Author: Md Irshad Ayub

  • अररिया की महिलाओं ने CAA-NPR-NRC के विरोध में सड़कों पर उतरी और पुरजोर तरीके से विरोध दर्ज किया

    देश में सी ए ए, एन पी आर और एन आर सी के खिलाफ महिलाओं की उठती आवाज़ के स्वर आज अररिया में भी सुनाई दिए। आज अररिया महिला नागरिक मंच द्वारा यतीम खाना से ए डी बी चौक होते हुए टाउन हॉल तक एक शांति मार्च निकाली गई जिसके बाद टाउन हाल पर बड़ी सभा आयोजित की गई। लवली नवाब ने महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं है कि हमारी गंगा – जमुनी तहजीब को मिटा सके और धर्म के नाम पर हमें बांट सके। एन पी आर, एन आर सी, सी ए ए विरोधी संघर्ष मोर्चा की समन्वयक कामायनी स्वामी ने विवेकानंद जयंती पर सभा को याद दिलाया कि विवेकानंद का भारत जहां किसी भी देश के सताए और पीड़ित लोग आ कर शरण ले सकते थे, सी ए ए उस भारत पर वार करता है। फातिमा परवीन ने कहा कि अगर ये कानून वापस नहीं लिया गया तो हर एक गली मोहल्लों में हज़ारों शाहीन बाघ उठ खड़े होंगे। तस्नीम कौसर ने भी अररिया की महिलाओं के जज्बे को सलाम कर आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका को दोहराया। नौजवान नौशीन परवीन ने बोला कि जितनी लाठी – गोली चले अब, हम लोग पीछे हटने वाले नहीं है। रमिका रागिब ने शायरी पेश करते हुए कहा कि शिव की गंगा भी पानी है, आबे ज़मज़म भी पानी है, अब पानी का मज़हब क्या होगा?! धर्म के नाम पर जनता को बांटने वाली भारत सरकार को आज इस मंच से पुरजोर चानौती मिली है कि गांधी – बिस्मिल – भगत सिंह का भारत ज़िंदा है और उसे हम किसी कीमत पर नहीं खोएंगे। जे जे एस एस की यूथ टीम – कल्याणी, तन्मय, डोली, कृष्चम, मीरा, और अन्य साथियों ने गीत गा कर सभा की आवाज़ बुलंद करी कि हम गीतों से, नारों से अपनी आवाज़ उठाएंगे और चाहे जो हो हम आगे बढ़ते जाएंगे। आज की सभा को एन पी आर, एन आर सी, सी ए ए विरोधी संघर्ष मोर्चा और हम हैं भारत के कोऑर्डिनेटर ज़ाहिद अनवर भी सभा में मौजूद थे। उन्होनें बताया कि दोनों संगठनों का समर्थन इस रेली को दिया गया है!
    जाहिद अनवर
    कन्वेनर- “हम है भारत”

  • “हम हैं भारत” के बैनर तले कारगिल पार्क (अररिया), NRC-CAA-NPR विरोधी धरना को प्रशासन ने बंद करा दिया

    “हम हैं भारत” के बैनर तले कारगिल पार्क में जो धरना चल रहा है जिसके लिए “हम हैं भारत” की तरफ़ से अनुमंडल पदाधिकारी अररिया को सूचना दे दी गई थी, धरना पहले चरण में दिनांक 7 जनवरी से 22 जनवरी तक चलना है, लेकिन पिछले दो दिन से प्रशासन की तरफ़ से अब उस जगह पर आपत्ति जताई जा रही थी! आज जिला प्रशासन के द्वारा कारगिल पार्क से धरना बन्द करा दिया गया और कहा गया है कि धरना कारगिल पार्क से हटा कर कहीं और ले जायें! हम लोगों के बहुत प्रयास के बात भी कारगिल पार्क में धरना करने की अनुमती नहीं दी गई जो बहुत दुखद है! आज कारगिल पार्क से धरना हटा लिया गया है! अब कल से ये धरना कॉंग्रेस कार्यालय के सामने टाऊन हॉल के निकट सुबह 10बजे से रात्री 8 बजे तक चलेगा! इस जगह का अनुमती भी ले ली गई है ।

