं के मंत्री व कांग्रेस विधायकों के खिलाफ अंग्रेजी राज के समय के बने काले कालून देश द्रोह कानून की दफा 124-A का उपयोग करते उन्हें आरोपी बनाया तो वो सभी नेता दिल्ली हाईकमान को अपनी भावनाओं से अवगत करवाने जाने पर मुख्यमंत्री ने बीना वजह ऐसा माहोल बनाया कि दिल्ली गये सभी कांग्रेस विधायक बागी हो गये है। यानि उनके खिलाफ माहोल बनाने के लिये अपने समर्थक विधायको की बाड़ेबंदी करके पायलट समर्थकों को पहले जिन नेताओं को साईडलाईन किया उसी तरह उनको भी साईडलाईन करने की कोशिशें की पर गहलोत उस कोशिश मे अभी तक कामयाब नही हो पाये है।

    मुख्यमंत्री गहलोत अपनी रणनीति के तहत लगातार सचिन पायलट पर भाजपा से मिलकर सरकार गिराने का आरोप लगाकर उनको अलग थलग करने की उम्मीद दिल मे पालकर जनता से सहानुभूति पाने की भरपूर कोशिशे करना जारी रखा हुवा है। वही सचिन पायलट ने अपने आपको अभी तक कांग्रेस मे होना व कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य दल मे नही जाने का लगातार कहना जारी रखने के बावजूद गहलोत ने सचिन पायलट व कुछ मंत्रियों को मंत्रीमंडल से जल्दबाजी मे बरखास्त करने व अध्यक्ष पद से हटाने के बाद सुलह की गुंजाइश को एक तरह से आंशिक रुप से खत्म करने मे सफलता जरूर पा ली है।

    मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा बूने जाल के तहत मुख्यमंत्री आवास व होटल मे कांग्रेस विधायक दल की बैठक बूलाई जिसमे उन 19-विधायकों के शामिल नही होने की शिकायत को लेकर मुख्य सचेतक महेश जौशी विधानसभा स्पीकर के पास गये एवं स्पीकर ने चंद घंटो मे उन्हें नोटिस जारी कर नोटिस की तामिल प्रशासन की मदद से घरो पर चिपका कर करने की कोशिश की। असल मे गहलोत इस बहाने उन 19 कांग्रेस विधायकों की सदस्यता रद्द करवाने चाहते थे लेकिन उनकी मंशा को भांपकर वो 19-विधायक उस नोटिस के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय की शरण मे चले गये जहां उस पर स्टे हो जाने के बाद फायनल जजमेंट तक मामला विचाराधीन है। लेकिन स्पीकर के नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट मे सुनवाई होने के बावजूद स्पीकर सुप्रीम कोर्ट गये जहां सुनवाई हो रही है।

    मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा अपनी सरकार के प्रत्येक कार्यकाल मे सत्ता मे सबकी हिस्सेदारी तय करने की बजाय हमेशा सत्ता को अपने इर्द गिर्द कायम रखा है। बोर्ड-निगम व आयोगो का गठन एवं संवेधानिक पदो पर नियुक्ति या तो की नही। अगर कुछ नियुक्ति व गठन किये तो सरकार के जाते समय अपने कार्यकाल के अंतिम दौर मे किये जो सरकार बदलते ही हटा दिये जाते रहे है। गहलोत की उक्त कार्यशैली के कारण भी आम कार्यकर्ताओं मे उदासीनता व असंतोष का आलम छाता रहा है।

    जब गहलोत का फेंका हर पाशा पहली दफा उनके उलटा पड़ने लगा तो उन्होंने हड़बड़ी मे कुछ ऐसे कदम उठा लिये जो अब तक बनाई गई उनकी कथित छवि के विपरीत व असल रुप के अनुसार पाई गई। मुख्यमंत्री गहलोत के अपनी सरकार चलाने की बजाय विधायकों को होटल मे बाड़ेबंदी मे रखने के अलावा किसी तरह उन 19-विधायकों की सदस्यता रद्द कराने मे अधिक रुचि होना देखा गया जो अभी तक संभव नही हो पाया है। सड़क से राजभवन तक कोशिश करने के साथ राजभवन की सुरक्षा को लेकर धमकाने वाले ब्यान से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। विधायकों को साथ लेकर राजभवन जाकर वहां धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी करना उनमे बोखलाहट होना दर्शाता है। इससे पहले अपने साथी रहे पायलट को नकारा व निकम्मा तक बताने से तो साफ लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत अब आपा खोते जा रहे है।

