नई दिल्ली:(सैफुर रहमान) वांडा नरसंहार पर बात करने से पहले रवांडा के इतिहास के बारे मे जान लेते हैं, 1962 में रवांडा ने बेल्जियम से स्वतंत्रता प्राप्त की, लेकिन बेल्जियम के लगभग 30 वर्षों के शासन ने देश और उसके लोगों पर एक अमिट छाप छोड़ी। जबकि कुछ लोगों का तर्क है कि रवांडा के हुतु बहुमत दक्षिण-पश्चिम के बंटू लोग हैं, और तुत्सी नीलोटिक लोग हैं जो उत्तर-पूर्व से हैं।
रवांडा नरसंहार में सत्ता/मीडिया की भूमिका !
स्वतंत्रता मिलते ही, हुतस के हाथ में सत्ता की कमान आयी तुत्सी के खिलाफ व्यापक भेदभाव की शुरुआत यही से शुरू हो जाती है प्रमुख करियर, शिक्षा कोटा से तुत्सी को को बाहर रखा जाने लगा। इतना ही नहीं तुत्सी को स्वदेशी जातीय समूह के बजाय रवांडा के लिए विदेशी के रूप में मान्यता दी गई थी। यह नस्लवादी विचारधारा, शुरू में जर्मनी और बाद में बेल्जियम द्वारा उपनिवेशीकरण के दौरान प्रचारित की गई, तर्क दिया कि तुत्सी हुतु बहुमत से नीच थे।
1993 के मध्य में, हुतु कट्टरपंथियों ने अपना रेडियो चैनल, रेडियो टेलीविजन लिब्रे डेस मिल कोलिन्स (RTLM) लॉन्च किया। चैनल का इस्तेमाल हुतु टेन कमांडमेंट्स जैसे प्रचार और नस्लवादी विचारधारा का उपयोग करके तुत्सी के प्रति घृणा को भड़काने के लिए किया। 6 अप्रैल 1994 को, जब राष्ट्रपति के विमान पर हमला हुआ, रवांडा और बुरुंडियन दोनों राष्ट्रपतियों की मौत हो गई, उस वक्त कट्टरपंथी हुतु रेडियो चैनल ने दोनों राष्ट्रपतियों की मौतों की ख़बर सुनाते हुए, हुतस कम्युनिटी को सरेआम दंगा भड़काने के लिए प्रेरित किया।
रेडियो के माध्यम से ये अपील की गई की हुतस “काम पर जाने” और तुत्सी आबादी को खत्म करने का समय आ गया है । देखते ही देखते अप्रैल और जुलाई 1994 के बीच इस 100 दिनों की अवधि के दौरान, लगभग दस लाख तुत्सी जाती का नरसंहार कर दिया गया। 1994 के रवांडा नरसंहार की भविष्यवाणी करने वाले प्रो ग्रेगरी स्टैंटन ने भारत में समान नरसंहार की चेतावनी दी है।
जेनोसाइड वॉच 2002 से भारत में नरसंहार की चेतावनी दे रही है, जब गुजरात में हुए दंगों और नरसंहारों में एक हजार से अधिक मुसलमान मारे गए थे। उस समय, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे, और उन्होंने कुछ नहीं किया। वास्तव में, बहुत सारे सबूत हैं कि उन्होंने उन नरसंहारों को प्रोत्साहित किया।
हाल के दिनों में 2021 के हरिद्वार ‘धर्म संसद’ की ओर इशारा करते हुए, कहा कि कई हिंदुत्व नेताओं के ज़रिए अल्पसंख्यकों को मारने और उनके धार्मिक स्थलों पर हमला करने के लिए कई सभा किए गए थे। आज भारत की सरकार और मीडिया रवांडा को पिछे छोड़ चुकी है, जिस तरह से रवांडा में सरकार ने एक कम्यूनिटी को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा, तुत्सी को विदेशी क़रार दिया गया था ठीक उसी प्रकार भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरतों को बढ़ावा दिया जा रहा और सी.ए.ए जैसी कानून लाकर अल्पसंख्यक को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की साज़िश रची जा रही है।
जिस तरह से रेडियो रवांडा पर तुत्सी के खिलाफ ज़हर घोला गया था वैसे ही भारत की मीडिया अल्पसंख्यक समुदाय के विरोध नफ़रत और ज़हर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। आए दिन मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफ़रत फैलाया जा रहा है और इसमें सरकार का पूरा सहयोग होता है, इतना ही नहीं भारतीय मीडिया आए दिन धर्म गुरु एवं कट्टर विचार धाराओं वाले लोगों को टी.वी पर बुला कर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ डिबेट के नाम पर ज़हर उगलवाते हैं।
रवांडा नरसंहार से सीख लेते हुए भारत की लोकतंत्र, एकता और अखंडता में विश्वास रखने वाले नागरिकों को सामने आना चाहिए और मुखर होकर नफरती ताकतों के विरोध में आवाज़ बुलंद करनी चाहिए व संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए
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