    ज़ाहिद अनवर, अररिया जिला
    कन्वेनर- “हम हैं भारत”

  • JNU छात्रों के समर्थन में आयी भीम आर्मी

    जेएनयू के छात्रों पर हुए हमले के आज दिनांक 06/01/2020 को पटना में पटना विशवविद्यालय मुख्य द्वार पर भीम आर्मी (बिहार) के द्वारा जेएनयू छात्रों के समर्थन एवं करवाई हेतु प्रदर्शन किया गया।

    आंदोलन का नेतृत्व भीम आर्मी (बिहार) के परदेश महासचिव अमर ज्योति ने कहा के जिस तरह से देश के सर्वोच्च संस्थान JNU के छात्रों पर हमला हुआ है यह बहुत ही निन्दनीय घटना है। हम इस की कड़ी शब्दों में निंदा करते हैं और यह मांग करते हैं के JNU छात्रों पर हुए हमले में शामिल नक़ाबपोशों को चिन्हित कर उन पर सख़्त से सख़्त करवाई की जाए। नहीं तो भीम आर्मी ( बिहार) राज्य के सभी ज़िलों में उग्र प्रदर्शन करेगा।

    प्रदर्शन में शामिल भीम आर्मी के सचिव राहुल रंजन, छात्र अध्यक्ष चन्द्र भास्कर,निरंजन,सचिन,डेविड,रोहित कुमार,शशि,विशाल एवं अन्य छात्र नेता शामिल रहे।

    भवदीय (अमर ज्योति)
    परदेश महासचिव
    भीम आर्मी ( भारत एकता मिशन) बिहार
    मो० : 9973704105

  • नागरिक संशोधन एक्ट के विरोध में उमड़ा जन सैलाब, देशव्यापी आंदोलन में बदल गया

    खुर्रम मालिक

    जैसा के आप सबको पता है के देश की मौजूदा सरकार ने दो दिन पहले एक कानून पास किया है जिसे CAB citizen ship amendment bill का नाम दिया गया है, जो अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही CAA (Citizenship Amendment Act) हो गया है। जिस में सरकार ने कहा है के पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, और बांग्लादेश से आ कर जितने भी हिन्दू, सिख, ईसाई,जैन,बौद्ध धर्म के लोग जो भारत में रह रहे हैं उन सबको भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन इस बिल में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है के जो मुसलमान इन देशों से आ कर भारत में बस गया है उसे भी हम भारत की नागरिकता प्रदान करेंगे। जिस के नतीजे में देश भर में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। और इसी क्रम में आज बिहार की प्रमुख राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बंद का आयोजन किया था ,

    Citizenship Amendment Act और NRC के विरोध में राजद द्वारा बुलाई गई बिहार बंद का आम जनजीवन पर व्यापक असर पड़ा है। मेन सड़कों के साथ-साथ गलियों और मोहल्लों में भी ज़िन्दगी थमी सी दिखी।

    इस बंद को कामयाब बनाने के लिए राजद के क़द्दावर नेता सुबह 10 बजे से ही सड़क पर उतर गए थे जिनमें क़ाबिल-ए-ज़िक्र एजाज़ुल्लाह खान, मोहम्मद महताब आलम और शिव मेहता हैं।

    बंदी की शुरुआत पटना सिटी के चौक शिकार पुर से सिटी चौक होते हुए मारूफगंज मंडी को बंद कराया गया। फिर पश्चिम दरवाज़ा और गुलजारबाग मंडी होते हुए
    शहीद भगत सिंह चौक पर समापन हुआ।

