Author: Millat Times Staff

  • जानिए क्या है माहे रमजान का महत्व? सुरक्षित प्रक्रिया कैसे अपनाएं कोरोना वायरस संकट के समय

    खुर्रम मालिक

    जैसा के हम सब को पता है के इस समय पूरी दुनिया कोरोना नामक महामारी से पीड़ित है और इस से बचाव के लिए हर वह उपाय किये जा रहे हैं जो इस बीमारी से मनुष्य को बचा सके. पूरी दुनिया में लाक डाउन हैऔर लोगों को अपने अपने घरों में रहने के लिये कहा गया है.जिस का पालन सभी लोग कर रहे हैं. और इसी बीच कल इस्लामिक पवित्र महीना रमज़ान का चांद पूरे देश में देखा गया और आज से रोज़ा शुरु हो गया. और इसी के साथ पूरी दुनिया के मुसलमानों ने रोज़ा रख कर इस पवित्र महीना का आरंभ किया. सब से पहले बात करते हैं के यह महीना है किया?इसकी महत्ता किया है और इसे इतना पवित्र कियु कहा गया है?

    ○इस्लामिक कैलेंडर का 9वां महीना रमजा़न है। इस महीने में मुसलमान रोजा़ रखते हैं। रोजे़ के दौरान सूर्योदय(सूरज निकलने)से लेकर सूर्यास्त(सुरज डूबने)तक कुछ भी नहीं खाते-पीते। इसके साथ ही रमजा़न में बुरी आदतों से दूर रहने के लिए भी कहा गया है। रमजा़न में मुसलमान लोग अल्लाह को उनकी नेमत के लिए शुक्रिया अदा करते हैं। महीने भर रोजे़ के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को ईद उल फि़तर मनाया जाता है। इन सबके बीच क्या आप जानते हैं कि रमजान क्यों मनाया जाता है? और इसका इतिहास क्या है? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”

    ○ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद साहब को साल 610 में लेयलत उल-क़द्र के मौके़ पर पवित्र कु़रान शरीफ़ का ज्ञान प्राप्त हुआ था। उसी समय से रमजा़न को इस्लाम धर्म के पवित्र महीने के तौर पर मानाया जाने लगा। इस पवित्र महीने में मुसलमान लोगों को कुछ खास सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”.
    ○इस पवित्र महीने का महत्व यह भी है के उसी पवित्र महीने में चारों आसमानी किताबें उतारी गई, जिस में तौरैत, ज़बूर(दाऊद अ) , इन्जील, और पाक किताब क़ुरान ए पाक हज़रत मुहम्मद सo पर. इस महीने की महत्ता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अल्लाह ने कहा के यह महीना मेरा महीना है और मैं इस महीने का बदला लोगों को उन के कर्मो के अनुरूप दूँगा. इस का सीधा अर्थ यह है के यह महीना अल्लाह के नज़्दीक बहुत महत्व वाला है.
    ○इस पवित्र महीने में इब्लीस (शैतान) को बंदी बना कर क़ैद कर लिया जाता है. इस पवित्र महीने में कुछ चीज़ें हैं जिन को करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ○1- रोज़ा- इस पवित्र महीने में सारे मुसलमानों को रोज़ा अर्थात उप्वास रखने का आदेश दिया गया है जो सुर्युदय से ले करसुर्यास्त तक होता है.अर्थात सुबह की अज़ान जिसे इस्लाम में फ़ज्र कहा गया है उस समय से ले कर शाम को सुरज डूबने तक सभी मुसलमानों को बिना दाना पानी खाए भूखा रहना होता है. लेकिन इस्लाम ने ऐसे लोगों के लिए छूट भी दी है जो बीमार हैं या जिन्हें डाक्टर ने भूखा रहने को मना किया है. तो ऐसे लोगों के लिये इस्लाम ने यह आदेश दिया है के वह रमज़ान के रोज़े ना रखे और जब वह स्वस्थ हो जाए तो बाद में वह रोज़े रख ले. कियु के इस्लाम में कहीं कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है. जैसा लोग समझ्ते है.

    ○2- तरावीह -यह एक नमाज़ है जिसे तरावीह की नमाज़ कहा जाता है. इस का पढ़ना सुननत ए मो’अक्कदा है अर्थात जिस के पढ़ने पर पुनय मिलता है. जो के 20 रकात पढी़ जाती है. इस नमाज़ में क़ुरान को एक हाफ़िज़ साहब (क़ुरान को याद किया हुआ इंसान) पढ़ते हैं और पीछे लोग उसे सुनते हैं.

    ○3-इफ़्तार -यह सुर्युदय के बाद अर्थात मग़रिब की अज़ान होने पर किया जाता है.जिस में सब से पहले खजूर खाने को कहा गया है या अगर यह नहीं है तो किसी मीठी चीज़ से अपना रोज़ा(उप्वास) खोले.

    ○4-सेहरी- यह सुबह के समय के खाने को कहा जाता है अर्थात ठीक सुर्युदय से पहले कुछ भी भोजन गर्हण कर लेना होता है. और इस की महत्ता के बारे में खु़द मुहम्मद साहब ने कहा है के

    قال رسول الله ص: تسحروا فان في السحور بركة..(بخاری شریف)

    क़ाला रसूलुल्लाह सo..
    तसह्हरु फ़’इनना फ़िस-सुहूरी बर’कतन (बुखा़रीशरीफ़)

    रोज़ा रखने के लिए सेहरी मस्नून है,हदीस में इस अमल को बरकत क़रार दिया गया है इस लिए सेहरी का ख़ास एहतेमाम करना चाहिए.

