Author: Millat Times Staff

  • तीन तलाक में सजा के प्रावधान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

    तीन तलाक (Triple Talaq) में सजा के प्रावधान के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंचा है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने याचिका दाखिल कर तीन तलाक में सजा के प्रावधान को चुनौती दी है.

    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि तलाक-ए-बिद्दत को अपराध बनाना असंवैधानिक है. इससे पहले अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत देते हुए तीन तलाक कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

    आपको बता दें कि तीन तलाक को कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद से ये गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में शामिल हो गया है. ऐसे में आरोपी को सिर्फ मजिस्ट्रेट ही जमानत दे सकता है. इतना ही नहीं पीड़ित महिला के ब्लड रिलेटिव्स भी तीन तलाक के मामले में एफआईआर दर्ज करा सकेंगे. इसी प्रावधान को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

  • अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों के इस बयान को रिकॉर्ड पर लाने की इजाज़त दी..

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) सहित मुस्लिम पक्षकारों को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद (Ram Janmbhoomi-Babri Masjid Land Dispute) में अपने लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति दे दी. मुस्लिम पक्षकारों ने इसमें कहा है कि शीर्ष अदालत का निर्णय देश की भावी राज्य व्यवस्था पर असर डालेगा.

    प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई (CJI Ranjan Gogoi), न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष मुस्लिम पक्षकारों के एक वकील ने कहा कि उन्हें राहत में बदलाव के बारे में लिखित नोट रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी जाए ताकि इस मामले की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ इस पर विचार कर सके.

    6 अगस्त से 40 दिन तक चली सुनवाई
    प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने छह अगस्त से इस मामले में 40 दिन सुनवाई करने के बाद 16 अक्टूबर को कहा था कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएगा. इस वकील ने यह भी कहा कि विभिन्न पक्षकार और शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री ने लिखित नोट सीलबंद लिफाफे में दाखिल करने पर आपत्ति जताई है.

    मुस्लिम पक्षकारों के वकील ने कहा, ‘‘हमने अब रविवार को सभी पक्षकारों को अपने लिखित नोट भेज दिए हैं.’’ साथ ही उन्होंने अनुरोध किया कि रजिस्ट्री को उनके रिकॉर्ड में रखने का निर्देश दिया जाए.

    हालांकि, पीठ ने इस लिखित नोट के विवरण के बारे में कहा कि सीलबंद लिफाफे में दाखिल यह नोट पहले मीडिया के एक वर्ग में खबर बन चुका है.

    भविष्य पर पड़ेगा कोर्ट के फैसले का असर

    संविधान पीठ के समक्ष लिखित नोट दाखिल करने वाले मुस्लिम पक्षकारों ने बाद में आम जनता के लिए एक बयान जारी किया था. मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन द्वारा तैयार किये गए इस नोट में कहा गया है, ‘‘इस मामले में न्यायालय के समक्ष पक्षकार मुस्लिम पक्ष यह कहना चाहता है कि इस न्यायालय का निर्णय चाहे जो भी हो, उसका भावी

    पीढ़ी पर असर होगा. इसका देश की राज्य व्यवस्था पर असर पड़ेगा.’’

    इसमें कहा गया है कि न्यायालय का फैसला इस देश के उन करोड़ों नागरिकों और 26 जनवरी, 1950 को भारत को लोकतंत्रिक राष्ट्र घोषित किये जाने के बाद इसके संवैधानिक मूल्यों को अपनाने और उसमें विश्वास रखने वालों के दिमाग पर असर डाल सकता है..input (news 18)

  • तुगलकाबाद में उसी जगह पर बनेगा संत रविदास का मंदिर: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर

    संत रविदास का मंदिर तुगलकाबाद में उसी जगह बनेगा जहां पर वह पहले था. सुप्रीम कोर्ट ने इसपर सोमवार को अपनी मुहर लगा दी. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है जिसमें उसी जगह पर मंदिर बनाने के लिए जमीन देने की बात कही गई है. बता दें कि कुछ महीने पहले ही प्रशासन ने दिल्ली के तुगलकाबाद स्थित संत रविदास के मंदिर को ढहा दिया था. इसे लेकर बाद में जमकर बवाल भी हुआ है. और बाद में प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

    मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शांत और सद्भाव सनिश्चित करने के लिए किया जाना जरूरी है. अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने पीठ को बताया कि साइट के 200 वर्ग मीटर क्षेत्र को मंदिर निर्माण के लिए भक्तों की एक समिति को सौंपा जा सकता है. कोर्ट ने केंद्र के प्रस्ताव को रिकॉर्ड में ले लिया और सोमवार को आदेश पारित करने के लिए मामले को सूचीबद्ध किया. सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने पीठ को बताया कि उन्होंने भक्तों और सरकारी अधिकारियों सहित सभी संबंधित पक्षों के साथ परामर्श किया और केंद्र सरकार ने साइट के लिए भक्तों की संवेदनशीलता और विसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर के लिए पक्का निर्माण किया जा सकता है. इसे लेकर केंद्र सरकार एक समिति का गठन करेगी जो मंदिर का निर्माण कराएगी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि उस जगह पर किसी के भी द्वारा व्यावसायिक पार्किंग या गतिविधि की अनुमति नहीं होगी. संत रविदास के मंदिर का पक्का निर्माण करने को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि क्योंकि यह मंदर जंगल के इलाके में है इसलिए यहां पक्का निर्माण करना सही नही होगा. लोगों की आस्था को देखते हुए सरकार जमीन दे रही है लेकिन यहां लकड़ी का ही मंदिर बनाया जा सकता है. इसपर कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार जमीन दे रही है तो मंदिर के लिए पक्के निर्माण पर रोक कैसे लगाई जा सकती है.

    इसपर अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा कि मन्दिर की आड़ में लोगों ने जंगल क्षेत्र में बड़ी जगह घेर रखी थी. ट्रक पार्क करते थे. 2000 वर्ग मीटर जगह घेर रखी थी जबकि 400 वर्गमीटर ही हो सकता है. जंगल क्षेत्र में आप स्थाई निर्माण नहीं कर सकते. इसके जवाब में कोर्ट ने कहा कि सब समहत हो जाएं तो कोर्ट मंदिर के लिए समुचित जमीन को मंजूरी दे सकता है. जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि हमारा आदेश इस जमीन का किसी भी तरह के व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकेगा. हम चाहते हैं कि मंदिर के देखभाल के लिए एक कमेटी का गठन हो. और इस कमेटी का गठन केंद्र सरकार खुद करे. कोर्ट ने सरकार को अगले छह हफ्ते के अंदर कमेटी का गठन करने को कहा है. श्वास को देखते हुए भूमि देने के लिए सहमति व्यक्त की.. INPUT:(NDTV)

  • अलवर लिंचिंगः राजस्थान सरकार ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की

    राजस्थान सरकार ने अलवर में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए पहलू खान के मामले में दोषियों को सजा दिलाने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया है.

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की कांग्रेस सरकार ने पहलू खान की हत्या के छह आरोपियों को बरी करने के अलवर की अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है.

    मालूम हो कि अलवर की अदालत ने बीते अगस्त महीने में इस मामले में सभी छह आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

    इस फैसले के बाद राजस्थान सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था, जिसने सितंबर में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी.

    एडिशनल एडवोकेट जनरल मेजर आरपी सिंह ने बताया, ‘पहलू खान मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है. यह अपील राज्य सरकार की तरफ से गठित एसआईटी की जांच रिपोर्ट सौंपने के एक महीने बाद की गई है. रिपोर्ट में मामले की जांच के विभिन्न स्तरों पर प्रकाश डाला गया है.’

    रिपोर्ट में कहा गया है कि लिंचिंग के वीडियो को सबूत के तौर पर प्रभावी रूप से निचली अदालत में पेश नहीं किया गया.

    इसके अलावा कानूनी प्रक्रियाओं का भी सही तरीके से पालन नहीं किया गया. इस मामले की जांच पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई थी. उस समय वसुंधरा राजे प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं.

    गौरतलब है कि एक अप्रैल, 2017 को राजस्थान के बहरोड़ थाना क्षेत्र में पहलू खान और उनके बेटे गायों को लेकर जा रहे थे, तभी भीड़ ने गो तस्करी के शक में उन्हें रोका और खान और उनके दो बेटों की भीड़ ने कथित तौर पर पिटाई की. इसके बाद तीन अप्रैल को इलाज के दौरान अस्पताल में खान की मौत हो गई.

    इससे पहले 14 अगस्त को अलवर में अतिरिक्त जिला जज ने अपना फैसला सुनाते हुए सभी छह आरोपियों को संदेह के आधार का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

    निचली अदालत ने पूरे मामले में राजस्थान पुलिस की तरफ से जांच में कमियों का भी उल्लेख किया था. इस फैसले के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि उनकी सरकार निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकती है.