    आप को बता दें के इस बिल के विरोध में देशव्यापी आंदोलन हो रहे हैं। ख़ास तौर से उत्तर पूर्व राज्यों के लोगों का प्रदर्शन बहुत तेज़ हो रहा है। यह बिल संविधान विरोधी है। इस से ग्रह युद्ध होने की आशंका जताई जा रही है।पूरे देश में एक अजीब सी बेचैनी पाई जा रही है।ख़ास तौर से भारत का मुस्लिम समाज ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा है। पटना के अलग अलग हिस्सों में यह जुलूस निकाला गया है,इस जुलूस में शामिल लोगों का कहना है के यह बिल मुस्लिम विरोधी है।इस से अनार्की फैलने की आशंका है।इस लिए भारत सरकार इस बिल को वापस ले। और देश की चरमराती अर्थ्यवस्था पर अपना ध्यान केंद्रित करे।

  • जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता और जुल्म मत करो दिल्ली पुलिस

    जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता मत करो

    दिल्ली पुलिस

    जामिया मिल्लिया के साथ ऐसा मत कीजिए। अंतरात्मा भी कोई चीज़ होती है। आदेश ही सब नहीं होता है। छात्रों की तरफ़ से जो वीडियो आए हैं उसमें आपकी क्रूरता झलकती है। प्लीज़ ऐसा मत कीजिए। एक बस की आग का सहारा लेकर ऐसा नहीं करना था। आपके होते आग कैसे लगी ? तब वो भीड़ बेक़ाबू थी तब तो ऐसा नहीं किया। शाम का फ़ायदा उठाकर अब आप आप लोग हास्टल और कैंपस में घुसकर मार रहे हैं यह बर्बरता है। ऐसा मत कीजिए।

    छात्रों से अपील है कि शांति बनाए रखें। वो एक ऐसे दौर में है जब पुलिस से भी बर्बर मीडिया हो गया है। लेकिन पूरी कोशिश कीजिए कि कोई भी तत्व हिंसा न करे। कौन बाहरी है उस पर खुद नज़र रखें। हो सके तो शाम के वक्त आंदोलन न करें। अंधेरे का फ़ायदा हमेशा ताकतवर को मिलता है।

    सभी पक्षों अपील है कि हिंसा का लाभ इस वक्त किसे होगा आप समझते हैं। इसलिए खुद नज़र रखें। हिंसा न होने दें। कोई भी फ़ार्मेशन ऐसा बनाएं जिसमें कोई अनजान पास भी न आ सके। अगर ऐसा नहीं कर सकते हैं तो प्रदर्शन न करें। छात्रों से अपील है कि शांति और अहिंसा का इम्तहान उन्हें देना है। पुलिस और मीडिया को नहीं। यह कैसे करना है उन्हें सोचना होगा।

    नागरिकों से अपील है कि वे तटस्थ होकर देखें कि किस तरह जामिया के छात्रों के साथ नाइंसाफ़ी हुई है। ऐसा मत कीजिए। ये ज़ुल्म आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र के ख़ात्मे की कहानी लिख रहा है। आप इस कहानी को मत लिखने दें। बाद में कोई अफ़सोस लायक़ भी नहीं बचेगा। हिंसा की कहानी से किसे फ़ायदा होता है आप जानते हैं ।

    इस तरह से यूनिवर्सिटी पर हमला करना आपकी अकेली और समूह की आवाज़ को कुचलना है। सौ बार कह चुका है कि इस वक्त आप जिन अख़बारों और टीवी चैनलों को अपने पैसे से ज़हर पीला रहे हैं और वो आपको पीला रहे हैं उनसे दूर रहें। ज़िम्मेदारी निभाइये। जामिया से भी सख़्त सवाल करें और पुलिस से भी। वीसी की इजाज़त के बग़ैर कैंपस में पुलिस कैसे आ गई? ये सवाल वीसी से भी करें।

