Author: Md Irshad Ayub

  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री शामायेले नबी ने लालू प्रसाद यादव जी के शासनकाल को याद किया लालू जी के जन्मदिन पर

    बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद देश के बड़े राजनैतिक दिग्गज माने जाते हैं। अपने बात कहने के अंदाज, बेबाक बयानबाजी का अलग अंदाज है श्री लालू प्रसाद यादव का जब भी नाम लिया जाता है तो लोगों के जेहन में जो छवि उभरकर आती है वह हाजिर जवाब होने के साथ-साथ एक तेज तर्रार नेता के तौर पर होती है।

    पूर्व मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद के नेतृत्व में नया बिहार बन रहा था उनके नेतृत्व में बिहार में जंगल राज्य नहीं था मंगल राज्य था हर तरह के लोगो का विकास हो रहा था तरक्की हो रही थी धार्मिक सौहार्द बना हुई थी हिन्दू-मुस्लिम में आपस में प्रेम था सभी लोग मिल जुल कर कर के काम करनी की बात सोचते थे लालू प्रसाद के नेतृत्व में गठित सरकार जिसमे कांग्रेस की अहम् भूमिका थी राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी दोनों ने मिलकर बिहार को एक नयी दिशा दी थी एक नए रास्ता दिखाया था नई रौशनी दी थी और वो रौशनी थी विकास के लिए प्रगति के लिए आगे बढ़ने के लिए धर्मनिरपेक्षता के लिए उसमे जो लोग इस देश में धर्म के नाम पर जात के नाम पर भाषा के नाम पर बँटवारे के बात करते है जो नफरत की राजनीति करते है उसे बिलकुल ही नकार दिया गया था हमें याद है लालू प्रसाद के नेतृत्व में बनी सरकार में एक दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना थी ये बात आज हम इसलिए कह रहे है आज लालू यादव जी का जन्मदिन है उनके जन्मदिन पर हम उनको मुबारकबाद देते है आशा और विश्वास करते है उनके बताये हुई रास्ता पर बिहार आगे बढ़ेगा धर्मनिरपेक्षता बनेगा जातिवाद से ऊपर उठेगा।

    लालू प्रसाद जी गरीब-गुरबों, शोषितों, पीड़ितों, वंचितो, अल्पसख्यकों और जरूरतमंदों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले एक ऐसे राजनेता है जिनका जीवन मानवता को समर्पित रहा है। ये बातें बिहार के पूर्व मंत्री वरिष्ठ कांग्रेस नेता शामायेले नबी ने कही है लालू जी के जन्मदिन के अवसर पर। खासकर में नौजवानों से अपील करता हूँ कि लोग राजनैतिक गतिविधिओ में भरपूर हिस्सा ले कर बिहार को एक नया समृद्ध, ख़ुशहाल और सौभाग्यशाली राज्य बनाने में योगदान दे। धर्म और जाति के नाम पर नफरत की राजनितिक सम्प्रदायिकता बढ़ाती है और विकास के लिए बहुत बड़ी रूकावट है इन्हे हमलोगो को एक साथ मिलकर ख़त्म करना है और बिहार को एक नई उचाईयो पर ले जाना है युवा कांग्रेस नेता शहजाद नबी ने भी लालू यादव जी उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं और हार्दिक बधाई दी और साथ में उनके दीर्घायु होने की कामना की.

  • आरएमएल हॉस्पिटल के स्टाफ ने बेड पता करने गये फोरम4 के संपादक से की मारपीट

    देश की राजधानी दिल्ली में आज फिर एक पत्रकार के साथ मारपीट और बदसलूकी का मामला सामने आया है। आर एम एल हॉस्पिटल के स्टाफ और वहां के कुछ गार्ड्स ने फ़ोरम4 के मुख्य संपादक और पत्रकार प्रभात के साथ मारपीट की। यह घटना उस समय घटी जब पत्रकार प्रभात अपने एक साथी के इलाज़ के सिलसिले में रोगी के बेड से जुड़ी पूछताछ के लिए आर एम एल हॉस्पिटल पहुंचे।