    कांग्रेस द्वारा पहले 27-जुलाई को राजभवन पर प्रदर्शन करने का ऐहलान किया। उस ऐहलान के बाद राज्यपाल ने जब डीजीपी यादव व मुख्य सचिव राजीव को राजभवन तलब करके हालात जाने तो कांग्रेस ने भारत के एकमात्र जयपुर स्थित राजभवन पर प्रदर्शन नही करने का कहकर बाड़ेबंदी मे मोजूद विधायकों वाली होटल मे ही विरोध सभा करने का ऐहलान घबराहट मे कर दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने 2008 के शासन की तरह इस दफा भी बसपा के छ विधायकों को कांग्रेस मे शामिल कर लिये जाने के बाद विलय को विधान विरोधी बताते हुये बसपा व विधायक दिलावर पहले स्पीकर के पास याचिका लेकर गये फिर माननीय न्यायालय मे याचिका लेकर गये है, जहां सुनवाई होनी है। इसके अतिरिक्त बसपा के राष्ट्रीय महामंत्री सतीशचंद्र मिश्रा ने उक्त बसपा के सभी विधायकों को विधानसभा मे कांग्रेस के बहुमत प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के खिलाफ पाबंद किया है। उक्त मामले को लेकर दायर याचिका व मिश्रा द्वारा बसपा विधायकों को व्हीप जारी करके पाबंद करने से कांग्रेस खेमे मे भारी खलबली मचना देखा जा रहा है।

    मुख्यमंत्री गहलोत व कांग्रेस पार्टी बार बार बहुमत होने का दावा करने पर जनता के मध्य सवाल उठने लगने लगे है कि अगर बहुमत है तो वो आराम से सरकार चलाये उन्हें कोन रोक रहा है। लेकिन फिर भी वो कोविड के प्रदेश मे आसमान छुते आंकड़े व रोजाना एक हजार से अधिक पाये जाने वाले कोराना पोजीटिव मरीजों के बावजूद सरकार को होटल मे बंद कर रखा है।जबकि विधायकों का मुश्किल समय मे उनके क्षेत्र की जनता बेसब्री से इंतजार कर रही है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे गहलोत-पायलट खेमो मे बंटे कांग्रेस विधायकों के बाद जारी आपसी संघर्ष मे गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे फंसते नजर आ रहे है। sog व acb एवं 124-A का अपने ही लोगो के खिलाफ उपयोग करने के अतिरिक्त अपनी खामियो को छुपाने के लिये सारे इल्जाम भाजपा पर लगा कर सहानुभूति पाने की कोशिश से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ता नजर आ रहा है। अपनी कमजोरी छुपाने के लिये अपने ही साथी को नकारा व निकम्मा बता देने के बाद जनता मे गहलोत को लेकर अलग तरह की बहस छिड़ चुकी है। जिस तरह कांग्रेस हमेशा भाजपा व संघ का डर दिखाकर मुस्लिम समुदाय को वोटबैंक की तरह उपयोग कर उनके हितो पर कठोराघात करती आई है। उसी तरह अशोक गहलोत भी वर्तमान राजनीतिक घटनाटक्रम मे अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालकर अपने आपके मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये हर बात का इल्जाम भाजपा पर लगाने से नही छुकते हुये भावनाओं से खेलने की रणनीति अपना रहे है। जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि अगर स्वयं को सर्वेसर्वा बनाये रखने की इच्छा के तरह परिवार के सदस्य को नाहक कुचलनै की कोशिश मे परिवार मे अगर फूट पड़ती है तो जहां तक संभव हो पाता है उतना विरोधी भी लाभ उठाने की भरपूर कोशिश करते ही हमेशा आये है। अभी भी समय है कि गहलोत को अपने मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये अड़यल रुख को त्याग कर कांग्रेस को बचाये रखने के लिये किसी तीसरे नेता को मुख्यमंत्री क्षका पद देकर पार्टी मे एकता व मजबूती बनाये रखने के लिये आगे आना चाहिए।वरना प्रदेश मे कांग्रेस के लिये हालात साजगार साबित नही होंगे।