    शांति शांति शांति

    शुक्रिया।

    रवीश

  • नागरिक संशोधन एक्ट 2019: संविधान और मुस्लिम विरोधी एक्ट है

    खुर्रम मालिक

    जैसा के अपा सबको पता है के देश की मौजूदा सरकार ने दो दिन पहले एक कानून पास किया है जिसे CAB citizen ship amendment bill का नाम दिया गया है, जिस में सरकार ने कहा है के पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, और बांग्लादेश से आ कर जितने भी हिन्दू, सिख, ईसाई,जैन,बौद्ध धर्म के लोग जो भारत में रह रहे हैं उन सबको भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन इस बिल में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है के जो मुसलमान इन देशों से आ कर भारत में बस गया है उसे भी हम भारत की नागरिकता प्रदान करेंगे। जिस के नतीजे में देश भर में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। और इसी क्रम में आज बिहार की राजधानी पटना के पटना सिटी इलाक़े में एक मौन जुलूस का आयोजन किया गया था, जिस में
    एजाज़उल्लाह खां, मोहम्मद महताब आलम, आदिल अहमद, अयाज़ उल हक़ और मोहम्मद इंतेखाब आलम आयोजक थे।
    जुलूस में विशेष रूप से लाल इमली से शहज़ादा, सदर गली से मुमताज़, सुल्तानगंज से ख़ुर्रम मल्लिक, पटना यूनिवर्सिटी से JACP के महासचिव शौकत अली शामिल थे।
    जुलूस सदर गली से निकल कर पश्चिम दरवाज़ा पर ख़त्म हुई।
    जुलूस में लगभग 20 हज़ार लोगों ने अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।

    आप को बता दें के इस बिल के विरोध में देशव्यापी आंदोलन हो रहे हैं। ख़ास तौर से उत्तर पूर्व राज्यों के लोगों का प्रदर्शन बहुत तेज़ हो रहा है। यह बिल संविधान विरोधी है। इस से ग्रह युद्ध होने की आशंका जताई जा रही है।पूरे देश में एक अजीब सी बेचैनी पाई जा रही है।ख़ास तौर से भारत का मुस्लिम समाज ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा है। पटना के अलग अलग हिस्सों में यह जुलूस निकाला गया है,इस जुलूस में शामिल लोगों का कहना है के यह बिल मुस्लिम विरोधी है।इस से अनार्की फैलने की आशंका है।इस लिए भारत सरकार इस बिल को वापस ले। और देश की चरमराती अर्थ्यवस्था पर अपना ध्यान केंद्रित करे।

    लेखक एक स्वतन्त्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है

  • याद रखना मुसलमानों तुम मिटोगे(Annihilate) नहीं “तक़दीर ए ज़माना तुम ही हो”

    Mohammad Seemab Zaman

    आज सोशल मिडिया पर देख रहे हैं लोग NRC/CAB पर ऐहतजाज की बात कर रहे हैं तो कोई मौलवी या रहनुमाओ को बूरा भला कह रहा हैं। वह सब ठीक है मगर आज तक किसी मुस्लिम ने या किसी मौलवी ने नही लिखा के रोड पर आकर ऐहतेजाज के बदले “दो रिक्त” नेमाज़ पढ़ी जाये और दुआ हो कि अललाह ख़ौफ़ और बरबादी से बचाये और जो मूल्क या मुस्लिम दुश्मन लोग है उन को हिदायत दे के सही फैसला ले वग़ैरह वग़ैरह ………………

    मौलवी लोगो से मेरी गुज़ारिश है आप रोड पर नही तो कम से कम अपने मस्जिद मे ही मग़रीब और अेशॉ के बीच सनिचर/ऐतवार को इस नेमाज का ऐलान कर ऐहतमाम से “नेमाज़े इसतखासा/नेमाज़े हाजत/क़ूनूते नाज़ला” पढ़े और देखे दूसरों पर कैसा ख़ौफ़ तारी होता है। मगर जो मुस्लिम आज आप को बूरा भला कह रहे हैं वह ख़ूद उस नेमाज मे शामिल नही होंगे, वह सिर्फ़ बोलते हैं।

    बूरा नही मान्ना जब अमेरिका मे टावर 2001 (9/11) मे गिरा था तो हम ने कई दिन ऐसी नेमाज मस्जिद मे सऊदी अरब मे पढ़ी है जब राष्ट्रपति बुश ने धमकी दी थी “you are either with us or against us ……….” उस नेमाज़ और दुआ का असर यह हुआ के सब बच गये वरना “साज़िशी दिमाग़” तो तुर्की से इंडोनेशिया तक को बमबारडमेनट करवाने वाले थे।