    आज कल कोविड-19 के दौरान हॉस्पिटल्स में रोगियों के उपचार में काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं। रोगियों का उपचार और भर्ती प्रक्रिया के संबंध में लगातार शिकायतें भी आ रही हैं। इसी बीच हाल ही में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हॉस्पिटल सख़्त कदम उठाते हुए डॉक्टर और हॉस्पिटल के लिए कुछ नए निर्देश भी जारी किए जिसमें रोगियों के उपचार में कुछ सहूलियतों के बरतने का भी ज़िक्र किया गया था पत्रकार प्रभात ने आर एम एल हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर जाकर पूछा कि नए एमरजेंसी मरीजों के उपचार के लिए बेड उपलब्ध हैं या नहीं, जवाब था “नहीं”। रिसेप्शन पर मौजूद व्यक्ति ने कहा “यहां बेड नहीं है कुछ भी ; हम नए मरीज नहीं लेंगे ।” हॉस्पिटल स्टाफ का ये झूठ और रोगियों के साथ बरती जा रही लापरवाही मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड हो चुकी थी।

    अब क्या था आर एम एल हॉस्पिटल के स्टाफ ने झड़प शुरू कर दी और वह पत्रकार के पीछे पीछे आने लगा और पत्रकार प्रभात से मोबाइल फोन छीन लिया और मौके पर लाठी डंडे समेत आए गार्ड्स ने मारपीट भी शुरू कर दी। ऐसे में प्रभात को काफ़ी चोटें भी आयीं।

    गंभीर त्रासदी और संकट से जूझ रहे देश में पत्रकार भी सच न दिखा सकें तो देश के लिए इससे बुरा दिन और कोई नहीं होगा। सरकारों के दावों की पड़ताल भी नहीं होगी तो क्या होगा? अगर इसी तरह पत्रकारों को सच दिखाने से रोका गया तो बुरे अंजाम सामने आएंगे। सरकारी विभागों में लापरवाही, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी की अनगिनत घटनाएं घटित होगी और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में शामिल पत्रकार की ज़बान बंद होने पर देश को सबसे बड़े खतरे से गुजरना होगा और आम जनता बेबसी का शिकार बन जाएगी।

  • प्रवासी मज़दूरों के लिए रैयाम चीनी मिल को फ़ौरन चालू किया जाए – शहज़ाद नबी

    आल इंडिया दलित मुस्लिम अधिकार मंच के जनरल सेक्रेटरी और कांग्रेस लीडर शहज़ाद नबी ने एक प्रेस बयान जारी करते हुए कहा कि कोरोना वायरस के जबरदस्त प्रकोप के बाद तालाबंदी के चलते दूसरे राज्यों में काम कर रहे प्रवासी मज़दूरों की घर वापसी के बाद हालात बद से बदतर हो गए है कोरोना के मामले बिहार में तेज़ी से बढ़ रहे हैं. वहीं शहज़ाद नबी ने बताया कि कोरोना को लेकर रोजगार के सभी साधन बंद हो गये हैं गांवों में जहाँ बिहार के बाहर प्रदेशों से आने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या बढती जा रही है वहीं बेरोजगारी भी चरम सीमा पर है. इस हालात से निपटने के लिए ओर गरीब और प्रवासी मज़दूरों के भलाई के लिए दरभंगा जिला के केवटी ब्लॉक स्थित रैयाम चीनी मिल को फ़ौरन चालू किया जाये ताकि इससे गरीब और मज़दूर के रोज़गार का जल्द समस्या हल हो सके.

    शहज़ाद नबी ने मजीद जोर देकर कहा कि कोरोना संकट की वजह से दूसरे राज्यों में फंसे मजदूर अपने राज्य लौट रहे हैं. मजदूरों के सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार है. बड़े पैमाने पर बिहार में मजदूर लौट रहे हैं. बिहार आ रहे मज़दूरों की माली हालात दयनीय है उनलोगो की आर्थिक रूप से मदद के लिए नीतीश सरकार से अपील की है और प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने की व्यवस्था सुनिश्चित करें सरकार जिससे बेरोजगारी की समस्या कम हो सके.