    5-ज़कात – ज़कात या ( अरबी : زكاة ) इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शुद्ध या पोषण करना। इसका मुख्य उद्देश्य ग़रीबों की मदद करना, सामाजिक कल्याण में अमीरों को शामिल करना और योग्य लोगों के लिए निर्वाह के साधन उपलब्ध कराना है।
    इस्लाम में जिस तरह नमाज़ पढ़ने पर ज़ोर दिया गया है ठीक इसी तरह ज़कात निकलने पर भी सख़्त आदेश दिये गए हैं. कियु के नमाज़ के बाद इस पर सब से ज़ियादा बात की गई है. वह इस लिये के इस के निकलने से ग़रीबों की मदद हो जाती है और इस का हुक्म मुहम्मद साहब के समय ही हुआ था जिस का पालन अब तक किया जा रहा है .
    इस की व्याख्या अगर सरल शब्दों में की जाए तो इस का अर्थ यह निकलता है के वैसे मुसलमान जो माल्दार हैं, पैसे से सम्पन्न हैं और पूरे साल में जो कमाता है और उस के बाद अगर उस के पास पैसे बच जाते हैं तो वह उस का ढाई अर्थात 2.5 पर्तिशत निकाल कर ग़रीबों, मोह्ताजों को देना होता है. इस्लाम ने इसे इस लिये लागू किया था के इस से समाज में गरीब लोगों का भी उद्धार हो और वह भी एक बेहतर जीवन व्यतीत कर सकें.

    6-ऐतेकाफ़- रमज़ान के पवित्र महीने के आखि़री के दस दिनों में मुसलमानों को अपने अपने मोहल्ले की मस्जिद में पूरे दस दिनों के लिए अल्लाह की इबादत के लिए बैठना होता है. एक मोहल्ले से अगर एक भी आदमी बैठ गया तो सब की तरफ़ से अदा हो जाता है. लेकिन अगर एक भी आदमी नहीं बैठा तो पूरी मोहल्ले को गुनाह मिलता है. और इस दौरान वह व्यक्ति मस्जिद से बाहर नहीं जा सकता है,.आप यह कह सकते हैं के मनुष्य का पूरी तरह से इश्वर की साधना में लीन हो जाना ही ऐतेकाफ़ है. और इस का अल्लह के क़रीब बहुत सवाब (पुण्य) है. और यह ईद का चांद देखने के बाद समाप्त हो जाता है और मो’तकिफ़ (मस्जिद में इबादत के लिए बैठने वाला) अपने घर चला जाता है.
    इस्लाम में कहा गया है के अगर कोई मुसलमान पूरी निष्ठा और श्रद्धा से रमज़ान के इन आखि़री के दस दिनों में मस्जिद में अल्लाह की इबादत के लिये बैठता है तो उस पर अल्लाह की खा़स रहमत होती है. और जब वह मस्जिद से निकलता है तो ऐसे होता है जैसे एक पैदा हुआ बच्चा.अर्थात जैसे एक बच्चा गुनाह से पाक होता है वैसे ही वह इंसान भी हो जाता है. इस पवित्र महीने में अल्लाह ने मुसलमानों को झूट,लड़ाई झगड़े से बचने को कहा है. आपस में भेद भाव मिटाने को कहा गया है. ग़रीब और बे सहारा लोगों की मदद करने का आदेश दिया गया है. अर्थात झूट की जगह सच, बुराई की जगह अच्छाई,बद की जगह नेक को दर्शाने के लिए कहा गया है.

    इसी के साथ मौजूदा रमज़ान कुछ अलग तरह का हो गया है. कोरोना की वजह कर लोग सरकारी आदेश का पालन कर रहे हैं. इस लिये मस्जिद में तरावीह नहीं हो रही है, और लोग अपने अपने घरों में ही नमाज़, तरावीह पढ़ रहे हैं जो के मुसलमानों के लिये अत्यंत दुख का कारण है. किन्तु महामारी के चलते सभी मुसलमान बाहर भी नहीं जा सकते हैं. कियु के हदीस के अनुसार अगर कहीं भी कोई वबा (महामारी) फैलती है तो ऐसे में नमाज़ घरों में पढ़ने का हुक्म दिया गया है. इस साल के रमज़ान में मुसलमान मस्जिद में तरावीह को याद कर के अफ़्सोस का इज़्हार तो कर रहा है है लेकिन दूसरी और वह इस महामारी के विक्राल रूप को भी देख रहा है और इस्लाम में अपनी और अपने परीवार की रक्षा करने को भी कहा गया है.साथ ही मुसलमानों के बड़े उलेमा ने भी घर में ही रह कर इबादात करने का आदेश दिया है और मुसलमान इस का पूरी तरह पालन भी कर रहे हैं. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है के इस साल का रमज़ान इतिहास में ऐसा पहला रमज़ान है जिस में मुसलमान मस्जिद में ना जा कर घर में ही इबादात कर रहा है और अपने अल्लाह के हुक्म को मानने के साथ ही अपने देश की सरकार और प्रशासन का पूरी तरह से सहयोग कर रहा है जो के सराहनिय है.
    इस लिये हम भी दुआ करते हैं के यह पवित्र महीना रमज़ान हम तमाम इंसानियत के लिये बेहतर साबित हो और इस मुबारक महीने की बरकत से हमारे देश और पूरी दुनिया से कोरोना नामक बीमारी को अल्लाह ख़त्म कर दे और तमाम इंसानियत की हिफ़ाज़त फ़रमाए. और देश में अमन शान्ती और भाई चारे को बनाए रखे. आमीन

    खुर्रम मालिक इस्लामिक स्कॉलर और पत्रकार है। ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं

  • मंडल का वह सैलाब जो कई दलों के तम्बूओं को बहा ले गया: बी पी मंडल की पुण्यतिथि विशेष