    और भी कई बार हम ने किसी दूसरे मौका पर वहॉ पढ़ी है। आज लोग देर ही से सही मगर नतिजा देख रहा है अमेरिका/यूरोप का ताज उड़ गया और कहीं तीन-तीन चुनाव के बाद भी सरकार नही बन रही है। भारत मे मुस्लिम को यही करने की ज़रूरत है न की रोड पर आकर ऐहतजाज करने की। सरकार तो चाह ही रही है आप रोड पर आओ और वह आप को देशद्रोही और आतंकवादी साबित करे।

  • मौलाना अबुल मोहासिन मोहम्मद सज्जाद साहब का महत्व और अहमियत: आज भी बिहार में महसूस होती है

    मरना और जीना दुनिया के रोज़ाना के कारोबार में है, कौन नही मरा और कौन नही मरेगा, आज उसकी तो कल हमारी बारी है, इस पर भी अज़ीज़ों और दोस्तों की मौत पर रोने वाले रोते हैं, उनकी याद में मातम करते हैं, उनकी एक एक ख़ूबी को याद कर नोहा पढ़ते हैं, लेकिन कुछ मौत ऐसी होती है कि ख़बर सुन कर ज़ुबान बंद हो जाती है, आँसू सूख जाते है, दिल की धड़कन बढ़ने के बजाए घटने लग जाती है, अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगता है, जी नही चाहता कि कुछ बोल कर जी का भड़ास निकाले और आँसू बहा कर ग़म दूर करें। मौलाना अबुल मोहासिन मोहम्मद सज्जाद साहब की मौत की ख़बर जब 23 नवम्बर 1940 (21 शव्वाल 1359 हिजरी) की शाम को मिली तो जिस्म और दिमाग़ पर यही कैफ़ियत तारी हो गई।

    मौलाना सज्जाद की विलादत ज़िला नालंदा के पनहस्सा नाम के गाँव में हुई थी, मौलाना वहीद उल हक़ साहब के क़ायम किए हुए मदरसे में तालीम की शुरुआत हुई और फिर इलाहाबाद के मदरसा सुभहानिया में अपनी तालीम मुक्कमल की और वहीं तदरीस का काम चालू कर दिया। गया में मदरसा अनवार उल उलूम की बुनियाद मौलाना अब्दुल वाहब के साथ मिलकर डाली गयी, मौलाना सज्जाद मदरसा अनवार उल उलूम में हर साल जलसा करवाते जिसके मुल्क भर से उल्मा को बुलाया जाता।

    मौलाना सज्जाद को सियासत का ज़ौक़ जंग अज़ीम में तुर्की के हार के बाद हुआ, वो उस वक़्त इलाहाबाद में थे उनके शागिर्द अंग्रेज़ी अख़बार से ख़बरें पढ़ कर सुनाते, आग रोज़ बा रोज़ भड़कती जाती, मौलाना आज़ाद के अल हिलाल ने इस आग में पेट्रोल डाल दिया और मौलाना सज्जाद ने मौलाना अबुल कलाम के कलाम पर लब्बैक कहने में देरी नही की। 1919 में तहरीक ए ख़िलाफ़त के साथ साथ मौलाना के क़दम सियासत में बढ़ते चले गए, 1920 में मौलाना अब्दुल बारी साहब फ़िरंगी महली और हकीम अजमल ख़ान साहब की कोशिश से क़याम हुए जमियत उल्मा दिल्ली की बुनियाद पड़ी, मौलाना सज्जाद इसके शामिल होने वाले में सबसे आगे थे, बिहार में ईमारत शरिया का क़याम इनकी सबसे बड़ी करामत थी।