    प्रेस विज्ञप्ति:आल इंडिया दलित मुस्लिम अधिकार मंच

  • इस लोक डाउन में कैसे पढे़ं ईद की नमाज़

    ख़ुर्रम मलिक

    कोरोना वायरस की वजह से आज पुरा विश्व एक अजीब सी परिस्थिति से गुज़र रहा है. और इस का असर हर ओर देखा जा सकता है. इस महामारी की वजह से जहाँ स्कूल कॉलेज, बाज़ार बंद हैं वहीं दूसरी ओर मस्जिद मंदिर गिर्जा गुरुद्वारा बंद पड़े हैं. और ऐसे में मुसलमानों का पवित्र महीना रमज़ान भी आया जिस में मुसलमानों ने पुरी तरह सरकार और प्रशासन का सहयोग करते हुए अपने अपने घरों में ही नमाज़ ए तरावीह पढी़ ,और फिर देखते ही देखते यह पवित्र महीना भी गुज़रने को है. और उम्मीद की जा रही है के 25 मई सोमवार को मुसलमानों का पवित्र त्यौहार ईद उल फ़ितर मनाया जाएगा. जैसा के हम सब जानते हैं कि यह पवित्र त्यौहार रमज़ान में किये गए इबादतों का बदला है जिसे अल्लाह ने खुश हो कर मुसलमानों को दिया है.

    और जिस की नमाज़ ईद गाह में होती है. लेकिन इस साल कोरोना वायरस की वजह से ईद की नमाज़ घरों में ही पढ़नी है. हम यहाँ आप को यह बताना चाहते हैं कि कैसे ईद की नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा है. सब से पहले तो हमें किसी भी नमाज़ की नियत करनी होती है. वैसे नियत दिल से होनी चाहिए. अगर ज़ुबान से बोल दिया तो और भी अच्छा है.

    नियत इस तरह करना है.

    नियत करता हूँ मैं नमाज़ ईद उल फ़ितर की वाजिब. छे ज़ाएद तकबीरों के साथ, वास्ते अल्लाह त’आला के. रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़.
    नियत के बाद तक्बीर ए तहरीमा (हाथों को कंधे तक उठाना है और फिर पेट पर बांध लेना) के बाद सना पढ़ना है उस के बाद दो और तक्बीर कही जाएगी. पहली तक्बीर के बाद हाथों को कंधे तक ले कर जा कर छोड़ देना है, फिर दूसरी बार भी ऐसा ही करना है. तीसरी तक्बीर के बाद हाथों को बांध लेना है और सुरह फ़ातिहा और उस के बाद कोई भी सुरह पढ़ना है. उस के बाद रुकु में जाना है फिर सज्दे में और इस तरह एक रकत पूरी करनी है.

    दूसरी रकत के लिये खड़े होंगे तो सब से पहले सुरह फ़ातिहा और फिर कोई सुरह मिलाएंगे और उस के बाद रुकु में जाने से पहले पहले तीन ज़ाएद तक्बीरें (अल्लाह हु अकबर) कहते हुए हाथ छोड़ देंगे और और चौथी तक्बीर कह कर रुकु में जाएंगे और सजदा के साथ सलाम फेर कर नमाज़ मुकम्मल करेंगे. नमाज़ के बाद जो सब से अहम है वह है ईद का खु़त्बा. नमाज़ के बाद जो सब से अहम है वह है ईद का खु़त्बा। यह दो है.
    ईद उल फ़ितर का खु़त्बा यह है.

    खु़त्बा सुनना वाजिब है.

    पहला खु़त्बा –
    अल्लाह हु अकबर ,अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर,

    अल्हम्दु लिल्लाही रब्बिल आ लमीन वस सलातु अला सय्येदेना मुहम्मदिन खा़तिमिन नबीय्यीन. व’अला आ’लिही व’अस’हाबिही अज्म’ईन,अम्मा बा’द, फ़क़द क़ालल्लाहु त’आला ,क़द अफ़्लहा मन त’ज़क्का, व’ज़करस्मा रब्बिही फ़सल्ला, बल तु’सिरुनल हयातअद दुनिया, वल’आखि़रतु खै़रु व’अब्क़ा, इनना हाज़ा लफ़िस सुहुफ़िल ऊला, सुहुफ़ी इब्राहीमा वमुसा, वक़ाला रसुलुल्लाह सo अo वo इनना लिकुल्ली क़ौमिन ईदन वहाज़ा ईदुना, बा’रकल्लाहु लना वलकुम फ़िल्क़ुराआन इल अज़ीम, वनफ़ाना व’इय्याकुम बिहदी सय्येदिल मुरसलीन