    1977 में जनता पार्टी की सरकार बनते ही मोरारजी देसाई ने अपने घोषणापत्र में किये वादे के अनुरूप पिछड़े वर्ग के लिए उत्थान के लिए आयोग गठन के लिए कदम उठाया और पुराने पड़ चुके काका कालेलकर आयोग की जगह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व बी पी मंडल की अध्यक्षता में नए आयोग की घोषणा की जिसे मंडल आयोग के नाम से आम लोगों के बीच जाना गया। स्व मंडल ने अपनी टीम के साथ काम करना शुरू किया और इससे पहले कि वे अपनी रिपोर्ट तैयार कर पाते , जनता पार्टी की सरकार अपने ही बोझ और पदलोलुप सहयोगियों के कुचक्र से धराशायी हो गयी। फिर से चुनाव हुए और जनता पार्टी की पिछली भारी -भरकम जीत को देख कई राजनीतिक पंडितों के द्वारा कांग्रेस और इंदिरा गाँधी जबरदस्त तरीके से कमबैक की। सिर्फ दो साल पहले हुए चुनाव में जिस जनता पार्टी और अलायन्स ने 345 सीटें हासिल कर कांग्रेस को महज 154 सीटों पर धकेल दिया , वही 1979 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 354 सीटें बटोर ली और पदलोलुपों की पार्टी जनता पार्टी महज 31 सीट ही हासिल कर सकी। खैर , यह इस पोस्ट का विषय नहीं है।

    14 जनवरी 1980 को इंदिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और तब तक बी पी मंडल अपनी रिपोर्ट भी लगभग तैयार कर चुके थे। 31 दिसंबर 1980 को मंडल कमिशन ने अपनी रिपोर्ट इंदिरा गाँधी को सौंप दिया। इंदिरा गाँधी को मंडल कमिशन की सिफारिशों को नहीं लागू करना था , सो उन्होंने नहीं किया और उस पर कुंडली मार कर बैठ गयी। इंदिरा गाँधी ने इसे क्यों नहीं लागू किया , राजनीति के छात्रों को इसे समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है। कांग्रेस का आधार वोट जो भी रहा हो लेकिन शीर्ष नेतृत्व समूह अगड़ी जातियों का ही समूह था। इक्के -दुक्के दलित और पिछड़ा चेहरा यदि था भी तो वह सिर्फ चेहरा चमकाने के लिए था , डिसिशन मेकिंग में ये लोग कोई तवज्जो नहीं पाते थे। इनके आधार वोट्स में मुस्लिम के अलावा सवर्ण जातियों का बहुत बड़ा समूह था जिसे नाराज कर मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू कर पाना इंदिरा के लिए इतना सहज नहीं था। मँझोली जातियाँ और दलितों के वोट्स कांग्रेस को नहीं मिलते थे , ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे वोट्स किसी एक जगह न जाकर समाजवादी खेमों , वामपंथी खेमों में बँटे हुए थे। खैर , इंदिरा बिना कुछ कहे -सुने इस आयोग की रिपोर्ट को अनंत काल के लिए दबाने के मकसद से ठंढे बस्ते में डाल दिया।
    इंदिरा ने भले इस रिपोर्ट को दबा दिया लेकिन वह वर्षों पुरानी माँगों को लेकर उठ रही आवाजों को कैसे दबा पाती ? मंडल कमिशन की अनुशंसाओं को लागू करने की माँग समाजवादी खेमों (तत्कालीन जनता पार्टी ) द्वारा होती रही और छोटे -बड़े आंदोलन होते रहे। गौरतलब है कि इस दौरान वामपंथी दलों का इस रिपोर्ट पर क्या रुख रहा होगा ? उस समय की घटनाओं का यदि गौर से अवलोकन किया जाय तो पता चलता है कि वामपंथी दलों का भी लगभग वही रवैया था कि जबतक पानी गर्दन से ऊपर न बहने लगे , मौन धारण ही श्रेयस्कर है। यह मौन इस रिपोर्ट से सहमति नहीं , असहमति के लक्षण थे।

    इधर जनता पार्टी में क्या चल रहा था ? भारी -भरकम हार के बाद क्या पार्टी नीतिगत स्तर पर किसी मंथन या सुधार के दौर से गुजर रही थी ? अब इसे जो भी कहें , लेकिन हार का ठीकरा एक -दूसरे पर फोड़ने के चक्कर में जनता पार्टी के नेता सरफुट्टौवल के अलावा कुछ नहीं कर रहे थे। हार के बाद जनता पार्टी के जनसंघ वाले खेमे जिनमें वाजपेयी , आडवाणी प्रमुख थे , की दोहरी सदस्य्ता पर सवाल उठाये जाने लगे। यह माँग जोर पकड़ने लगी कि पार्टी का सदस्य रहते हुए कोई आरएसएस की भी सदस्य्ता कैसे रख सकता है और संघ की कार्यशालाओं में हिस्सा कैसे ले सकता है। यह विवाद इतना बढ़ा कि जनता पार्टी टूट गयी और जनता पार्टी का जनसंघ वाला खेमा 1980 में ही उस पार्टी से अलग होकर नए दल का निर्माण किया और भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ जिसके अध्यक्ष बने अटल बिहारी वाजपेयी। शुरू में दिखावे के लिए ही सही इस पार्टी ने अपने लिए गांधीयन समाजवाद का रास्ता चुना , हालाँकि इस पर जनसंघ और आरएसएस की विचारों का ही प्रभाव था। लेकिन फिर भी आरएसएस का इस नयी बनी पार्टी पर वह नियंत्रण नहीं था जो आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी पर है। कुछ सालों तक यह दल गाँधी और समाजवाद के इर्दगिर्द ही अपने संघर्ष का तानाबाना बुनता रहा लेकिन 1984 के आमचुनावों में मात्र 2 सीटे हासिल कर पाने की भारी असफलता ने इस दल के कलेवर और विचार , दिशा और दशा सब बदल कर रख दिया। हालाँकि यदि इस चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गाँधी की हत्या नहीं हुई होती तब क्या गुणा -गणित होता , यह कहना मुश्किल है। इस दल ने गाँधी और समाजवाद के चोले को उतार फेंक उग्र हिंदुत्व की राह पकड़ ली और यही वह समय था जब आडवाणी के नेतृत्व में राममंदिर आंदोलन ने जोड़ पकड़ना शुरू किया।