    गहलोत का कहना था कि उनकी सरकार का रुख साफ है कि प्रदेश में किसी भी तरह की लिंचिंग नहीं होनी चाहिए.. INPUT:(THE WIRE)

  • PMC बैंक मामले में जनहित याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी बैंक (PMC Bank) मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने के लिए कहा है. केंद्र सरकार की ओर से SG तुषार मेहता ने कहा कि सरकार निवेशकों को लेकर चिंतित है और उनके साथ है. ED ने 88 संपत्तियों को जब्त किया है. मामले में त्वरित कार्रवाई चल रही है. याचिकाकर्ता ने कहा कि चार राज्यों के लोग इससे प्रभावित हैं. कोई बेल आउट पैकेज दिया जाए.

    पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक के खाता धारक की अपने बैंक खाते में जमा रुपयों की कथित चिंता के के कारण मौत की सूचना के एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी जिसमें बैंक के सभी ग्राहकों के जमा रुपये की 100 प्रतिशत सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई. यह याचिका दिल्ली के उपभोक्ता कार्यकर्ता बेजोन कुमार मिश्रा द्वारा दायर की गई.

    मिश्रा ने पीएमसी बैंक के 15 लाख उपभोक्ताओं के धन के संरक्षण और पीएमसी बैंक के वित्तीय संकट के मामले को देखते हुए उसके ग्राहकों की जमा राशि को सुरक्षित रखने के लिए दिशानिर्देश देने के लिए याचिका दायर की.

    याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पीएमसी बैंक की वित्तीय गड़बड़ी से हमारे देश की बैंकिंग प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास को धक्का लगा है. दलील में कहा गया, “देश भर के हजारों जमाकर्ता भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी किए गए मनमाने परिपत्र द्वारा वित्तीय कठिनाइयों को झेल रहे हैं. इस परिपत्र के कारण शुरू में खाता धारक अपने खाते से 10000 रुपये तक निकाल पा रहे थे और बाद में 25000 रुपये ही निकाल पा रहे थे. यह परिपत्र मनमाना और भेदभावपूर्ण है.”

    इसके अलावा याचिका में आरोप लगाया गया है कि आम लोगों की गाढ़ी कमाई को कुछ प्रभावशाली और बेईमान लोगों द्वारा लूटा जा रहा है, जिससे वे आर्थिक रूप से अक्षम हो रहे हैं. RBI ने अनियमितताओं के बाद इस बैंक पर छह महीने के लिए प्रतिबंध लगाया है. सर्वोच्च बैंक ने जमाकर्ताओं की निकासी की सीमा 25,000 रुपये से बढ़ाकर 40,000 रुपये कर दी. याचिका में कहा गया है कि एक मजबूत और पारदर्शी तंत्र रखने के लिए सभी सहकारी बैंकों में काम करने और उनके संचालन के पूर्ण मामलों पर गौर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाना चाहिए जो सहकारी बैंकों में आम जनता के विश्वास को प्रेरित कर सके.

    कुछ पीएमसी बैंक खाता धारकों ने निकासी पर प्रतिबंध को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा की प्रारंभिक जांच के अनुसार, पीएमसी बैंक ने RBI के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए रियल इस्टेट फर्म HDIL को अपनी 9000 करोड़ रुपये की जमा राशि का लगभग 70 प्रतिशत ऋण दिया था.. INPUT:(NDTV)

  • हम यूपी सरकार से परेशान हो गए हैं, लगता है वहां जंगलराज है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों के प्रशासन से जुड़े एक मामले में बीते गुरुवार को कहा कि हम उत्तर प्रदेश सरकार से तंग आ चुके हैं. क्या उत्तर प्रदेश में जंगलराज है? जो वहां के वकीलों को पता ही नहीं है कि किस नियम के तहत काम किया जा रहा है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर मामलों में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास संबंधित प्राधिकरण का कोई उचित निर्देश नहीं होता.

    अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने बुलंदशहर के सैकड़ों वर्ष पुराने एक मंदिर से जुड़े प्रबंधन के मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की.

    जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल से पूछा कि क्या राज्य में कोई ट्रस्ट या सहायतार्थ ट्रस्ट एक्ट है? क्या वहां मंदिर और सहायतार्थ चंदे को लेकर कोई कानून है?