  • राजस्थान मे लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस उम्मीदवार रहे नेता व पूर्व सांसद राजनीतिक घटनाटक्रम मे नई करवट ले सकते है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    लोकसभा चुनाव मे राजस्थान की सभी पच्चीस सीटो से चुनाव लड़ चुके कांग्रेस उम्मीदवारों मे से दो-चार को छोड़कर अधिकांश उम्मीदवार प्रदेश मे पल पल घट व बदल रहे राजनीतिक घटनाटक्रम पर नजर रखते हुये अपनी महत्ती भूमिका अदा करने का तय करके राजनीतिक करवट लेकर मोजुदा समय मे अहम किरदार निभा सकते है।

    राजनीतिक सुत्र बताते है कि कांग्रेस से जुड़े अधिकांश लोकसभा उम्मीदवार व पार्टी से जुड़े पूर्व सांसद जयपुर मे जल्द एक बैठक करके मोजूदा राजनीतिक घटनाटक्रम पर मंथन करके व्यू रचना बनाकर उस पर अमल कर सकते है। प्रदेश मे माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अब केन्द्र सरकार से सीधा टकराव होने की सम्भावना पूरी तरह बन चुकी है। वही कांग्रेस विधायक भी कम ज्यादा तादाद मे दो भागो मे बंट चुके है। गहलोत सरकार बहुमत सिद्ध करे या अल्पमत मे आये या फिर राष्ट्रपति शासन लगे। लेकिन सम्भवतः चालू वर्ष के आखिर मे बिहार चुनाव के साथ राजस्थान मे भी मध्यवर्ती विधानसभा चुनाव होना माना जा रहा है।

    राजस्थान के राजनीतिक घटनाटक्रम के तहत कांग्रेस विधायक गहलोत-पायलट खेमो मे विभक्त होकर होटल्स मे कैद हो चुके है। वही लोकसभा चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों व कांग्रेस पार्टी से जुड़े पूर्व सांसद एक जगह बैठकर मोजुदा राजनीतिक संकट मे नया कुछ कर सकते है। इनमे से अनेक उम्मीदवार तो काफी मजबूत व सीनियर लीडर्स की श्रेणी मै
    मे आते है।

  • मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे को लग सकता है बडा झटका।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे शामिल कराने को लेकर भाजपा विधायक मदन दिलावर व बसपा ने पहले स्पीकर के यहा 16-मार्च को शिकायत करके बसपा विधायको के कांग्रेस मे विलय को गलत करार देते हुये प्रार्थना करने पर जब स्पीकर सीपी जोशी द्वारा अभी तक उस पर निर्णय नही लेने के पश्चात आखिरकार मदन दिलावर ने उक्त मामले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय मे दिलावर व बसपा द्वारा दायर याचिका पर 27-जुलाई को सुनवाई होनी है।

    हालांकि न्यायालय का उक्त याचिका पर सुनवाई के बाद जो निर्णय आयेगा उसके बाद बसपा विधायको के अस्तित्व पर प्रभाव पड़ना तय है। लेकिन हाईकोर्ट मे दिलावर द्वारा उक्त प्रकरण को लेकर दायर याचिका के बाद कानून के जानकार व राजनितिज्ञ उक्त प्रकरण को लेकर चर्चा करने जरुर लगे है। अगर न्यायालय का आदेश विलय प्रक्रिया के खिलाफ आता है तो बसपा विधायको की सदस्यता पर भी सवाल खड़े हो सकते है। अगर उक्त छ विधायकों की विलय प्रक्रिया की खामियों के कारण सदस्यता रद्द होती है तो मुख्यमंत्री खेमे द्वारा अब 102 विधायको का समर्थन होना जताया जा रहा उस संख्या बल मे कमी आने से गहलोत खेमे को बडा झटका लग सकता है।