    दूसरा खु़त्बा-
    अल्लाह हु अकबर ,अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर,
    अल्हम्दु लिल्लाही नहमदुहू व’नस्तईनुहु व’नस्तग्फ़िरुहु ,वनु मिनु बिही, व’नतवक्कलु अलैही ,व’न’ऊज़ु बिल्लाही मिन शुरुरी अन्फ़ुसिना व’मिन सैय्येआती आमालिना ,वनश्हदु अल्लाह ही लाहा इल’ल्लाहु ,व’नश’हदु अन्ना मुहम्मदन रसुलुल्लाह, व’अला आलिही व’सहबिही ,व’बारका व’सल्लम, अम्मा बाद, क़ाला रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम, ज़कातुल फ़ितरी तुहरत उन लिस’साइमी मिनल लग़वी वर’रफ़सी व’तोमत उन लिल मसाकीनी औ कमा क़ाला अलैहिस सलामो, व’क़ाला त’आ’ला ,इननललाहा या’मुरु बिल अदली वल इहसानी व’ईता’ई ज़िल क़ुरबा व’यन्हा अन’इल फ़हशाई वल’मुन्करि वल’बग्यि़ , य’ईज़ुकुम ल’अल्लकुम तज़्कुरून, वलज़िक्रुल्लाही अकबर.

    यह है दोनों खु़त्बा जिसे लोक डाउन की वजह कर छोटा किया गया है. जिस से के कोई भी अरबी ज़ुबान का जानकार इसे पढ़ सकता है.

    इस लिए आप सभी मुसलमान भाई से यह गुज़ारिश है के ईद उल फ़ितर की नमाज़ घरों में पढे़ं ,अगर किसी को नमाज़ पढ़ना नहीं आये तो वह चाश्त की नमाज़ पढ़ ले.

    ख़ुर्रम मलिक इस्लामिक स्कॉलर और स्वतंत्र पत्रकार है। ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • हमारी कोशिश है कोई भूख से न मरे- हम हैं भारत

    कोरोना वायरस महामारी के कारण पूरा देश लाॅक डाउन कर दिया गया है! ऐसे में गरीब, मजदूरों का रोजगार खत्म हो गया है! मजदूर काम छोड़ कर घरों में बैठे हैं, बहुत सारे लोगों को खाने के लिए कुछ भी नहीं है! उनके बच्चों का बुरा हाल है! हम हैं भारत ने ऐसे गरीब, मजदूर एवं मजबूर लोगों की भूख मिटाने के लिए उनके बीच फ़ूड पैकेट का वितरण कर रही है ताकि कोई बच्चा भूख से न तरपे!
    हम सभी की यह जिम्मेदारी है के हमारे समाज में, हमारे जिले में और हमारे देश में कोई भी इंसान भूखा न रहे!
    जाहिद अनवर
    कोडिनेटर- हम हैं भारत, अररिया की ओर से फ़ूड डिस्ट्रीब्यूशन किया जा रहा है.

  • ट्रस्ट के नाम पर चला रहे हाॅस्पिटल के मालिक ने मिथिला लाइव 24 के पत्रकार पर किया जानलेवा हमला, कैमरा और माइक भी तोड़ा

    500 फीस की जगह 1500 लेने की पुष्टि करने के समय पत्रकारों को हाॅस्पिटल के अन्दर बनाया बंधक.

    दरभंगा- पूरी दुनिया में इस‌ समय कोरोना वायरस को लेकर महामारी फैली हुई है। भारत में भी 14 अप्रैल तक इस महामारी से निपटने के लिए सरकार ने लाॅकडाउन कर रखा है। सरकार के साथ साथ बड़ी संख्या में जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, डाक्टरस, नर्स, हाॅस्पिटल, सामाजिक कार्यकर्ता, नेता और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस बिमारी से निपटने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन इस हालात में भी कुछ भेड़िए लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाने और गरीब मरीजों का इलाज के बहाने मोटी राशि ऐंठ खून चूसने का काम कर रहे हैं। जी हां ये मामला दरभंगा के एक निजी हाॅस्पीटल का है जो ट्रस्ट के नाम पर चलता है और फीस की तीन गुनी राशि ऐंठ रहा है। जिला प्रशासन और सिविल सर्जन के निकटतम छेत्र में यह माफिया आम गरीब मरीजों का खून चूसने का काम रंगबाजी अंदाज में अंजाम दे रहा है।

