Author: Md Irshad Ayub

  • मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वास्तान्वी: मॉडर्न एजुकेशन क्षेत्र में भूमिका और योगदान

    90 एकड़ में बना एक ऐसा शैक्षणिक संस्थान जो प्राथमिक स्कूल से एमबीबीएस तक कि शिक्षा देता है, ऐसा संस्थान जिसमे लगभग 13 हजार स्टूडेंट्स एक कैंपस में अध्यन करते हैं। प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल, हाई स्कूल, बीएड कॉलेज, आई टी आई, डिप्लोमा इंजीनियरिंग कॉलेज, बी टेक इंजीनियरिंग कॉलेज, बी फार्मा, बी यूनानी मेडिसिन, 100 एमबीबीएस एडमिशन सीट, 300 बेड हॉस्पिटल, प्रतिदिन 600 ओपीडी और 230 आई पी डी पेशेंट चिकित्सा सेवा, प्रतिदिन 30 ऑपरेशन (सभी विभाग को मिलाकर) के संस्थापक एक मौलाना है, चंदे के पैसे से मौलाना ने इतना बड़ा शैक्षणिक संस्थान खोल दिया जहाँ 2 लाख से अधिक बच्चो ने प्रोफेशनल कोर्सेज में ग्रेजुएशन किया है। एक लाख से अधिक बच्चे बिल्कुल मुफ्त प्रोफेशनल कोर्सेज में ग्रेजुएट हुए हैं।

    महाराष्ट्र के अक्कलकुंवा के एक मोहल्ला “मकरानी” से एक झोपड़ी से एक मदरसे की शक्ल में शुरू हुआ जामिया इस्लामिया ईशातुल उलुम की बुनियाद 1979 में रखी गई थी। 6 बच्चों से शुरू हुआ यह मदरसा आज पुरे देश में 1 एक लाख 70 हजार स्टूडेंट्स को शिक्षा देता है। इस संस्थान का 70% से 75% खर्च चंदे से पुरा होता है, 25% से 30% अमीर बच्चों के द्वारा दिये गये फीस के द्वारा।

    इस संस्थान के संस्थापक और व्यवस्थापक एक मशहूर आलिम ए दीन हैं, नाम है : मौलाना मोहम्मद गुलाम वस्तानवी। जो लोग मौलवियों पर चंदा खाकर पेट मोटा करने वाला आरोप लगाता है , जो लोग मौलवियों पर फोरचुनर से घूमने का आरोप लगाता है, वह ऐसे मौलवी के बारे कभी जानने की कोशिश भी नही करता है, आपके मॉडर्न एडुकेशन हासिल करने वाले कई लोगों ने मेडिकल कॉलेज खोला है लेकिन एक भी एम बी बी एस की सीट में फ्री एडमिशन नही देता है, यहाँ तो 50% से 75% स्टूडेंट्स फ्री में एम बम बी बी एस भी करता है। अगर मौलवियों को अपना पेट मोटा करना होता तो लाखों स्टूडेंट्स को प्रोफेशनल कोर्सेज का शिक्षा फ्री में नही देता। आखिर आपकी मानसिकता में मौलवीयों को चन्दाखोर कहने का क्या कारण है? आप ने आजतक कितने बच्चों को मुफ्त बी एड, इंजीनियरिंग, बी फार्मा, एम बी बी एस कराया है? नही कराया है तो क्युँ नही कराया? नही कराया है तो मौलवियों पर सवाल क्युँ उठाते हैं? एक नही, कई मौलवियों ने तो शिक्षा के छेत्र में इतिहास रच दिया है। कहिये तो इस पर एक सिरीज चला दुं, आप इतिहास नही जानते हैं तो खामोश क्युँ नही रहते? बिला वजह मौलवियों पर उँगली क्युँ उठाते?

    यह अलग बात है की ऐसे शिक्षाविद को भी आर एस एस का दलाल, बीजेपी का एजेंट और कई बेबुनियाद आरोप लगाकर इंसल्ट किया गया है लेकिन सच तो सच होता है, ऐसे इल्जामात के बाद भी कारवाँ नही रुका और न रुकेगा। मेरी अपील मिल्लत के उस मॉडर्न लोगो से है की मौलवियों को चन्दाखोर कहने से पहले मौलवियों के इतिहास को पढ़ लें, हर जमाने मे मौलवियों ने इतिहास रचा है। आप तो 40 व 50 या 100 की भीड़ को नही संभाल सकते, छोटे से संस्था को नही संभाल सकते, एक दूसरे पर चन्दाखोर का आरोप लगाकर अपने को ऊंचा दिखाना चाहते हो। खुले आम भसढ़ मचाते हो। अपने को ऊंचा बनने के लिए किसी को नीचा करने के लिए ऊर्जा को बर्बाद न करें, लंबी लाइन खिंचे, मौलवियों ने एक मेडिकल कॉलेज खोला है, मौलवी 50% से 75% फ्री शिक्षा देता है तो आप 100% फ्री शिक्षा दीजिये, मौलवी छोटे छोटे मौलवियों से चंदा करवाता है, आप प्रोफेशनल बिज़नेस डेवलपमेंट एग्जीक्यूटिव से डोनेशन / फण्ड जेनेरेट कीजिये। किसने मना किया। आप दो खोलिये, फिर मिल्लत का हक़ अदा होगा।

    लेखक: Mustaqim Siddiqui 
    इंसाफ इंडिया

  • अनिल चमड़िया ने बीबीसी को लिखा खुला पत्र, कहा आखिर बीबीसी में भारतीय समाज के पिछड़े वर्ग, दलितों-आदिवासियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखाई देता है?

    मैं भारत में पैंतीस वर्षों से ज्यादा समय से पत्रकारिता और पत्रकारिता के अकादमिक क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहा हूं। मेरे पत्रकारिता के अनुभवों में आए शब्दों में सबसे पहले नंबर पर एक शब्द आता है वह है जाति। मैं ब्रिटेन के अश्वेतों के खिलाफ भेदभाव और उनके आंदोलनों से वाकिफ हूं। दुनिया में लिंग, रंग, नस्ल, भाषा, धर्म आदि स्तरों पर भेदभाव होते रहे हैं। भेदभाव का मतलब यह देखने को मिलता है कि जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर ऊपर बैठा है, वह इन आधारों पर एक बड़ी आबादी को अपने अधीन रखना चाहता है। भारत में जब ब्रिटिश हुकूमत थी तब राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव होते थे। तब भारत में ब्रिटिश सरकार के समक्ष यह गुहार लगायी जाती थी कि भारत के लोगों को भी नौकरियों में जगह दी जाए। उन्हें भी आत्म सुरक्षा का अधिकार दिया जाए। भारतीयों द्वारा ऐसी मांगों की एक लंबी फेहरिस्त हैं।

    दुनिया भर के भेदभाव के जो कारण हैं, भारत में उनसे एक बिल्कुल भिन्न कारण है जिसे हम जाति के नाम से जानते हैं। देश के संविधान के अनुसार आप धर्म बदल सकते हैं। विज्ञान जेंडर में बदलाव की सहूलियत देता है। लेकिन भारत में जाति नहीं बदली जा सकती। हर चीज पर जाति का ठप्पा मिलता है। रंगों में जाति हैं। जाति के श्मशान है। जाति में ही शादियां होती हैं। नामों में जातीय विभाजन हैं।

    मैं यदि एक सीधा सवाल करूं कि आखिर भारत के बीबीसी कार्यालय में देश की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी का कोई प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? क्यों खास तरह के जातीय वर्ग के लोग बीबीसी में पसंद किए जाते रहे हैं। जो पसंद करने वाले रहे हैं, क्या वह एक खास तरह से सोचने, उठने-बैठने, हंसने, मिलने-जुलने, लिखने-पढ़ने, पहनावे आदि को पसंद करते रहे हैं? क्या यह जाति नहीं है? जिन्हें पसंद नहीं किया जाता रहा है, क्या उन्हें केवल इसीलिए खारिज किया गया कि उन्हें अच्छी भाषा में लिखने व पत्रकारिता की समझ नहीं है? आप जिसे योग्यता कहते हैं, वह दरअसल एक पैकेजिंग है और भारत में योग्यता की पैकेजिंग की कसौटी जाति होती है। हम लोगों ने 2006 में जब भारत के लगभग सभी मीडिया संस्थानों के सम्पादकीय विभागों में सबसे ऊपर के पदों पर बैठने वाले लोगों की जातीय पृष्ठभूमि के बारे में एक अध्ययन किया तो पाया कि नब्बे फीसदी आबादी के बीच के लोग इन दफ्तरों में बैठने के लिए जगह नहीं पाते हैं। इन संस्थानों में बीबीसी का भारत का कार्यालय शामिल भी था।
    क्या यह सिर्फ संयोग है कि जिन्हें इन दफ्तरों में रखा गया, वे सभी योग्य लोग खास जाति वर्ग के लोग ही निकलते हैं। यानी नजर ऐसी है जो केवल खास जाति वर्ग को पसंद कर पाती है।

