पत्रकार असित के समर्थन से पटना के सब्ज़ी बाग़ आंदोलन को मिली मज़बूती

जौवाद हसन, पटना।। नागरिकता संशोधन कानून और संभावित NRC के मसले पर देश के बुद्धिजीवियों का विरोध पूरा देश देख […]

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21 January 2020 (Publish: 12:53 PM IST)

जौवाद हसन, पटना।। नागरिकता संशोधन कानून और संभावित NRC के मसले पर देश के बुद्धिजीवियों का विरोध पूरा देश देख रहा है। बिहार में तो ये आंदोलन राज्य की राजनीति को हिलाने की तैयारी में है। बीते 17 जनवरी को बिहार की राजधानी पटना के फुलवारी शरीफ में चल रहे धरना में सीपीआई नेता कन्हैया कुमार और 18 जनवरी को पटना के ही सब्जी बाग में चल रहे धरना में चर्चित न्यूज एंकर असित नाथ तिवारी को सुनने के लिए जिस तरह से भीड़ उमड़ी वो बहुत कुछ इशारा करने को काफी है। कन्हैया कुमार और असित नाथ तिवारी ने अपने पूरे संबोधन में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को ही निशाने पर रखा। इसके बाद 19 जनवरी को बंद कमरे में असित नाथ और कन्हैया कुमार के बीच तकरीबन डेढ़ घंटे बैठक चली।

अब खबर है कि कन्हैया कुमार सूबे के पश्चिम चंपारण से गांधी यात्रा करेंगे और सांप्रदायिक राजनीति के खतरे से लोगों को आगाह करेंगे। ये यात्रा गांधी जी की पुण्यतिथि के मौके पर शुरू होगी। पत्रकार असित नाथ तिवारी और कन्हैया कुमार के समर्थन से सीएए और एनआरसी का विरोध करने वालों को ताकत मिली है। असित नाथ तिवारी ने 2013 में एक बड़े राष्ट्रीय न्यूज चैनल की नौकरी ये कहते हुए छोड़ दी थी कि वो हिंदू-मुस्लिम तनाव के लिए झूठी खबरें नहीं दिखा सकते। बाद में यूपी-उत्तराखंड के दो-दो रीजनल चैनल के बड़े पदों से असित नाथ तिवारी को योगी सरकार की नाराजगी की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।

मतलब मोदी-योगी राज में असित नाथ तिवारी के लिए पत्रकारिता टेढ़ी खीर बनी हुई है और नौकरी मिलनी मुश्किल दिख रही है। ऐसे में असित नाथ तिवारी ने मोदी सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है और सीएए और एनआरसी के मसले पर सरकार को घेरने में जुटे हैं। पटना के सब्जी बाग में असित नाथ ने सावरकर की तुलना जिन्ना से की और फिर कहा कि मौजूदा सरकार सावरकर के सपनों के लिए एक बार फिर देश का बंटवारा चाहती है। असित नाथ ने यहां कहा कि देश का बंटवारा बस दो ही लोगों की शरारतों की वजह से हुआ और वो दो लोग थे सावरकर और जिन्ना। असित नाथ के इस संबोधन के बाद नया विवाद पैदा होने का खतरा सामने आ गया है। ये आंदोलन किस दिशा में जाएगा ये कहना अभी संभव नहीं है लेकिन इतना तो ज़रूर कहा जा सकता है कि बिहार में असित नाथ तिवारी और कन्हैया कुमार के इस आंदोलन में कूदने से अचानक सियासी सरगर्मियां तेज हो गईं हैं।

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