    इस हाॅस्पिटल का नाम है जोगिंदर मेमोरियल ट्रस्ट हॉस्पिटल। इसके मालिक का नाम है रितेश कमल।जोकि हॉस्पिटल रोड पर उपस्थित है और कल तक इस हॉस्पिटल का चार्ज ₹500 था और इस विपदा की घड़ी में आज इस हाॅस्पिटल ने अपना चार्ज 1500 रुपए कर दिया है। इस की एक विडियो वायरल होने के बाद *Mithila Live 24* के पत्रकार और कैमरामैन हाॅस्पिटल पहुंच कर हाॅस्पिटल मालिक से पक्ष जानने की कोशिश की। इसी दौरान हाॅस्पिटल मालिक रितेश कमल पत्रकार और कैमरामैन पर खुद और अपने स्टाफ के साथ मिलकर हमलावर हो गए। इतना पर ही नहीं रुका मामला पत्रकार का माइक तोड़ दिया साथ ही कैमरा को भी फेंक दिया उसके बाद सभी को हाॅस्पिटल के अंदर ही बंधक बना लिया। मामला जैसे ही लोगों तक पहुंचा हाॅस्पिटल मालिक रितेश ने धमकाना बंद नहीं किया बल्कि उसने कहा कि हम किसी पुलिस प्रशासन को नहीं मानते अपना फैसला डायरेक्ट करते हैं। उक्त बातें ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के सचिव ई0 फखरूद्दीन ने कही। श्री फखरूद्दीन ने कहा कि दरभंगा मेडिकल मामले में पहले से भी बदनाम रहा है। यही कारण है के यहां के बेश्तर निजी हाॅस्पीटल के मालिक मरीजों के इलाज के नाम पर मोटी राशि ऐंठ गरीब मरीजों का खून चूसने का काम सिविल सर्जन, जिला प्रशासन, दलाल और मेडिकल माफियाओं के संरक्षण में खुलेआम अंजाम दे रहा है। हम जिला प्रशासन और सिविल सर्जन से मांग करते हैं कि 24 घंटे के अंदर जांच कर ट्रस्ट के नाम चल रहे जोगिंदर मेमोरियल ट्रस्ट हाॅस्पिटल को सील करे साथ ही देश के चौथे स्तंभ मिडिया बंधुओं पर किए गए जानलेवा हमले के आरोपी रितेश पर कानूनी कार्रवाई करे।

  • CAA और NPR के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करे नितीश कुमार, नही तो होगा आन्दोलन तेज़- नजरे आलम

    एनपीआर-सीएए- एनआरसी के खिलाफ आज 37वां दिन भी सत्याग्रह जारी है। इस अवसर पर आज बिहार के मुखिया नीतीश कुमार के दरभंगा आगमन पर लालबाग सत्याग्रह के द्वारा हजारो गुब्बारा उड़ाकर अपना विरोध दर्ज किया। तथा नीतीश कुमार गो बैक, एनपीआर को खारिज करो, नीतीश कुमार होश में आओ, सीएए पर रोक लगाओ नारा के साथ दरभंगा शहर में भारी संख्या में मार्च निकाला गया।

    मार्च का नेतृत्व नजरे आलम, सबा प्रवीण, नाजिया हसन, साहिबा प्रवीण, मोतिउर रहमान, बदरूलहोदा खान, राजा खान, प्रिंस राज, इस्माईल अख्तर, शाहनवाज, अब्दुल्लाह, मो0 बशर, ज़ीशान अख्तर, हीरा नेजामी, मो0 मुन्ना, साजिद कैसर आदी ने किया।

    मार्च में अमानुल्लाह अमन, सोनू मिकरानी, मो0 तमन्ने समेत भारी तादाद में पुरुष एवं महिलाएं शामिल हुईं।

    मार्च के बाद सभा को संबोधित करते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के राष्ट्रीय अध्यक्ष नजरे आलम ने कहा कि नीतीश कुमार को शर्म नहीं आती हैं कि वो मुसलमान का वोट लेकर मुसलमान से गद्दारी कर रहे हैं। उनका कोई अल्पसंख्यक योजना जमीन पर लागू नहीं होता है।
    श्री आलम ने कहा कि पूरा देश अभी एनआरसी-एनपीआर- सीएए की आग में झुलसा हुआ है। और नीतीश कुमार वोट की रोटी सेक रहे हैं। पहले नीतीश कुमार विधानसभा से इस काला कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित करें फिर ये वोट की रोटी सेंके, नीतीश कुमार अगर एनपीआर पर अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं करते हैं तो जनता नीतीश कुमार को कुर्सी पर से उतारना भी जनती है। जनता इस बार किसी भी लुभाने वाले योजना के बहकावे में आने वाले नहीं हैं।

    श्री आलम ने कहा कि अगर नीतीश कुमार काला कानून पर रोक नहीं लगाए तो आने वाले समय में जनता उनको सबक सिखाएगी।

  • CAA और NRC के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने की मांग को लेकर दरभंगा में पैदल मार्च निकाला गया

    एनआरसी-सीएए-एनपीआर के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने की मांग को लेकर आज संविधान बचाओ संघर्ष मोर्चा लालबाग सत्याग्रह कमिटी द्वारा लालबाग से कमिश्नरी तक पैदल मार्च निकाला गया.