    आप स्वयं सोचें कि जाति का ऐसा पैनापन और गहरा प्रभाव किस तरह से किसी सार्वजनिक जगह पर काम करता होगा। एक जाति को अपवित्र माना जाता है। एक जाति की परछाई नफरत के लिए होती है। क्या इस तरह छुआछूत और नफरत को मानने वालों के बीच से आने वाले लोगों के बारे में यह मान लिया जाए कि वे दफ्तर पहुंचकर बीबीसी जैसी संस्था के वैश्विक मुलाजिम के रूप में खुद को परिवर्तित कर लेते हैं? जिन्हें हजारों वर्षों का जाति भेद का प्रशिक्षण मिला हुआ है।

    भारत में ब्रिटिश सत्ता के लौट जाने के बाद सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर सत्ता में भागीदारी की मांग राजनीति के केन्द्र में बनी रही है। ब्रिटिश-भारत में जो लोग भारतीय के नाम पर अपने लिए सरकारी सेवा में मौका देने की मांग करते रहे हैं, वहीं लोग 1947 के बाद भी भारत में व्यावहारिक स्तर पर हुकूमत कर रहे हैं और उन्होंने ही सदियों से सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा रखने के कानून बनाए हैं और उनसे अब उन वैदिक कानूनों को व्यावहारिक स्तर पर खत्म करने की मांग की जाती है। लेकिन एक भेदभाव बराबरी के बीच दूरी को खत्म करने के लिए होता है और दूसरा भेदभाव वास्तव में नफरत होता है और वह खत्म करने के लिए नहीं होता, बल्कि उसे घृणास्पद बनाए रखा जाता है।
    आखिर बीबीसी में भारतीय समाज के पिछड़े वर्ग, दलितों-आदिवासियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखाई देता है? दलित, पिछड़ा वर्ग, आदिवासी तीन हजार से ज्यादा जातियों के समूहों का सरकारी नाम है। क्या वे काले होते हैं? क्या उनके उठने-बैठने का तरीका अलग है। क्या उनके सोचने का तरीका वैसा है जैसा कि भारतीय संविधान का है? क्या उन्हें कब किसके सामने होंठों पर हल्की मुस्कुराहट देनी है ये नहीं आता। हंसते है तो तेज आवाज होती है और वर्चस्ववादी संस्कृति में उसे असभ्य माना जाता है? भारत में जाति की पहचान के लिए चूहे और चीटी की नाक लगी होती है।
    मैं आपको ये लंबा खत क्यों लिख रहा हूं क्योंकि आपके भारत स्थित कार्यालय में हिन्दी सेवा में प्रशिक्षण के लिए बहाल की गई मीना कोटवाल को काम से बाहर निकालने का एक फैसला सुनाई दिया है। आखिर आपने मीना का चयन क्यों किया था? क्या महज यह प्रचारित करने के लिए किया था कि बीबीसी में भी दलित हैं।

    मुझे पत्रकारिता के हजारों प्रशिक्षणर्थियों के साथ काम करने का मौका मिला है। राजस्थान जैसे सामंती प्रदेश के जिस श्रमिक परिवार की चार बहनों व भाईयों ने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई नहीं की हो और उस परिवार की सबसे छोटी लड़की मीना ने तरह-तरह की मजदूरी करके अपने बल पर देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों जैसे जामिया मीलिया इस्लामिया और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता का कोर्स किया तो उसके भीतर की इस ताकत को पहचाना जा सकता है। उसकी योग्यताओं को परखा जा सकता है। लेकिन उस अकेली दलित महिला को बीबीसी में सैकड़ों लोग बीबीसी के लायक प्रशिक्षित नहीं कर सकें। आप खुद सोचें कि इसका विश्लेषण कैसे किया जाना चाहिए। क्या यह अयोग्यता प्रशिक्षण देने वालों की नहीं है?
    मैं मीना की बीबीसी-डायरी सुन रहा था। वह अम्बेडकर नगर में जाति को महसूस नहीं कर सकी क्योंकि वहां उसके ही जैसे लोग रहते हैं। लेकिन बीबीसी में उसका यह अपराध हुआ कि उसने महसूस करना शुरू कर दिया। ऐसे सैकड़ों लोगों का हमें अनुभव है कि दलित अपनी बस्ती से जब बाहर निकलता है तभी उसे जाति का एहसास होता है। जो वर्ण व्यवस्था की ऊपरी जाति के परिवार में पैदा होता है उसके स्वभाव में यह बुरी तरह से घुला मिला होता है कि वह समाज में ऊपर वाला सदस्य है। बीबीसी में मीना को यह बताया गया कि इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता। यह किस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाने की उद्घोषणा है? बीबीसी में काम करने वाले एक दूसरे जातिवादी ने घर लौटते हुए ड्राइवर से कहा कि अब आपके लोग भी हमारे साथ बैठेंगे। यह मीना की तरफ इशारा था। ये बीबीसी के दो लोग नहीं है। ये एक ही है क्योंकि जाति की तरह सोचते हैं। जाति कैसे एक समूह के रुप में वहां काम करती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बीबीसी रोजाना भारत में दलित होने की सजा भुगत रहे लोगों की कहानियों से रूबरू होता है। दलित बीबीसी की सामग्री भर नहीं है।

    मीना ने जिन कठिन परिस्थितियों में अपना विकास किया है, उसमें उसकी ताकत की पहचान की जा सकती है। बीबीसी में उसने पाया कि वहां उन लोगों का वर्चस्व है जो कि एक दलित और वह भी स्त्री के भरोसे की ताकत को तोड़ने के लिए सदियों से प्रशिक्षित किए गए हैं। हिन्दू मिथक ग्रंथ महाभारत के दोर्णाचार्य द्वारा एकलव्य से अंगूठा मांगने का नया रूप है- आत्म विश्वास को तोड़ना। प्रशिक्षण लेने गई एक लड़की को डिप्रेशन का शिकार होना पड़े, उसे आत्महत्या के बारे में सोचना पड़े और तो और वह इतनी डरी हो कि अपने दफ्तर के करीब पहुंचकर यह सोचे कि उसका एक्सीटेंड हो जाए और उसे अपने दप्तर कई दिनों तक नहीं जाना पड़े, तो इस हालात का विश्लेषण किया जा सकता है। उसकी अपनी ताकत की पूंजी से बेदखल करने के जातीय वायरस के हमले के अलावा इसे किस रूप में देखा जा सकता है? एक उस व्यक्ति को डांट पड़ती हो, जो बशर्म हो चुका हो और चापलूसी की संस्कृति में ढला हो तो उसे डांट का कोई फर्क नहीं पड़ता। एक उस व्यक्ति को सार्वजनिक तौर पर डांट पड़े जो कि डांट को डांट की तरह ग्रहण करता हो, तो उसके लिए खाना पीना और सोना मुश्किल हो जाता है और वर्चस्ववादी संस्कृति में इसका हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। डांटने में अपमान और अपनत्व का फर्क आप जानते होंगे। भारतीय समाज में एक दलित व स्त्री को उसकी चेतना और अपेक्षाओं के साथ स्वीकार करने की संवेदना हर क्षण एक चुनौती की तरह खड़ी रहती है। मीना जो महसूस करती रही है उसे देखने वाले भी बीबीसी में हो सकते हैं। लेकिन वह सदियों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए नाकाफी है। उन्हें अपवाद के रूप में ही हम देख सकते हैं।

    मैं आपसे आग्रह करता हूं कि भारत में बीबीसी को जाति संस्था के रूप में बनने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करें। आप समाज शास्त्रियों का सहयोग लें और वास्तव में भारतीय समाज का आईना बनने की कोशिश करें। बहुत ही होनहार लोग उनके बीच हैं जो कि पिछड़े, दलित, आदिवासी कहे जाते हैं।
    आशा है आपको मेरी किसी बात का बुरा नहीं लगा होगा। यदि गलती से आपकी किसी भावना को चोट पंहुची हो, तो मैं आपसे क्षमा चाहता हूं। आप मीना के पूरे मामले को आईने पर पड़ी धूल को साफ करने के एक मौके के रुप में देखेंगे, यह विश्वास करता हूं।

    आदर सहित
    अनिल चमड़िया

  • बीबीसी रँग और नस्ल के आधार पर भेदभाव करती है: तारिक अनवर चम्पारणी का सटीक विश्लेषण