    मौलाना सज्जाद की सबसे बड़ी ख़्वाहिश थी कि उल्मा मैदान ए सियासत में आए और क़ौम की रहबरी करें, मुसलमानो में दीनी तँज़ीम क़ायम हो, तमाम तबलीगी, मज़हबी व तालीमी काम तंंज़ीम के ज़रिए किया जाए, दारूल क़जा की बुनियाद डाली जाए, बैतूल माल का क़याम किया जाए। मौलाना ने अपने ज़िंदगी के आख़िरी बीस साल इसी में लगा दिया। मौलाना की सबसे बड़ी खसुसियत ये थी कि मौलाना राह और मंज़िल के फ़र्क़ को समझते थे, इसलिए राह के लुत्फ़ में फँस कर कभी मंज़िल से हटना गवारा नही किया, जज़्बा ए आज़ादी की पूरी लगन के बाद भी वो कभी कांग्रेस या उनकी हुकूमत के ग़लत फ़ैसले पर ख़ामोशी अख़्तियार नही की।

    मौलाना सज्जाद का वजूद सारे मुल्क के लिए ख़ास था मगर हक़ीक़त ये है कि वो बिहार की तनहा दौलत मौलाना सज्जाद थे, बिहार में जो कुछ तालीमी, तबलीगी, तंज़ीमी, सियासी और मज़हबी तहरीक की चहल पहल थी वो सब मौलाना सज्जाद के ज़ात से थी, वही एक चिराग़ था जिससे सारा बिहार रौशन था, वो वतन की जान तो बिहार की रूह थे, वो क्या मरे सारा बिहार मर गया। मौलाना के जिस्म पर खद्दर का साफ़ा, खद्दर के कुर्ते, पैर में देशी जूते ही होते थे। उनकी ज़िंदगी सादा थी, ग़ुरबत की ज़िंदगी थी, घर ख़ुशहाल ना था, सफ़र मामूली सवारियों में और मामूली दर्जे के डिब्बे में होता था, उनका दिन कहीं गुज़रता तो रात कहीं, कहीं सैलाब आए, आग लगे, लोगों पर झूठे मुक़दमे डाले गए हों, कहीं क़ुर्बानी का झगड़ा हो मौलाना पहुँच जाते, मामले की सचाई जान लोगों की मदद करते।

    बिहार में ज़लज़ले के दौर में मौलाना ने जिस तरह काम किया वो एक मिसाल है, एक एक गाँव में जाकर लोगों की मदद करने से आप पीछे नही हटे। हर लीडर के पास तीन चीज़ में से एक होती है दौलत, तक़रीर या क़लम लेकिन मौलाना सज्जाद इन तीनो चीज़ से ख़ाली थे, उनके पास जो कुछ था वो बस अख़लाक़ था जो उनकी हर कमी को पूरा कर देता। मौलाना उन इलाक़ों में जाते जहाँ जाना कोई गवारा नही करता, उत्तर बिहार के इलाक़े मलेरिया के चपेट में थे, लोग वहाँ से भाग रहे थे, और मौलाना उत्तर बिहार का सफ़र कर रहे थे, लोगों की मदद में आगे आगे थे, मौलाना की ज़िंदगी का आख़िरी सफ़र भी उत्तर बिहार था, जहाँ मलेरिया ने उन्हें भी चपेट में ले लिया, जो उनकी मौत की वजह बनी।

    मार्च 1941 में सैयद सुलैमान नदवी साहब द्वारा लिखे गए इस बात का हिन्दी तर्जुमा Abdur Rasheed साहब ऩे किया है।

  • क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक जिन्दा लाश बन चुके हैं ?

    क्या आप सभी को शर्म आ रही है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर लाठियाँ बरसाईं गईं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि एक नेत्रहीन छात्र पर लाठियाँ बरसाई गईं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि ग़रीब छात्रों को उच्च शिक्षा मिलने के हक़ को कुचला जा रहा है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि चैनलों के ज़रिए एक यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि जिन वकीलों से पिट कर जो महिला आई पी एस अपना केस तक दर्ज नहीं करा सकीं?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि पिटने वाले जवानों का साथ पुलिस के अफ़सरों ने नहीं दिया ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि उन जवानों ने ही छात्रों को पीटा?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के नाम पर वसूला गया दो लाख करोड़ पूरी तरह ट्रांसफ़र नहीं किया गया है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की इस रिपोर्ट के बारे में पता नहीं था जिसकी खबर फ़रवरी 19 में मनीकंट्रोल डॉट कॉम पर छपी थी ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि 2007 से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के नाम पर वसूला गया 94000 करोड़ अभी तक शिक्षा कोष में नहीं दिया गया है ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि यह पैसा ख़र्च होता तो गाँव से लेकर शहर के ग़रीबों को टॉप क्लास शिक्षा मिलती ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप दंगाई, माफिया नेताओं के समर्थन में खड़े होते हैं और छात्रों के समर्थन में नहीं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप संसाधनों को लूटने वाले उद्योगपतियों के समर्थन में चुप रहते हैं लेकिन छात्रों के ख़िलाफ़ बोलते हैं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आई टी सेल एक पोस्ट लिख देता है, गाली देता है तो आप चुप हो जाते हैं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक लाश बन चुके हैं ?