    मार्च की अध्यक्षता ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के अध्यक्ष नजरे आलम, शकील अहमद सलफी, नेतृत्व सबा प्रवीण, नाजिया हसन, मोतिउर रहमान, ई0 फखरूद्दीन कमर, बदरूलहोदा खान, राजा खान, हीरा नेजामी, शाहिद अतहर, मो0 मुन्ना, सोनू मिकरानी, जीशान अख्तर, मो0 तालिब, शाहनवाज, अब्दुल्लाह, मो0 बशर, बदिउज्जमां आदी ने किया।

    वहीं पोलो मैदान में सभा की संचालन इंजीनियर फखरूद्दीन ने किया। सभा को संबोधित करते हुए सबा प्रवीन ने कहा कि आज धरना के 35वां दिन लालबाग सत्याग्रह कमेटी के द्वारा नीतीश कुमार के 23 फरवरी के दरभंगा आगमन पर पैदल मार्च निकालकर उनको यह बतलाने का काम किया है कि नीतीश कुमार पहले आप बिहार विधानसभा से एनआरसी- सीएए-एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पारित करें उसके बाद अपनी यात्रा को शुरू करें नहीं तो दरभंगा की जनता आपका विरोध करेगी।

    वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम केदारी कारवां के राष्ट्रीय अध्यक्ष नजरे आलम ने कहा कि नीतीश कुमार दरभंगा आगमन से पहले सीएए- एनआरसी – एनपीआर के खिलाफ विधानसभा के अंदर प्रस्ताव पारित करें अन्यथा 23 फरवरी को पूरे दरभंगा में उनका जगह-जगह विरोध किया जाएगा।

    श्री आलम ने कहा कि बिहार के मुखिया मुस्लिमों का वोट लेकर अब मोदी-अमित शाह की भाषा बोल रहे है, और अपने नेता से भी बोलवा रहे है। जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।

    उन्होंने स्थानीय मुस्लिम नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज जो मुस्लिम हितैषी की बात कर रहे हैं उन्होंने 35 साल तक मुस्लिम का वोट लेकर मुस्लिम के साथ गद्दारी करने का काम किया है। पहले नीतीश कुमार ऐसे गद्दार को अपनी पार्टी से निकाले, और वोट बैंक की राजनीति करना बंद करें नहीं तो आने वाले चुनाव में जनता वैसे-वैसे नेता को समाज से बाहर निकाल देगी।

    श्री आलम ने कहा कि नीतीश कुमार आज तक मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया सिर्फ मुसलमानों का वोट लेकर मुसलमानों के साथ दगाबाजी करने का काम किया है। अब यह नहीं चलेगा जनता जागरूक हो चुकी है।

    श्री आलम ने कहां के मुस्लिम योजनाओं के नाम पर लाखों लाख की लूट हो रही है। और जो नेता को उसका कमीशन मिलता है वही नेता मुस्लिम के योजनाओं का गुण गाते हैं।

    श्री अलाम ने कहा कि बाप-बेटा दोनों को मुस्लिम समाज मुसलमान मानकर उनको जिताने का काम किया लेकिन इन दोनों बाप बेटा ने मुसलमान समाज का अपमान कर आरएसएस-भाजपा की गोद में जाकर बैठ गया है। और उसकी भाषा बोल रहा है। ऐसे दगाबाज नेता को दरभंगा की आम-आवाम में सबक सिखाने का काम किया।

    वहीं भाकपा(माले) जिला सचिव बैद्यनाथ यादव, सीपीआई जिला सचिव नारायण जी झा, आइसा जिला अध्यक्ष प्रिंस राज, मयंक , एनएसयूआई नेता त्रिभुवन कुमार ने भी सभा में आकर अपनी एकजुटता जाहिर किया। और लड़ाई को मजबूत करने का आवाहन किया।

    मार्च में भोला‌ भाई, काजी अरशद रहमानी, सोना खान, लईक मंजर वाजदी समेत हजारों की संख्या में महिलाएं एवं पुरुषों ने हिस्सा लिया।