    इस पर उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने कहा कि इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस पर नाराज होकर पीठ ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि राज्य सरकार चाहती ही नहीं है कि वहां कानून हो.’

    पीठ ने कहा, ‘लगता है वहां जंगलराज है. हम यूपी सरकार से परेशान हो गए हैं. हर दिन ऐसा देखने को मिलता है कि सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास उचित निर्देश नहीं होते हैं. फिर चाहें वह दीवानी मामला हो या आपराधिक.’

    पीठ ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? नाराज पीठ ने 2009 के इस मामले में अब उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तलब किया है.

    पीठ ने कहा, ‘हम सीधे मुख्य सचिव से जानना चाहते हैं कि क्या यूपी में मंदिर और सहायतार्थ चंदे को लेकर कोई कानून है?’ पीठ ने मुख्य सचिव को मंगलवार (22 अक्टूबर) को पेश होने को कहा है.

    यह मामला बुलंदशहर के करीब 300 वर्ष पुराने श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है.

    सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें बुलंदशहर के एक मंदिर के चढ़ावे को वहां काम करने वाले पंडों को दे दिया गया था. इन आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मंदिर के प्रबंधन के लिए एक बोर्ड बनाया था, लेकिन इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा और इस तरह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

    सुप्रीम कोर्ट में मंदिर की ओर से उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ याचिका दायर की गई थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला गलत है और मंदिर के बोर्ड के गठन के लिए किसी तरह के कानून का पालन नहीं किया गया.. INPUT:(THE WIRE)

  • Ayodhya Case : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अहम बैठक कल, फैसले से पहले मंथन

    अयोध्या मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एग्ज़िक्युटिव की मीटिंग कल लखनऊ में होगी. अयोध्या मसले (Ayodhya Case) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले यह बोर्ड की आखिरी मीटिंग होगी. पर्सनल लॉ बोर्ड ही बाबरी मस्जिद के ज़्यादातर पक्षकारों को केस लड़ने में मदद करता है. मीटिंग में सुप्रीम कोर्ट में अभी तक हुई बहसों का विश्लेषण पेश किया जाएगा ताकि बोर्ड कुछ राय कायम कर सके कि मुकदमे का रुख क्या लगता है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या केस की सुनवाई चल रही है. सुनवाई 17 अक्टूबर तक होगी और नवंबर में इस मामले में फैसला आएगा. अब 14 अक्टूबर से सिर्फ चार दिन की सुनवाई और होगी.

    बोर्ड दो अहम मुद्दों पर अपनी रणनीति बनाएगा. पहली यह कि अगर मस्जिद के पक्षकार केस जीत जाते हैं तो उस हालत में उनका रुख क्या हो. अभी गुरुवार को ही लखनऊ में मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक सम्मेलन में यह प्रस्ताव पास हुआ है कि विवादित जमीन सुलह करके हिंदुओं को भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए दे दी जाए. और अगर किसी वजह से समझौता न हो पाए या अगर मुसलमान मुक़दमा जीत भी जाएं तो भी वो उस जमीन को हिंदुओं को गिफ्ट कर दें.

    अब मुसलमान यह समझने लगे हैं कि अगर वे मुकदमा जीत भी जाएं तो भी अब वहां से रामलला की मूर्तियां हटाकर मस्जिद बनाना मुमकिन नहीं है. बैठक में ऐसे हालात के लिए बोर्ड अपना रुख तय करेगा.

    दूसरा मसला यह है कि अगर मंदिर पक्ष मुकदमा जीत जाता है तो उसके बाद देश भर में जिस तरह के विजय जुलूस और जश्न होंगे उसके नतीजे में हिंसा का अंदेशा है. इन हालात से कैसे निपटा जाए, बोर्ड इस पर भी अपनी राय कायम करेगा.