    कुल मिलाकर यह है कि बसपा विधायकों के कांग्रेस मे विलय होने को लेकर मदन दिलावर व बसपा द्वारा 16-मार्च को स्पीकर सीपी जौशी के यहा चुनौती देने के चार महिने तक जौशी द्वारा निर्णय नही लेने के पश्चात आखिरकार दिलावर ने उच्च न्यायालय मे याचिका दायर करने के पश्चात सोमवार 27-जुलाई को सुनवाई होना तय हुवा है।

  • शरजील इमाम और अखिल गोगोई की रिहाई के लिए एस.डी.पी.आई बिहार का 400 से अधिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन

    प्रेस विज्ञप्ति 24 जुलाई, 2020:भारत में कोरोना को रोकने के नाम पर लॉकडाउन तैयारी की कमी के कारण पूरी तरह से विफल रही है , साथ ही सरकार द्वारा इस बीच की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि यहां लॉकडाउन कोरोना को रोकने के उद्देश्य से नहीं बल्कि उसके आड़ में सांप्रदायिक फासीवाद ताकतों को बढ़ावा देने के लिए है यह बातें *सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया*, बिहार के राज्य अध्यक्ष *नसीम अख्तर* ने कहा, एसडीपीआई ने 24 जुलाई को बिहार के सभी जिलों में सैकड़ों स्थानों पर शरजील इमाम और अखिल गोगोई को रिहा करने की मांग करने वाले तख्तियों के साथ धरना प्रदर्शन किया है। पार्टी ने सवाल किया कि जब कोरोना गुवाहाटी जेल में तेजी से फैल रही थी तब शरजील और गोगोई और अन्य कैदियों की जान क्यों नहीं बचाई गई ? क्या कोरोना के नाम पर शरजील और गोगोई की हत्या की साजिश तो नहीं है? इसलिए पार्टी ने शरजील इमाम, अखिल गोगोई की तुरंत रिहाई और उनके लिए बेहतर इलाज की मांग की, साथ ही राजनीतिक शत्रुता के तहत गिरफ्तार किए गए सभी छात्रों और कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग की।

    अपने बयान में, पार्टी के राज्य सचिव मंजर आलम और राज्य के उपाध्यक्ष नूरुद्दीन ज़ंगी ने धर्मनिरपेक्ष दलों की आलोचना करते हुए कहा कि जब सी.ऐ.ऐ विरोधी आंदोलन चल रहा था, तो हर कोई मंच पर आने और नेता बनने की कोशिश कर रहा था। लेकिन जब आंदोलन का हिस्सा रहे कार्यकर्ताओं व छात्रों को गिरफ्तार करने और प्रताड़ित करने का काम जारी है, तो सब चुप है, यहां तक ​​कि राजद नेता जामिया विद्वान मीरान हैदर की गिरफ्तारी पर उनकी अपनी पार्टी को भी सांप सूंघ गया है। बिहार के लाल शरजील इमाम का जीवन खतरे में है लेकिन बिहार का कोई भी नेता या कोई भी दल अपने राज्य के बेटे के लिए मुंह खोलने को तैयार नहीं है

    बिहार शरीफ प्रदर्शन में बोलते हुए, पापुलर फ्रंट बिहार के प्रदेश उपाध्यक्ष शमीम अख्तर और मुजफ्फरपुर के औराई में बोलते हूवे कैंपस फ्रंट के नेता सैफुर रहमान ने सभी धर्मनिरपेक्ष व्यक्तियों और धर्मनिरपेक्ष संगठनों से अपील की कि वे यूपी और दिल्ली को एक व्यावहारिक तौर पर पुलिस राज्य बनाकर व तलबा और ऐकटिविसटों को प्रताड़ित कर हिंदू राष्ट्र के किऐ जा रहे टेस्ट के खिलाफ एकजुट हो कर हिंदू राष्ट्र के चल रहे परीक्षण को विफल कर देश को फासीवाद की खतरनाक मक़सद से बचा लें । उन्होंने एसडीपीआई को धन्यवाद दिया कि जब सभी ज़बान बंद होती दिख रही हैं, तब एसडीपीआई देश की रक्षा में सबसे आगे दिख रही है।