    तारिक अनवर चम्पारणी

    क्या आपने कभी मोटी, नाटी, काली, कथित तौर पर भद्दी नैन नक्श वाली लड़कियों को बीबीसी हिंदी के स्क्रीन पर देखा है? आप ने नहीं देखा होगा। अगर देखा भी होगा तो कभी कभार ही, मजबूरी में। कभी कभार दिखने वाली ये कथित तौर पर कुरुप और भद्दी लड़कियां एकाएक स्क्रीन से गायब क्यों हो गई थी? दरअसल एक बार मंथली मीटिंग में बीबीसी हिंदी विभाग के संपादक मुकेश शर्मा ने यह एलान किया कि अब से स्क्रीन पर वही आएगा जो प्रेजेंटेबल फेस होगा यानी कथित तौर पर सुंदर लड़किया। फिर क्या था कथित तौर पर भद्दी और लंबाई में कम कमलेश मठेनी से फेसबुक लाइव के मौके छीन ली गई। कथित तौर पर भद्दी और मोटी दिखने वाली सिंधुवासिनी त्रिपाठी के लिए वीडियो के लिए अवसर बंद हो गए। किसी की जी हुजूरी न करने वाली गुरप्रीत कौर के वीडियो के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए। सुर्यांशी टैलेंटेड जरूर है लेकिन वह सम्पादकों की जीहुजूरी नहीं करती है। इसलिए उससे भी वीडियो के सभी मौके छीन लिए गए और उसे एफएम विभाग में सड़ने को छोड़ दिया गया। अब मीना कोटवाल एक तो वह काली दिखती है और ऊपर से दलित है इसलिए मौके का कोई सवाल ही नहीं उठता था। खैर, इन सब का पत्ता कटा तो फिर किसको मौका मिला? कथित तौर पर बेहद खूबसूरत सर्वप्रिया सांगवान, प्रज्ञा सिंह को मौक़ा मिला। मैनेजरों की प्राथमिकता की सूची में पहला नाम प्रज्ञा सिंह का था। प्रज्ञा बिहार के गया से है और भूमिहार या राजपूत जाति से आती हैं। वह पहले एनडीटीवी में थीं, शायद ट्रेनी रही होंगी। जैसा मेरे स्रोत बताते हैं, वो 500 शब्दों की कॉपी लिख या फिर ट्रांसलेट भी नहीं कर पाती हैं। लेकिन उनको एकलौती दलित पत्रकार की तरह भेदभाव नहीं झेलना पड़ा और नही उनके परफॉर्मेंस पर सवाल उठाए गए। प्रज्ञा जी का बड़े ही आसानी से प्रोबेशन पूरा हुआ, कंफर्म हो गईं। आसानी और बहुत आराम की नौकरी चल रही है। क्यों, क्योंकि वो सवर्ण जाति से हैं और कथित तौर पर बेहद खूबसूरत हैं। बीबीसी के लिए यही इनकी योग्यता का पैमाना है। प्रज्ञा को रातों-रात हिंदी के संपादक ने उन्हें ‘बीबीसी हिंदी क्लिक’ कार्यक्रम का एंकर चुन लिया। वह प्रैक्टिस भी कर रही थीं। अचानक कार्यक्रम के लॉन्च से पहले बीबीसी लंदन से कुछ अंग्रेज पदाधिकारी आए। उन्होंने देखा कि प्रज्ञा का परफॉर्मेंस बहुत अच्छा नहीं था। वह ठीक से कार्यक्रम नहीं कर पा रही थी। बीबीसी के अधिकारियों ने ओपन ऑडिशन की घोषणा किया। इन हाउस जितने भी लोग थे, जो एंकर बनना चाहते थे, उन्होंने ऑडिशन के लिए अप्लाय किया। सभी लड़कियों का ऑडिशन हुआ। उस ऑडिशन में एनडीटीवी के रवीश कुमार की प्रिय और कथित तौर पर ‘महान’ पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान भी शामिल थीं। सबका ऑडिशन लिया गया। परिणाम क्या हुआ? न प्रज्ञा सिंह उस ऑडिशन में पास हो पाई और न ही महान पत्रकार सर्वप्रिया जी। फिर पास कौन हुआ? पास हुई एक टैलेंटेड लड़की सुर्यांशी। अब क्या था, अंग्रेजों से फैसले को हिंदी के संपादक कैसे बदलते, वो तो अपना रौब दलित और पिछड़े पत्रकारों पर दिखाते हैं। उनके काम का हिसाब लेते हैं।

    इस बात से खफा संपादक जी उनदोंनों सवर्ण पत्रकार (प्रज्ञा और रवीश की प्रिय सर्वप्रिया) को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया। फिर क्या किया? उन्होंने सर्वप्रिया जी को बीबीसी के हर इवेंट(पटना भी आयी थी) में एंकर बनाया। चाहे वो इवेंट में शामिल गेस्ट से सवाल अच्छी कर रही हों या न कर रही हों, चाहे वो अटक रही हों, चाहे वो बीबीसी से स्टैंडर्ट की बातें कर रही हों या ना कर रही हों मग़र उन्हें सुधार का हर मौका दिया गया। उनका कोई भी परफॉर्मेंस रिव्यू नहीं हुआ और नही उनकी कभी भरी सभा में आलोचना हुई। हर वक्त उन्हें प्रशंसा हासिल हुई। चाहे वह दूसरों की कॉपी चुरा कर वीडियो ही क्यों न बना ले। चाहे वह बेतुके सवाल ही क्यों न पूछ ले? उन्हें संपादक मंडली से स्नेह मिलता रहा भले चाहे वह गलत करे या सही। इसका बाकी के महिला पत्रकारों ने जोरदार विरोध भी किया और सवाल किया। प्रबंधन ने उत्तर दिया और कहा कि “हर कोई हर काम नहीं कर सकता है।“ संपादक मुकेश शर्मा जी ने इतना कह कर बिना किसी को सुधार का मौका दिए अयोग्य करार दे दिया। यह था उनका भेदभाव और महिला विरोधी फरमान।

    खैर, क्या ऐसे मौके कथित रूप से सुंदर नहीं दिखने वाली कमलेश मठेनी या फिर सिंधुवासिनी को नसीब हुआ। नहीं, बिलकुल भी नहीं। बीबीसी में और भी कई काले और साँवले चेहरे हैं। क्या उनको कोई ऐसा मौका मिला? नहीं, बिलकुल नही। तो फिर इतना होने के बाद कथित तौर से बेहद खूबसूरत प्रज्ञा जी का क्या हुआ? कुछ नहीं, वह ऑनलाइन में लिख नहीं पाती है। वह ट्रांसलेशन कर नहीं पाती है। फिर भी वह बीबीसी में बनी रहे, इसके लिए उन्हें दूसरे मौके उपलब्ध कराए गए। कैसे मौके? मसलन इंडिया न्यूज पर आने वाले कार्यक्रम ‘बीबीसी दुनिया’ में ‘राउंड अप न्यूज’ में उन्हें मौका दिया गया। उन्हें इलेक्शन काउंटिंग के दिन लाइव कार्यक्रम के दौरान ऑन स्क्रीन सोशल मीडिया पोस्ट पढने का मौका दिया गया। फिर वही सवाल है, क्या कथित रूप से भद्दी, मोटी, नाटी, काली दिखने वाली पत्रकारों को ये मौका मिला? बिलकुल भी नहीं।

    रंग रूप, जाति, धर्म से परे बीबीसी सबको बराबर मौका देने का दावा करती है। उनका यह दावा सार्वजनिक है, पर बीबीबी के संपादक भारत में इसे लागू करेंगे? अभी तक तो नहीं किया गया, आगे ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन से उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। बीबीसी के आलेखों पर मत जाइए। महिलाओं के बारे में की गई महान बातों पर मत जाइए। रंगभेद, जातिभेद, ऊंच-नीच वाले आलेखों पर मत जाइए। बीबीसी के अंदर भी वही होता है जो बाहर होता है। ब्राह्मणवादी सोच के लोग अपने पंसदीदा लोगों को मौका देते हैं। कथित रूप से बेहद खूबसूरत दिखने वाले को मौका देते हैं। काली, कथित रूप से बेहद भद्दी दिखने वाली लड़कियों को मौका तक नहीं दिया जाता। क्या यह बीबीसी का महिला विरोधी चेहरा नहीं है? बॉडी शेमिंग, ऊंच नीच और काले-गोरे की बात करने वाला बीबीसी इंडिया क्या महिला विरोधी फैसले नहीं ले रहा है?

    कोई गोरी होगी या नहीं, कोई पतली या सुडौल होगी या नहीं, क्या यह किसी महिला के हाथ में है? जब यह सबकुछ उनके हाथ में नहीं है तो फिर उनके साथ बीबीसी भेदभाव क्यों कर रही है? उनसे मौके छीने क्यों जा रहे है? क्या इसका जवाब भूमिहार मुकेश शर्मा, मैथिल ब्राह्मण रूपा झा और कायस्थ राजेश प्रियदर्शी देंगे?

    अरे! महिलाकर्मियों को मौका देने की बात तो दूर जब ये महिलाकर्मी वीमेन इंगेजमेंट के लिए वीडियो बनाने किसी महिला कॉलेज जाती हैं तो संपादक लोग इन्हें खूबसूरत और सेक्सी दिखने वाली लड़कियों के बाइट लेने का आदेश दिया जाता है। महिला पत्रकारों को मजबूरन यह करना पड़ता है। इससे खफा एक बार बीबीसी की महिलाकर्मी ने खुद के संस्था के खिलाफ फेसबुक पर पोस्ट भी लिखा था। उस पोस्ट पर समान पीड़ा झेल रही दूसरे महिला पत्रकार ने कमेंट भी किया। बाद में दोनों महिला पत्रकारों को ब्राह्मवादी मानसिकता के मुकेश शर्मा ने बुला कर डांटा और नौकरी से निकालने की धमकी दी और पोस्ट डिलीट करवाया। #NidarLader का कैंपने चलाने वाली बीबीसी की महिला पत्रकारों, आप कब निडर हो कर इन सभी भेदभाव के खिलाफ हल्ला बोलेंगी? क्या सारी नैतिकता आलेखों में ही लिखेंगे या फिर उसे खुद पर लागू करेंगी? ज्ञान देना आसान है बीबीसी, उसे खुद पर लागू करना बहुत मुश्किल।

    जब से सोशल मीडिया पर बीबीसी के जातिवादी चेहरे के खुलासे हो रहे हैं, तब से कथित रूप से भद्दी दिखने वाली इन महिलाओं को कुछ मौका जरुर मिलने लगा है, सिंधुवासिनी, सुर्यांशी को वीडियो का मौका दिया जा रहा है ताकि संपादक लोग अपनी नौकरी बचा सके। लंदन के अंग्रेजों के सामने खुद को साबित कर सके। प्रबंधन को मजबूरन यह सबकुछ करना पड़ रहा है। यदि आपको मेरी यह बातें झूठी लग रही है तब आप पिछले तीन-चार महीनों तक का बीबीसी हिंदी वेबसाइट का दौरा करें।

    दोस्तों! यह हमारी लड़ाई की जीत है। जब तक हम इस ब्राह्मण ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन अर्थात बीबीसी को बदल नहीं देते, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा। क्या आप साथ देंगे?