    क्या आपको लाशों का लोकतंत्र नज़र आ रहा है ?

    Courtesy: यह पोस्ट रवीश कुमार जी के फेसबुक वाल से लिया गया है।

  • नागरिकों के नाम रवीश कुमार का एक पत्र, बंद कर दें न्यूज़ चैनल और सामान्य रहें।

    भारत के शानदार नागरिकों,

    9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि मामले पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है। दशकों पुराना मुक़दमा है। दोनों पक्षों की तरफ़ से ऐसी कोई बात नहीं जिसे लेकर पब्लिक में बहस नहीं हुई है। दोनों समुदाय के लोगों ने जान भी दी है। जितना कहना था, सुनना था, लिखना था वो सब हो चुका है। झूठ और सच सब कुछ कहा जा चुका है। पचासों किताबें लिखी गईं हैं। हम या आप किसी बात से अनजान नहीं हैं। कई साल तक बहस और हिंसा के बाद सभी पक्षों में इस राय पर सहमति बनी थी कि जो भी अदालत का फ़ैसला आएगा वही मान्य होगा। यहीं बड़ी उपलब्धि थी कि सब एक नतीजे पर पहुँचे कि अदालत जो कहेगा वही मानेंगे। तो अब इसे साबित करने का मौक़ा आ रहा है।

    30 सितंबर 2010 को भी इस मामले में फ़ैसला आ चुका है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन पक्षों में बाँट दिया था। दो तिहाई ज़मीन मंदिर पक्ष को ही मिला था। तीनों पक्ष अपने अपने दावे लेकर सुप्रीम कोर्ट गए। तो कुछ नया नहीं होगा। जो भी होगा उसका बड़ा हिस्सा 2010 में आ चुका है। उस साल और उस दिन भारत के नागरिकों ने अद्भुत परिपक्वता का परिचय दिया था। लगा ही नहीं कि इस मसले को लेकर हम दशकों लड़े थे । हमने साबित किया था कि मोहब्बत से बड़ा कुछ नहीं है। कहीं कुछ नहीं हुआ। तब भी नहीं हुआ जब इलाहाबाद कोर्ट से निकल कर सब अपनी अपनी असंतुष्टि ज़ाहिर कर रहे थे और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कर रहे थे।

    हम इस बार भी साबित करेंगे। ठीक है हम बहस करते हैं। मुद्दों को लेकर भिड़ते रहते हैं लेकिन जब मोहब्बत साबित करने की बारी आएगी तो हम मोहब्बत साबित करेंगे। हर्ष करना है न मलाल रखना है। जिसके हिस्से में फ़ैसला आए उसी में शामिल हो जाइये। यह मुल्क एक फ़ैसले से बहुत बड़ा है। कल का दिन ऐतिहासिक नहीं है। 30 सितंबर 2010 को भी ऐतिहासिक घोषित किया गया था। अब किसी को न वो फ़ैसला याद है और न इतिहास। इसलिए सामान्य रहिए। फ़ैसले को सुनिए। बातें भी कीजिए लेकिन संतोष मनाइये कि यह मसला ख़त्म हो रहा है।