    उधर बाकी की जनता पार्टी क्या कर रही थी ? 1979 की हार ने इस पार्टी में कोहराम ही मचा दिया था। जैसे यह दल कुनबा – कुनबा जोड़कर बना था , वैसे ही यह बिखड़ता गया , एक दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा। उधर जनसंघ वाला खेमा भारतीय जनता पार्टी बना तो भारतीय लोक दल जिनका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह के हाथों था , 1980 में ही अलग होकर पुनः लोकदल के नाम से नया दल बना बैठे। जनता पार्टी खत्म तो नहीं हुई लेकिन ख़त्म जैसी ही हो गयी। एक जनता पार्टी चंद्रशेखर चलाते रहे और एक तो सुब्रमण्यम स्वामी 2013 तक चलाते रहे जिसका विलय अंतत उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में कर लिया। जनता पार्टी हालत यह हो गयी कि 1984 के आम चुनाव में इंदिरा की मौत के बाद जिसमें राजीव गाँधी को 414 सीट मिले वहीँ जनता पार्टी 10 सीट , चौधरी चरण सिंह का दल लोक दल महज 3 सीट और भारतीय जनता पार्टी मात्र 2 सीटों पर सिमट कर रह गयी। जनता पार्टी की आहुति 11 अक्टूबर 1988 को तब दे दी गयी जब कांग्रेस पर बोफोर्स तोप के सौदे में सीधा राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अलग हुए और जनता दल नामक नए दल का गठन हुआ। जनता पार्टी का विलय इस जनता दल में हो गया और विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके अध्यक्ष बने।

    1989 के आम चुनाव में जनता दल के नेतृत्व में कई अन्य छोटी -छोटी पार्टियाँ एकत्रित हुई जिसे राष्ट्रीय मोर्चा का नाम दिया गया। जनता दल ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कई वादे किये जिसमें एक प्रमुख वादा था मंडल कमिशन की सिफारिशों को लागू करना। जनता दल को भारतीय जनता ने पसंद किया और बोफोर्स के हल्ले ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुँचाया। कांग्रेस 414 के टैली से धड़ाम होकर 197 पर आ गिरी। नए बने जनता दल को पहली ही बार में 143 सीट मिले। उग्र हिंदुत्व और राममंदिर के आंदोलन की नाव पर सवार होकर भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित बढ़त मिली और उसका आंकड़े पिछले चुनाव के मुकाबले 2 सीट से 85 सीट पर जा पहुँचा। चुनाव उपरांत राष्ट्रीय मोर्चा ने वाम मोर्चा की सहायता से और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से वी पी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायीं। 10 दिसंबर 1989 को वी पी सिंह प्रधानमंत्री बने।

    सरकार बनते ही समाजवादी खेमों ने जिनमें शरद यादव , लालू प्रसाद यादव , राम बिलास पासवान जैसे प्रमुख लोग थे , वी पी सिंह पर मंडल आयोग की रिपोर्ट की अनुशंसाओं को लागू करने का दबाव बनाने लगे। उधर जनता दल के ही लहर में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें बिहार समेत अन्य राज्यों में जनता दल का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ। बिहार, कर्नाटक , हरियाणा , उत्तरप्रदेश , ओडिसा आदि राज्यों में जनता दल की सरकार बनी। यह किन परिस्थितियों में हुआ , किसने दबाव बनाये , परदे के पीछे क्या -क्या खेल चल रहा था , इसके विस्तार में जाना भी इस पोस्ट का मकसद नहीं है। 7 अगस्त 1990 को जनता दल सरकार ने अपनी मंशा इस आयोग की रिपोर्ट को लेकर जता दी और इसके ठीक 6 दिन बाद 13 अगस्त को गवर्नमेंट आर्डर के जरिये इसके कुछ हिस्सों को लागू करने की घोषणा कर दी गयी और अगले दो दिनों बाद 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने अपने भाषण में लाल किले की प्राचीर से भी इस बात का जिक्र किया।

    इसकी घोषणा होते ही असली खेल शुरू हो गए। कांग्रेस की त्योरियाँ तो चढ़ी ही , सरकार को समर्थन दे रही भारतीय जनता पार्टी ने भी इसका प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष विरोध किया। दोनों के वजूद दाँव पर लगने वाले थे। सड़कों पर आरक्षण विरोधी और आरक्षण समर्थकों के प्रदर्शन होने लगे। पूरे हिन्दुस्तान में खासकर उतर भारतीय बेल्ट में जमकर तोड़-फोड़ और हिंसा हुई। सैकड़ों लोग मारे गए। पिछड़ी -दलित जातियाँ जो अब तक कांग्रेस , कम्युनिस्ट के झंडे ढो रही थीं , जनता दल के पीछे लामबंद होती दिखने लगी। जगह -जगह मशाल जुलूस , रैलियाँ आम बात थीं। मुझे याद है मेरे गाँव से भी एक बहुत बड़ा मशाल जुलूस निकलकर 4 किलोमीटर तक गया जिसमें वी पी सिंह जिंदाबाद , लालू यादव जिंदाबाद जैसे नारों से आसमान गूँज रहा था। भारतीय जनता पार्टी यह सब देख घबरा गयी। बड़े जतन से हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर वह 2 से 85 पर पहुँची थी और उसे अपने लिए बेहतर भविष्य दीख रहा था। लेकिन मण्डल कमिशन की सिफारिश को लागू करने की घोषणा के साथ ही उसे यह उम्मीद क्षीण नजर आने लगी। इसकी काट के लिए आडवाणी ने रथयात्रा का प्रपंच रचा। उधर कांग्रेस से नाउम्मीद सवर्ण जातियों को भी भारतीय जनता पार्टी में एक उम्मीद की किरण दिखने लगी थी। इधर आडवाणी ने रथयात्रा की घोषणा की उधर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सरकार के इस घोषणा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस पर रोक की माँग कर दी।