  • मॉब लिंचिंग: मानवता और सभ्य समाज को शर्मसार कर देने वाली घटना हैं।

    ज़ैन शाहब उस्मानी

    झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में भीड़ ने तबरेज अंसारी को चोरी के संदेह में कथित रूप से पीट पीट कर मार डाला था. तबरेज अंसारी की 17 जून को पिटाई की गई और 22 जून को उसने दम तोड़ दिया.

    17 जुलाई को सोनभद्र के उम्भा गांव में ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर सवार होकर सैकड़ों की संख्या में लोग जमीन पर कब्जा करने पहुंचे थे और विरोध करने पर 10 लोगों को बेरहमी के साथ हत्या कर डाला था .

    बिहार के छपरा ज़िले में 19 जुलाई शुक्रवार को भीड़ ने मवेशी चोरी के कथित आरोप में तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी. मामले की जानकारी मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन तब तक तीनों की मौत हो चुकी थी.

    21 जुलाई को झारखंड में एक बार फिर सुनियोजित तरीके से मॉब लिंचिंग कर मानवता का खून किया गया है। यहां डायन के संदेह में चार लोगों को पहले बुरी तरह पीटा गया और फिर गला काटकर निर्मम हत्या कर दी गयी है। गुमला जिले के सिसई प्रखंड मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर सिसकारी गांव में हुए इस नरसंहार में रविवार तड़के 3 बजे 10 से 12 अपराधियों ने घर में से खींचकर चार लोगों को बाहर निकाला और फिर उनकी गला काटकर हत्या कर दी। नरसंहार को अंजाम देने से पहले गांव में हत्यारों ने पंचायत लगाई थी। चारों लोगों पर ओझा गुनी और टोना-टोटका का आरोप लगाकर उनकी हत्‍या कर दी गई।

    ख़बर के ये मुताबिक़ ये सारी घटनाएं सुनियोजित तरिके से भिड़ तंत्र के द्वारा अंजाम दिया गया है, जो कि बहुत ही दुखद और निंदनीय है। और मानवता को शर्मसार कर देने वाली है।
    अब ऐसा मालूम होता है कि जैसे कुछ लोगों के अंदर क़ानून का डर समाप्त हो चुका है और वह लोग लगातार क़ानून को अपने हांथों में लेकर धर्म और जाती के नाम पर अमानवीय घटना को अंजाम दे रहे हैं। इस प्रकार की घटना से मैं बहुत आहत हूँ और केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से विनम्रता के साथ निवेदन करता हूँ कि तत्काल मामले को गंभीरता से लेते हुए संसद और सभी राज्यों के विधानसभा में एक मोब लीचिंग के विरुद्ध एक मज़बूत कानून बनाया जाए।

  • पूना पैक्ट की कमजोर और गूंगी संतानें हैं लोकसभा के दलित सांसद

    दिलीप मंडल

    डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने 1932 में ही ये होता देख लिया था. और इसी वजह से उन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध किया था. बात हो रही है पूना पैक्ट की. गांधी के आमरण अनशन के दबाव के जरिए दलितों से उनका सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचक मंडल छीन लिया गया और उन्हें रिजर्व सीटें थमा दी गईं. इसके बुरे असर का असर आंबेडकर को उसी समय हो चुका था. अब जो हो रहा है, वह बस उनकी उस समय की आशंकाओं का विस्तार है.

    अब से चंद दिनों में 17वीं लोकसभा गठित हो जाएगी. हर लोकसभा में कुछ नयापन होता है. कुछ चौंकाने वाली बातें होती हैं. सदस्यों की संरचना से लेकर शिक्षा, पेशे से लेकर संपत्ति तक का अध्ययन करके रिसर्चर कुछ नई बातें ले कर आते हैं.

    लेकिन इस नई लोकसभा की एक बात चुनाव खत्म होने से पहले ही तय हो चुकी है. अगली लोकसभा में, देश की 16.6 फीसदी यानी 20 करोड़ दलित आबादी की कोई मुखर और जानी-पहचानी आवाज नहीं होगी. इसमें एक अपवाद प्रकाश आंबेडकर हो सकते हैं, जो महाराष्ट्र के शोलापुर से चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि वे वहां कड़े तिकोने मुकाबले में फंसे हैं.

    बीएसपी अध्यक्ष मायावती लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही हैं. उन्होंने 2004 के बाद कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा. लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान भी चुनाव मैदान में नहीं हैं. नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके पासवान इस बार राज्य सभा से संसद में आने की तैयारी कर रहे हैं. अगर बीजेपी ने अपना वादा निभाया तो वे इसी साल जून में मनमोहन सिंह के रिटायर होने के बाद असम से राज्य सभा में आ जाएंगे.

    आरपीआई के चीफ और कभी दलित पैंथर रहे रामदास अठावले बीजेपी की वजह से राज्यसभा में हैं और उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही है. बीएसपी से कांग्रेस में गए दलित नेता पीएल पूनिया भी राज्य सभा में हैं. बीजेपी ने अपने दलित नेता उदित राज को आखिरी मौके पर टिकट नहीं दिया और वे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. दलित समुदाय की आवाज उठाने वाले और ऐसी क्षमता रखने वाले कुछ अन्य नेता जैसे सीपीआई के डी राजा, प्रो. बीएल मुंगेकर, नरेंद्र जाधव भी राज्य सभा में हैं. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे दलित तो हैं, लेकिन उनकी छवि दलितों के लिए बोलने वाले की नहीं है.

    सीटें रिजर्व हैं, लेकिन चुनकर कौन आ रहा है?
    ऐसा नहीं है कि दलित नेता लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. संविधान में प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभा की सीटों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आबादी के अनुपात में सीटें रिजर्व रहेंगी. इसलिए इस बार भी लोकसभा में 84 सीटें दलित उम्मीदवारों के लिए और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं. यानी हर हाल में लोक सभा में इतनी संख्या में दलित और आदिवासी सांसद तो होंगे ही. इसके अलावा, दलित और आदिवासी उम्मीदवारों के लिए अनरिजर्व सीटों पर लड़ने का भी विकल्प है.

    क्या ये 84 दलित सांसद दलितों की आवाज उठाने में सक्षम नहीं होंगे?
    शायद नहीं. अगर हम पिछली लोकसभा की कार्यवाही को याद करें तो ऐसे दलित सांसद कम ही हैं, जिन्होंने दलितों के मुद्दों को उठाया. मिसाल के तौर पर जब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से एससी-एसटी एक्ट कमजोर पड़ गया तो इसके खिलाफ आम तौर पर लोकसभा में इनकी तरफ से चुप्पी रही. लोकसभा सांसदों में इसका विरोध सिर्फ रामविलास पासवान और बाद में उदित राज ने किया. गौरतलब है कि दलितों की पार्टी जानी जाने वाली बीएसपी का पिछली लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं था.

    दलित सांसदों की छिटपुट आवाजें तब आईं, जब दलितों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ा और उन्होंने 2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद कर दिया. इसकी वजह से सरकार को कानून बनाकर एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बहाल करना पड़ा. इसमें पूरा योगदान सड़क पर आंदोलन करने वाले दलित संगठनों का रहा.

    इसी तरह जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने आनन-फानन में 13 पॉइंट रोस्टर लागू करके रिजर्वेशन को विभागवार बना दिया, जिससे रिजर्वेशन लगभग समाप्त हो गया, तो दलित सांसद चुप रहे. जब इसके खिलाफ कैंपस और सड़कों पर आंदोलन शुरू हुआ और 5 मार्च, 2019 को भारत बंद हुआ, तब जाकर सरकार ने अध्यादेश लाकर 13 पॉइंट रोस्टर वापस लिया. दलित उत्पीड़न के मामलों, जैसे रोहित वेमुला की घटना हो या ऊना में दलितों की पिटाई का मसला, लोकसभा में दलित सांसदों की आवाज कम ही सुनाई देती है.

    कुल मिलाकर हम एक ऐसी स्थिति में हैं, जिसमें लोकसभा में दलित सांसद खामोश हैं और सड़कों से लेकर कैंपस में दलित बेहद मुखर और आंदोलित हैं.

    यहां सवाल उठता है कि दलितों की आवाज उठाने के लिए दलित सांसद ही क्यों चाहिए? दूसरी जातियों के सांसद भी तो ये काम कर सकते हैं? होने को ये हो तो सकता है. लेकिन अगर देश की इतनी विशाल आबादी की आवाज उठाने का सारा काम दूसरे समुदायों के सांसदों को करना पड़े, तो ये दुखद है. और फिर लोकतंत्र का मतलब ही प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी है. जिस शासन प्रणाली में खास समूह के तथाकथित विद्वान या प्रभावशाली लोग ही फैसले करते हैं, उसे लोकतंत्र नहीं प्लूटोक्रेसी या अभिजनवाद कहते हैं.

