क्या बिहार में मंडल आंदोलन से उभरे जातिवादी राजनीति ने वामदलों को हाशिये पर पंहुचा दिया?

ज़ैन शहाब उस्मानी

वामपंथ ने भूमि-सुधार, बटाइदारों को अधिकार, गरीबों हक और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करके जो अपनी ज़मीन तैयार की थी। मंडल आंदोलन से उभरे पिछड़ी जाति के नेताओं जैसे लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसों ने उस पर अपना झंडा गाड़ दिया।

जब वामपंथी दलों ने इस नए राजनीतिक परिवर्तन को नकार दिया

इसके बाद वामपंथी दलों ने इस नए राजनीतिक परिवर्तन को नकार दिया जिसका परिणाम बिलकुल उनके विपरीत चला गया। CPI, CPI(M) का प्रदेश नेतृत्व भी अगड़ी जातियों के इर्द-गिर्द घुमते रहना। जबकि मंडल आंदोलन की बुनियाद ही पिछड़ा वर्ग के अधिकार को लेकर जिस को लेकर पिछड़ी जाति के लोगों के अगड़ी जाति के नेतृत्व को हजम कर पाना असंभव था।

वर्तमान का झारखंड जो 2000 से पहले तक बिहार का हिस्सा हुआ करता था, वहां पर नकस्लवाद की शुरुआत हुई जो चुनाव विरोधी थे। यह भी वामपंथ के कमज़ोर होने का एक महत्वपूर्ण कारण बन गया। वामपंथी दलों में आपसी टुट भी एक कारण बना।

वामपंथी दलों ने 1990 के बाद बिहार में होने वाले राजनीतिक और समाजिक परिवर्तन जिसमें जातिवाद सबसे अहम था उस में भी खुद को ढाल नहीं पाई जिसके कारण जो पिछड़ा, दलित मतदाता कल तक वामदलों के साथ खड़ा था वह पूरी तरह से लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान की तरफ ट्रांसफर हो गया।

बिहार में वामपंथ की स्थिति 1990 के अंत तक सड़क से संसद तक दमदार मौजूदगी हुआ करती थी लेकिन अब वह दौर समाप्त हो चुका है। अभी के परिस्थिति को देखेंगे, तो बिहार विधानसभा में CPI(ML) के केवल तीन विधायक हैं।

2019 लोकसभा चुनाव में बिहार के साथ समूचे CPI को कन्हैया कुमार को लेकर बहुत उम्मीद थी लेकिन उसपर भी पानी फिर गया और कन्हैया कुमार बड़े अंतर से चुनाव हार गए, चुनाव से पूर्व बहुत लोगों का कहना था की राजद को बेगुसराय सीट कन्हैया कुमार के लिए छोड़ देना चाहिए लेकिन राजद ने एसा नहीं किया और आप चुनाव नतीजों पर नज़र डालेंगे, तो राजद और कन्हैया कुमार का वोट जोड़ भी देंगे तब भी भाजपा बहुत आगे दिखाई देती है।

वाम दलों का भी था एक दौर
एक दौर था जब वाम दलों के पास बिहार विधानसभा में 25-30 विधायक और लोकसभा में 4-5 सांसद हुआ करते थे। 1969 विधानसभा चुनाव में CPI के 25 विधायक चुनाव जीतने में कामयाब हुए और जब किसी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ तो CPI के समर्थन से दारोगा प्रसाद राय के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी।

1972 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद CPI दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरा और सुनील मुखर्जी प्रतिपक्ष के नेता बनाए गए थे। वामपंथ लगातार हर विधानसभा में अपनी स्थिति का एहसास करवाता रहा 1990 के विधानसभा चुनाव में वामपंथ CPI, CPI(M) और IPF जो बाद में CPI (ML) में विलय हो गया क्रमशः 23, 6 और 7 सीट जीतने में कामयाब हुआ।

उधर जनता दल की सरकार को समर्थन देकर लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने में भी वामपंथियों अहम भूमिका रही। इस चुनाव के एक साल 1991 में होने वाले लोकसभा चुनाव में वामपंथी दलों CPI 8 सीट और CPI(M) 1 सीट जीतने में कामयाब हुई जो वामदलों के लिए अबतक की बिहार में सबसे बड़ी कामयाबी रही।

1995 विधानसभा चुनाव में CPI, CPI(M) और CPI(ML) को क्रमशः 26, 2 और 6 सीट जीतने में कामयाब रही। इसके बाद 1996 के लोकसभा चुनाव में भी CPI के 3 सांसद जीतने में कामयाब हुए इन दोनों नतीजे का मुख्य कारण लालू यादव के जनता दल के साथ CPI और CPI(M) गठबंधन में चुनाव लड़ना रहा और मधुबनी से चत्रूहन मिश्रा यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में मंत्री भी बने।

इसके बाद से अबतक बिहार के किसी भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों के लिए कोई सकारात्मक नतीजा आया। अब 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में वामदल CPI, CPI(M), और CPI(ML) महागठबंधन के साथ चुनाव में जाएगें अब देखना होगा कि इस बार क्या होता है?

कभी गरीबी और ज़ुल्म के विरुद्ध मजबूत आवाज़ माना जाने वाला वामपंथ अब खुद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। गरीबी तो नहीं हटी लेकिन गरीबों ने वामपंथ का साथ छोड़ दिया। एक समय एसा था देश की संसद में 45-50 सदस्यों वाले वामपंथ के पास आज संसद में केवल 5 सदस्य बचे हैं।

वामपंथ का मजबूत किला माना जाने वाला पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा भी अब ढह चुका है। वर्तमान में वामपंथ के पास केवल एक राज्य केरल है लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद केरल से भी संकेत सही नहीं हैं, क्योंकि राज्य में सरकार होने बावजूद लोकसभा चुनाव में वामपंथ को केरल के 20 लोकसभा सीट में से केवल एक सीट पर संतोष करना पड़ा जबकि पार्टी के जो 4 और सदस्य हैं, वह तामिलनाडु में कांग्रेस-डीएमके के गठबंधन के कारण मिल पाए हैं।

दक्षिण भारत के राज्य आंध्रप्रदेश में भी वामपंथ की पकड़ ठीक ठाक थी लेकिन अब वहां भी समय के साथ परिवर्तन आया और ज़मीन खिसक चुकी है लेकिन समय बदलने के साथ-साथ वामपंथी दलों का अस्तित्व भी कमज़ोर होने लगा। 2004, 2009, 2014 में CPI और CPM के पास लोकसभा में 53, 20 और 10 सीटें थीं और 2019 के लोकसभा चुनाव में घटकर 5 सीटों पर सिमट गईं।

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