    आडवाणी की रथ यात्रा का बिहार में क्या हश्र हुआ , यह मालूम है. हालाँकि वी पी सिंह नहीं चाहते थे कि आडवाणी को गिरफ्तार किया जाय। क्यों नहीं चाहते थे , इसका अलग -अलग लोग अपने तरीके से जवाब देते हैं लेकिन मैं साफ़ -साफ़ कहने का आदी हूँ। वी पी सिंह को पता था कि आडवाणी उधर गिरफ्तार हुए और इधर सरकार गिरेगी। भाजपा चाहती भी थी कि उसे कोई ठोस बहाना मिले ताकि वी पी सिंह से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी जाय और मंडल आयोग की अनुशंसा जो एक गवर्नमेंट आर्डर के जरिये लागू की गयी थी , ठोस संवैधानिक अमलीजामा पहने बगैर फिर से ठंढे बस्ते में चला जाय। यदि ऐसा करने में भाजपा सफल होती है तो उसे कांग्रेस से उन सवर्ण समर्थकों को झटकने में कामयाबी मिलती जिसे अब तक लगता था कि सवर्णों का हित कांग्रेस के ही हाथ में सुरक्षित है। भाजपा को बहुत हद तक कामयाबी मिली भी। इधर लालू यादव ने आडवाणी को दबोचा , उधर वी पी सिंह की सरकार गिरी। तिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नमेंट आर्डर पर अंतिम सुनवाई तक स्टे लगा दिया।

    वी पी सिंह की सरकार तो गिर गयी लेकिन राज्यों में जनतादल के क्षत्रप मजबूत होकर उभरे। एक तरफ मंडल कमिशन के उफान ने पिछड़ों -दलितों वामपंथियों के चंगुल से निकलकर को लालू , मुलायम जैसे नेताओं के पीछे गोलबंद कर दिया वहीँ सवर्ण जाति के लोग कांग्रेस के इतर भाजपा को अपना सच्चा प्रतिनिधि महसूस करने लगे। एक और वर्ग था मुसलमान। जो मुसलमान अब तक कांग्रेस के पीछे लामबंद थे , भाजपा के चढाव के बीच कांग्रेस की आक्रामकता में कमी देखकर उसका भी कांग्रेस से मोहभंग होने लगा था। शाहबानो का मामला मुस्लिमों का कांग्रेस से विश्वास दरकने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा था तो अब भाजपा के उग्र हिंदुत्व के बीच लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का आडवाणी और राममंदिर आंदोलन के करता-धर्ता से सीधा टकराना , मुस्लिम समुदाय के मन में इन क्षेत्रीय नेताओं के लिए एक सम्मान और समर्थन का भाव बटोर रहा था। रही -सही कसर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में नरसिम्हा राव की संदिग्ध भूमिका को लेकर पूरी हो गयी जिसमें कम से कम राज्यों के चुनाव में उत्तर भारत के मुस्लिम कांग्रेस को पूरी तरह छोड़ चुके थे और अपना समर्थन इन क्षेत्रीय क्षत्रपों को दे चुके थे। कांग्रेस का तम्बू बिहार , उत्तरप्रदेश , हरियाणा , झारखण्ड और अन्य राज्यों से उखड चुका था। वहीँ वामपंथी पार्टियाँ जो अब तक दलितों , पिछड़ों के लिए संघर्ष के नाम पर वोट पाकर सवर्ण चेहरों को सदन में भेजने का जो कारनामा अब तक कर रही थी , उसकी भी दुकानें बंद होने के कगार पर पहुँच गयी। मंडल के बाद उभरे राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी पार्टी के वैसे समर्थक जो सवर्ण वर्ग से थे , भाजपा का दामन थम चुके थे। दलित ,पिछड़े, मुस्लिम समर्थक लालू। मुलायम जैसों का हाथ थाम चुके थे। वामपंथी दलों का भी तम्बू मंडल की सुनामी में बह गया और बहकर इतनी दूर चला गया कि लाख चाहने के बाद भी नया आशियाना बसाया न जा सका।

    Lal Babu Lalit, लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील है.  ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं अतः इसे पढते समय पाठक जन अपने विवेक का प्रयोग करें, और इस लेख को पढने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जरूर देवें।

  • मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा- साक्ष्यों के आधार पर SC का फैसला मान्य होगा..

    अयोध्या मामले (Ayodhya Case) के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर आने वाले फैसले से पहले जमीयत उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ( Maulana Sayyed Arshad Madani ) ने कहा है कि ‘वर्तमान में देश आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर चुनौतियों से गुजर रहा है और हालात चिंताजनक हैं. मदनी ने कहा कि मुसलमानों का दृष्टिकोण पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों, सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर है. बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर या किसी मंदिर की जगह पर नहीं किया गया था. हमें पूर्ण विश्वास है कि कोर्ट का फैसला आस्था की बुनियाद पर ना होकर कानूनी दायरे में होगा और कोर्ट के फैसले को जमीयत उलेमा-ए-हिंद ससम्मान स्वीकार करेगी.’

    मदनी ने कहा कि ‘आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक मौजूदा परिस्थितियों से लोग डरे सहमे हैं और एक अविश्वास की भावना आई है. मदनी ने NRC का जिक्र करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर गृहमंत्री अमित शाह का बयान जिसमें उन्होंने “गैर मुस्लिम सभी धर्मों को भारतीय नागरिकता देने” की बात कही, शर्मनाक है. अमित शाह के बयान से स्पष्ट है कि उनके निशाने पर सिर्फ मुस्लिम हैं और गृहमंत्री की सोच संविधान की धारा 14-15 के विरुद्ध हैं जिसमें सभी धर्मों को उनके धार्मिक भाषा, खान-पान, रहन-सहन के नाम पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करने की बात की है.’