    दलित सांसद बोलते क्यों नहीं?

    इसकी एक संभावित व्याख्या के लिए हमें 1932 और उसके आसपास चली गांधी-आंबेडकर डिबेट को देखना चाहिए. ये वो समय था जब सेकेंड राउंड टेबल कांन्फ्रेंस (1931) हुई थी और फिर पूना पैक्ट (1932) पर दस्तखत किए गए थे. आंबेडकर चाहते थे और ब्रिटिश सरकार उनसे सहमत थी कि दलित (उस समय के अछूत, या डिप्रेस्ड क्लासेस) हिंदुओं से अलग हैं और उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसे सेपरेट इलेक्टोरेट या पृथक निर्वाचक मंडल कहा गया जहां दलित अपने प्रतिनिधि चुनते लेकिन गांधी की मान्यता थी कि इससे हिंदू बंट जाएंगे, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि सेपरेट इलेक्टोरेट की जगह कुछ मतदान क्षेत्र दलितों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं, जहां सभी लोग वोट डालें.

    इस बात पर गांधी अड़ गए और तर्क की जगह आमरण अनशन का जबर्दस्ती वाला रास्ता चुन लिया. जब उनकी तबीयत खराब हो गई तो भारी दबाव में और बेहद मजबूरी में आंबेडकर को गांधी की जिद के आगे झुकना पड़ा और आरक्षित सीटों की बात माननी पड़ी. यही पूना पैक्ट है.

    इस तरह अपना प्रतिनिधि खुद चुनने की दलितों की इच्छा पर पानी फिर गया. यही व्यवस्था आजादी के बाद भी जारी रही.

    रिजर्व सीटों की यह व्यवस्था मूक सांसद क्यों पैदा करती है?
    देश में एक भी लोकसभा की सीट ऐसी नहीं है जहां दलितों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा हो. यानी रिजर्व सीटों पर आधी से ज्यादा आबादी हर हाल में गैर दलितों की होती है. इसका मतलब है कि हमेशा गैर-दलित मतदाता ही रिजर्व सीटों पर निर्णायक होते हैं. यानी रिजर्व सीटों पर वही उम्मीदवार जीतेगा, जो गैर-दलितों को पसंद हो. दलित समुदाय के लिए लड़ने वाले, आवाज उठाने वाले दलित उम्मीदवार के जीतने की संभावना ऐसी सीटों पर काफी कम होती है. इन सीटों से जीतने वाले उम्मीदवार पर हमेशा ये दबाव होता है कि वह गैर-दलितों को नाराज न करे, वरना वो दोबारा नहीं जीत सकता. इसके लिए वह तमाम समझौते करता है. संसद में चुप रहना उनमें से एक है.

    भारत में दलित हितों की सबसे मुखर आवाज बाबा साहेब आंबेडकर, जिन्हें राष्ट्र निर्माताओं में गिना जाता है, कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाए. पहली बार वे बॉम्बे उत्तर मध्य सीट से 1952 में हारे और उनकी दूसरी हार भंडारा सीट से 1954 के लोकसभा उपचुनाव में हुई. 1956 में उनका महापरिनिर्वाण हो गया.

    बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने इस गतिरोध को तोड़ने के लिए दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का गठबंधन बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी सीमित सफलता ही मिल पाई. आज स्थिति यह है कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा बेशक बीजेपी को दलित विरोधी मानता हो लेकिन लोकसभा में सबसे ज्यादा 40 दलित सांसद बीजेपी के हैं.

    लोकसभा में मुखर दलित नेताओं के होने और न होने का मतलब
    भारत की संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक देश की सत्ता का स्रोत लोकसभा है. यहां जिस पार्टी का बहुमत होता है, उसकी ही सरकार चलती है. इस सदन का विश्वास हासिल होने तक ही कोई प्रधानमंत्री अपने पद पर रह सकता है. इसके अलावा भारत के राजकोष, संचित निधि और बजट के बारे में फैसला करने का निर्णायक अधिकार लोकसभा का है. इसके लिए तीन संसदीय समितियां काम करती हैं- प्राक्कलन या एस्टिमेट कमेटी, लोक लेखा समिति और सार्वजनिक उपक्रमों से संबंधित समिति. लंदन यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर अरविंद कुमार का अध्ययन है कि इन समितियों में दलित सांसद नाम मात्र के होते हैं और यहां की कार्यवाहियों में उनकी हिस्सेदारी बेहद कम होती है.

    यानी देश कैसे चलेगा, सरकारी धन का इस्तेमाल कैसे होगा, इसे तय करने में देश के 20 करोड़ दलितों के प्रतिनिधियों की नाम मात्र की हिस्सेदारी है. ये लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है. इसे देखते हुए क्या दलितों को उनका सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचक मंडल मिलना चाहिए? राष्ट्र को इस बारे में विचार करना चाहिए.

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

  • गुड़गांव घटना की विस्तृत फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट: यूनाइटेड अगेंस्ट हेट

    मोहम्मद साजिद और उनका परिवार जो भूप सिंह कॉलोनी,ग्राम भोंडसी, गुरुग्राम, हरियाणा के निवासी हैं की ज़िंदगी ने 21 मार्च की शाम को अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। होली के दिन की एक आलसी दोपहर थी और धीरे धीरे शाम ढल रही थी जब साजिद, उनके बेटे और उनके कुछ रिश्तेदार जो छुट्टी का दिन होने की वजह से उनके घर पर थे, अपने घर के सामने एक परित्यक्त क्षेत्र में क्रिकेट खेल रहे थे । दो युवा लड़के, जो पड़ोस के नया गावं नामक गावं के निवासी थे एक बाइक पर आये और उनके साथ खेलने की मांग की। परिवार के बीच दोस्ताना क्रिकेट मैच पहले से ही चल रहा था और वो लोग इसे खेल रहे थे और इस सिलसिले को तोड़ना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने उन्हें मना कर दिया । इस कारणवश थोड़ी तकरार हुई और साजिद के अनुसार उन पर और उनके परिवार पर एक सांप्रदायिक टिप्पणी की गयी ” तुम मुल्ले लोग पाकिस्तान जा कर क्रिकेट क्यों नहीं खेलते”. फिर वो लड़के चले गए और कुछ देर बाद दो बाइक के साथ वापस आये जिस पर छह लोग थे और सबके हाथ में लाठी,लोहे की छड़ और यहां तक भाले भी थे। उन लोगों के पीछे एक और भीड़ थी जिनके हाथों में लाठी डंडे और भले तक थे
    भीड़ उनके घर में घुस गई और आक्रामकता के साथ हर एक को पीटना शुरू कर दिया । परिवार के कुछ सदस्य जो ऊपर छत पर फंसे हुए थे हमले की एक छोटी सी झलक कैमरे में कैद कर के एक वीडियो बना ली जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। तब तक कुछ हमलावरों को एहसास हो गया के उनकी वीडियो बनाई जा रही है जिसके बाद उन्होंने लोहे के रॉड और भालों से छत के दरवाज़े को तोड़ने की कोशिश असफ़ल रहे। उनके द्वारा की जा रही हिंसा की वीडियो रिकॉर्डिंग कर ली गयी है ये जानने के बाद वो भाग गए लेकिन हमला कितना तेज़ और आक्रमक था इसे उस वीडियो को देख कर समझा जा सकता है।

    भीड़ ने पूरे घर को घेर लिया था और घर में लगे कांच के शीशे को तोड़ने के लिए लगातार चट्टानों और पत्थरों से हमला करती जा रही थी वे सांप्रदायिक गालियां देते रहे और बच्चों सहित परिवार के सभी सदस्यों को पीटा जो नीचे और पहली मंजिल थे। यहाँ तक की उन्होंने भयभीत बच्चों जो अलमारी के पीछे छुप् अलमारी से बाहर खींच कर उन्हें पीटा। फिर अलमारी खोल कर गहने और कैश तक लूट लिए जो उन्हें मिल गया । मोहम्मद साजिद, मोहम्मद इरशाद, मोहम्मद शादाब, श्रीमती शाकेरीन आबिद, शाहरुख, समीना,दिलशाद, नरगिस, अफ़ीफ़ा और आमिर को सबसे ज्यादा बेरहमी से पीटा गया था और वास्तव में हमलावरों को लगा के वो मर चुके हैं ।

    साजिद के डरे हुए परिवार ने 100 नंबर डायल करके पुलिस को कॉल करने की कोशिश की लेकिन वो उपलब्ध नहीं हुए. अंत में वो घायल लोगों को एक निजी कार से इलाज के लिए दिल्ली के एम्स ले कर आये और परिवार का एक व्यक्ति पुलिस रिपोर्ट करने के लिए स्थानीय थाने पहुंचा।
    यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की एक टीम ने पहली बार दिल्ली स्थित लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल में 25 मार्च 2019. को भर्ती किए गए घायल पीड़ितों से मुलाक़ात की और दो दिन बाद उनके घर का दौरा किया।