    एक ऐसे वक्त में जब मुसलमानों का एक बड़ा तबका चाहता है कि आपसी भाईचारे के लिए विवादित जमीन भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए हिंदुओं को दे दी जाए, बोर्ड पर इसका भी दबाव जरूर होगा..input:(NDTV)

  • PMC बैंक क्राइसिस पर एक्ट्रेस का छलका दर्द, बोलीं- गहने बेचकर चलाना पड़ रहा है खर्च…

    पीएमसी बैंक घोटाले (PMC Bank Crisis) ने इसके ग्राहकों की जिंदगी पूरी तरह बदलकर रख दी है. पुलिस जांच के मुताबिक बैंक को 11 साल में करीब 4300 करोड़ से ज्यादा का चूना लग चुका है. बैंक में हुए इस घोटाले ने इसके ग्राहकों की जिंदगी पूरी तरह से बदल कर रख दी है. क्योंकि वित्तीय गड़बड़ी के चलते आरबीआई (RBI) ने खाताधारकों के पैसे निकालने की एक सीमा तय कर दी है. आम लोगों के साथ इसका असर टीवी एक्ट्रेस नुपुर अलंकार (Nupur Alankar) पर भी पड़ा है. इस घोटाले ने उनकी जिंदगी में तूफान ला दिया है, यहां तक कि नुपुर को अपना गुजारा करने के लिए अपने गहने तक बेचने पड़ रहे हैं. यह बात नुपुर अलंकार ने खुद टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में बताई.

    अपनी परेशानियों के बारे में नुपुर अलंकार (Nupur Alankar) ने बताया, ‘घर पर पैसे न होने के कारण, सभी अकाउंट फ्रीज कर देने की वजह से मेरे पास गहने बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. यहां तक कि मैने अपने साथी अभिनेता से 3,000 हजार रुपये उधार लिए. किसी दूसरे ने मुझे 500 रुपये ट्रांसफर किए. इसके अलावा, मैंने अपने दोस्तों से भी 50,000 हजार रुपये उधार लिए. अभी तक यह भी नहीं पता चल पाया है कि इस समस्या का समाधान कब होगा और हमें डर भी है कि कहीं हम अपना पैसा न खो दें.’

    टरव्यू के दौरान नुपुर अलंकार (Nupur Alankar) ने कहा, ‘मैं एक बड़े वित्तीय संकट से गुजर रही हूं. दूसरे बैंकों में भी मेरे खाते हैं, लेकिन मैंने उन सब को इस बैंक में ट्रांसफर कर दिया था. मुझे क्या पता था कि मेरे परिवार की और मेरी जमापूंजी बैंक में इस तरह फंस जाएगी. मैं पैसों के बिना अपना जीवन कैसे गुजार सकती हूं? क्या मुझे अपने घर को गिरवी रखना चाहिए? मेरी मेहनत की कमाई पर ही इतनी रोकथाम क्यों? मैंने पूरी शिद्दत के साथ इनकम टैक्स अदा किया है, तो मुझे इस चीज से क्यों गुजरना पड़ रहा है?’ नुपुर ने बातचीत में बताया कि उनका क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड कुछ काम नहीं कर रहा है.

    नुपुर अलंकार (Nupur Alankar) ने आगे बताया, ‘सबसे बुरी चीज यह है कि मैं अभी कोई लोन लेने की स्थिति में भी नहीं हूं. जिस पल मैंने टेलीकॉलर्स से कहा कि मेरा खाता पीएमसी बैंक में है तो उन्होंने उसी वक्त फोन काट दिया.’ बता दें कि नुपुर अलंकार अपने करियर के दौरान ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’ और ‘घर की लक्ष्मी बेटियां’ जैसे सीरियल्स में काम कर चुकी हैं. input(NDTV)

     

  • शेहला रशीद का एलान, राजनीति में अब नहीं लेगी हिस्सा

    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की पूर्व छात्र नेता और जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) पार्टी की नेता शेहला राशिद ने चुनावी राजनीति छोड़ने का ऐलान किया है. उन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर बयान जारी इसकी जानकारी दी.

    शेहला ने बयान में कहा, ‘पिछले दो से अधिक महीनों से लाखों नागरिकों को प्रतिबंधों के बीच रहना पड़ रहा है. भारत सरकार अभी भी कश्मीर में बच्चों का अपहरण कर रही है और लोग एंबुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं को फोन करने से भी वंचित हैं. वहीं, केंद्र सरकार जल्द ही कश्मीर में ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल (बीडीसी) चुनाव कराने जा रही है, जो बाहरी दुनिया को यह दिखाने का प्रयास है कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है.’

    उन्होंने कहा, ‘इस तरह की स्थिति में मैं आवाज उठाने और चुनावी प्रक्रिया पर अपना रुख स्पष्ट करने को नैतिक जिम्मेदारी मानती हूं. जम्मू कश्मीर में जारी प्रतिबंधों के बीच केंद्र सरकार वहां बीडीसी चुनाव कराने जा रही है, जिस वजह से मुझे यह बयान लिखना पड़ रहा है.’

    https://twitter.com/Shehla_Rashid/status/1181798759170052096

    शेहला ने कहा, ‘केंद्र सरकार चुनाव कराकर दुनिया को यह दिखाना चाहती है कि अभी भी कश्मीर में लोकतंत्र है लेकिन यह लोकतंत्र नहीं बल्कि लोकतंत्र की हत्या है.’