    मौलाना मदनी ने कहा कि ‘हमारे मतभेद किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं हैं बल्कि हमारा विरोध हमेशा से ही उस

    विचारधारा से है जो देश की गंगा-जमुनी तहजीब और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को खत्म करने की होती है. आज जिस तरह से गाय

    के नाम पर तो कभी जय श्री राम के नाम पर धार्मिक जुनून पैदा करके देश की हिन्दू-मुस्लिम बुनियाद हिलाने की कोशिश हो रही है, वो शर्मनाक है.’ Input;(ndtv)

  • Odd Even के लिए दिल्ली तैयार…

    देश की राजधानी दिल्ली (Delhi) में एक बार फिर ऑड-ईवन (Odd-Even) शुरू होने जा रहा है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (CM Arvind Kejriwal) ने शुक्रवार को ऐलान किया कि 4 से 15 नवंबर के बीच दिल्ली में Odd-Even फॉर्मूला लागू होगा

    दिल्ली सरकार सोमवार से राजधानी में 12 दिन तक वाहनों को सम-विषम (Odd Even) के आधार पर चलाने की योजना के लिए तैयार है और इसके लिए 2000 अतिरिक्त बसें लगाई गयी हैं. यात्रियों की सुविधा के लिए मेट्रो भी 61 अतिरिक्त फेरे लगाएगी. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा (Odd Even) बैठक की. उन्होंने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि सम-विषम (Odd Even) योजना के तहत किसी को असुविधा नहीं हो.

    सरकार के अनुसार ओला, उबर जैसी कैब कंपनियों को परामर्श जारी किये गये हैं कि योजना के दौरान दामों में इजाफा नहीं किया जाए. ऑटो और ई-रिक्शा चालकों से भी अतिरिक्त किराया नहीं वसूलने को कहा गया है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को स्वीकार किया कि इस योजना के दौरान स्कूली बच्चों को लेकर जाने वाले वाहनों को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति है. हालांकि विश्वास के आधार पर ऐसे वाहनों को चलने की इजाजत होगी। ऐसा ही रोगियों को लेकर जा रहे वाहनों के मामले में होगा.

    स्कूली बच्चों के वाहनों के मुद्दे के अलावा विशेषज्ञों और कुछ दिल्लीवासियों ने सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की खराब हालत, सीएनजी वाहनों पर प्रतिबंध तथा दो पहिया वाहनों को दी गयी छूट को लेकर सरकार की आलोचना की..

  • झारखंड विधानसभा चुनाव 2019: 5 चरणों में होगा चुनाव, 23 दिसंबर को होगी नतीजे

    झारखंड (Jharkhand)  में विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) का बिगुल बज गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा (Sunil Arora ) ने चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है. झारखंड में पहले चरण का मतदान 30 नवंबर, दूसरे चरण का मतदान 7 दिसंबर, तीसरे चरण का मतदान 12 दिसंबर, चौथे चरण का मतदान 16 दिसंबर और पांचवें चरण का मतदान 20 दिसंबर को होगा. चुनावों के नतीजे 23 दिसंबर को आएंगे. चुनाव आयोग (Election commission) ने कहा है कि उन्होंने व्यापक तैयारी की है और झारखंड में आज से आदर्श आचार संहिता भी लागू कर दी गई है.

    बता दें कि, झारखंड विधानसभा का कार्यकाल 5 जनवरी 2020 को पूरा हो रहा है, उससे पहले नई सरकार का गठन किया जाएगा. पिछली बार झारखंड में पांच चरणों में चुनाव हुए थे. 81 सदस्यों की विधानसभा में बीजेपी आजसू गठबंधन ने 42 सीटें जीती थीं. बीजेपी ने 72 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 37 सीटें जीती थीं. जबकि उसके सहयोगी आजसू ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा था और पांच सीटें जीती थीं.

    झारखंड में पिछली बार कई बड़े नेता चुनाव हार गए थे. इसमें सीएम उम्मीदवार अर्जुन मुंडा, तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी, पूर्व सीएम मधु कोड़ा, आजसू अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो शामिल थे. चुनाव बाद झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के छह विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे.input:(ndtv)

  • शिवसेना सांसद संजय राउत बोले – पहले भी मुकर चुकी है BJP

    महाराष्ट्र में भाजपा पर दबाव बनाते हुए शिवसेना ने 50-50 के फॉर्मूले की मांग कर रही है. भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल किया है, लेकिन अभी तक सरकार बनाने को लेकर कोई बात नहीं हुई है. सोमवार को शिवसेना और भाजपा दोनों पार्टियों को प्रतिनिधिमंडलों ने राज्यपाल से अलग-अलग मुलाकात की है. एनडीटीवी से बात करते हुए शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, ‘वे(भाजपा) अपने वादे से नहीं मुकर सकते.’ बता दें, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने सोमवार सुबह राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात की. यह मुलाकात राज्य में गठबंधन सहयोगियों भाजपा-शिवसेना के बीच सत्ता को लेकर जारी झगड़े के बीच हुई है. राज भवन के एक अधिकारी ने बताया कि यह ‘औपचारिक मुलाकात थी.’  वहीं, दूसरी ओर शिवसेना के प्रतिनिधिमंडल ने भी राज्यपाल से मुलाकात की है.

    महाराष्ट्र में 50-50 के फॉर्मूले पर कहा, ‘यह उनका(भाजपा) हमारे साथ समझौता है. इसको समझाना चाहिए. उन्होंने मीडिया के सामने यह बात कही थी. वे अपनी बात से नहीं मुकर सकती.’

  • महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नतीजों पर बोले ओवैसी, हर बार मोदी के नाम पर नहीं जीत सकती बीजेपी..

    ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर निशाना साधा है और ध्रुवीकरण की राजनीति बंद करने को कहा है. ओवैसी ने कहा, ‘बीजेपी महाराष्ट्र में क्लीन स्वीप का दावा कर रही थी, लेकिन रिजल्ट वैसा नहीं रहा है जैसा वे चाहते थे. चुनाव परिणाम बीजेपी को आगाह करने वाले हैं. उन्हें ध्रुवीकरण की राजनीति बंद कर देनी चाहिए और अर्थव्यस्था और ग्रामीण क्षेत्रों के संकट पर ध्यान देना चाहिए.’ आपको बता दें कि ओवैसी की पार्टी पहली बार बिहार में खाता खोलने में सफल रही है. उप चुनावों में पार्टी के प्रत्याशी कमरुल होदा (Kamrul Hoda) ने किशनगंज (Kishanganj) विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की स्वीटी सिंह को हरा दिया. वहीं, महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने 2 सीटों पर जीत हासिल की है.

    बिहार में पार्टी उम्मीदवार की जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए ओवैसी ने कहा, ‘बिहार में हमारी पहली जीत बहुत महत्वपूर्ण है. हमने न सिर्फ बीजेपी को पराजित किया, बल्कि कांग्रेस को भी तीसरे स्थान पर धकेला. मैं इसके लिए किशनगंज की आवाम का धन्यवाद करना चाहता हूं.’ गौरतलब है कि बिहार विधानसभा उपचुनाव (Bihar Assembly By-Polls Election Results 2019) में किशनगंज (Kishanganj) विधानसभा सीट पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के कमरुल होदा (Kamrul Hoda) ने भारतीय जनता पार्टी की स्वीटी सिंह को 10,211 मतों के अंतर से हरा दिया है. AIMIM के कमरुल होदा को 70469 वोट मिले हैं, जबकि दूसरे नंबर पर बीजेपी की स्वीटी सिंह को 60,258 मत मिले. वहीं तीसरे नंबर पर कांग्रेस की सईदा बानो रही हैं. यह पहली बार है जब बिहार में AIMIM ने खाता खोला है.. input (ndtv)

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा सवाल: जम्मू-कश्मीर में आखिर कब तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखी जाएंगी

    सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में मौजूदा हालात को लेकर केंद्र और राज्य प्रशासन से जवाब मांगा है. कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से पूछा कि आखिर आप कब तक जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंद लगाए रखेंगे. और आम लोगों के लिए कब तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखी जाएंगी. कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से पांच नवंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है. कोर्ट के कड़े रुख के बीच केंद्र सरकार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के हालात पर रोजाना नजर रखी जा रही है. अभी तक राज्य से 99 फीसदी प्रतिबंध उठाए जा चुके हैं. धीरे-धीरे ही सही लेकिन हालात सामान्य हो रहे हैं.

    कोर्ट में सरकार ने कहा कि राज्य में अभी इंटरनेट को इसलिए बंद रखा गया है ताकि सीमापार से होने वाली हरकतों को रोका जा सके. सरकार के इस जवाब पर वी रमना ने कहा कि बेंच के एक जज निजी कारणों से छुट्टी लेना चाहते थे लेकिन मैनें आने को कहा नहीं तो लोग कहते कि हम मामले को सुनना नहीं चाहते. उन्होंने कहा कि हमारी कोई निजी जिंदगी नहीं है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट कश्मीरी व्यवसायी मुबीन की याचिका पर सुनवाई कर रही था. कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से चार हफ्तों में जवाब मांगा है.

    कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजीं थी .अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केन्द्र और जम्मू कश्मीर प्रशासन को नोटिस जारी किया था. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह अनुच्छेद 370 हटाए जाने की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करेगा. अनुच्छेद 370 के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई पांच जजों की बेंच करेगी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार ने बताया है कि जम्मू-कश्मीर हालात सामान्य हैं.

    सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने के राष्ट्रपति आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में केन्द्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को नोटिस भी जारी किया था. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ केन्द्र की उस दलील से सहमत नहीं दिखी कि अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल के अदालत में मौजूद होने के कारण नोटिस जारी करने की जरूरत नहीं है.

    पीठ ने नोटिस को लेकर ‘सीमा पार प्रतिक्रिया’ होने की दलील को ठुकराते हुए कहा, ‘हम इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजते हैं.’ अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस अदालत द्वारा कही हर बात को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष पेश किया जाता है. दोनों पक्ष के वकीलों के वाद-विवाद में उलझने पर पीठ ने कहा, ‘हमें पता है कि क्या करना है, हमने आदेश पारित कर दिया है और हम इसे बदलने नहीं वाले.’

    अनुच्छेद 370 रद्द करने के फैसले के खिलाफ याचिका अधिवक्ता एमएल शर्मा ने दायर की है, जबकि नेशनल कांफ्रेंस सांसद मोहम्मद अकबर लोन और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी ने जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में केंद्र द्वारा किये गए बदलावों को चुनौती दी है. पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल, जेएनयू की पूर्व छात्रा शेहला रशीद और राधा कुमार जैसे प्रख्यात हस्तियों सहित अन्य भी इसमें शामिल हैं..INPUT(NDTV)

  • मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई फटका कहा- यूपी में ‘जंगलराज’ है

    बुलंदशहर के करीब 300 वर्ष पुरानी श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्‍तर प्रदेश सरकार को जमकर फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये ‘अराजकता’ है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है यूपी में जंगलराज है. श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की तरफ से पेश वकीलों को भी अपनी नाराजगी जाहिर की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “क्या उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक आदेश के तहत कुछ भी कर सकते है?”