    वो घर अस्पताल की तरह दिख रहा था। टूटे हुए कांच के शीशे हर जगह बिखरे हुए थे और दीवारों पर छड़ और भालों के निशान भी थे । खिड़कियों और दरवाज़े तोड़ कर गुंडों ने जबरन घर में घुसने का प्रयास किया था।घर के प्रत्येक कमरे और बिस्तर पर एक या दो घायल व्यक्ति पड़े थे। परिवार का प्रत्येक डरा हुआ और तनाव में था ” बच्चे तब से हर दिन रोते हैं । ‘ वो रंगवाले लोग फिर से आ जायेंगे अब्बु. भाग चलते है यहाँ से “. जिन हमलावरों ने सुबह होली खेली थी और शाम को लाठी और भाले के साथ उन सब को मारने के लिए आये थे बच्चों के दिमाग में हमेशा के लिए हैं है । उन्होंने हर दरवाजे को तोड़ दिया था बस एक छत का दरवाजा वो नहीं तोड़ पाए थे जहाँ कुछ कुछ महिलायें और लड़कियां छुपे हुए थे और परिवार की एक लड़की दनिश्ता ने वहीँ से इस पूरी घटना का वीडियो बनाया था। उस दरवाज़े को जबरन तोड़ने और भालों से दरवाज़े पे प्रहार के निशाँ स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन वो लोग दरवाज़े को नहीं तोड़ पाए ” साजिद की युवा बहू नरगिस बताती हैं के अल्लाह, हमारे साथ खड़ा था, दरवाजा पकड़ रहा था वरना हम बस कुछ लड़कियां एक तरफ और हथियारबंद गुंडे दूसरी तरफ थे।
    साजिद बताते हैं के उनके परिवार को गुंडों से बचाने कोई स्थानीय पड़ोसी नहीं आया क्यूंकी एक तो होली के कारण उनमें से ज्यादातर यहाँ नहीं थे और जो मौजूद थे वो दूर से ही हमें पीटता हुआ देख रहे थे और शायद डरे हुए थे इसलिए कोई भी नहीं आया। भूपसिंह कॉलोनी में कोई बहुत पुराने पड़ोसी नहीं हैं क्यूंकी यह एक कम आबादी वाली नई विकसित कॉलोनी है, जहां ज्यादातर प्रवासी श्रमिक जो गुड़गांव के विशाल औद्योगिक बेल्ट में काम करते हैं, किराए पर रहते हैं इसलिए कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है एक दुसरे के साथ क्यूंकी अधिकतर लोग बाहर से आये हैं। वहीँ दूसरी ओर हमलावर नए गाँव से आए थे , जो एक अपेक्षाकृत बड़ी बस्ती है और अधिकतर गूजर समुदाय के लोग हैं जो स्थानीय जाति हैं, और उनके द्वारा हिंसा की घटनाएं आम हैं। इसी डर के कारण से पड़ोसी,जो भी उस दिन के चश्मदीद थे और स्थानीय गुंडों को पहचानते भी थे उन्होंने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया

    पुलिस की भूमिका:
    पुलिस ने साजिद और उनके परिवार को पीटने वाले भीड़ के किसी भी सदस्य का नाम प्राथमिकी में शामिल नहीं किया हालांकि वे इंटरनेट पर उपलब्ध वीडियो से बहुत आसानी से पहचान सकते हैं यानी एफआईआर नामज़द नहीं हुई है।
    पुलिस के दावे के अनुसार कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया है लेकिन इतने दिनों के बाद भी हिरासत में लिए गए आरोपी की कोई पहचान परेड नहीं हुई है ।
    पुलिस स्टेशन में हर कोई अपने होंठ सिले हुए था और मामले के बारे में कुछ भी बात करने के लिए तैयार नहीं था। उनका कहना था के कमिश्नर श्री अकील ने निर्देश दिए हैं कि पुलिस विभाग को बाहर से किसी भी व्यक्ति से इस पर बात नहीं करनी चाहिए ।

    एक काउंटर केस और एफआईआर देने से इनकार:

    परिवार पर एक काउंटर केस दर्ज किया गया है और सात दिनों के बाद, आरोपीयों ने एक लड़के को सामने लाया है जो उनके अनुसार पीड़ित परिवार द्वारा चोटिल हुआ है और उसके सर पर टाँके लगे हैं। अजीब बात है कि इस लड़के का उल्लेख उस आरोपी द्वारा कहीं नहीं किया गया था जब मीडिया ने व्यापक रूप से हमले की घटना को कवर किया था। काउंटर एफ़आईआर स्पष्ट रूप से पीड़ित लोगों को कानूनी रूप से और मामले को सेटल करने के लिए पीड़ितों को डराने धकाने और संतुलन बनाने का एक प्रयास है । इस काउंटर एफआईआर की कॉपी परिवार द्वारा मांगे जाने के बावजूद भी परिवार को नहीं दी गई है जो की उनका अधिकार है UAH के सदस्यों ने कुछ मीडिया वालों की मदद से कॉपी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन पत्रकारों को भी उस एफआईआर की कॉपी नहीं मिल पाई है।

    1 अप्रैल को परिवार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बताया के किस तरह उन्हें धमकी दी जा रही है और यहां तक कि सामूहिक आत्महत्या करने की बात तक पीड़ित परिवार के लोग कर रहे हैं।

    ठीक उसी समय गूजर पंचायत भी किया गया है जहां इस मामले में परिवार को धमकाने और कानूनी करवाई से हट कर बाहर ही इस मामले को हल करने की रणनीति बनाई गयी
    हम जब दूसरी बार परिवार से मिले तो हमने स्थानीय विधायक तेजपाल तंवर को भी परिवार से मिलते देख। विधायक ने कहा: “दोनों लोगों को साथ बैठा कर मिलवा देंगे”. विधायक के साथ आये लोगों का लहजा दोषियों को दंडित करने के बारे में बात करने के बजाय समझौता करने के लिए अधिक था । गुरुग्राम में इस घटना को एक बार फिर से एक बार फिर से बताया गया है कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत और कट्टरता भयानक हिंसा की ऐसी घटनाओं को भड़का रही है और सम्प्रदायिक गुंडे पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं जिन्हें कानून का कोई डर नहीं है और पूरा तंत्र इन गुंडों के सामने आत्मसमर्पण कर चूका है। अगर मोहम्मद साजिद का परिवार मौन में भयभीत है या अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर है, और अगर इन गुंडों को उनके खिलाफ स्पष्ट साक्ष्य के बावजूद सजा नहीं दी जाती तो ये हमारे लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा आघात होगा और भारतीय लोकतंत्र और कानून पर इस देश की जनता के विश्वास को कमज़ोर करेगा

    फैक्ट फ़ाइंडिंग टीम के सदस्य:

    ये रिपोर्ट #UnitedAgainstHate के सदस्यों द्वारा फ़ैक्ट फाइंडिंग के बाद जारी की गयी है। टीम ने 27 मार्च 2019 को गुरुग्राम के भोंडसी गावं का दौरा किया था और पीड़ित परिवार के सदस्यों से मुलाक़ात की थी।

  • मुसलमान सबको चाहिए लेकिन “विक्टिम” की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों।

    आप सबको JNU का वो नारेबाज़ी वाला मामला तो याद ही होगा जिसमें JNU के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, छात्र नेता उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन तीनों को इस मामले में जेल भी जाना पड़ा था। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सात कश्मीरी छात्रों को भी मुख्य आरोपी बनाया गया था और इन सब के अलावा 36 अन्य को कॉलम नंबर 12 में आरोपी बनाया गया था जो कि कथित तौर पर घटनास्थल पर मौजूद थे।

    इस विवाद से किसी को फ़ायदा हुआ हो या न हुआ हो लेकिन JNU के उसी विवाद से कन्हैया कुमार एक नेता बन कर उभरे और आज बेगूसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। बेगूसराय सीट पर CPI के उम्मीदवार कन्हैया कुमार, भाजपा के गिरिराज सिंह और महागठबंधन के प्रत्याशी डॉ तनवीर हसन चुनाव लड़ रहे हैं। कल यानी 9 अप्रैल को कन्हैया कुमार बेगूसराय से नामांकन करेंगे और CPI उनके नामांकन को अभूतपूर्व बनाना चाहती है। इसी सिलसिले में CPI अंचल परिषद की विस्तारित बैठक सोमवार को जिला कार्यालय कार्यानंद भवन में श्यामसुंदर झा की अध्यक्षता में की गई। मौके पर अंचल मंत्री अनिल कुमार अंजान ने कहा कि “9 अप्रैल को वाम मोर्चा के उम्मीदवार डा. कन्हैया कुमार के नामांकन को अभूतपूर्व बनाया जाएगा। एक-एक बूथ से संगठित जत्था आएगा, जिसमें सभी जाति और सांप्रदाय के लोग शामिल होंगे।”

    हालाँकि ज़मीनी हक़ीक़त इस से परे है। ये सही है की कन्हैया के नामांकन को अभूतपूर्व बनाने ले लिए उन्होंने देश भर में लोगों को न्योता दिया है लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है की कन्हैया कुमार के उस निमंत्रण सूची से छात्र नेता उमर खालिद का नाम ग़ायब है। कल तक छात्र नेता का नाम कन्हैया कुमार की निमंत्रण सूची में था लेकिन रात उस सूची से उमर ख़ालिद का नाम निकाल दिया गया है। CPI को डर है की कन्हैया कुमार के नामांकन में उमर ख़ालिद के आने से कन्हैया कुमार का भूमिहार वोट कट जाएगा। इसलिए भूमिहार वोट कटने के डर से उमर ख़ालिद को इस अवसर पर नहीं बुलाया गया है।

    आज कन्हैया कुमार ने भी साबित कर दिया की मुसलमान सबको चाहिए लेकिन विक्टिम की शक्ल में चाहिए। मुसलमान नेता किसी को नहीं चाहिए, चाहे वो कन्हैया कुमार ही क्यूँ न हों। इस का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं की इस अवसर पर JNU के गुमशुदा छात्र नजीब की माँ फ़ातिमा नफ़ीस को तो वहाँ बुलाया गया है लेकिन कन्हैया के कभी बहुत ही क़रीबी साथी उमर ख़ालिद को नहीं बुलाया है। अब आप ख़ुद अंदाज़ा लगा लीजिए कि जिस कन्हैया को आज एक उर्दू नाम वाले उमर ख़ालिद के अपने नामांकन समारोह में सम्मिलित होने से दिक्कत महसूस हो रही है, कल उनका मसलमानों के साथ रवैया कैसा होगा।

    लाल सलाम। ?