    हमें अपने प्यारे वतन को और ऊँचा मक़ाम देना है। अच्छे स्कूल बनाने हैं। अस्पताल बनाने हैं। ऐसी न्यायपालिका बनानी है जहां जज का इक़बाल हो। इंसाफ समय पर मिले। पुलिस को ऐसा बनाना है कि जहां एक महिला आई पीएस भीड़ से पिट जाने के बाद चुप न रहे। हमें बहुत बनाना है। राजनीति ऐसी बनानी है जिसे कोई उद्योगपति पीछे से न चलाए। बहुत कुछ करना है। नौकरियाँ जा रही हैं। लोगों के बिज़नेस डूब रहे हैं। नौजवानों का जीवन बर्बाद हो रहा है। हम सबको इन सवालों पर जल्दी लौटना होगा।

    इसलिए दिलों में दरार न आए। बाहों को फैला कर रखिए। कोई हाथ मिलाने आए तो खींच कर गले लगा लीजिए। इस झगड़े को हम मोहब्बत का मक़ाम देंगे। हम बाक़ी ज़िम्मेदारियों में फेल हो चुके नेताओं को ग़लत साबित कर देंगे। राजनीति को छोटा साबित कर देंगे। भारत के नागरिकों का किरदार ऐसे फ़ैसलों के समय बड़ा हो जाता है। 9 नवंबर का दिन आम लोगों का है। आम लोग 2010 की तरह फिर से साबित करेंगे कि हम 2019 में भी वहीं हैं।

    मैं जैसे ही शारजाह पुस्तक मेले के लिए दुबई एयरपोर्ट पर उतरा, ख़बर मिली कि 9 नवंबर को फ़ैसला आ रहा है। मेरी प्रतिक्रिया सामान्य थी। 2010 में सिहरन पैदा हो गई थी। जाने क्या होगा सोच सोच कर हम लखनऊ गए थे । फ़ैसले के दिन यूपी और शेष भारत ने इतना सामान्य बर्ताव किया कि शाम तक लगने लगा कि बेकार में सुरक्षा को लेकर इतनी बैठकें हुईं। झूठमूठ कर मार्च होते रहे। सब अपने अपने काम में लगे थे। अच्छा होता हम भी लखनऊ न आते और अपनी फ़ैमिली के साथ होते।

    मुझे पूरा यक़ीन है कि 9 नवंबर का दिन भी विकिपीडिया में कहीं खो जाएगा। लोग सामान्य रहेंगे और सोमवार से अपने अपने काम पर जुट जाएँगे। जैसे मैं जिस काम के लिए आया हूँ वो काम करता रहूँगा। गीता में समभाव की बात कही गई है। समभाव मतलब भावनाओं को संतुलित रखना। एक समान रखना। कल इस मुद्दे से छुटकारा भी तो मिल रहा है।

    फ़ैसले को लेकर जो भी विश्लेषण छपे उसे सामान्य रूप से पढ़िए। भावुकता से नहीं। जानने के लिए पढ़िए।याद रखने के लिए पढ़िए। हार या जीत के लिए नहीं। पसंद न आए तो धमकाना नहीं है और पसंद आए तो नाचना नहीं है। सच कहने का वातावरण भी आपको ही बनाना है। साहस और संयम का भी।

    2010 में मीडिया ने शानदार काम किया था। ग़ज़ब का संयम था। इस बार ऐसा नहीं है। लेकिन हम इस मीडिया की असलियत जान गए हैं। कल से लेकर सोमवार तक न्यूज़ चैनल बंद कर दें। दो चार दिनों तक न्यूज चैनलों से दूर रहें। मोहल्लों में आवाज़ दें कि टीवी से दूर रहें। और भी माध्यम हैं जिनसे समाचार सुने जा सकते हैं। रेडियो सुनिए। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और विपक्ष के मुख्य नेताओं को सुनिए। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर फ़ैसले को खुद पढ़िए। चैनलों में आने वाले फ़ालतू प्रवक्ताओं से दूर रहे हैं। किसी नेता की बात मत सुनिए। किसी एंकर के चिल्लाने से तनाव मत लीजिए। मुस्कुराइये। जो घबराया हुआ मिले उसे पकड़ कर चाय पिलाइये। कहिए रिलैक्स। टेंशन मत लो।

    आपका,

    रवीश कुमार