    मालूम हो कि इस साल मार्च में शेहला राशिद पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फ़ैसल द्वारा गठित जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) पार्टी में शामिल हुई थीं.

    शेहला का कहना है, ‘यह स्पष्ट है कि कश्मीर में किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने के लिए समझौते की जरूरत है.’ उन्होंने कहा कि वह कार्यकर्ता के तौर पर अपना काम जारी रखेंगी लेकिन मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े रहने में उन्हें अब भरोसा नहीं रहा.

    सीपीआईएम ने भी जम्मू कश्मीर में बीडीसी चुनाव कराने के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए इसे न्याय की त्रासदी कहा है.

    मालूम हो कि पांच अगस्त को केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से घाटी में प्रतिबंध लगे हुए हैं. बड़ी संख्या में नेताओं और कार्यकर्ताओं को नज़रबंद किया गया है, जिसमें राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं.

    जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद शेहला राशिद पर कथित तौर पर भारतीय सेना को लेकर सिलसिलेवार किए गए ट्वीट को लेकर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है. राशिद ने 18 अगस्त 2019 को कई ट्वीट कर भारतीय सेना पर जम्मू कश्मीर में लोगों को उठाने, उनके घर पर छापेमारी करने और लोगों को प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे.

    इस पर राशिद ने कहा था कि उन्होंने सिर्फ सच्चाई उजागर की थी, जिसे छिपाया जा रहा है और वह लगातार ऐसा करती रहेंगी.

  • भारत को लगा ज़ोर दार झटका अर्थ वेवस्था में पंहुचा 10 वे नंबर पर

    इस साल ब्रिक्स देशों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में एक होने के कारण भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धिता सूचकांक में पिछले साल की तुलना में 10 स्थान फिसलकर 68वें स्थान पर आ गया है. वहीं, अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए सिंगापुर ने शीर्ष स्थान पर कब्जा जमा लिया.

    बता दें कि ब्रिक्स देशों में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं.  ब्रिक्स देशों में चीन की स्थिति सबसे अच्छी रही और वह 28वें स्थान पर रहा.

    जिनेवा स्थित विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के सालाना वैश्विक प्रतिस्पर्धिता सूचकांक में भारत पिछले साल 58वें स्थान पर रहा था.

    विश्व आर्थिक मंच ने बुधवार को कहा कि वृहद आर्थिक स्थिरता तथा बाजार के आकार के मामले में भारत की रैंकिंग अच्छी है. वित्तीय क्षेत्र भी स्थिर है, लेकिन चूक की दर अधिक होने से बैंकिग प्रणाली प्रभावित हुई है.

    सूचकांक के अनुसार, भारत का स्थान कंपनी संचालन के मामले में 15वां, शेयरधारक संचालन में दूसरा तथा बाजार आकार और अक्षय ऊर्जा नियमन में तीसरा रहा. नवोन्मेष के मामले में भी भारत का प्रदर्शन अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर रहा और विकसित देशों के समतुल्य रहा.

    हालांकि सूचना, संचार एवं प्रौद्योगिकी (आईसीटी) को अपनाने में खराब प्रदर्शन, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा क्षेत्र की खराब स्थिति तथा स्वस्थ जीवन की संभावना की खराब दर ने कई क्षेत्रों में अच्छे प्रदर्शन के असर को सीमित कर दिया.

    स्वस्थ जीवन की संभावना के मामले में भारत का स्थान 109वां रहा. यह अफ्रीकी महाद्वीप के देशों को छोड़कर सबसे खराब में से एक है. मंच ने कहा कि भारत में पुरुष कामगारों की तुलना में महिला कामगारों का अनुपात 0.26 है. इस मामले में भारत का स्थान 128वां रहा.

    प्रतिस्पर्धिता की रैंकिंग में भारत के बाद श्रीलंका 84वें, बांग्लादेश 105वें, नेपाल 108वें और पाकिस्तान 110वें स्थान पर रहा. अध्ययन में कहा गया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था आर्थिक नरमी के लिये तैयार नहीं है.input(the wire)