    मोहम्मद ख़ालिद हुसैन

  • इस्लाम विरोधी विचारधारा और जेएनयू के वामदल

    जेएनयू का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है

    14 अक्टूबर 2016 को बायोटेक्नोलॉजी के प्रथम वर्ष के छात्र नजीब अहमद को माही मांडवी हॉस्टल में एक तथाकथित झड़प के बाद पीटा गया और अगले दिन नजीब रहस्यमय ढंग से गायब हो गया. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कोई छात्र लापता हो गया हो और कोई सुराग तक ना मिला हो. स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन, वाईएफडीए और शेहला राशिद आदि कई वामपंथी नेताओं ने बयान दिए कि भीड़ ने नजीब को मुसलमान होने के कारण पीटा और परिसर में इस्लाम विरोधी माहौल व्याप्त है. इस दलील से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़े होते हैं क्योंकि जेएनयू मुख्यधारा की वामपंथी छात्र राजनीति, मसलन सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल)और इनके अतिरिक्त कुछ नासमझ किंतु अधिक रेडिकल वाम संगठनों का गढ़ रहा है.

    नजीब के गायब होने का जिम्मेदारी कौन?

    वामदलों के प्रभुत्व वाले और स्वघोषित निरपेक्षता के लिए विख्यात एक विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर में इस्लाम विरोधी भीड़ अगर इस प्रकार के बर्बर हमले को अंजाम दे सकती है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसे में नजीब के गायब होने की जिम्मेदारी किसकी है? वाम दलों के नेताओं के पास इन प्रश्नों का रटा-रटाया उत्तर यह है की परिसर में एबीवीपी की ताकत बढ़ गई है और इसी कारण मुसलमान असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. लेकिन गौर से देखने पर यह जवाब संतोषजनक नहीं लगता क्योंकि परिसर में स्वयं को निरपेक्ष कहने वाली वाम विचारधारा का समर्थकों की संख्या और अकादमिक सम्मान दोनों में ही प्रभुत्व एवं एकाधिकार है.

    और गहराई से पड़ताल करने पर हम यह पाते हैं कि वामदलों की बयानबाजी भी स्वभावत:मुस्लिम विरोधी ही है जिसमें अक्सर मुसलमानों के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण और इस्लाम का बचकाना चित्रण पाया जा सकता है.

    इस्लाम के भीतर भी बहस है

    यहां पर हम इस्लाम में महिलाओं की स्थिति या स्वतंत्रता, ट्रिपल तलाक या मुसलमानों में जाति प्रथा से संबंधित परिचर्चा की बात नहीं कर रहे हैं. इन विषयों पर इस्लाम के धर्मशास्त्र के अंदर ही व्यापक बहस पहले से चल रही है और इस्लाम के असंख्य विद्वान भी इन मुद्दों पर आपस में मोर्चा खोले हुए हैं. यहां हम उन बयानों और विचारों की बात कर रहे हैं जो उन मुद्दों से संबंधित हैं जोकि इस्लाम की आस्था से बहुत मौलिक रुप से संबंधित है और जिनके बारे में अपरिपक्व व्यवहार और बयानबाजी से पहले से ही त्रस्त मुस्लिम युवा और अधिक अलगाव महसूस करने लगते हैं.

    उदाहरण के लिए, नजीब एक धार्मिक रुझान वाला युवक था और बरेलवी सूफी मत की एक धारा से प्रभावित था जैसा कि महान सूफी गौस-ए-आज़म के बारे में उसकी कई फेसबुक पोस्टों से पता चलता है.

    आइए इस प्रकार की बयानबाजी के कुछ नमूने देखते हैं:

    वामपंथी छात्र संगठन आइसा के सदस्य और भूतपूर्व पदाधिकारी हर्ष वर्धन इस फेसबुक पोस्ट में दावा करते हैं कि कुछ मुसलमानों के आतंकवादी बनने का कारण कम से कम आंशिक तौर पर इस्लाम धर्म ही है और उनकी पवित्र पुस्तक कुरान में स्पष्टत: ऐसी खामियां है जिनकी वजह से वे हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित होते हैं.

    इन महानुभाव ने आतंकवादी गतिविधियों और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों के बीच के संबंध को उजागर करने वाले किसी विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ को पढ़ा या समझा तक नहीं है, आतंकवाद की एक अस्पष्ट अवधारणा की आलोचना करना तो शायद इनके लिए बहुत दूर की बात है.

    फिर भी कुरान के बारे में कम से कम एक बुनियादी ऐतिहासिक समझ की उम्मीद तो इनसे की ही जा सकती थी. कई सदियों और कई महाद्वीपों की मुस्लिम जनता में कुरान की स्वीकार्यता इसके प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था.

    लेकिन उनका यह बयान एक सामान्यीकरण है जो कि यह दावा करता है कि कुरान पढ़ने से आप आतंकवादी बन सकते हैं. यह एक पूरी कौम या समुदाय को एक रंग में रंगने वाली घटिया सोच और एक इस्लाम-विरोधी बयान है.

    अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लाम का विरोध कितना सही है?

    फिर भी आइसा के कई कार्यकर्ता इस पोस्ट का तर्कसंगत वाद-विवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक उदाहरण के रूप में समर्थन और बचाव करते रहे. अपनी एक पोस्ट में शहला रशीद द्वेषपूर्ण भाषण या भड़काऊ बयानबाजी क्या होती है यह समझाने का जिम्मा उठा लेती हैं. वे एक उदाहरण देती हैं जिसमें मुहम्मद के लिए एक अपमानसूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है और दावा करती हैं कि यह कथन द्वेषपूर्ण भाषण का उदाहरण नहीं है.

    इस पूरी समस्या की एक वजह यह भी है कि इन चिंतकों का तर्क से दूर का भी कोई नाता नहीं है. अगर कोई इस्लाम के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखता है तो उसे यह पता होगा की इस्लामी आस्था में मुहम्मद को एक सर्वोपरि मानवीय आदर्श माना जाता है. अतः इस पोस्ट में जहां मुहम्मद के बारे में एक अापराधिक श्रेणी की बात की जा रही है, इसका अर्थ यह भी निकलता है कि मुहम्मद के अनुयायी अर्थात सभी मुस्लिम उसी आपराधिक श्रेणी में रखे जाने चाहिए.

    अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ ने इस पर प्रतिक्रिया दी और कैबिनेट मेंबर गजाला अहमद ने शहला के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण की एफआईआर दर्ज करायी. जेएनयू छात्रसंघ और वाम बुद्धिजीवी शहला के बचाव में कूद पड़े और अचानक अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय को एक दकियानूसी विश्वविद्यालय का खिताब देने लगे. यहां तक कि गजाला को पितृसत्तात्मक अलीगढ़ मुस्लिमविश्विद्यालय छात्र संघ के हाथों में एक कठपुतली भी कहा जाने लगा.

    नारीवाद के नाम पर इस्लाम पर हमला कितना सही?

    एक और बचकानी पोस्ट जो इन दायरों में इस्लाम विरोधी सोच के लक्षणों को दर्शाती है, उसमें इस्लामी नारीवाद पर प्रहार किया गया.
    आधुनिक इतिहास के छात्र और आइसा के एक कार्यकर्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि धार्मिक और गैर-धार्मिक मुद्दों पर पिछली पूरी सदी में मुस्लिम महिलाओं के प्रतिरोध के बारे में मुसलमानों और गैर मुसलमानों द्वारा लिखी हुई अकादमिक पुस्तकों की कोई कमी नहीं है.

    इस्लामी-नारीवाद शब्द-युग्म का प्रयोग एक खास संदर्भ में किया जाता है जिसमें की मुस्लिम विदुषियों ने महिलाओं के नजरिए से इस्लामी ज्ञान की एक विभिन्न और पूरक प्रकृति को सामने लाया है, जिसमें कि कभी-कभी परिवार की विक्टोरियन अवधारणा को भी पीछे छोड़ देना पड़ता है.

    दूसरी आपत्तिजनक बात इस पोस्ट में यह की मोहम्मद को सिजोफ्रेनिया की बीमारी का शिकार बताया गया है. यह मुस्लिम पहचान और आस्था पर सीधा हमला है.