    श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या यूपी में कोई भी मंदिर बना सकता है और पैसे कलेक्ट कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि मंदिर को लेकर कोई कानून क्यों नहीं है? जबकि कई राज्यों में कानून है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आपके राज्य में कानून नहीं है तो आपने केंद्र सरकार के कानून को क्‍यों नहीं अपनाया?

    मंदिर के प्रबंधन मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से साफ कहा कि मंदिर को लेकर आप कानून बना रहे है या नहीं वह 6 हफ़्ते में कोर्ट को बताए. कोर्ट ने कहा कि यह केवल मंदिर से जुड़ा हुआ मामला नहीं है बल्कि लोगों से जुड़ा हुआ मुद्दा है. हमें मंदिर से नहीं लोगों से मतलब है.

    पिछली सुनवाई में कोर्ट ने चीफ सेकेट्री को तलब किया था. आज की सुनवाई में यूपी के अतिरिक्त सचिव कोर्ट में पेश हुए और कोर्ट को बताया गया कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है. सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने 6 हफ्ते की मोहलत दी. इस दौरान राज्य सरकार मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के नियमन का कानून बनाएगी.

    सुप्रीम कोर्ट बुलंदशहर के सैकड़ों वर्ष पुराने श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर से जुड़े प्रबंधन के मामले की सुनवाई कर रहा है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार से तंग आ चुकी है. ऐसा लगता है यूपी में जंगलराज है. सुप्रीम कोर्ट ने सवाल करते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर मामलों में यूपी सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास संबंधित अथॉरिटी का कोई उचित निर्देश नहीं होता?

    बुलंदशहर के करीब 300 वर्ष पुरानी श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन से जुड़े मामले में विजय प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें मंदिर के चढ़ावे को वहां काम करने वाले पंडों को दे दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट इसी मामले की सुनवाई चल रही है..input (ndtv)

  • पीएम मोदी से मुलाकात के बाद नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी का ‘एंटी मोदी’ बयान पर रोचक जवाब..

    नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी ने मंगलवार को पीएम मोदी से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद अभिजीत बनर्जी ने मीडिया से भी बात की. इस दौरान उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि मैं आज कोई विवादित बयान नहीं दूंगा क्योंकि पीएम मोदी ने मुझे इसके लिए सावधान किया है. अभिजीत बनर्जी (Abhijit Banerjee) ने आगे कहा कि पीएम ने मुलाकात के दौरान मजाक करते हुए कहा कि यह मीडिया आपके द्वारा कही गई एंटी मोदी बयानों के लिए आपको खूब दिखाती है. अभिजीत बनर्जी ने मीडिया कर्मियों से कहा कि मैं आप सभी को बता देना चाहता हूं कि वह टीवी देख रहे हैं और वह आपको भी देख रहे हैं. वह जानते हैं कि आप लोग क्या करना चाहते हैं. बता दें कि नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी (Abhijit Banerjee) ने कुछ दिन पहले भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर कई बयान दिए थे. उन्होंने इशारों-इशारों में मोदी सरकार की आलोचना भी की थी.

    वहीं, इससे पहले अभिजीत बनर्जी (Abhijit Banerjee) से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक ट्वीट किया. उन्होंने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर एक तस्वीर भी साझा की. इतना ही नहीं, पीएम मोदी ने बताया कि उनके साथ विस्तार से कई विषयों पर बात हुई. ट्विटर पर पीएम मोदी ने लिखा, ”नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के साथ शानदार बैठक हुई. मानव सशक्तीकरण के प्रति उनका जुनून साफ दिखाई देता है. हमने विभिन्न विषयों पर एक स्वस्थ और व्यापक बातचीत की. भारत को उनकी उपलब्धियों पर गर्व है. उनके भविष्य के प्रयासों के लिए उन्हें शुभकामनाएं.”

    बता दें कि पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) ने अभिजीत बनर्जी को लेकर कहा था कि उनका झुकाव पूरी तरह वामपंथ की ओर है. जिसपर बनर्जी ने शनिवार को NDTV से कहा कि वाणिज्‍य मंत्री ने मेरे ‘प्रोफेशनलिज्‍म पर सवाल’ उठाया है. गोयल ने शुक्रवार को पुणे में संवाददाताओं से कहा था कि मैं अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार जीतने की बधाई देता हूं. आप सभी जानते हैं कि उनकी सोच पूरी तरह वाम की ओर झुकाव वाली है. भाजपा नेता ने कहा कि बनर्जी ने कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित ‘न्याय’ योजना का समर्थन किया और भारत की जनता ने उनकी सोच को नकार दिया.

    दिल्‍ली में NDTV से बात करते हुए अभिजीत बनर्जी ने कहा था कि अगर कांग्रेस पार्टी की तरह बीजेपी ने मुझसे पूछा होता कि किसी योजना के तहत एक विशेष आय वर्ग के लोगों की कितनी संख्‍या है, तो क्‍या मैं उन्‍हें सच्‍चाई नहीं बताता? मैं उन्‍हें भी बिल्‍कुल वही बताता. अगर पेशेवर होने की बात की जाए तो मैं हर किसी के साथ पेशेवर होना चाहता हूं. मेरी सोच पक्षपाती नहीं है.

    अभिजीत बनर्जी ने कहा था कि हम कई राज्‍य सरकारों के साथ काम करते हैं, उनमें से कई बीजेपी की सरकारें हैं. हमने गुजरात प्रदूषण बोर्ड के साथ भी काम किया जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्‍यमंत्री थे और वास्‍वत में वह बेहतरीन अनुभव था. बनर्जी ने यह भी कहा कि मैं कहूंगा कि वो सबूतों के साथ जुड़ने को इच्‍छुक थे और उन्‍होंने अनुभव के आधार पर नीतियों को लागू भी किया..input(ndtv)