    कोई इतिहासकार बिना प्रामाणिक और मूल स्रोतों के कैसे एक बीमारी का पता लगा सकता है, ये हमारी समझ के बाहर है.आश्चर्य की बात यह है कि कुछ वामपंथी विद्वानों ने इस पोस्ट का समर्थन तार्किक सोच के नाम पर किया.

    फतवे का सच और जेएनयू के वामपंथी

    आखिरी उदाहरण सबसे ज्यादा चिंताजनक है. यह श्रेणी है फेक न्यूजज अर्थात झूठी खबरों की. तथाकथित फतवों के बारे में आने वाली लगभग सभी खबरें इसी श्रेणी में आती हैं.

    यहां यह साफ करते चलें कि फतवा दरअसल एक पंजीकृत मुफ्ती द्वारा किसी के पूछने पर इस्लामी आस्था के नैतिक मूल्यों के बारे में दी गई एक कानूनी राय होती है जो कि किसी भी रुप में बाध्य नहीं है.

    यह बताना इसलिए भी जरूरी था कि आजकल के अखबारों के किसी आम पाठक को यह भी गलतफहमी हो सकती है कि कोई भी दाढ़ी वाला मुसलमान अगर किसी हिंसात्मक गतिविधि के लिए उकसाने वाला कोई बयान देता है तो उसे फतवा कहा जाता है.

    आम जनमानस में फतवे कि यही धारणा बना दी गई है. जेएनयू शिक्षक संघ की अध्यक्ष आयशा किदवई ने अपनी टाइमलाइन पर यह शेयर किया.

    यह झूठी खबर दरअसल 2 साल पुरानी है लेकिन उन्होंने पिछले रविवार को इसे शेयर किया. हफिंगटन पोस्ट, द गार्जियन जैसे समाचार प्रतिष्ठान 2 सालों से बता रहे हैं कि यह खबर झूठी है.

    मुफ्ती-ए-अाज़म ने भी खुद ये साफ किया है कि उन्होंने ऐसा कोई फतवा नहीं दिया. यहां सवाल यह नहीं कि हम मुफ्ती-ए-अाज़म की इस्लाम के बारे में अवधारणा से सहमत हैं या नहीं क्योंकि यह तो अलग-अलग प्रकार की आस्थाओं वाले मुसलमानों के बीच एक व्यापक बहस का मुद्दा है.

    यहां ध्यान देने की बात यह है कि इन बुद्धिजीवियों ने चुन-चुन कर ऐसे समाचारों का प्रचार किया जो मुसलमानों को नीचा दिखाते हैं

    यहां हमारा उद्देश्य इन व्यक्तियों की निंदा करना नहीं है ना ही हम बात को कुछएक खराब व्यक्तियों के होने या ना होने की दिशा में ले जाना चाहते हैं.

    हमारा मानना यह है कि इन पोस्टों से वाम दलों के भीतर मौजूद मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह का पता चलता है. यही वजह है कि पिछड़े इलाकों से आने वाले कई मुस्लिम छात्रों को यह गलतफहमी हो जाती है कि उनकी मुस्लिम पहचान,आस्था और व्यक्तिगत आचरण और विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित वामदलों के सुनने में बहुत ऊंचे लगने वाले आदर्शों में 36 का आंकड़ा है.

    इस द्वेषपूर्ण बयानबाजी और साथियों के दबाव के द्वारा यहां का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है. इस प्रकार वे विद्यार्थियों पर विचार और व्यवहार की एक खास पद्धति थोपना चाहते हैं.साथ ही साथ यह उनके इस्लाम विरोधी जनाधार का तुष्टीकरण भी करता है.

    लेखक: Sharjeel Imam and Saqib Salim
    (दोनों ही लेखक जेएनयू से इतिहास के शोधकर्ता हैं) साभार: फर्स्टपोस्ट

  • जानिए- बीएसएनएल को मोदी सरकार ने किस तरह बर्बाद किया

    यह बात सभी को पता है कि किस तरह से 4जी स्पेक्ट्रम बीएसएनएल को न देकर बाकी सब कंपनियों दिया गया….. मोदी सरकार की मंशा जियो को प्रमोट करने की थी और उसी को आगे बढाने के लिए बीएसएनएल को धीमा ज़हर दिया गया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस को सिर्फ डेटा सर्विस के लिए लाइसेंस दिया गया था, लेकिन बाद में 40 हजार करोड़ रुपये की फीस की बजाय 1,600 करोड़ रुपये में ही वॉयस सर्विस का लाइसेंस दे दिया गया।

    लेकिन जियो के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव था। इसलिए मोदी सरकार ने बीएसएनएल के इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे धीरे जिओ को देना शुरू किया। 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने एक टॉवर पॉलिसी की घोषणा की ओर दबाव डालकर रिलायंस जिओ इंफोकॉम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्‍टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जिओ बीएसएनएल के देशभर में मौजूद 62,000 टॉवर्स का उपयोग कर सकती थी। इनमें से 50,000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी ।

    यह जिओ के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योंकि वह चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लेती, इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नही खड़ा कर सकती थी। लेकिन उसके सामने एक मुश्किल यह ओर थी कि बीएसएनएल भी उसके कड़े प्रतिद्वंद्वियों में से एक था, जिन्हें इन टॉवर से सिग्नल्स मिलते थे।

    इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला, उसने जिओ को इन टावर का निरंतर फायदा मिलते रहे इसके लिए इन टावर्स को एक अलग कम्पनी बना कर उसमे डाल दिया।

    मोबाइल टॉवर किसी भी टेलीकॉम ऑपरेटर के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं, इस कदम का परिणाम यह हुआ कि अब बीएसएनएल को भी इन टावरों का इस्तेमाल करने के लिए किराया चुकाना पड़ रहा था। 2017 में मोदीं सरकार ने यह फ़ैसला लिया था, जिससे बीएसएनएल ख़ुद अपने ही टॉवरों की किराएदार बन गया।

    नतीजतन जो कम्पनी 2014-15 में 672.57 करोड़ रुपए के फायदे में आ गई थी, इस निर्णय के बाद हजारों करोड़ रुपए का घाटा दर्शाने लगी।

    कुछ समझे आप मोदी सरकार ने बीएसएसएल को 4जी स्पेक्ट्रम अलॉट भी नही किया और उसे बीएसएनएल के टावर भी दिलवा दिए और बीएसएनएल को ख़ुद अपनी ही संपत्ति का किराएदार भी बना दिया।

    लेकिन मोदी सरकार यही नही रुकी उसने उन राज्यों में जहाँ उसकी सरकार थी, वहां ऐसी पॉलिसी बनाई जिससे जिओ को फायदा पुहंचे ओर बीएसएनएल को कोई मौका नहीं मिले।

    छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने एक योजना शुरू की जिसे संचार क्रांति योजना कहा गया। 2011 में छत्तीसगढ़ में मोबाईल की पहुंच 29 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं कम जनसंख्या घनत्व के कारण दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां राज्य में नेटवर्क का विस्तार नहीं कर पा रही थी।

    संचार क्रांति योजना के तहत इन क्षेत्रों में टेलीकॉम प्रदाता कंपनी द्वारा नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदाय किए जाने हेतु अधोसंरचना (इन्फ़्रास्ट्रक्चर) तैयार की जानी थी और 1500 से अधिक नए मोबाईल टॉवर लगाये जाने थे 600 करोड़ रुपये मोबाइल टावरों की स्थापना पर खर्च किये जाने थे, यानी सारा काम सरकारी खर्च पर किया जाना था। यह ठेका बीएसएनएल के बजाए जियो को दिया गया।

    इस तरह से मोदी राज में BSNL को पूरी तरह से बर्बाद करने की दास्तान लिखी गई।

    (गिरीश मालवीय स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

  • 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्वकार कौन था?

    Ashraf Hussain

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 1857 कि जंग का नेतृत्व मंगल पांडे कर रहे थे लेकिन इतिहास कुछ और ही बता रहा है, बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

    1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला।

    इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया। विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रितानी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले ९० वर्षों तक चला।

    1857 यानी पहली जंगे आजादी के महान स्वतंत्र सेनानी अल्लामा फजले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दिया था ! इस फतवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अज़ीम जंगे आजादी लड़ी !

    अँगरेज़ इतिहासकार लिखते हैं की इसके बाद हजारों उलेमाए किराम को फांसी ,सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था और बहुतसों को काला पानी की सजा दी गयी थी! अल्लामा फजले हक खैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई !

    यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।
    सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है।

    प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा ‘गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स’ के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).

    इतिहास कि कई किताबों में ये भी जिक्र आया है कि 1857 के जंग ए आज़ादी के दौरान डोक्टर विलियम ब्रीडन अंग्रेजों को मशवरा देते हुए कहता है की अगर तुम हिंदुस्तान पर हमेशा अपना कब्जा जमाये रखना चाहते हो तो तिन काम करो,
    – कुरान को खत्म कर दो,
    – ओल्माओ को खत्म कर दो,
    – और मदारिसों को मिटा दो,
    लिहाजा अंग्रेजों ने 1861 तक लाखों कुरान जला दिए, 1864 तक 14 हजार से जादा ओल्माओ को मौत के घाट उतार दिया और हजारो मदरसों को नेस्तो नाबुत कर दिया था।